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Sheetkal Ke Pad

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Kirtan Title
Page
Kirtan
Raag
Nhaat balkunwar kunwar giridhari..
Part2-038
न्हात बलकुंवर कुंवर गिरिधारी॥ जसुमति तिलक करत मुख चुंबत आरती नवल उतारी ॥१ ॥ आनंद राय सहित गोप स्व नंदरानी द्जनारी॥ जलसों घोर केसर कस्तुरी सुभग सीसतें ढारी ॥२ ॥ बहोर करत श्रृंगार सबे मिल सब मिल रहत निहारी चंद्रावलि ब्रजमंगल रसभर श्रीवृषभान दुलारी ॥३ ॥ मनभाये पकवान जिमावत जात सबें बलहारी॥ श्रीविद्दलगिरिधरन सकल ब्रज सुख मानत छोटी दिवारी ॥४ ॥
Devgandhar
Poot maherko khirak dohawat gaiya.
NityaPad-065
पूत महेरको खिरक दोहावत गैया। संध्या समें बांधे फेंटा गरे गुंजमाल पहेरे तनिया ठाडे हें अधपैया ॥|१॥ कोंधनि बनि हाथ हंसतातर रूप मोहनी मदन हरैया। रसिक प्रीतमकी बानिक निरखत लीजे रीझ बलैया ॥।२॥
Hameer
Praatsamay uthh kariye shrilakshmansut gaan ..
NityaPad-001
प्रातसमय उठ करिये श्रीलक्ष्मणसुत गान ॥ प्रकट भये श्रीवल्लभप्रभु देत भक्तिदान ॥१॥ श्री विद्लेश महाप्रभु रूपके निधान ।॥ श्रीगिरिधर श्रीगिरिधर उदय भयो भान ॥ २॥ श्री गोविंद आनंदकंद कहा वरणो गुणगान॥ श्रीबालकृष्ण बालकेलि रूप ही सुहान ॥ ३॥ श्रीगोकुलनाथ प्रकट कियो मारग वखान ॥ श्रीरधुनाथलाल देख मन्मथ ही लजान ॥४॥। श्रीयदुनाथ महाप्रभु पूरण भगवान ॥ श्रीधनश्याम पूरणकाम पोधीमें ध्यान ।।५॥ पांडुरंगविट्डलेश करत वेदगान ॥ परमानंद निरख लीला थके सुर विमान ॥।६।।
Bhairav
Virajat gwalmandali aho balmohan chhaake khaat .. silaa
NityaPad-204
विराजत ग्वालमंडली अहो बलमोहन छाके खात ॥ सिला ओदन जंघन रोटी अंगुरिन बिच फलधरे और गोरसके पात ॥१॥ काहूको ले देत स्थाम काहूको डहकाबत कोऊ झटक खातहाथतें तब लालन मुसकात जात ॥ रामदासप्रभुकी लीला लख कहत शिवब्रह्मादिक हम न भये अहीर ब्रजमें योंकहि कहि पछितात ॥२॥
Saarang
Rangmahal podhe peeya pyaari .. nain gulal lagyo
Part3-363
रंगमहल पोढे पीय प्यारी ॥ नैन गुलाल लग्यो प्रीतम के ले अंचल पोंछत जतनन कर श्रीवृषभान दुलारी ॥१॥ रीझ रीझ मिलवत भौंहन अंग कछु सकुच जिय लाज बिचारी ॥ कुंभनदास प्रभु गोवर्धन धर हिय लगाय लई सकुमारी ॥१२॥
Bihag
Chala vrishbhan sutaa sojhikon aaee houn dekh phool rahey phool ..
Part1-266
चल वृषभान सुता सॉझीकों आई हों देख फूल रहे फूल ॥ और सखी सब गईं ल्र#ती मोहि मिलीं कालिंदी कूल ॥१॥ हों पठई उन बोलन तुमकों आतुरगति आई हों दौर ॥ बेगि चलौ छिन बिलेंब करौ जिन वे सब चुनचुन लैंगी तोर ॥२॥ बरन बरन बिविध भाँतके फूले कुसुम शोभा देत ॥ तजि स्वारथ हों अपनो आई भलौ मनावन तुहारे हेत ॥३॥ कहा तेरो नाम कौन की बेटी अबल्ों हम देखी नहिं बाल ॥ कीनी भली भें तुम आईं काज परायौ करत कृपाल ॥४॥ रूपरास दुति कांति कृपानिधि देखियत हैं तुम परम उदार ॥ या छबिकी पटतर कोऊ नाहीं कोटिक चंदा डारों वार॥५॥ * बास नंदगाम है मेरौ श्यामा श्यामा सब कोऊ कहत ॥ तु प्रताप वृषभान बांह बल बहुत बरस भये व्रजमें रहत ।॥६॥ मैयासों मिस कौन बने हो तुम प्रवीन कछु करो उपाय ॥ ले चल मोहि मिलवो रानीसों करें उन मन भायौ दाव॥७॥ तब बोली राधा कीरतिसों तोहि मैया कोऊ बोलत द्वार ॥ बोल लेहु गृह काज करत हों ताहि बोलिये भवन मैँँझार ॥८॥ तब श्यामा कीरति पै आईं देखतही मन रहौ लुभाय ॥ दे असीस नीके आदर कर ढिंग बैठारी मोद बढ़ाय ॥९॥ बूइयौ नाम काज कहा आईं कीरति बोली हित उपजाय ॥ स्यामा नाम कहत हैं मेरी तबहीं बोली मूदु मुसिकाय ॥१०॥ आई डार कुँवरि कर कंकण पायौ है रखवारे हाथ ॥ बीनत फूल काल्‍्ह हम सबही राधा सहित हतीं सब साथ॥१ १॥ इन न रही सुध गिरत न जान्यों हों रही इकटक नयनन तान ॥ अनबोली हैं है रही रानी यों मनमें नहीं जान पहिचान ॥१२॥ अब हौं आज गई फूलनकों तब माली बोल्यौ यों माय ।| आररी कुँवरि सुता तू कहाँकी कहा ढूँढ़त हीं देहु बताय ॥१३॥ मैं कह्यौ वीर गयौ एक कंकण राधा गई है काल्‍्हकी डार ॥ तब उन कह्मौ बोलि उन लावो ताकों ताहि नीके देहुँ संभार ॥१४॥ ततछिन अति आतुर उठ धाई काज करन हित तुम्हरे पास ॥ राजकाज ज्यों कछु बनि आदे बोल भलाई और न आस ॥१५॥ तब कर जोरि कह्मौ तुम हो धन्य कीरति बोल कुँवरि दई संग ॥| अति आनैंद बढ़बौ दुहुन मन फूले समात नहीं अंग अंग ॥१६॥ ललिता संग कुँवरिके दीनी आवोगी उलट सब बेग ।! स्यामा सब बिध तुम प्रवीन हौ तुम विश्वास सब तज्यौ उद्वेश ॥१७॥ लै संग जाउ आउ पौंहचावन तब घर जाउ आपने काज ॥ तुम निश्चित निधरक रहौ मनमें आऊँ लै अब सुखके साज ॥१८॥ पहुँचे जहाँ सघन गहेवरबन ललित लता द्रुम गहबर माँहि ॥ जान एकांत चाह चित्त क्रीड़ा तब प्यारी धर गरेमें बाँहि ॥१९॥ देख्यौ स्थल प्यारी सुंदरवर चाहें हियेमें करन विनोद ॥ परसत अंग मदन व्यापत तब चितवत प्यारी श्यामाकोद ॥२०॥ ललिता ललित बचन हँस बोली ए छलिया पहिचानत नाहिं ॥ मैं तो जान रही कबहीकी समझ रही मनही मनमाँहिं ॥२१॥ क्‍यों न कही पहिलें सखी हमसों तुमही हमसों करत दुराव ॥ ऊपरतें अनखत ललितासों मनमें आनंद उपजत चाव ॥२२॥ ससमें बिरस क्यों करत लड़ैती यो बोली ललिता करजोर ॥ तब सुध बुध कैसेंके रहिये जब विधिना लैहें चितचोर ॥२३॥ तिय पट पलट देहु हरि मोकों पिय प्यारी कीजै कल केलि ॥ कुसुम शैया ललिता रचि कुंजन आप भई इत उत दोउ मेलि ॥२४॥ कर ओली चोलीकी बीनन गई कुसुम ललिता बनमाँझ ॥ . रति रस विलस निकस कुंजनतें पिय प्यारी आये लखि साँझ ॥२५॥ उत सब सखिन लखी ललिता जब हँसत हँसत आई ता पास ॥ बूझत आज अकेली क्‍यों तूँ राधा छाड़िकें करत बिलास ॥२६॥ यह पट पीत कौनकौ लहेंगा प्रकट जनावत बदन बिकास ॥ हम कहाँ कहत दुरावत हौ क्‍यों मेंटो भलें तुम मन्मथ प्यास ॥२७॥ तब ललिता टेरी मनमोहन आय घिरी सब ब्रजकी बाल ॥ आलिंगन चुंबन दे हरिकों चोरी राधाकी नंदलाल ||२८॥ मिल सब गईं लाजकी मारी इत राधा मन रही लजाय ॥ डलिया फूलनकी आगें धरि सब बिधि मिल लीनी बतराय ॥२९॥ अब घर चलौ बेर ढ्वै जैहै तो खीज बाबा वृषभान ॥ बहुरि सखीकौ भेख श्याम कर सखियन लै पहुँचे घर आन ॥|३०॥ कीरति आई द्वार गान सुन अरघ दियो अरु आरति बारि ॥ भवन माँझ लै स्यामा बोली ढिंग बैठारी कर बलहारि ॥३१॥ साँझ भई अब जिन घर जैयो रहियो सोय आज यहाँ रात ॥ सॉँझी खेल कीजिये व्यारू करजु कलेऊ जैयो प्रात ॥३२॥ शंक न करी निशंक खेली घर अपनी तुम मनमें जान !| कहत सबै बशकीनी कीरति नई सखी भइरी मनमान ॥३३॥ लीपभीत चंदन गोबर रचि चित्रित सॉझी धरी बनाय ॥ जो देखत सोई रहत चक्रत द्वै कहत और नहीं त्रिभुवन माँय ॥३४॥ धूप दीप नैवेद्य भोग धर करत आरती दोउ कर जोर ॥ चिरजीवो राधा श्री श्यामा हरें हरें यों कहें तृण तोर ॥३५॥ कीरति कहत करो अब व्यारु भूखी हौ जो सबै सुकुमार ॥ सब प्रताप तिहारौ घर रानी अब जैहै बहु भई अबार ॥३६॥ भल्रौ भद्र सिदौसी अईयो भुवन तुमारे तें उठि भोर ॥ दै असीस सब चलीं सखी घर बिहरत दंपति संग बरजोर ॥३७॥ लस्‍ियो जिन राधा श्री श्यामा तुम सोय रहौ मेरी पलक डार ॥ ललिता पानीको ठिंग रहियो कीरत सोई अपने दरवार ॥३८॥ सुरत केलि सब विधि सुख लूट्यो मिसहिं मिस दोऊ परम विचित्र || केतिक बुद्धि श्रुति पार न पावत बरन सकै को अगणित चरित्र ॥३९॥ भोर भयौ जाये नरनारी सब जाग्यौं बरसानों गाम॥ करन कलेऊ कीरति टेरत राधा श्यामा लै लै नाम !४०॥ आलस भरे उनीदे दोऊ लेत जूंभाय अंग अकराय ॥ बदन पखार उठाय सेजतें अति हितसों भोजन करवाय ॥|४१॥ पेंड़ पाँच पहुँचाय दवारतें ललितासों कही यों पहुँचाय ॥ चिबुक परस सिर पर कर फेस्यी घर पठई श्यामा समझाय ॥४२॥ पूरन पुन्य फले ललिताके पहुँचावन मिस पायौ लाव ॥ मानों कसौटी कसत कनककों देखत को पायौ है दाव ॥४३॥ त्रिय वागौ पायो नौछावर आई उलटि घर रिश्ल रिझाय ॥ इत्त जसुमति सुतकों बूझत जब कहत बात मोहन समुझाय ॥४४॥ नयन सजल भरभर कर मींड्ृत बिगरी यों कहि तोतरे बोल ॥ मैया हम न बसेंगे ब्रजमें त्रजवासिनी मद मत्त अलोल ॥४५॥ गोपीजनकौ कृष्ण अति वल्लभ गहि बाँध्यो कर माखनचोर ॥ उपज्यौ हास सुनत सुत बतियाँ उर लायौ कर प्रान अकोर ॥४६॥ मेरे लालकों जो कोउ बाँयै बाँघूँ ताहे कोटिक बार ॥ चिरजीवी रसिकनकी जीवन पीवत नंद यशोमति जलवार ॥४७॥
Gori
Aaj ayodhya prakate raam..
Part2-257
आज अयोध्या प्रकटे राम॥ दशरथवंश उदे कक शिव विरंचि मुनि भयो विश्राम ॥ १ ॥ घर घर तोरन बंदनमाला चौक पूरे निजधाम॥ परमानँददासतिहिं अवसर बंदीजनके पूरत काम ॥२॥
Saarang
Aaj badhaabo dashrath rayaken chalo sakhee dekhan jaany..
Part2-260
आज बधाबो दशरथ रायकें चलो सखी देखन जांय॥ घरधर पुर आनंद भयो फुले अंग न मांय॥१॥ कौसल्याकी कुखिि कल्पतरु प्रकट भये श्रीरम॥ देवलोक और भुवलोकनमें पुरबन मनके काम ॥२ ॥ दशरथ भाग्य सराईयेहो कौसल्या बडभाग ॥ नरनारीसब गावहींहों उमग उमग अनुराग ॥३ ॥ युवती यूथ मिल आवहींहो हाथन कंचनथार॥ मानो कमलन शशि चढ चलेहो नृप दशरथ दरबार ॥४ ॥ मोतिनचौक पुरावही साथीये रचितदुवार। नेगलेंहि सब यों कहेंहोजीवोराजकुमार ॥५ ॥ बालक वृद्ध तरुण सबेहो भवन रहो नहि कोय॥ एसोदिन माई आजकोहो एसो जो नितहोय ॥६ ॥| भुषणवसन पहेरावहीहो निकसी देत असीस कुंदुंब सहित तुबसुत लाडिलेहो जीवो कोटिवरीस ॥७ ॥ जिनयाच्यो सोईदीनों हो छिनछिन बढतहुलास॥ रामललाके रूपपेहो बलबल गोविंददास ॥८ ॥
Gouri
Praat samain giridharanlal kau karati prabodh jasoda
Part3-020
प्रात समैं गिरिधरनलाल कौ करति प्रबोध जसोदा मैया ॥ जागौ लाल, चिरैया बोलीं, सुंदर मेरे कुँवर कन्हैया ॥१॥ हलधर संग लैहौ मनमोहन, खेलन जाउ ब्रिन्दाबन धाम ॥ क्रतु बसंत प्रफुलित अति देखियत सुंदर हे कालिंदी ठाम ॥२॥ जननि-बचन सुनति मनमोहन, आनँद उर न समाई ॥ “कृष्णदास' प्रभु बेगि उठे जब, जननि-जसोदा कंठ लगाई ॥३॥
Basant
Seetal
NityaPad-217
सीतल सदनमें जेंबत मोहनग्वाल मंडली लेसंग जोर ॥ सीतल छांहसीतल बिंजनभाव सीतलतन मुदीतहोतलेतकोर ॥॥१॥ सीतल सुगंधमंद बहत वायुसीतल अंग अरगजा लेप चंदन खोर ॥ सीतल होत नयन सीत अंग अंग चेन गिरिधर पर कुंभनदास डारत तुनतोर ॥२॥
Saarang
Chova mein chahal rahey hau laalan kahaan kahaan gaye raat dashahara
Part1-319
चोवा में चहल रहे हौ लालन कहाँ कहाँ गये रात दशहरा मनावन ॥ एकतें एक सुघर घोष नारी तुमतौ छैल गिरिधारी सबहिन के मन भावन ॥१॥ कर माँझ कर लीनौ हँसि एक बीरा दीनौ ले लै-नाम लागे भोही पै गिनावन ॥ धोंधीके प्रभु बिनु सुभट ईत्त जनावत बातन बतरावत जात सखी आई समुझावन ॥२॥
Bibhas
Kahatkahat shashi raingai nahin maanat piya pyaari hoe..
NityaPad-321
कहतकहत शशि रैनगई नहिं मानत पिय प्यारी हो॥ समुझाये समझत नहीं और खरी यह निठुर देखी भारीहो ॥ १ छलबल बुद्धि में केते कीनों मेरी तो चरणरसना हारीहो || अब नाहिं और उपाय कछु आपन चलियेजू गोविंदप्रभुजू विहारीहो ॥ २॥
Iman
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