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Sheetkal Ke Pad
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Kirtan Title | Page | Kirtan | Raag |
|---|---|---|---|
Horry rung bhar gaaven soee khilar duff liye bajaaven .. | Part3-336 | होरी रंग भर गावें सोई खिलार डफ लिये बजावें ॥
गाय गाय के रंग उपजावे जोई रीझे ताकों फेर सुनावे ॥१॥ सबे अरगजे
मरग जे बागे नयन से न दे रस उपजावे ॥ कहियत नायक दक्षण-लक्षण
आप गदाधर नाम कहावे ॥२॥ | Nayaki |
Jayati lakshman tanuj krishna badnanal | Part2-291 | जयति लक्ष्मण तनुज कृष्ण बदनानल
श्रीएलंमागारु गर्भरत्ने। दैवीजन समुध्यृति करुणकृति निजाविर्भाव
विहित बहु विविध यत्नें ॥१ ॥ महालक्ष्मीपत्ती गोपिकानाथ श्रीविद्ठलाभिद्य
सुभग तनुज ताते। प्रधित-मायावादवर्ति बदन ध्वंसि-विहित निजदासजन
पक्षपाते ॥२ ॥ पुष्टिपण कथनर चिताने कसुग्रन्थ मथित भागवत पीयूष
सारे। रासयुवती-भाव सतत भावित हृदय मानस जनित मोदभारे ॥३ ॥
निज चरण-कमल धरणी-परिक्रमण कृतिमात्र पावन वितत तीर्थजाले।
कृष्णसेवन विहित शरणगत शिक्षणा-क्षिप्त संदेहदासैक पाले ४ ॥ निज
वचन पियूष वर्षित सतत साहित्य पुरुषजन भृत्य-युक्ते विविधबाचो युक्ति
निगमवचनादितेरपिच दूरीकृत दुष्टजन द्ुरुक्ते ॥५॥ इदशे सति शिरसि
सर्वदा बलल्लभाधीश पद सकल कर्तरी दयालौ। कैब परिवेदना भवति
हरिदास जन सकल साधनरहित निज कृपालौ ॥६ ॥ | Sarang |
Gragrathung thung tita kitt thringan aeka charan karason bharein juu bhalein mridang | Part1-341 | ग्रग्रथुंग थुृंग तित किट थृंगन एक चरण करसों भरें जू भलें मृदंग
बजाबवै ॥ दूसरे कर चरणसों कठताल झंझंझ झपतालमें अब घर गरि
उपजावै ॥१।| कंठ सरस सुरहे गावै मोहन मधुरतान लाबै सकल कला पूरण
वृषभाननंदिनी पिय मनभावै ॥ गोविंदप्रभु पिय रिि रहे मुरझाई दशन दशन
धरकें रहसि उरसि लपटावै ॥२॥ | Iman |
Phooli chayan hulraavai yashoda juu lait balaiya . anoop paalnen | Part1-099 | फूली चायन हुलरावै यशोदा जू लेत बल ैया । अनूप पालनें
झुलाय हरखसों अंचल ओलि माँगे विधिनापै जियो मेरी कान्ह ललैया ।|१॥
यह व्रजनायक यह ब्रजशोभा गोपी ग्वाल गौ बच्छ पलैया | जगन्नाथ कविरायके
प्रभु माई सब सुख फलन फलैया ॥२॥ | Bilawal |
Gori gori gujariya gori see pyaari tein mohe | Part3-296 | गोरी गोरी गुजरिया गोरी सी प्यारी तें मोहे
नंदलाल || खेलन में हो हो जु मंत्र पढ डारचो तेंजु गुलाल ॥१॥ तेरी
सोंधे सनी अंगिया उरजन पर ओर कटि लहेंगा लाल ॥ उचरजात कंबहूंक
चलनमें जेहर ढिंग ऐडी लाल ॥२॥ तू सकल त्रियन में यों राजतहें ज्यों
मुक्तन में लाल ॥ न्याय चतुभुंज को प्रभु मोह्यो अधर सुधारस लाल ॥|३॥ | Gouri |
Brat dhari devi pooji .. jaake munn abhilash-naan dooji .. | Part1-312 | ब्रत धरि देवी पूजी ॥ जाके मन अभिलाष-न दूजी ॥
कीजै नंदपुत्र पति मेरे ॥ पैहों जो अनुग्रह तेरे ॥छंद॥ कर अनुग्रह बर दियी
जब बरस भरलों तप कियो ॥ ब्रैलोक्य सुंदर पुरुष भूषण रूप गुण नाहिन
बियौ ॥ इत उबटि सोल सिंगार सखियन कुँवरि चौरी जहाँ बनी ॥ जा हितके
ब्रत नेम संयम सोघरी बिधना ठनी ॥१॥ मुकुट रचि मौर बनायो ॥ मायें
धरि हरि वर आयो ॥ तन सांवल पीत दुकूले ॥ देखतही घन दामिनी
भूले ॥छंद॥ दामिनी घन कोटि बारों जब निहारों मुख छबि ॥ कुंडल विराजत
गंडमंडल नहीं शोभा शशि रवि ॥ और कौन समान त्रिभुवन सकल गुण जामाहिं
हैं ॥ मानों मोर नाचत संग डोलत मुकुटकी पर छांहिं हैं ॥२॥ गोपी सब
न्योतें आई ॥ मुरली धुनि पड़े बुलाई ॥ जहाँ सब मिलि मंगल गाये | नव
फूलनके मंडप छाये ॥छंद॥ छायेजु फूलन कुंज मंडप पुलिनमें बेदीरची ॥
बैठेजु श्यामा श्याम वर जैलोककी शोभा सची ॥ उत कोकिलागण करें कुलाहल
इत सबें व्रजनारियां ॥ आईजु न्योंते दृहददिशतें देत आनंद गारियां ॥३॥
रासमंडल भुज जोरी ॥ स्याम सांवरे श्रीराधागोरी ॥| पाणि ग्रहण विधिकीनी॥
तब मंडप भ्रम भांवरदीनी ॥ दीनीजु भांवर कुंजमंडप प्रीति गांठ हृदय परी ॥
शरदनिश पून्यो विमल शशि निकट बृन्दा शुभघरी || गायेजु गीत पुनीत सखियन
वेद रुचि मंगलध्वनी ॥ नंदसुत व्रषभान तनया रासमें जोरी बनी ॥॥४॥ जहाँ
मन्मथसेन बराती ॥ तहाँ द्ुम फूले नाना भांती ॥ सुर बंदीजन यश गाये ॥
तहां मघवा वाजित्र बजाये ॥ वाजित्र बाजे शब्द नभसुर पुष्प सजुली ली बरखहीं ॥
देव व्योम बिमान बैठे जय शब्द करकें हरखहीं ॥ सूरदासहिं भयौ आनंद पूजी
मनकी साधिका ॥ मदन मोहनलाल दूल्हे दुलहनि श्रीराधिका ॥५॥ | Bilawal |
Viharat jall jamuna russ bheene.. maano matt gaj | Part2-341 | विहरत जल जमुना रस भीने॥ मानो मत्त गज
राज परसपर करीनी जुथ संग लीनें ॥१ ॥ तिन में वृषभानु दुलारी नील
सुरंग पट झीनें ॥ राजत रास रमन द्विज दंपति मोहित कर बस कौनें ॥२ ॥
उभय बदन पर जल कनिक मानों, जलज सरस छबि छोनें ॥ 'सूर' आरज
हित अवलोकत मोहित सजमनी प्रेम धन दीनें ॥३ ॥ | Bilawal |
Kankari kaanh mohi maare .. tendhi chitwan motan | Part3-239 | कांकरी कान्ह मोहि मारे ॥ टेंढी चितवन मोतन
चितवत लोट-पोट करडारे ॥१॥ हूं गुरुनन की लाज करत सखी निकसत
निपट सबारे ॥ वरज्यो न मानें नंदको कोऊ कह्ि पचिहारे ॥२॥ कहा करूं
कित जाऊं सखीरी को यह न्याव विचारे रसिक राय प्रीतम की बातें इतनी
कोन सहारे ॥३॥ | Sarang |
Anandsindhu badhyo hari tanamen .. radhamukh pooranshashi nirakhat | NityaPad-225 | आनंदसिंधु बढ््यो हरि तनमें ॥ राधामुख पूरणशशि निरखत
उमग चल्यो ब्रज बूंदावन में ॥।१॥| इत रोक््यो यमुना उत गोपिन कछु एक फैल
पर्यो त्रिभुवनमें । नापरस्यो करमठ अरुग्यानी अटक रहो रसिकन के मनमें || २॥।
मंदमंद अवगाहत बुद्धि बलभक्त हेत लीला छिनछिनमें ॥ कछु एक लझ्यो नंदसूनू
कृपातें सो देखियत परमानंदजनमें ॥३॥ | Saarang |
Horry kakanh piyari ranamage horry khele ree .. | Part3-339 | होरी ककान्ह पियारी रणमगे होरी खेले री ॥
उड़त गुलाल मानो अरून उदित रवि कमल कनक की बेले री ॥ १॥ जमुना
तट द्रुम कुसुम माथुरी करी सुगंध की रेले री ॥ 'ब्रजाधीश' प्रभु अलि
धुुनि गावत गावत रतिपति छबि पेले री ॥२॥ | Iman |
Jhoolati doll gopal sanga nava nagri chala nava | Part3-378 | झूलति डोल गोपाल संग नव नागरी चल नव
नागरी || इंदु-बदनी मृग नैंनी सबे गुन आगरी ॥ चलि नवनागरी | १॥ रत्न
खचित द्वे खंभ के ही राजही ॥ चोकी हेम जराय के बहु विधि साज ही
॥२॥ कदली मोर अंब पाँति द्वे परम सुहाव ही ॥ विविध कुसुम रंग बोरी
के अति मन भाव ही ॥३॥ चहूं दिस गोपी ग्वाल सखा संग सोह
ही ॥ निरख वदन तन हेर सबे मन मोह ही ॥४॥ ताल मृदंग उपंग बैनु
बहू बाज ही ॥ ढफ दुंदुभी कठ त्ताल मधुर सुर गाज ही ॥५॥ केसर कुंमकुम
घोर मृगमद सान के ॥ प्यारी को छिरकति पिचकारी जान के ॥६॥ सुरँंग
गुलाल अबीर उड़ावत भामिनी || बरन-बरन भये बसन कियो दिन जामिनी
॥७॥ दुहूँ दिस बाढ्यों खेल पोरि बृजराय के ॥ प्यारी दियो अरगजा ढोर
स्यथाम सिर धाय के ॥८॥ फगुवा देऊक कुमार के हम ही मँगाय के ॥ मेवा
बसन आभूषन बहुत मिलाय के ॥९॥ यह विधि खेलत रंग रह्यो परे ॥
जसोमति अति अभिलाष सों आरती करे ॥ १०॥ जुग-जुग अविचल जोरी
के नित बिहार ही ॥ “श्री विड्डल' पद रज हरि जिन सिर धार ही ॥१ १॥ | Dhanashri |
Nandasadangurujanaki bheertaamen mohanavadan | NityaPad-089 | नंदसदनगुरुजनकी भीरतामें मोहनवदन
नीकेदेखननपाऊं।। विन-देखें जिय अकुलायजाय दुःखपाययद्यपि बडरेछिनछिन
उठधाऊ ॥१॥ ले चलरी सखीमोहियमुनाके तीरजहांहोय बलबीर देखदूग
सिराऊं॥ नंददासप्यासेकों पानीपिवायलेजिवायलेजीयकी जानतहो तोसों
कहांलो जनाऊं ॥। २।। | Ramkali |
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