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Sheetkal Ke Pad
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Kirtan Title | Page | Kirtan | Raag |
|---|---|---|---|
Pragat bhaee shobha tribhuvanaki shrivrishbhan gopaken aaee. adbhut | Part1-187 | प्रगट भई शोभा त्रिभुवनकी श्रीवृषभान गोपकें आई। अद्भुत
रूप देखि व्रजबनिता रीझ्नि रीक्षिकें लेत बलाई ॥१॥ नहिं कमला नहिं सची
रति रंभा उपमा उर न समाई । जातें प्रगट भये ब्रजभूषण धन्य पिता धनि
माई ॥२॥ युगयुग राजकरौ दोऊ जन इत तुम उत नैँदराई । उनके मदनमोहन
इत राधा सूरदास बलिजाई ॥३॥ | Saarang |
Ratipati dey duhkh curry ratipati saun .. tuun tau merrie | Part3-355 | रतिपति दे दुःख करि रतिपति सौं ॥ तूं तौ मेरी
प्यारी और प्यारे हु की प्यारी उठि चलि गज गति सौं ॥१॥ दुती कैं बचन
सुनि कैं, मुसक्यानि, भूषन बसन सोंधो लियौ बहु भांतिसौं ॥ “कल्यान'
के प्रभु गिरिधर नागर धाई लई उर अतिसों ॥२॥ | Basant |
Anandarayaju kein param badhaayau. sabahin bhaag suhag sub neekau | Part1-045 | आनंदरायजू कें परम बधायौ। सबहिन भाग सुहाग सब नीकौ
महरि जसोदा जायौ ॥१॥ झुंडनि आवत मंगल गावत सुभग सिंगार कियौ ।
मुख आनंद चंद बरखाये होत प्रफुल्लित हियौ ॥२॥ लेत बलाय आछी रानीकी
जाति सबै बलिहार ॥ धरत सुधारि सवारि साथिये रोपत बंदनवार ॥३॥
छिरकत हरद दहीं रोरिनसों नॉचत किलकत ग्वाल ॥ लाल उधारे तनन बिसारे
अरु नांचत व्रजवाल ॥४॥ बांह उठायें कहत सुख पाये पूरे काज हमारे ॥
श्रीविहल गिरिधर शुह प्रगटे रायजू पुण्य तुम्हारे ॥५॥ | Sarang |
Hailey govardhandhari laal hailey nutber khelati | Part3-137 | हेली गोवरधनधरि लाल हेली नटबर खेलति
रँग भरचौ। हेली बन ठन साज समाज सौं मग निकसति दृष्टि परयो हेली
॥१॥ हेली सबन चित विहल भयौ जनु मन आकर्ष लयो री हेली ॥ हेली
अँग अँग अति सौहनौ स्याम लढ़ि रन छयो री हेली ॥२॥ हेली लाल
काछनी कटि तट वाके ललित टिपारो सीस हेली ॥ हेली वाके पटतर कहा
वीजै न््याव गोकुल कौ ईस हेली ॥३॥| हेली कौतिक लखि मन थकि रहौ जाके सँग सखा दस बीस हेली ॥ हेली इन अँखियन के भाग ते प्यारी
जीवह कोटि बरीस हेली ॥४॥ हेली बंक चितै मुसिकाई मो पै डारच्यौ अबीरन
आई हेली ॥ हेली निरतति नाना भाँति सौं तहँ ग्रीवा हार लटकाई हेली
॥५॥ हेली ग्रगतत-ग्रगतत थेई-थेई बोलै सबदन चटक लगाई हेली ॥ डेली
सौन गहे कछू कर चले माँनों मन-ही-मन डहकाई डेली ॥६॥ हेली हों
जु नैंकु ठाड़ी रही फिरि चितए मृदु मुसिकाई हेली ।| हा हा करि मोसौों
कह्यौँ तजि घुंघट मुख हि दिखाई हेली ॥७॥ हेली हों लाजन सकुचित
रही पचिहारे समुझाई हेली ॥ हेली कहनों होई सो कही लीजे हरि छिन
इत्त. उत नहिं जाई हेली ॥८॥ हेली होरी के दिन जानि के तहेँ नर नारिन
के ठाट हेली ॥ हेली साम दाम बिधि भेद सौं मेरो पाथर तर को हाथ
हेली ॥९॥ हेली जब तें प्यारे रुस गये तब तें कछू न सुहाय हेली ॥ हेली
कठिन-कठिन दिन भरति हूँ रजनी कलप सम जाति हेली ॥१०॥ हेली पूरे
पून्यन पाइवों सहज भई पहिचान हेली || हेली 'कृष्णदास' प्रभु सौं मिली
बर पायोौ जद॒कुल भान हेली ॥११॥ | Sarang |
Tum nandmeherke laal mohan zaan daiy .. raani jasumati praan | Part1-223 | तुम नंदमेहेरके लाल मोहन जान दै ॥ रानी जसुमति प्रान
आधार ॥ मोहन जान दै ॥धृ.॥ श्रीगोवर्धनकी शिखरतें मोहन दीनी टेरा॥
अंतरंगसों कहत हैं सब ग्वालिनि राखो घेर || नागरि दान दे ॥१|॥ ग्वालिन
रोकी ना रहें ग्वाल रहे पचहार ॥ अहो गिरिधारी दौरियों सो कह्मौ न मानत
ग्वार ॥२!। चली जात गोरस मदमाती मानों सुनत नहीं कान ॥ दौरि आये
मनभामते सो रोकी अंचलतान ॥३॥ एक भुजा कंकन गहैं एक भुजा गहि
चीर ॥ दान लैन ठाढ़े भये गहबर कुंज कुटीर ॥४॥ बहुत दिना तुम बचि
गई हो दान हमारौ मार ॥ आज हों लैहों आपनौ दिन दिनकौ दान सँभार॥५॥
रसनिधान नवनागरी निरख बचन मूदु बोल ॥ क्यों मुरि ठाढ़ी होत है घूँघटपट
मुखखोल ॥|६॥ हरख हियें हरि करखिकें मुखतें नील निचोल ॥ पूरन प्रगस्यो
देखिये मानो चंद घटाकी ओल ॥७॥ ललित बचन समुदित भये नेति नेति
यह बैन ॥ उर आनंद अतिही बढ़यौ सो सुफल भये मिलि नैन ॥८॥ यह
मारग हम नित गईं कबहूँ सुन्यौ नहीं कान ॥ आज नई यह होत है सो माँगत
गोरसदान )। मोहनजानदे ॥९॥ तुम नवीन नवनागरी नूतन भूषण अंग।॥
नयौ दान हम मॉगनो सो नयौ बन्यौ यह रंग ॥१०॥ चंचल नयन निहारिये
अति चंचल मूदुबैन ॥ कर नहीं चंचल कीजियै तजि अंचल चंचल नैन ॥११॥
सुंदरता सब अंगकी बसनन राखी गोय ॥ निरखि निरखि छबि लाड़िली मेरी मन
आकर्षित होय ॥१२॥ लै लकुटी ठाढ़े रहे जानि सॉँकरीखोर ॥! मुसक्कि
ठगौरी लायकें मोसों सकत न लई रति जोर ॥१३॥ नेंक दूरि ठाढ़े रहौ कछू
और सकुचाय ॥ कहा कियौ मन भांवते मेरे अंचल पीक लगाय ॥१४॥
कहा भयी अंचल लगी पीक हमारी जाय ॥ याके बदलें ग्वालिनी मेरे नयनन
पीक लगाय ॥१५॥ सूधे बचनन मॉगिये लालन गोरस दान |! मोहन भेद
जनायकैं सो कहत आनकी आन ॥१६॥ जैसें हम कछु कहत हैं ऐसी तुम
कहि लैहु ॥ मनमाने सो कीजिये पर दान हमारी देहु ॥१७॥ कहा भरें हम
जात हैं दान जो माँगत लाल ।| भई अवार घर जानदै सो छाँड अटपटी
चाल ॥१८॥ भरें जातहीं श्रीफल कंचन कमल बसनसों ढाँक ॥ दान जो
लागत ताही कौ तुम दैकर जाहु निशौक ॥१९॥ इतनी विनती मानियै माँगत
ओली ओड़ ॥ गोरसकौ रस चाखियै लालन अंचल छोड़ ॥२०॥ संग की
सखी सब फिर गईं सुनिहे कीरति माय ॥ प्रीति हिये में राखिये सो प्रगट कियें
रस जाय ॥२१॥ काल्ह बहोरि हम आई हैं गोरस लै सब ग्वारि ॥ नीकी
भाँति चखाइहों मेरे जीवन हों बलिहारि ॥२२॥ सुनि राधे नवनागरी हम न
करें विश्वास ॥ करकौ अमृत छाँडिकें को करै काल्हि की आस ॥२३॥
तेरी गोरस चाखिबै मेरी मन ललचाय ॥ पूरन शशि कर पायकें चकोरन धीर
धराय ॥२४)॥ मोहन कंचन कलशिका लीनी शीश उतार ॥ श्रमकन बदन
निहारिकें सो ग्वालिनी अति सुकुमार ॥२५॥ नव विंजन गहि लालजु श्रीकर
देत ढुराय ॥ श्रमित भई चलौ कुंज में नेंक पलों पाय ॥२६॥ जानत हों
यह कौन है ऐसी ढीठ्य देत ॥ श्रीवृषभान कुमारि हे अरी तोहि बीच को
लेत ॥२७॥ गोरे श्रीनंदरायजू गोरी जसुमति माय । तुम याहीतें सॉमरे ऐसे
लक्छिन पाय ॥२८॥ मन मेरों तारन बसै और अंजन की रेख |! चोखी
#% दान लीला के पद & # राग बिलावल # ३२५
प्रीत हियें बसे याते सॉवल भेख ॥२९॥ आप चालसो चालियै यहै बड़ेनकी
रीत ॥ ऐसी कबहुँ न कीजिये हँसें लोग बिपरीत ॥३०॥ ठाले टूले फिरत
हो और कछू नहिं काम ॥ बाट घाट रोकत फिरो आन न मानत श्याम ॥३१॥
यही हमारौ राज है व्रजमंडल सब टौर ॥ तुम हमारी कुमुदिनी हम कमल बदन
के भौंर ॥३२॥ ऐसे में कोफऊ आई है देखे अद्भुत रीति ॥ आज सबै
नेंदलालजू प्रगट होयगी प्रीति ॥३३॥ ब्रज वृंदावन गिरि नदी पशु पंछी सब
संग ॥ इनसों कहा दुराइयै प्यारी राधा मेरी अंग ॥३४॥ अंसभुजा धरि लै
चले प्यारी चरन निहोर ॥ निरखत लीला रसिकजू जहाँ दान मान की
ठोर ॥३५॥ | Bilawal |
Bhojan giridharlalko mainto yeh jaani .. darshan pyaari | NityaPad-300 | भोजन गिरिधरलालको मैंतो यह जानी ॥ दरशन प्यारी
रूपको पुतरिन रुचि मानी ॥ १॥ मृदु बोलन मीठी लगे भ्रोहन कटुकाई ॥ षघटरस
वारों कोटिलों दृग चंचलताई ॥२॥| चाहा छिनछिन चौगुनो जेंबत रुचि ज्योंही ॥।
जनभगवान युगल यश कहे तनमन त्योंहीं।। ३॥ | Kanharo |
Madanbhohan piya gawat raag kalyan .. | NityaPad-318 | मदनभोहन पिय गावत राग कल्यान ॥
बाजत ताल मृदंग संख ध्वनि गावत शब्द रसाल | १॥।
बीन बेनु मधुर सुर बाजत उपजत तान तरंग |
“रसिक' प्रीतम पिय प्यारे की छबि ऊपर वारों कोटि अनंग ॥२॥ | Kalyan |
Rasakon rasilo laal andoi dolai .. vraj kii | Part3-343 | रसकों रसीलो लाल एंडोई डोलै ॥ ब्रज की
बिथिनि बीच होरी खेलै।। केसर रंग अरगजा घोरै, पिचकाईन रँग रैले ॥१॥
सरब्री समाज झुंडन बीच रैँग रह्मों गुन प्रबीन रस काम को पेले ॥ 'सरस
रँग” पिय रस भरी राधे सुघर तान सँग झेले ॥२॥ | Kedaro |
Houn balihari aajki baanik parr. | NityaPad-062 | हों बलिहारी आजकी बानिक पर।
एवेत काछ काछे नंदनंदन शवेत टि पारो सोहत सिर पर ॥१॥
नख सीख लौं सिंगार कहा कहौं जमुना पुलिन ठाड़े कदमतर।
सुधरराय' प्रभु बेनु बजावत मोहि लिये सब व्रजनार ॥२॥ | Saarang |
Jaanat naheen kahaait daani .. »adhi dehu ghar jaay sawari | Part1-236 | जानत नहीं कहाइत दानी ॥ »अड़ि देहु घर जाय सवारी
झूँठी लाल तुम अरबी ठानी ॥१॥ नितही नित आवत यह मारग वातन ही
करि डारत घानी ॥ यह सुनि हँसि बोले नंटनंदन तू ग्वालिन अति खरी
सयानी ॥२॥ ऐसें वचन कहत नवनागरि निरखि बदन तन मुरि मुसिक्यानी॥
श्रीविद्ठलगिरिधिरनलालनें सबके अंतरघटकी जानी ॥३॥ | Bilawal |
Biharan biharat shyam dhanee.. nandanandan | Part2-352 | बिहरन बिहरत श्याम धनी॥ नंदनंदन
वृषभानु-नंदनी रति रस रीति ठनी ॥१ ॥ श्याम सरूप सन्यो प्रिय तन में
ज्यों घन तड़ित बनी॥ “कृष्णदास' गिरिधर रस-बस भए गुन गावत
रजनी ॥२ ॥ | Devgandhar |
Mahaa mohan dhota saanvarau hoe arrie merau leenon | Part3-222 | महा मोहन ढोटा सांवरौ हो अरी मेरौ लीनों
है चितचोर ॥ राजति आजु महारंण भीने ठाड़े हैं सांकरी खोर ॥ १॥ सोभित
रतन जटित पिचकाई अबीर भरै भरि फैंट ॥ संग खरे अनुराग भरे सो
भई है अचानक भैंट ॥२॥ ढुरि रहि ढीली पाग रंगीली कुंचित कच न
समाई ॥ चंचल नेन अरून अनियारे छबि भरे मुरि-मुरि जाई ॥ ३॥ जगमग
रहे सबनन कुंडल गंडन लग्यौ है गुलाल ॥ कान्ह कुंवर की मूरति देखें
चलि न सकत तिहिं काल ॥४॥ चितयौ काहू भांति सखियन करी हे मदन
सर घात ॥ पान भरे मुख हँसि मोसौं कही प्रेम लपेटी बात ॥५॥ रूप
ठगोरी किथौों अरगजा दियौ मोपै ढुरकाई ॥ बूका मंत्र मनौं पढ़ि डाओं
तन-मन लियौ अपनाई ॥६॥ भूली लाज कानि की सब सुधि चित न अनत
ठहराई ॥ 'राम राई' कहे चित भगवानैं स्याम कौ संग सुहाई ॥७॥
| Kafi |
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