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Sheetkal Ke Pad
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Kirtan Title | Page | Kirtan | Raag |
|---|---|---|---|
Shyam salone gaatahen kahuko dhota.. aaihun dekh khirak mukh | NityaPad-114 | श्याम सलोने गातहें काहूको ढोटा।। आईहूं देख खिरक मुख
ठाढो मकछु कहेनकी बात ॥१॥ कमल फिरावत नयन नचावत मोतन
मुरमुसकात ॥ छबिकेबल जगजीत गर्वभरद्योमेन मानों इतरात ॥ २।। नखसिख
रूपअमनूपरूप छबि कविपे वरन्यो न जात ॥ नंददास चातक की चोंचपुट सबधन
कैसे समात ॥। ३॥ | Adano |
Chadhbadh widder gaee angauang manveli terein sabani .. | NityaPad-120 | चढबढ विडर गई अंगऊअंग मानवेली तेरें सबानी ॥
हृदय आलवाल मध्य प्रकटभईरी आली प्रीतिपालीनीके कर छिन छिन रूसबो भयोपानी ॥१॥
कोनकोन अंगनते निरवारोरी आली अलक तिलक नयनन बेनन भ्रोहसों लपटानी ॥
नंददासप्रभु प्यारी दूती के वचनसुन छबीली राधे मंद मंद मुरमुसकानी ।२॥ | Kanharo |
Leele vrindaavan atee sunder ltili wellie param ruchikari | leele | NityaPad-067 | लीले वृन्दावन अति सुन्दर ल्तीली वेली परम रुचिकारी | लीले
कीर बिरछ पर सोहत लीले कोकत भोर सुढारी ॥१॥ लीली भूमि बनी अति
कोमल लीली तुलसी माला धारी। लीली बनी ब्रजकी वनिता अरु लीली चुरी
करन में सारी ॥ २।। लीलो सिंगार किये तन सोभित करन फूल बेसर मुक््ता री ।
चरन-कमल पर नूपुर बिछुबा छबि पर कृष्णदास बलिहारी ॥।३।। | Todi |
Vaahike bal thenu charawat .. vahai lakut jaaki vaha murali | Part1-282 | वाहीके बल थेनु चरावत ॥ वहै लकुट जाकी वह मुरली
वाते वे सुख पावत ॥१॥ वह अति निटुर वे बातें अतिही मिलिकें घात
बनावत ॥ बनही बनमें रहत निरन्तर ताहि बजावत गावत ॥२॥ वाके बचन
अमृत हैं इनकों ताहि अधररस प्यावत ॥ सूरश्याम बनवारी कहियत वह बन
बाँस कहावत ॥३॥ | Bilawal |
Hari karaten giriraj uttaayyon .. saat divas jall pralay sambhaayon ..1.. | Part2-094 | हरि करतें गिरिराज उत्ताय्यों ॥ सात दिवस जल प्रलय संभायों ॥१॥
ग्वाल कहत केसें गिरिधायों॥ केसें सुरपति गर्व निवार्यों ॥२ ॥
वच्रायुध जलवरष सिरानों॥ पर्यो चरण जब प्रभु करि जान्यों ॥३ ॥
यह करतूत करत तुमकेसें॥ हमसे सदां रहतहो तेसें ॥४ ।॥
हमहि मिले तुम गाय चरावत ॥ नंद यशोदा सुबन कहावत ॥५ ॥
देख रहीं सब गोप कुमारी॥ कोटि काम छबिपर बलहारी ॥६॥
करजोरत रवि गोदपसारे ॥ गिरिवरधर पति होठ हमारे ॥७ ॥
ऐसो गिरिगोवर्द्धन भारी ॥ कब लीयो कब धर्यो उतारी ॥८॥
तनक तनक भुज तनक कन्हाई॥ यह कहि उठी यशोदामाई ॥९ ॥
केसें पर्वत लियो उठाई ॥ भुज चांपत चुंबत लगाई ॥१९०॥
वारंबार निरख पछिताई॥ हंसत देख ठाडे ॥११॥
इनकी महिमा काहु न पाई।॥ गिरिवर धर्यों यहे बहुताई ॥१२ ॥
एक एक रोंम कोटि ब्रह्मांड ॥ रवि शशि गगन धरणि नव खंड॥१३।॥
यह ब्रज जन्म लियो केवार॥ जहांतहां जलथल अवतार॥१४॥
प्रकट होत भक्तनके काज॥ ब्रह्म कीट सबनके राज ॥१५॥
जहांजहां गांठ परे तहां आबे॥ गरुड छांड तासन्मुख खधावे ॥१६ ॥
ब्रजहीमें नित करत विहारन॥ यशुमति भाव भक्तन
कारन ॥१७॥ यहलीला इनकों अतिभाबे॥ देह धरें पुनपुन
प्रकटावे ॥१८ ॥ नेक तजत नहीं त्रज नरनारी ॥ इनके सुख गिरि धरत मुरारी ॥१९॥
गर्ववंत सुरपति चढआयो॥ वाम करज गिरि टेक उठायो॥२० ॥
ऐसेहें प्रभु॒गर्वप्रहारी। भुज चुंबति वशुमति महेतारी ॥२१॥
यह लीला जो नितप्रति गावे॥ आपुन सीखे और सिखावे ॥२२ ॥
सुनें सीख पढ मनमें राखे ॥ प्रेम सहित पुन मुखतें भाखे ॥२३॥
भक्ति मुक्तिकी केतिक आस॥ सदांरहत हरि तिनके पास ॥२४॥
चतुरानन जाको यश गावत॥ शेष सहस्नमुख जाहि वखानत ॥२५ ॥
आदि अन्त कोऊ नहि पावे॥ जाकों निगम नेतिनेति गावे॥२६॥
सूरदास प्रभु सबके स्वामी। शरण राख मोहि अंतर्यामी ॥२७ ॥ | Bilawal |
Aaj atishobhit haye nandlal ..| | NityaPad-177 | आज अतिशोभित है नंदलाल ॥|
कोर केसरी धोति पहेरे अरु उपरना लाल॥।१॥
चंदन अंग लगाय सांवरो उर राजत बनमाल ||
अति अनुराग भरी व्रजवनिता बलि बलि दास गोपाल ॥। २॥ | Saarang |
Gopkumar liye sanga hoe hoe horry khelein vrajnayak .. | Part3-206 | गोपकुमार लिये संग हो हो होरी खेलें ब्रजनायक ॥
इत ब्रज युवती यूथ मधिनायक श्रीवृषभान किशोरी ॥१॥ मोहन संग डफ
दुंदुभी सहनाईं सरस धुनिराजें | वीचवीच युवती मनमोहन महुबर मुरलीबाजें
॥श॥ स्याम संग मृदंग झांझ आवज आनभांत बजावें ॥ किन्नरी वीन आदि
वाजे साजे गनतन आवें ॥३॥ इतब्रज कुंवर करनि कर राजत रत्नखचित
पिचकाई ॥| उनकर कमल कुसुम नवलासी गावत गारि सुहाई ॥७॥ तब
मनमोहन युवती यूथपर विविध रंग वरखाये ॥ अति सुख फाग सोंझ लीने
उनये मानो नवघन आये ॥५॥ तव ललिता चंद्रावली मतोकर सुबल सेनदे
लीनों ॥ छलबल कर गिरिधर गहिवेकों यह मतोमन कीनों ॥६॥
सखा भेद गिरिधर गहिपाए भयो युवतिन मन भायो ॥ आंखि आंजि गुंथी वेनी
मृगनयनी भेष बनायो ॥७॥ फणजुवा के जहने मोहन मोतिन माल उतारी ॥
बंसी झटकि लई झुकि प्यारी अधरन की विलसनहारी ॥८॥ दीने छांडि
आप भायोकर श्याम सखन में आये ॥ तब मोहन समसर करवें कों बलदाऊ
पकराये ॥९॥ जब हलधर वसपरे युवतिनके केसर कलश नवाये ॥ जोई
जोई बिध उपजी जाके जिय तिहिं तिहिं भांतन चाये ॥६०॥ कीनो बीच
सुबल श्रीदामा दाऊ आनि छुडाये ॥ फगुवा देन कह्मो मन भायो ब्रजपति
टेर सुनाये ॥ १ १॥ तब ब्रजराज वसन भूषणले युवती यूथढिंग आये ॥ अति
आनंद वदन प्रफुल्लित दिये सबन मन भाये ॥१२॥ देत असीस सकल
ब्रजवनिता रसना नहीं लखे कोरी ॥ चिरजीयो मदन मोहन पिय श्यामा
गौर स्याम समजोरी ॥१३॥ | Kaafi |
Akeli bunn-vann doli rahee . gaain | NityaPad-207 | अकेली बन-वन डोलि रही । गाँइ
चरावत कहां रहे हरि काहूने न कही ॥ बडे सवारे निकसे घर तें पठ्यो माई
दही। भूख लगी ह्वै है लालन को दुपहर जाम सही ॥ इतनौ वचन सुनत
मनमोहन नागरि-बिथा लही। 'परमानंददास' कौ ठाकुर गोकुल रति निबही | | Saarang |
Sakhiyan ruchiruchi sez banaai .. | NityaPad-127 | सखियन रुचिरुचि सेज बनाई ॥
रंगमहलमें पेरेहें परदा धरी अंगीठी सुखदाई ॥१॥
सीतसमें ग्रीष्म ऋतुकीनी अतिसुंदर वरराईं ॥
श्रीविद्लगिरिधारी कृपानिधि पोढे ओढ रजाई ॥।२॥ | Bihaag |
Merey laadile gopal paudhi paalane jhulaauun ..tech.. dadhiki | Part1-102 | मेरे लाड़िले गोपाल पौढ़ी पालने झुलाऊँ ॥टेक॥ दधिकी
भधथन बेर मेरे सैंग जागे । मैं मथन कियो तोलों रहे जानु लागे ॥१॥ जसुमति
अतिही निकट हुलरावै । बाल विनोद प्रमुदित गावे ॥२॥ चौंकि चौंकि
जननीकौ बदन निहारें | धाम काम जाय जिन बारबार संभारें ॥३॥ कहुँ न
जाऊँ लाल तुमहिं हों लागी । जाहि जनें जग मैं भई हों बड़भागी ॥४॥
गोपकुल गायनको प्राण प्रतिषाल | सबको भावतौ मेरी सुलछिन लाल ॥५॥
नींद भरी स्वायवेकों माय अभिलाखै । उर क्षीर धारनकों रोक्ति रोकि राखै ॥६॥
महरि मुदित मन तृपति न पावै । मदनमोहन श्याम सुतहिं लड़ावै ॥७॥ | Aasawari |
Paudhe rung mahal govind .. | Pustak1-359 | पौढ़े रंग महल गोविंद ॥
श्रीराधिका संग सरद रजनी उदित पून्यौ चंद ॥१॥
बिबिध चित्र बिचित्र चित्रित कोटि कोटिक बंद ॥
निरख निरख बिलास बिलसत दंपती रसछंद ॥२॥
मलय चंदन अंग लेपन परस्पर आनंद ॥
कुसुम बीजना प्यार ढोरत सजनी परमानंद ॥२।॥। | Kedaro |
Sakal kalaa guna praveen arrie aeye doondaavan rung .. saa ree gumm | Part1-329 | सकल कला गुन प्रवीन एरी ए दूंदावन रंग ॥ सा री गम
प ध नी अलाप करत सरस उपजत अवधर तान तरंग ॥१॥ सीस टिपारों
कटि लाल काछनी वनजु धात विचित्र सोहे सुभग अंग ॥ गोविंद प्रभु के अंग
अंग परवारों कोटि अनंग ॥२॥ | Saarang |
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