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Sheetkal Ke Pad
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Kirtan Title | Page | Kirtan | Raag |
|---|---|---|---|
Adubhut nutt bhekh dharein naachat giridharanlal ughatat sangit tata | Part1-321 | अदूभुत नट भेख धरें नाचत गिरिधरनलाल उघटत संगित तत
थेई थेई थेई थेई ता थे ॥ लेत उरप मान लाग डाट सुधर तान आन आन
गननननननन गति बंधान साथे ॥१।| शरद निशा पूरनचंद त्रिविध वायु बहत
मंद खगमृग द्रुमवेली पत्र पत्र रटत राधे राधे ॥ युवत्तीमंडल समूह राग रंग अति
कौतूहल रामकृष्ण हित दामोदर चरण अंबुज आराधे ॥२॥ | Bhairav |
Sakal nish jaage kese mayan .. jaantahon kahaan kiye nandsut | NityaPad-050 | सकल निश जागे केसे मयन ।। जानतहों कहां किये नंदसुत
आनरमनि सुखचैन ॥॥१९॥ लटपटीपाग चालगति उलटी रसन अटपटे बेन ॥
लगत पलक उधरत न उघारे मानों खंडित रस ऐन ॥। २॥ आज रेन जागत भई सारी
अबहोनी दुख देन ॥ जानी प्रीति सूरप्रभु अब हम सुरत भई गति गेन ॥ ३॥। | Lalit |
Mandil bajyo ray baajyau sakal ghosh suhaayo gaaj . hamaare raay | Part1-052 | मंदिल बाज्यो रे बाज्यौ सकल घोष सुहायो गाज । हमारे राय
घर ऐसौ ढोटा जायौ जसुमति आज पूर मनके काज ॥१ ॥ सुनिसुनि चल्ीं
अली गुहयुहते सजिसजि नव सत साज । दधिघृत भरि काँवरि कॉंचे धरि आये
गोप समाज ॥१॥ धरि सिर दूब तिलक करि माँथे साथिये धरि दुहूँ वाज ।
भीतर जाय बदन निरखत ही बंधी प्रेम की पाज ॥३॥ श्रीवृषभान देत पट
भूषन धेनु देत व्रजराज । अविचल रहौ जमुनजल ज्यों थिर ब्रजजनके
सिरताज ॥४॥ | Malhar |
Sagare parr daan lagat atee bhaari .. merey danki baat buddy | Part1-258 | सगरे पर दान लगत अति भारी ॥ मेरे दानकी बात बडी
है काहपै जाय है न सेभारी ॥१॥ तुमही समझौ और को समझे जिन गाँठ
नवयुग धारी ॥ मेरो दान लागत गॉटनतर मोहि काहे सोंह तिहारी ॥२॥
कहा कहत ऐसी कौन जिन दान निवेरी सुधी चाल ॥ श्रीविद्डलगिरिधरनलाल
कहें तुमही मेरी सब ग्वाल ॥३॥ | Kanharo |
Horry khelati nandadularo mohan pitchkine rung | Part3-085 | होरी खेलति नंददुलारो मोहन पिचकाईन रंग
बरखत ॥ सुगंध अबीर अरगजा कुँमकुमा छिरकति नव पिय सरसत ॥ १॥
मृगमद अगर घोरि ज्वालिनी लै ललिता कपोलन परसत | सुठ सोभा
मुख भरचो लाल को धनि 'ब्रजजन”ः सुख दरसत ॥२॥ | Sughrai |
Chaliyen kunwarkanh | NityaPad-328 | चलियें कुंवरकान्ह
सरबी वेष कीजे ॥ देख्यो चाहो लाडिलीकों अबही देखलीजै ॥।१॥ ठाडीहैं
मंजनकियें आंगन अपने ॥ देखी न सुनी न ऐसी संपति सपने | २॥। बडे बडे वार
पाछे छूटे अति छाजे ं।॥ मानहु मकरध्वज चमर विराजें ॥ ३॥ वदन सलिलकण
जगमग जोती ॥ मानो इंदुसुधा तामें अपीमयय मोती ॥४॥ आधो मोतीहार चारु
उररह्यो लसी॥ कनक लताते मानों उदबहोत ससी |।५।। पुन सुरसरी सम मोतिनके
हारा॥ रोमावलि मिली मानो यम्ुुनाकी धारा।।६।। पीक झलकन सोहें सरस्वती
ऐनी ॥ परमपावन देखी मदनत्रिवेनी ॥७।॥। अंचलउडन छबि कहिये कवन ॥।
रूपदीप शिखा मानो परसी पवन ॥८॥ शिवमोहे जिन वह मोहनी जे कोई ।।
प्यारी के पांयनआज आनपरें सोई ॥।९॥ नंददास और छब्रि कहालों कहीजे |।
देखेंही बनेही लाल चल्योही चहीजे ॥१०॥ | Bihagaro |
Chhaak khaay bansibat phir chaley | NityaPad-218 | छाक खाय बंसीबट फिर चले
यमुना तट तहां जाय धोवत मुख धीर समीरन ॥
फैंटा खोल पोंछत हाथ सखा
सब लिये साथ चले जात दावानल खात मुख बीरन ॥१॥
गाय बच्छ चरत जहाँ कुसुमनकी लता तहाँ बैठे जाय ड्रमनबीच बोलत पीक कीरन ॥
चत्रभुजप्रभु सखनसंग गावत सारंग राग धुनसुन मृग आये घेर सुधन रही शरीरन ॥२॥ | Saarang |
Nandrayakon dhaadhi aayou . bhanurai ghar sutaa janam suni | Part1-206 | नंदरायकों ढाढ़ी आयौ । भानुराय घर सुता जनम सुनि
कुँवरिको मंगल गायो ॥१॥ महाराज वृषभानु जानि यों बड़घरनी बहुविधि
पहरायौ । हेम रत्न मुक््ता मणि भूषण पट दे याचकको मान बढ़ायौ ॥२॥
बड़े सिंघासन बैठे भानजू विप्रन दान दीयौ मन भायौ ॥ मागध चारन बंदीजनको
मान राखि कंचन झरलायो ॥३॥ | Ramkali |
Jenwat rangmahal giridhari .. saribran jugal kanakchoki dhari | NityaPad-084 | जेंवत रंगमहल गिरिधारी ॥ सरिब्रन जुगल कनकचोकी धरि
उपर कंचन थारी ॥ १॥| ललिता ललित परोसती रुचिसों दोऊ जन मन रुचिकारी ।
प्रीतत भरी सखी जल जमुना आन धरी जुग झारी ॥२॥ मंद मंद मृदु गावत
सहचरी सुन्दर सब धुनि न्यारी ॥ चहुंदिस द्रमलता मन्दिर पर कूजत सुक पीक
सारी ॥ ३॥ कर अचवन प्रभु नवल बिछावे बेठे ही रस भारी ॥ रच बीरी कर दे
परमानन्द हरख जाय बलिहारी ॥।४॥ | Saarang |
Aaj mohan rachee rasrus mandali .. udit pooran nisha naath | Part1-350 | आज मोहन रची रासरस मंडली ॥ उदित पूरण निशा नाथ
निरमल दिशा देख दिनकर सुता सुभग पुलिन स्थली ॥१॥ बीच हरि बीच
हिरणाक्ष माला रची तरुलता पिच्छ मानों कनक कदली रली || पवन वश चपल
द्रुम डुलनसी देखियत चारु हस्तक भेद भाँत भारी भली ॥२॥ चरण विन्यास
कर्पूर कुंकुम धूरि पूरि रही दिश विदिश कुंजनबनकी गली ॥ कुंद मंदार अरविंद
मकरंद मिलि कुंज पुंजन मिले मंजु गुंजत अली ॥३॥ गान रस तनक बाण
बेध्यो विषपान अभिमान मुनि ध्यान जिय दलमली ॥ अधर गिरिधरनके लाग
अनुराग मिल जगत विजई भई मुरलिका काकली ॥४॥ रसभरे मध्य मंडल
बिराजत खरे नंदनंदन वृषभानजूकी लली ॥ देख अनमेष लोचन गदाधर युगल
लेख जिय आपने भाग्य महिमा फल्ली ॥५॥ | Kedaro |
Saras gaabat laalan tribhangi .. raag kalyan mill churchery | Part1-339 | सरस गाबत लालन त्रिभंगी ॥ राग कल्यान मिल चर्चरी
ताल सों मधुर कर मुरलिका मोहन गुनंगी ॥१॥ रासमंडल मध्य सुबिध नाचत
वे अलाग लागन लाग जुबती जन संगी ॥ कोक संगीत सुखसिंधु सावल रत्न
नंदनंदन केलि मनन््मथ तरंगी ॥२॥ सप्तस्वर भेद अवघर तान मानसों मंद चाल
सुरति श्रीधर्म भंगी ॥ क्ृष्णदासनिनाथ लालगिरिधरनसों चल क्यों न मिलत
लोचन कुरंगी ॥३। | Hameer |
Sakhiyan sanga radhika beenat sumanan banmaanh .. saanjhi poojanakon | Part1-275 | सखियन संग राधिका बीनत सुमनन बनमाँह ॥ साँझी पूजनकों
आतुरही ठाढ़े कब की छोँह ॥१॥ सखी भेष दे मोहनकों लै चली आपने
गेह॥ पूछी कीरति यह को सुंदारि तब कहो मेरी सनेह ॥२॥ सॉँझी खेल
बिदाकर सबकों दोऊ पौढ़े सेज मझार ॥ सगरी राति सूर के स्वामी बसि सुख
कीयो अपार ॥३॥ | Gori |
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