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Sheetkal Ke Pad
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Kirtan Title | Page | Kirtan | Raag |
|---|---|---|---|
Kulhe kesari sheesh bunny ..| | NityaPad-057 | कुल्हे केसरी शीश बनी ॥|
कटि केसरी पिछोरा सोहत अद्भुत बान बनी ॥। १॥|
अंग अंग भूखन छबिराजत हीरा मानिकमनी ॥।
हरिदास प्रभु शोभा निरखत श्रीगोवर्धननाथ धनी ॥॥२॥ | Bilawal |
Radhaju shobha pragat bhaee . voondaavan gokul galiyanmein sukhaki | Part1-187 | राधाजू शोभा प्रगट भई । वूंदावन गोकुल गलियनमें सुखकी
लता छई ॥१॥ प्रति प्रति पद गोपुर कुंजनमें उपजी उपमा नई | कुंभनदास
गिरिधर आबेंगे आगें पठे दई ॥२॥ | Saarang |
Chandan paherat aavat haye navrang rangilo .. | NityaPad-235 | चंदन पहेरत आवत हे नवरंग रंगीलो ॥
चंदनकों तन पाग पिछोरा चंदन छबिही छबिलो ॥१॥
चन्दन की तन खोर कीए हें चन्दन लागत अरबीलो ॥
कृष्णदास प्रभु परम मनोहर लागत परम रसीलो ॥२॥ | Saarang |
Hoe hoe horry khele laal .. | Part3-171 | हो हो होरी खेले लाल ॥
एक जारि निपट उघारी गावत कौन टेव परी गोपाल ॥|१॥ पिचकारिन रंग भरत भराबत
मुख मांडत ले गुलाल ॥ 'कृष्ण जीबन लछीराम' के प्रभु संग लिये सब
ग्वाल बाल ॥२॥ | Dhanashri |
Doumil podhe | NityaPad-339 | दोऊमिल पोढे
कुंजमहल ॥ रत्नजटित पर्यक बसनमृदु पूरित कुसुम पहल ॥॥१॥ तैसीय पवन
त्रिविध सुखदायक तैसीये दामिनी सहेल ॥ गावतसखी विचित्ररीति गीत
रतिकरत माधुरी टहल ॥२॥ | Kedaro |
Naachat gopal sange prem sahit rasarange tatthei tatthei karate ghoshnagari .. | Pustak1-337 | नाचत गोपाल संगे प्रेम सहित रासरंगे ततथेई ततथेई करते घोषनागरी ॥
रूपरास अंग अंगे तततान वर सुधंगे लास्य भेद निपुण कोकरस उजागरी ॥१॥
लेत सुलप उरप तिरप अवनि उरज बदन फिरत मुखरिति मणि दाम मिले अलग लागरी ॥
क्ृष्णदास प्रभु गिरिधर मोह लीये सुवश कीये तरणि तनया तीर बधू गुणन आगरी ॥२॥ | Gori |
Milein kaba srivallabh key pyaare. | NityaPad-370 | मिलें कब श्रीवल्लभ के प्यारे।
जिनके हाव भाव प्रीति रस तीहूँ लोकते न्यारे।
कृपा समुद्र भरे अंग अंगमें उछलत रसको धारे।
माला तिलक विराजे अद्भुत करुनामय अनुहारे॥
कोटि जन्मके तम दुःख भाजत हृदयकरत उजियारे।
प्रेम पुलक कंठभरि आवबे सुख उपजावत न्यारे ॥
जापें कृपाकरे श्री गिरिधर तव इनकी अनुसारे ।
रसिकदास जिनकी विधि पैयत दोउ नेनके तारे। | Bihaag |
Houn kaisen yamuna jall jaaoonri hari motan herey.. | Part3-278 | हों कैसें यमुना जल जाऊंरी हरी मोतन हेरे॥
मेरे संग की जानदे तब मेरो ही मग घेरे ॥१॥ नीचो व्हे घूघट तके मेरे
सनन््मुख दर पन लाय ॥ मुख प्रतिबिंब निरख कें छिन छिन लेत बलायरी
॥श५॥ डणगर बुहारे कांकरीरी डारे दूर उठाय ॥ मधुर बन मोंसो यों कहे
चरणन जिन चुभजाय ॥|३॥ जबही हों गागर भरोंरी तबही पेठ अन्हाय |।
तूं जिन परसें सीतमें कही मोहीपें जु भराय ॥४॥ हँसकर कलश उचा बहीरी
मिसकर पकरे बांह ॥ क्यों हूं हटक्यो नारहे मेरी छलकर पकरे छांह ॥५॥
यद्यपि सकल ब्रज सुंदरि री सब सों खेले फाग ॥ मन ब च क्रम ब्रजईश
के नित मोहीसों अनुराग ॥६॥ | Sorat |
Curr pada gahi aungushtha mukh melat | prabhu paudhe paalnen akele | Part1-103 | कर पद गहि अऑंगुष्ठा मुख मेलत | प्रभु पौढ़े पालनें अकेले
हरि हँसि हँसि अपने रंग खेलत ॥१॥ मुनि भयभीत भयौं भुव कंपन बाढ्यौ
बड़ सायर जल झेलत । बिडरि चले जग प्रलय जानिके दिगपति दिगदंतों न सँकेलत
॥३॥ शिव सकुचत बिधि बुद्धि विचारत शेष सहख्न शीशन पग पेलत ।
वब्रजकी नारि तौ मरम न जानत समझि सूर शकट पग ठेलत ॥३॥ | Aasawari |
Madan mutt keenori matwaro | | Part3-003 | मदन मत कीनोरी मतवारो |
आवत नींद निशंक करन सब भर जोबन अति भरो ॥१॥
तेसिय सीत परत सखी हम पर कांपत हे तन सारो।
सोवा सेज देवकके साजसें अलसत अंग उघारो ॥२॥
कब आबवोें मेरे गृह वह प्रीतम प्रान हमारो ।
परमानंदप्रभु या जाडेको कीजे मुंह अब कारो ॥३॥ | Malkoos |
Bhojan karat nandlal sanga liye gwalball | NityaPad-206 | भोजन करत नन्दलाल संग लिये ग्वालबाल
करत हे ख्याल बैठे बंसीवट छेया ॥ पातनपें धर्यो भात दधि सान लिये हाथ
मांगत मुसक्यात जात सांवरे कन्हैया ॥१॥ बिंजन सब भांति भांति अनुपम
अति कही न जात रुचिसों करी खात मुदित पठड मैया ॥ छीत-स्वामी गिरिधर
पिया मधि मंडली बिच शोभित सबको मन मोहे निरखि निरखि लेत
बलैया॥२॥ | Saarang |
Aau raghuveeraki sharan angad kahai maani ray moodhgati bachan merau... | Part1-301 | आउ रघुवीरकी शरण अंगद कहै मानि रे मूढ़गति बचन मेरौ।॥
जाओ रे ज़ाऔ जब कोपि लंकेश कहे भुजन मेरी बस्यौ काल तेरौ ॥१॥ सुर
असुर नाग बलि जेते हैं जगत में इंद्र ब्रह्मा सबहि मैं नबाये ॥ बात अद्भुत सबे
और पाछें रही रीछ कपि लैन गढ़ लंक आये ॥२॥ वाम करकी यह अल्प
सी अंगुरी लंक गढ़ बंक छिनमें ढहाऊँ ।| कहा करूँ नेंक मोहि शंक रघुबीरकी
रंक तोहि मार अबही उड़ाऊँ ।।३॥ होहि ऐसौ बली काहे न मुग्ध बल बालिसे
बापकौ बैर लीनौ ॥ तातके भ्रातकी मात पत्नी करी शन्रुकी शरण जाय मूँड़
दीनौ ॥४॥ हुते मम तातके राबरे से लक्षण धर्मकी मेंड जिन तोर डारी ॥
परिरहें अब धूर ततकाल तेरे बदन राम अवतार खल दंडधारी ॥॥५।। सुनतही
बचन मानों फनग कौ फन चफ्यौ सिंघकी पूँछ सोबत मरोरच्यौ ॥| ज्वलित
पावक सदृश बीश लोचन विकल पटक भुज उठत मंत्री निहोरद्ौ।।६॥ जौ
लों आये ऐंड अभिमान मद धरत ग्रीवमें बंक दै दृष्टि डीठी ॥ सुर सुरी बंकुरी
भुजा रघुबीरकी जौ लौं मतिमंद तें नाहीं दीठी ॥७।। चपल बनचरकी जात
अति बोलनी कहा राजानसों बोल जानें ॥| छत्रकी छाँह इंद्रादि थर थर करें
बंक यह ढीट नहिं शंक माने ॥८॥ करूँ जिय शंक जो अधिक तोकों गिनूँ
जो कछु अपनपौ घट बिचारूँ ॥ भुजनसों पलटि दिगषाल सब दल मलूँ
धरनि नभछत्र जो फार डारूँ ॥।९॥ रहि रे सुभट समसेर अधसेरतू अपनकौ
बल जिय नहिं बिचारै | कहत परधान महाराज रावण बली अवबनि रहि
आभसों बाथ मारे ॥१०।॥ परच्नौ बलि द्वार परिहार वामन गदा किंकिरी कोर
है दै जिवायौ ॥ तात मम पालने आनि बाँध्यौ जबै रैपटन मार कैड़बार
खायौ ॥११॥ मरमकौ बचन सुन खेद हियमें भयौ चटपटी लाय भृकुटी
चढ़ावै ॥ है कोऊ सूर सामंत मेरी सभा मार लैहौं मंद नहिं जान पावे ॥१२॥
एक रैपट दियें मुकुट उड़ि जायँगे सभा सब चरणसों चाँपि डारूँ।। बालिकौ
पूत ह्लै शोच जियमें करूँ सिंघ द्वै में्क्न कहा मारूँ॥१३॥| करत अपराध
उत्पात छोटेनकूँ बड़ेनकूँ क्षमा भूषण कहावै ॥ जान देहु दूत अबलों न
मारथौ कहूँ पशुनसों लरत जिय लाज आबै ॥१४॥ सूर किशोर जब बालिनंदन
कहां शीश अब कौन तो सौं पचावै ॥ नेक धर धीर रणधीर रघुबीर भट देख
तरबार कैसी चलावै ॥१५॥ | Maru |
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