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Sheetkal Ke Pad
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Kirtan Title | Page | Kirtan | Raag |
|---|---|---|---|
Khelat naval vallabh piyhori .. raajat hain | Part3-325 | खेलत नवल वल्लभ पियहोरी ॥ राजत हैं
सब सभा सहित अरू जुरि आईं नवल किशोरी ॥१॥ रही ढर पाग लाल
भाल पर अरू अनुराग रंगसों चोरी ॥ रत्न जटित सिरपेच जगमगे रदह्यो
रवि निरख डोर रथ तोरी ॥२॥ चूनी चोली चुपरि चतुराइन चतुर नायक
तन पहरे सोरी ॥ विविध भांत सों धोता ऊपर वरन सके एसो कबि कोरी
॥३॥ मृगमद साख जवाद अरगजा ओर कपूर केसर ले घोरी ॥ दामिनिंसी
कामिनि प्राण वलल्लभकूं आई छिरकत हसत मुख मोरी ॥|४॥ मृदंग तालडफ
बीन बजाबत नाचत गावत हैं चडुओरो आओरी ॥ रह्यो अबीर छाय चहुंदिशते लसत
हैं कनक वरण तन गोरी ॥५॥ होत प्रसन्न निरख भक्तन तन मृदु मुसकाय
लेत चितचोरी ॥ भई रस मणन बदत नहीं काहू हैं अलबेली वेश न थोरी
॥६॥ श्रमित जान जब करत आरती तनमन प्राण न देत अकोरी ॥ मुरली
प्रभु बल्लभ सुखत्र निरखत रति पति ब्हे गई मति बोरी ॥७॥ | Kalyan |
Teree gopal runn-suro | jahi jahi firat pachaari saanvarau taheen | Part1-164 | तेरी गोपाल रन-सूरो | जहि जहि फिरत पचारि सांवरौ तहीं
परत है पूरो ॥ वृषभ रूप इक दानव आयो सो छिनु में लै मास्यो। दोऊ हाथ
: विषान गाढ धरि धरनी माँझ पछास्नौ ॥ कहत ग्वाल जसोदा के आगे भलो पूतु
तैं जायो ॥ है कोऊ इह बड़ो देवता लहनें गोकुल आयो । चरन कमल-रज बंदत
रहिये निसदिन सेवा कीजै ॥ बारंबार दास “परमानँद” हरि की बलईया लीजै॥ | Saarang |
Ghana bunn dwam phool sumukh nihaarai ..| ankur madhi | Part3-063 | घन बन द्वम फ ूल सुमुख निहारै ॥| अंकुर मधि
मदमत्त झुमति सख्री मिथुन मधुप कुल डारहि डारै ॥ १॥ कुहुकुह्ड पिक बोले
मदन सिंधु कलोलै बऊ बिहँग गावति अति सारे ॥ जुबती जूथ प्रति बिंबति
पिय उर मनिगन खचित बिमल बर हारै ॥२॥ गिरिधरि नवरँग सुनि सखी
तुब सँग चाहति बसंत विहारै ॥ 'कृष्णदास' प्रभु माधव मन हरि जीति
लैड रति मंत्र विचारै ॥३॥ | Basant |
Jopein srivallabh dharate naan roop .. | Part2-303 | जोपें श्रीवललभ धरते न रूप ॥
अर्थ श्रीभागवतको कहि सकतोको पतित परते सब कूप॥१॥
अघ गज बनवपु वसन न पावह नाम सुनत मृगभूष ॥
विष्णुदास चरणन छायातक अकुलानो भव धूप ॥२ ॥ | Nat |
Aaj gahwar bunn horry maani .. vrajrani vrajraj | Part3-350 | आज गहवर बन होरी मानी ॥ ब्रजरानी ब्रजराज
कुंवर जन सुरंग गुलाल उडानी ॥१॥ मानो उदित अनुराग सिंधु कुमुदमुखी
हित आनी ॥ “ब्रजाधीश' प्रभु प्रमुदित बधुनि कोटि काम छबि मानी ॥२॥ | Bihaag |
Aaj kamaneey navkunj vrindabipin madanmohan sukhad rasmondal rachyo .. | Pustak1-326 | आज कमनीय नवकुंज वृंदाबिपिन मदनमोहन सुखद रासमंडल रच्यो ॥
उदित उडुराज लख मुदित व्रजराजमुत प्रान प्यारी सहित विविध गति मति जच्यौ ॥१॥
मुकुटकी लटक कुंडलकी चटक भूकुटीनकी मटक पगपटक बरनी न परत ॥
हार उर रुरित कंकण ललित किंकिणी मुखर मंजीर ध्वनि सुनत जन मन हरत ॥२॥
एक तें एक ब्रज सुंदरि अधिक गुणरूप रसभत्त गिरिधरन संग स्वर भरत ॥
सबै जोबन भरी उरप पुनि तिरप संगीत गति अलग मति तत्त थेई थेई करत ॥!३॥
श्रवण सुन सुरबंधू मुरलिका काकली यद्यपि पति निकट तौऊ नॉँहि धीरज धरत ॥
रसिकमणि मुकुट नंदलालकी केलि यह गदाधर मिश्रके नेंक न मनतें टरत ॥४॥ | Khat |
Tereri manaayavete mananiko | NityaPad-323 | तेरेरी मनायवेते माननीको
लागत जौलों रहीआली तोौलों लाल लैआऊं ॥ तेरीतो रुखाई प्यारी औरको
हँसनो तोर मुखसोरेहू कलाको पून्योचंद बलजाऊं।॥। १॥ चल न सकत इन पगन
परत उत ऐसीशोभा फिर पाऊंकें न पाऊं॥ नंददास मोहि दृयदिश कठिन भई
देखबो करूं कैधों लाल ले आऊं॥२॥ | Kedaro |
Palana nand mahar ghar aayou . divya kanik bahu rattan | Part1-091 | पलना नंद महर घर आयौ । दिव्य कनिक बहु रतन
अमोलिक हीरा बहोत जरायौ ॥१॥ गजमोतिनके झूमका बनाये दक्षिन चीर
बिछायी । नखशिखलों सिंगार साँवरी पुलकित प्रेम झुलायौ ॥२॥ जसुमति
अति आनंदित वदनी विप्रन दान दिवायो । व्रजनारी आई झुंडन मिलि हरखित
मंगल गायो ॥३॥ सुरनर मुनि सब कौतिक भूले गगन बिमानन छायौ ।
सूरदास प्रभु शिशु छै पौढें गिरिधर श्याम धरायौ ॥४॥ | Ramkali |
Phool mahal mein baithe maadho sanga vrikhbhan dulari .. | NityaPad-267 | फूल महल में बैठे माधो संग वृख भान दुलारी ॥
फूलनहार सिंगार फूलन को फूल मुकुट शिर धारी ॥२॥
फूल सिंघासन फूलगेंदुवा फूलन बनी है तिबारी ॥
फूले गावत बेमु बजावत राग रंग रस भारी ॥२॥
फूले मधुप कोकिला कूजत फूले पवन सुखकारी ॥
श्रीविद्ठल गिरिधरकों निरखत अखियां टरत न टारी ॥२॥ | Kanharo |
Lalco rotty aur badee ... heing lagaay mirach putdino karube | NityaPad-078 | लालको रोटी और बड़ी ॥। हींग लगाय मिरच पुटदीनो करुबे
तेल तरी ॥१॥ आन कनिक द्वयविरिया छानी बेलन बेल करी पतरी ॥।
कटहरियाप्रभुको रुचि उपजी माखनसो चुपरी ॥।२॥। | Dhanshree |
Namo vallabhadhish pada kamal yugale sadaa vasatu | Part2-315 | नमो वल्लभाधीश पद कमल युगले सदा वसतु
मम हृदय विविध रसभाव बलितं॥ अन्य महिमा भास वासना वासितं मा
भवतु जातु निज भाव चलितं॥१॥ भजतु भजनीय मति शयित रुचिरं
चिरं चरण युगल सकल गुण सुललितं॥ बदति हरिदास इति माभवतु
मुक्तरपि भवतु मम देह शत जन्म फलितं ॥२॥ | Hameer |
Mohan paryori merey gonhan parchonandako chhona | Part3-208 | मोहन परयोरी मेरे गोंहन परचोनंदको छोना
मेरे गोहनपरथो ॥।भ्रु०॥ साँवरे कमलनयन आगेंदूकें आय ॥ लाजन के मारे
कहूँ गयोहू न जाय ॥१॥ याकी घाली मेरी आली कहो कित जाऊं ॥ बासुरी
में गावे जीत तामें मेरो नाऊं ॥२॥ अंगना में ठाडी भई अटाचढि आवबे ॥
मुकुंटकी छैयां मेरे पायन छुवावे ॥ ३॥ जबहूं चितऊं आडोदे चीर ॥ सेनन में
कहें चलि कुंज कुटीर ॥४॥ हित घनस्याम अब होय सोहोह || कृष्ण चरण
प्रभुसों बाढ्यो अतिमोह ॥५॥ | Kaafi |
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