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Sheetkal Ke Pad

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Kirtan Title
Page
Kirtan
Raag
Arichal dekhat laal bihaari laal paag pataki rahee bhuvpar
NityaPad-169
अरीचल देखत लाल बिहारी लाल पाग पटकी रही भुवपर अलकबनी घुघरारी ॥१॥ तापर मोरचंद्रिका राजत श्रवनकुंडल छबिभारी ॥ परमानंदस्वामी के उपर सर्वस्व देहूं बारी ॥२॥।
Saarang
Aaj kaanh curry haye ann praasan | manee kanchanke thaar bharaaye
Part1-140
आज कान्ह करि है अन्न प्रासन | मनि कंचनके थार भराये भाँति भातिके बासन ॥१॥ नंदघरनी ब्रज बधू बुलाई जे सब अपनी पॉँतिन। कोऊ जौनार कोऊ करे घृत पके खटरस के बहु भाँतिन ॥२॥ बोहोत प्रकार किये बहु बिजन अनेक बरन मिष्टान । अति उज्ज्वल कोमल अति सुंदर अति अद्भुत पकवान ॥३॥ जसमुमति नंदहि बोलि कह्मौ तब महर बुलावो जाति। आपु गये सब गोपनके घर ले आये सब ज्ञाति ॥४॥ आदर करि बैठाय सबनकों भीतर गये नैंदराय । जसुमति उबटि न्हवाय कान्हकों पट भूषन पहराय ॥५॥ बारबार मुख निरखि यशोदा पुनि पुनि लेत बलाई । तनकसी झगुली माला मोतिन कर चूरा दुहुँ पाई ॥६॥ और जात सुत मुख जुठरायौ नंद बैठाये गोद | महरि बुलाई बैठारी मंडली आनँद करत विनोद ॥७॥ कनिक थार भरि खीर धरी ले तापर मधु घृत नाई । नंद लै लै हरि मुख जुठरावत नारि उठीं सब गाई ॥८॥ खटरस के परकार जहाँ लगि लै लै अधर छुवावत | विश्वभर जगदीश जगत गुरु परसन मुख करवावत ॥९॥ तनक तनक जल अधर पौंछिकें जसुमतिपै पहोंचाये | हरखित युवति सब लै लै मुख चूमि चूमि उर लाये ॥१०॥ महरि गोप सबही मिलि बैठे पनवारे परसाये | भोजन करत अधिक रुचि उपजावै जो जिहिं जिहिं मन भाये ॥११॥ यह विधि सुख बिलसत व्रजबासी धनि गोकुल नरनारी । नंदकुँवरकी या छबि ऊपर सूरदास बलिहारी ॥१२॥
Saarang
Merau saanvaron kanhai maaee ekau dey naan jaanen ! doodh aur
Part1-152
मेरौ साँवरों कन्हाई माई एकौ दे न जानें ! दूध और दावानल दोऊ एकही करिकें मानें ॥॥॥ कमल और गोवर्धन लाला दोऊ एक करि लेखे । सूर लीला केती करि गाबै देव सपनेहुँ नहीं देखे ॥२॥
Bilawal
Gokul gharghar hott badhaai . graavati mangal naari ghoshaki
Part1-021
गोकुल घरघर होत बधाई । ग्रावति मंगल नारी घोषकी बाजे विविध बजाई ॥१॥ देत न्यौछावरि पटभूषन ले बंदीजन पहराई ॥ रामकृष्ण जन्मे गिरिधारी सब ब्रजके सुखदाई ॥२॥
Bilawal
Jaya jaya jaya srivallabhanand .. sakalkala bundavanchand ...1..
NityaPad-007
जय जय जय श्रीवल्लभनंद ॥ सकलकला बुंदावनचंद ॥।१॥ वाणी वेद न लहे पार ॥ सो ठाकुर श्रीअंकाजीद्वार ॥ २॥ शेष सहस्रमुख करत उच्चार ॥ ब्रजजन जीवन प्राण आधार ॥३॥ लीला ही गिरिधार्‌यो हाथ ॥ छीतस्वामी श्रीविद्डलनाथ ।।४॥।
Bhairav
Aisee koo haye joe chhuvai merrie matuki achhooti dahendi jamee . binn
Part1-231
ऐसी को है जो छुवै मेरी मटुकी अछूती दहेंडी जमी । बिन माँगें दीयी न जाय माँगे ते गारी खाय केतेई करो उपाय डराये नहीं मेरेतें गोरसकी कहाँ धौं कमी ॥१॥ औरकौ दह्मौ छिलछिलौ लागत में औंट जमायौ भरकें तमी । नंददास प्रभु बड़ेई खबैया मेरेती गोरसमें बहुत अमी ॥२॥
Bilawal
Aeka sez podhe yugalkishore ..
NityaPad-345
एक सेज पोढे युगलकिशोर ॥ नंद नंदन बृषभान दुलारी सुरत केलिकी उठत झकौर ।। १॥। बींजना ब्यार करत ललितादिक चंदन भर धरा कमोर ॥ हरिनारायन स्यामदासके प्रभु माई बिनती करतहे दोऊ कर जोर॥१॥
Bihaag
Maaee barasaane tey nandgam prodhit vrishbhan koo
Part3-104
माई बरसाने ते नंदगाम प्रोढित वृषभान को आयो ॥ नंदभवन को वैभव अद्भुत निरख परम सुख पायो | १॥ पायध्बाय के जल अचवायो घधिर आईं ब्रजनारी ॥ पालागन कहि फूलफूल गावत होरी की मारी ॥२॥ एकन चोवा आनसान ब्राह्मनके मुख लपटायो ॥ एक कपोलन मारत मींडत करत आपमन भायो ॥ ३॥ एकघर धसी घोर अरगजा पाछेते गहिनायो ॥ एकतो पकर फेंट झकझोरत इकलोकर कें पायो ॥४॥ एक चोंडहोंटियालेत चोरचित एकजु तारी बजाबे | एकतो पकर पोतिया झटकत हंसिहंसिवाख चढावे ॥५॥ एक अचानक व्हे पाछेते आंखिन में दियो हे गुलाला ॥ मींडतदृग यों कहत लुगइन मेरोपारथ्योचाला ॥६॥ एकनवासी खाटी छाछिते माथेते गहिनाई ॥| इत यह एक उतेवे अनगिण ब्राह्मम कीनबस्याई ॥७॥ गिडगिडात मारच्ो जाडे को चितवत भ्रोहेतान ॥ हाह्ाहों हारचो तुम जीती छांडिदेहु जिजमान ॥८॥ एक कहेयाहि पकरटकियाके श्रवनन को सुखदीजे ॥ एक कहेहा हानीके व्हे घरी एक गहिलीजे ॥९॥ कहत परस्पर ए ब्रजनारी ॥ सबमिल यह बिचारी ॥ इतनी सुतन अथांई तेचलि आये कुंजबिहारी ॥ १ ०॥ जोदेखेतो पांडेकों यहीं घेर रहीं ब्रजबाला ॥ मुख पठुकादे निरख निरख मुसिकाने नंदकेलाला ॥ १ १॥ भलीमानसहो भलो आदरकियो ॥ भलोभोजन करवायो ॥ सुनों हो कुंवरजू सगरी लुगाईन होंतो नाचचायो ॥१२॥ एकनगुल गुलाय गुलचायो एकन कोहंनीदीनी ॥ जानत हों अपने जीय में जेसी पोहों नाई कीनी ॥१३॥ किचकिचाय मेरे लियो चोहोंटिया पीठ न्है गई राती ॥ इननवरजी इनते हों डरपत धुकरपुकर करे छाती ॥ १ ४॥ तब ललिता गदगदगणद कायो स्याम स्याम कहिटेरच ॥ पांडेजू की ललित पीठ पर लालकमल कर फेरदो ॥१५॥ एकन मोकों नयनसेनदे एकन अंजन कीनों ॥ एक नमन हरिलियोचितें आंखिन में बूकादीनों ॥ १ ६॥ क्यो श्याम अजड्ृबकसो तिहारे बहुत सुख पेह़ें ॥ जो चाहोसोई तुमकों मनभायो फगणुबा देहें ॥१७॥ तुम तो अति उदार हो ढोटा तुम से तुम ही दानी ॥ जानजाउ जियमे जगजीवन चीरहरण सुधि आनी ॥ १ ८॥ जोसासुरे की दया की जेतो हाहा खाय छूडावो ॥ तो हमछांडें पांडे कों पांडेनाचे तुमगावो ॥१९॥ काहेन पांडेगुन प्रगटो हरिसेन दर दूग मोरी ॥ मणन भयो तब नाचन लाग्यो बोलत हो हो होरी ॥२०॥ बांधत रोटी पेट फुलायो यों टेढी पाग बनाई | अधिकवार बहा नेंटानरोत्तन अद्भुत फाग मचाई ॥ २ १॥ जान बूझ अनबोली न्हे के दुरदेखत नंदरानी ॥ निरख निरख नयनन कौतूहल मनहीं मन मुसिक्यानी ॥२२॥ इंद्रादिक ब्रह्मादिक शंकर ये सब रहे लुभ्याई हम न भये ब्रज ब्राह्मन निरख निरख मनमे पछिताई ॥|२३॥ भई विमान भीर ब्रज ऊपर पहोपन वृष्टि करावें॥ निरख निरख यह सुख नयनन सुरबनिता मंगलगावें ॥२४॥ धन्य ब्राह्मन धन्य धन्य नंदसुत धन्य ये ब्रज की नारी धन्य धन्य ब्रज के ब्रजवासी धन्य स्याम बलहारी ॥२५॥
Kafi
Vijayadashmi aur bijay muhurat srivitthalgiridhar paherawat ..
Pustak1-316
विजयदशमी और बिजय मुहूरत श्रीविद्ठलगिरिधर पहेरावत ॥ कर सिंगार विचित्र भाँतिनकौ निरख निरख नयनन सुख पाबत ॥१॥ सुथन लाल और श्वेत्र चोलना कुल्हे जरकसी अति मन भावत ॥ विविध भाँत भूषण अंग शोभित केकी पक्ष गुंजा पहिरावत ॥२॥ साज कनक नग थार हाथ लै कुंकुम तिलक ललाट बनाबत ॥ अक्षत दै जब अंकुर शिर पर निरख निरख मन मोद वढ़ाबतत ॥३॥ बहुत भोग बीरा धर आगें ब्रजभामिनि मिलि मंगल गावत || निजजन निरख निरखकें श्रीमुख गोविंद हरख हरख गुण गाबत ॥४॥
Saarang
Yeh hamkaun vidhana likh raakhi .. naam naan gaam kahaante
Part1-290
यह हमकौं विधना लिख राखी ॥ नाम न गाम कहाँते आई श्याम अधर रस चाखी ।|१॥ यह दुख काहि कहाँ को जानें ऐसौ कौन निबारे ॥ जो रस धरत्ौ कृपनकी नाई सो सब एसेंई डारै ॥२॥ यह दूषण वाहीकों कहिये कै हरिहूलों दीजै ॥ सुनहूँ सूर कछु बच्यौ अधररस कैसेहूँ करि लीजै ॥३॥
Saarang
Srivallabh srivallabh srivallabh kripa-nidhan
Part2-306
श्रीवल्लभ श्रीवल्लभ श्रीवल्लभ कृपा-निधान अति उदार करुनामय दीन द्वार आयो। कृपा भरि नैन कोर देखिये जु मेरी ओर जनम-जनम सोधि-सोधि चरन-कमल पायो ॥१ ॥ कीरति चहूँ दिसि प्रकास दूर करत विरह ताप संगम गुन गान करत आनंद भरि गाऊँ। बिनती यह मान लीजे अपनो “हरिदास' कीजे चरन-कमल बास दीजे बलि-बलि-बलि जाऊँ॥२ ॥
Sarang
Aayo rituraj saaji panchami basant aaj moremdrum atee anoop ambarahe phooli ..
Part3-013
आयो ऋतुराज साजि पंचमी बसंत आज मोरेमद्रुम अति अनूप अंबरहे फूली ॥ वेली लपटी तमाल सेतपीत कुसमलाल उडबत सब स्याम भाम भमरहे झूली ॥१॥ रजनी अति भई स्वछ सरिता सब विमलपच्छ उडगन पति अति अकास बरखत रस मूली ॥ जती सती सिद्धसाध जिततित उठि भगे समाधि विमन जडित पसीभये मुनिमनगति भूली ॥२॥ जुवति जूथकरत केलि स्याम सुखद सिंधुझेलि लाज लीक दईपेलि परसिपगन मूली ॥ बाजत आवज उपंग बांसुरी मृदंग चंग यह सुख सब छीतनिरखि इच्छा अनुकूली ॥३॥
Basant
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