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Sheetkal Ke Pad
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Kirtan Title | Page | Kirtan | Raag |
|---|---|---|---|
Teej gangaur tyauhar koo jaani dinn thaade kunjdwar sandhya samai piya pyaari | | Part2-249 | तीज गनगौर त्यौहार को जानि दिन ठाड़े कुंजद्वार संध्या समै पिय प्यारी |
दौरि नर नारि सब आये दरसन करन भई आंगन मधि भीर भारी ॥१ ॥
बजत बीना मृदंग तानपूरा चंग गान गावत सखा आठों करदे तारी।
'कृष्णदास' निनाथ रानी जसुमति मात करत आरती करन मधि ले थारी ॥२ ॥ | Gouri |
Jabaten radhika bhootal pragati tabaten bidhikau maan hanyau . | Part1-177 | जबतें राधिका भूतल़ प्रगटी तबतें बिधिकौ मान हन्यौ ।
मेरी तौ यह सृष्टि न होई अब कछु अद्भुत बान बन्यौ ॥१॥ एकरूप एकबैस
कम बरन विलक्ष ठन्यौ । कृष्णदास प्रभु श्रीगिरिधरतें केलि कलारस
सन्यो ॥२॥ | Bilawal |
Kunj mein jembat sthamastham . aas-paas maalati madhvi bibidh kusum banyo dhaam .. | NityaPad-215 | कुंज में जेंबत स्थामास्थाम । आस-पास मालती माधवी बिबिध कुसुम बन्यो धाम ॥
पय पकवान मिठाई मेवा भरि-भरिं थाल जु पाए। रुचि सों परस्पर खात
खबावत जुगल रूप मन भाए ॥| सखी एक सनमुख भई अचव ति जमुनाजल
झारी लै हाथ । बीरी देति सम्हारि दुहुँनि मुख उर आनंद न समात ॥ बैठे जाइ
कुसुम-सिज्ञा पर दंपति सब सुख-रास । बिविध बिहार किये मन भाए बलि
“परमानंददास' ॥ | Devgandhar |
Chaley kinn jaau lalaa tum sudhe apani gell .. humm nita prati | Part1-251 | चले किन जाउ लला तुम सुधे अपनी गेल ॥ हम नित प्रति
आवतत गिरघटीया गोवर्धन की सेल |॥१॥ दूध दही को दान अनोखो भल्ों
चलायो खेल ॥ 'परमानंददास” को ठाकुर घर लरिका बन छेल ॥२॥ | Poorvi |
Janmaliyon jadaunkulrai . curry karuna vasudev devaki | Part1-076 | जन्मलियों जादौंकुलराय । करि करुणा वसुदेव देवकी
अद्भुत बालक दरस दिखाय ॥१॥ अंबुज नैन अमोल मुकुटमणि रतन जटित
कुंडल झलकाय । कोमल अलक श्याममुख ऊपर श्रीवत्स लक्ष्मी उर
शोभाय ॥२॥ कोौस्तुभभणि पीतांवर सोहै चारिभुजा शंखादिधराय ।
कंटिकिकिनी करकंकन अंगद बनमाला पदकमल बनाय ॥३॥ कोटिचंद भानु
उदय मानों सुमरि सुखद भुव तिमिर नसाय। मात तात आश्वासन करिंकें प्राकृत
होई चले ब्रज धाय ॥४॥ मात तात छुड़ाई बंधते गोपुर दिये किवार खुलाय ।
शेष सहस्रफन बूंद निवारत जमुना चरन परसि भई थाय ॥५॥ लै वसुदेव गये
श्रीगोकुल नंदघरनि की सेज सुवाय । निज सामर्थ योगमाया लै मोहन मथुरा दई
विप्र बुलाय । हेम गो रत्न भूमि दक्षता दै आशीरवचन विप्र पढ़ाय ॥११॥
यहि विधि भयौ महोत्सव व्रजमें सुर समाज कुसुमन वरषाय सचिपति देव मुनि चढि
विमानन अंबर लियौ है छाय ॥१२॥ गोविदप्रभु नंदनंदन देखत कोटिक मनमथ
गये लजाय । श्रीविद्डलपद रज प्रतापबल यह लीला संपतिमें पाय ॥१३॥
| Bilawal |
Phooli jhoomi aaee basant ritu .. jamuna tata naba | Part3-067 | फूलि झूमि आई बसंत ऋतु ॥ जमुना तट नब
कान्हर बिहरति नँद कुमार घोख जुबतिन बितु ॥१॥ गिरिधरि नागर तोहि
बुलावति वऊ बिधान सखी कहा कहूं हितु ॥ 'कृष्णदास' प्रभु कौतिक सागर
तुम उपरि चलि धरैं चपल चितु ॥१२॥ | Basant |
Gokulki panihari paniyan bharan chaali badebade nayana taame shobharahayo kajra .. | NityaPad-268 | गोकुलकी पनिहारी पनियां भरन चाली बडेबडे नयना तामे शोभरहयो कजरा ॥
पहिरें कसुंभी सारी अंग अंग छबिभारी गोरीगोरी बहियनमें मोतिन के गजरा ॥१॥
सखी संगलिये जात हँसहँस बूझत बात तनहूँकी सुधि भूली सीस धरें गगरा ॥
नंददास बलहारी बिच मिले गिरिधारी नयनकी सैनन में भूल गई डगरा ॥२॥। | Bilawal |
Radha mathou sanga-kheli .. baar-baar lapataati | Part3-223 | राधा माथौ संग-खेली ॥ बार-बार लपटाति
स्यथाम-तन कनक-बाहू पिय गल मेली ॥ चोवा-चंदन सरस कुँमकुमा बहुत
सुगंध अबीर ॥ कुसुम माल राजति उर-अंतर प्रहसित जादौ-वीर ॥ मदन-
महोच्छव फाग मनोहर रति-रस फागुन मास ॥ गोप-बधू णाबति नाना
रंग बलि 'परमानँददास' ॥ | Kafi |
Hoe hoe hoe | Part3-196 | हो हो हो
लीने राधा नवसत साजें बाल ॥ स्
अधबट उपंग बाजे मृदंग ताल ॥ १।
गुलाल ॥ झक झोरत दोरत गहि :
नयननसों नयन मिलवत बोलत रं
ग्वालिनी गारी सुढाल ॥२॥ फगुवा चलत एंडी गयंद चाल वहोरचों जल जमुना तीर छिरकत छींटें रसाल ॥
आरती वारत ब्रज वनिता लीनें कंचन थाल जनहरि या प्रभु को मुख निरखत
मिटे बिरह जाल ॥३॥ | Kaafi |
Dhanya gokul jahaan govind aaye .. dhanya dhanya nand sumangal | Part1-020 | धन्य गोकुल जहाँ गोविंद आये ॥ धन्य धन्य नंद सुमंगल
निसदिन धन्य जसुमति जिन गोद खिलाये ॥ धन्य यह बालकेलि जमुनातट धन्य
वन सुरभी बूंद चराये ॥ धन्य यह समय धन्य यह लीला धन्य यह बेनु अधर धरि
गाये ॥२॥ धन्य यह चरन सदा सुखकारी संत जननके हदे रहाये ॥ धन्य
सूर उखल धन्य गोपी जाके हेत गोपाल बंधाये ॥३॥ | Bilawal |
Param russ paayo vrajaki naari.. joe russ brahmaadik koo dullabh sou | NityaPad-108 | परम रस पायो व्रजकी नारि॥ जो रस ब्रह्मादिक को दु्ल्लभ सो
रस दियो मुरारि।। १॥। दरशनसुख नयननकों दीनों रसनाको गुणगान | वचनसुनन
श्रवणनको दीनो बदन अधररसपान ॥ २॥। आलिंगन दीनो सब अंगन भ्ुजन दियो
भुजबंध॥ दीनी चरण विविधगति रसकी नासाको सुखगंध ।। ३॥। दियो कामसुख
भोग परमफल त्वचा रोमआनंद | ढिंग बेठ वोदियो नितंबनले उछंग नंदनंद ।।४॥
मनको दियो सदारस भावन सुखसमूहकी खान ॥। रसिकचरण ब्रजयुवतिनकी
अति दुर्लभ जियजान ॥५।॥ | Gori |
Jaanyau jaanyau ree sayan tein praneshwar soun keeyau maan bhayau haye | Part1-279 | जान्यौ जान्यौ री सयान तें प्रानेश्वर सों कीयौ मान भयौ है
बिहान ॥ पियकों तेरो ही ध्यान मेरी सीख सुनले कान जामें बसे प्रान तोसों
कैसो गुमान ॥१॥ सुन मुरलीकौ गान आछी मीठी नीकी तान संकेत स्थल
रध्यौ कुसुम बितान ॥ सूरदास प्रभु सुजान सकल शिरोमनि मान मदनमोहन तेरे
सुखकौनिधान ॥ | Bhairav |
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