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Sheetkal Ke Pad
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Kirtan Title | Page | Kirtan | Raag |
|---|---|---|---|
Dekhari dekh aanan chand.. mudit chitt chakor | Part2-359 | देखरी देख आनन चंद॥ मुदित चित्त चकोर
प्लावित नयन कुमुदिनी बूंद ॥९ ॥ विपिन नभते प्रकट संध्यासमय दरशन
देत॥ मध्य उडुगण सखा संगही गोधन जलद समेत ॥२ ॥ क्रीडत घोष
तडाग मनजु मराल सूरजदास ॥ एक रसना कहि सके को रंक विविध
बविलास ॥३॥ | Sorat |
Aangan nandke dathi kaundi . chhirkat gopi gwal paraspar prakate | Part1-046 | आंगन नंदके दथि कौँदी । छिरकत गोपी ग्वाल परस्पर प्रकटे
जगमें जादी ॥१॥ दूधलियौ दधिलियों लियौ घ्रत माखन माँट संयूत । घरघरते
सब गावत आवत भयौ महरकें पूत ॥२॥ बाजत तूर करत कोलाहल वारिवारि
दे दान । जीयौ जसोदा पूत तिहारी यह घर सदा कल्यान ॥३॥ छिरके लोग
रंगीले दीसें हरदी पति सुवास । मेहा आनंद पुंज सुमंगल यह ब्रज सदा
हुलास ॥४॥ | Sarang |
Chiksoli mein chanaa churaaye .. | NityaPad-214 | चिकसोली में चना चुराये ॥
गारी दे दौड़ी रखवारन ग्वाल सहित गोपाल भजाये ॥१॥
हरे बुट दाबे बगल में स्वास भ रे गहवर बन आये॥
नागरिया बैठी छक हारिन छील छील नंद लाल खबाये।। २॥ | Saarang |
Phooli phooli vrishbhan gopanen aachhe busson maingaaye | burren baranaken | Part1-188 | फूलि फूलि वृषभान गोपनें आछे बसन मैँँगाये | बरन बरनकें
चीर बीनिकें अपने पास धराये ॥१॥| दोऊ सुतन समेत राय हँसि पहलेही
पहराये । फिरि फिरि गोप ग्वाल सबहिंनकों आगें ह्वै जु दिवाये ॥२॥ फिरि
हँसि बोलि लईं व्रजमुंदरि ठाड़ी करि पहराई । श्री विद्ठल गिरिधरन कुँवरिकें तिलक
करन सब आईं ॥३॥ | Saarang |
Mandilra bajehi baaje baaje maaee nandrai darbar ..dhru... dhuni | Part1-058 | मंदिलरा बाजेही बाजे बाजे माई नंदराय दरबार ॥ध्रु.॥ धुनि
सुनि चलीं अली जिततिततें नबसत साजि सिंगार। भूषण वसन विचित्र कीये शुभ
ग्रह लग्न विचार ॥१॥ तिलक साज रोरी अक्षत ले श्रीफल कंचनथार ! प्रेम
मगन भई गावति आवतिं सब मिलि मंगलचार ॥२॥ दामिनिसी भामिनी
चुुँदिशितें आईं भवन मँझार । जसुमति सुत घनश्याम विलोकत देति अपनपौ
वारि ॥३॥ बदन विलोकत हियौ न तोषत इकटक रही निहार । मनहुँ चंद
लखि थकित चकोरी भई है सकल मनुहार ॥४॥ साथिये चित्र किये शुभ
युवतिन बाँधी बंदनवार | मानों अखिल भुवनकी शोभा राजत गोप दुवार ॥५॥
आये गोप ओपसों व्रजजन फूल्यौ सब परिवार । हँसिहँसि मिलत नंद आनंदित
करत सकल मनुहार ॥६॥ पितर पुजाय बहुरि नांदीमुख कीनों कुल व्यौहार।
नामकरन पुनि कियौ गर्ग मुनि शुभ ग्रहलग्न विचार ॥७॥ कामधेनु सम दई
हैं द्विननकों विधिसों धेनु अपार । औरनकों पार्टबर अंबर है गये भवन
भंडार ॥८॥ ठाढ़ी भाट बिस्ध गोपनके करत जो यश उच्चार । विप्र असीस
देत चिरजीयो महरि मनोहर बार ॥९॥ काँवरि कंध धरें अति हरखत सुनि
आये सब ग्वार । हरदी दूध दह्यौ बरखावत मानों घन भादों धार ॥१०॥
गोरस कीच मची द्रज विधिनि दूध दही बहे खार । सगबगे वसन नंद मिलि ग्वालन
नाचत झूमत तार ॥११)। नाचत नंद थोंदि हालत है आनंद उर न संभार ।
हँसिहँसि ग्वाल बालन गहे फेंट अभरन लिये उतारि ॥१२॥ डुंदुभी शब्द किये
नभ सुरनर मुनि उचरत जयजयकार । नाचत सनक सनंदन नारद चतुरानन
निपुरारी ॥१३॥ रिद्धि सिद्धि दीनी जो जाँची श्रीत्रजराज उदार । दामोदर बलि
राम क्रृष्णफी दरसन प्रान अधार ॥१४॥ | Gori |
Jaanan lageri laalan mill vichhuranaki bedan .. drig bhar | NityaPad-053 | जानन लागेरी लालन मिल विछुरनकी बेदन ॥ दृग भर
आयेरी मे कहीरी कछुक तेरी प्रीतिकि रीति आनाकानी भई घुमराई में गये एते
दिन ॥१॥ नेहकनावडेकी रूप माधुरी अंगअंग लागी सरस हियो वेदन ॥
नंददासप्रभु रसिक मुकुट मणि कर पर धर कपोल रहेरी ध्यान धर ररकत ढरकतहैरी
तिलक मृगमेदन ॥२॥ | Malkos |
Chainramas samvatsar parwa varas pravesh bhayohe aaj .. | Part2-243 | चैन्रमास संवत्सर परवा वरस प्रवेश भयोहे आज ॥
कुंज महेल बैठे पीय प ्यारी लाल नये हेरे नौतन साज ॥१ ॥
आपुही कुसुम हार गुहलीने क्रीडा करत लाल मन भावत ॥
बीरीदेत दास परमानंद हरखि निरखि जस गावत ॥२ ॥ | Saarang |
Brahmadai jaakon thakurai .. tetis koti devanke raaee..1.. | Part2-078 | ब्रह्मदई जाकों ठकुराई ॥ तेतिस कोटि देवनके राई॥१॥
गिरि पूज्यों तिनकों विसराई॥ जाति मति इनके मन आई॥२॥
शिव विरंचि जाकों कहें लायक॥ जाके हें मेघनसे पायक ॥३॥
यहे कहत आये सुर लोकहिं॥ पोहोंच्ये जाय इंद्रके ओकहिं ॥४॥
दूतन वेसी जाय सुनाई॥ बैठे जहां सुरनके राई ॥५॥
करजोरें सन््मुख भये आई।॥ बूझ उठे व्नजकी कुशलाई ॥६ ॥
दूतन ब्रजकी बात सुनाई॥ तुमहि मेट पूज्यों गिरिराई ॥७॥
तुमहि निंदित गिरिवरहिं बडाई॥ यह सुनत रिसदेह कंपाई ॥८ ॥
सूरस ्थाम यह बुद्धि उपाई ॥ नाजाने व्रजमें यदुराई॥९॥ | Bilawal |
Gaay khilawat shobha bhaari.. | Part2-044 | गाय खिलावत शोभा भारी॥
गौरज रंजित बदन कमल पर अलक झलक घुंघरारी ॥१॥
नखशिख प्रति बहु मोलिक भुषण पेहेरत सदांदिवारी॥
फैलरहीहे खिरक सभापर नगन रंग उजियारी ॥२ ॥
श्रमकण राजे भाल गंड भ्रुव यह छबिपर बलहारी॥
श्रवतहेरि अंचल चंचल सब चढतहें अटन अटारी ॥३ ॥
भीर बहुत अति जातकी भई मड॒हन पर ब्रजनारी॥
सेंननमें समझावत सगरी धनधन निरखन हारी ॥४ ॥
रहे खिलाय धुमरी धोरी गुनन काजर कारी ॥
नंददास प्रभु चलेसदन जब एकबार हुंकारी ॥५ ॥ | Sarang |
Dhanteras raani dhana dhovati. | Part2-036 | धनतेरस रानी धन धोवति।
गर्ग बुलाई बेद-विधि पूजति ठौर-ठौर घृत -दीप सँजोवति।
(अप दीप नैवेद्य भोग धरि स्थामसुन्दर इकटक मुख जोवति।
“परमानँद” त्यौहार मनावति सब ब्रज पुष्टि-मारग-धन बोबति | | Bilawal |
Aaj gopal hamhinkon deree | dekhon badan kamal nainan bhari | Part1-158 | आज गोपाल हमहींकों देरी | देखों बदन कमल नैनन भरि
पुनि तू लाल आपनी लैरी ॥१॥ अति कोमल कर चारु सरोजें अधर दशन
नासा सोहैरी | लटकन शीश कंठ मणि आजत मनमथ कोटि वारने कैरी ॥२॥
: दिवसही निशा बिचारत हों सखी यह सुख कबहुँ न पायो मैंरी । निगम निधान
सनातन बालक भागि बड़े पायो है तैंर ी ॥३॥ ताकौ रूप जगतके लोचन कोटि
चंद रवि आलय हैरी । सूरदास बलि जाय ग्वालिनी गोकुलनाथ पूतना बैरी ॥४॥ | Dhanashri |
Gawat ramjanmaki gaatha.. | Part2-261 | गावत रामजन्मकी गाथा॥
दशरथके गृह प्रकटभये प्रभु पूरणब्रह्म सनाथा॥१ ॥
आजप्रार्थना सुफलभई यह अब काज देव सब सरहें |
दुष्टटलन संतनसुखदायक भुवको भार उतरहें ॥२ ॥
भुवन चतुर्देश करत प्रशंसा भूरिभाग्य रघुकुलको आहि॥
नेतिनेति निगमादिकगावे सोई सुत कोशल्याजाहि ॥३ ॥
देत असीस सूतमागथजन पुरवासी नर नारि॥
कोशल्या नंदनके ऊपर तनमन डारत बारि ॥ | Kanharo |
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