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Sheetkal Ke Pad
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Kirtan Title | Page | Kirtan | Raag |
|---|---|---|---|
Piya pyaari key charan palotat. | NityaPad-346 | पिय प्यारी के चरन पलोटत।
ललितादिक बिजना ले आई तोय देख के घूंघट ओटत ॥।१॥
चंदन लेप करत दोउ अंगन आलिंगन अधरन रस घोटत ॥
नंददास स्याम स्थामा दोउ
पोढे नवनिकुंज कालिंदी के तट ॥२॥। | Kedaro |
Palanon atee param sunder gadhi laaure biir badhaiya. sheetal chandan | Part1-109 | पालनों अति परम सुंदर गढ़ि लाऔरे बीर बढैया। शीतल चंदन
कटाय धरि खराद रैंग लगाय पचरँंग रेसम मेंगाय विविध चोकरि बुनाय बिचविच
हीरामोती लाल लगैया ॥१॥ पालनौ आन्योौ अति मन मान्यो आछोसौ दिन
धराय रोप्यौ है रंग महल थूलै मेरी बारी कन्हैया | जनहरिया प्रभुकी मैया नैंदरानी
जोई माँगे ताहि देत बधैया ॥२॥ | Todi |
Mohan mohani rasbhare .. | Pustak1-322 | मोहन मोहनी रसभरे ॥
भोंह सोहन नयन फेरत ताहि रस में ठरे ॥१॥
अंग निरख अनंग लक्षित सके नहिं ठहराय ॥
एक हि की कहा चलै शत शत कोटि रहत लजाय ॥२॥
करत परस्पर रंग हस्तक छवि नृत्य भेद अपार ॥
उड़त अंचल प्रगट कुच दोउ कनक घट रस सार ॥३॥
तरकि कंचुकी ढरक माला रही धरणी जाय ॥
सूर प्रभु करती सखी कर नृत्य लेत उठाय. ॥४॥ | Ramkali |
Faguwa deho lalaa naatar upraina aur paag | Part3-174 | फगुवा देहो लला नातर उपरैना और पाग
भरेंगी ब्रज अबला ॥भ्रु०) इक दिना ब्रज नार सिमिट चली फगुवा मांगनाँ ॥
मृगमद साख जवाद लीए कर गोप घनी घनाँ ॥ राधा प्रमुख सबै चली
हो उपमा कही न जाईं ॥ मनहु मत्त गयंद पै हो ज्यों किरिनी चलीं धाई ॥
फगुवा देहो लला ॥१॥ किनहु कंचुकी लाल किनहु लै पीत बनाई | तनसुख
सारी साज माँग सेंदर भराई || नकबेसरि मोतीहरा हो किंकिनि नुपूर घोर ॥
नैननि में कजरा बन्यों हो अरू सौंथे झकझोर ॥ फगुवा ॥।२॥ गावति धावति चली सबैं नंदराई की पौरि || मन में मदनगुपाल गह्मौ चाहत भरि कोरी ॥
फागुन मास बसंत ऋतु हो मदन ब्यापत अंग ॥ झुंडन आई सबै हो स्केलन
हरि जू के सँग ॥ फग॒ुवा ॥३॥ बाजत ताल मृदंग और मुख चंग उपंगा ॥
झाँझ झालरि पटह भेरि दुंदुभी सुरंगा ॥ बीना मह॒वरि प्रनव ढफ हो तूरी
बंस रसाल ।| और अधघोटी सबद बर हो उघटत हे कठताल ॥ फगुबा
॥४॥ मोर मुकुट सिर बन्यौं बनी मुक्ता फल माला ॥ कुंडल मंडित गंड
कुटिल भौंह नेन बिसाला ॥ पीतांबर कटे किंकिनी हो मुरली सबद रसाल
कोलाहल सुनि द्वार पै हो पौरि निकसे नंदलाल ॥ फगुवा ॥५॥ उहकि
इत उत ग्वालि तकत मोहन की घाते ॥ गहवे को छल धरति मनहू मोहि
मदमाते ॥ सौंधे पिचकाई भरि हो अंचल ओट दुराई ॥ आसपास सिंघ
द्वार पै हो रही गेल सब छाई ॥ फगुवा ॥६॥ बाढ्यों अद्भुत झुंड राधिका
मधि दुराई ॥ सब तरुनी तिलक हरचौ चाहति हरिराई ॥ तबहि तलमली
नैन हरयौ हो ढिंग आई अकुलाई ॥ सरखत्री परसपर सैन दे हो सिर रैंग
दीयौ ढ़रिकाई ॥ फगुवा ॥७॥ लिये अरगजा लाल जुबती मंडल मधि दौरे ॥
मनहु मदन मत्त जज तरूनी गन घेरे ॥ पट झीनों पहेचान मुख हो श्री
राधा ढिंग लोल ॥ छूवत अरगजा ब्याज के हो कुच भरि ललित कपोल ॥
फगुवा ॥८॥ कोऊ कर अंचल गहे कोऊ पढ़का झकझोरे ॥ कोऊ भाँम
लै दाम नैन सौं नैना जोरे ॥ काजर हरद कपोल बर हो गावति धावति
नारि ॥ स्यामा सनमुख आई के हो भरि लीनें अंकवारि ॥| फगुवा देहो
लला ॥९॥ में अंकवारो भरतञ्ौ करो जीय कौं तुम भायौ ॥ भाँमिनि को
अचरोट खैंचि काहु को उढ़ायौ ॥ मुरली पगीयाँ पीत पट हो आनि चंद्रिका
मोर ॥ स्यामा अंग बनाव हीं हो हरि सिर गूंथी है डोर | फंगुवा ॥१०॥
कोऊ कर अंजन करे कोऊ लै माँग सँवारी रोरी बिंदुका भाल तिलक काजर
. बिंदुका री ॥ सारी सुरँग बनाई कैं हो बागो लियौ है उतारि ॥ प्यारी कौ पहिराव ही हो दे सिर मुकट सँवारि || फयणुवा ॥११॥ किन नकबेसरि
दई किनहु मुक्ताफल हारा ॥ खुभी चौकी पदक पोति दुलरी व सुढारा ॥
बलय पह़ौंचिका मुद्रिका हो झांबे झूमक चार ॥ बर कंकन अर किंकिनि
हो पण नुपूर झनकार ॥ फगुवा ॥१२॥ कर जोरे कोऊ सखी कोऊ पट गाँठि बनावे मंडल करि जु फिराइ सरस धमार हि गाबे ॥ कुँवरि कुँवर
विलसति अधिक हो कोक कला ब सुजान ॥ नव नागरि दुलहो भई हो
नव दुलहनि भए कान्ह ॥ फगुवा ॥१३॥ कोउ आलिंगन करे कोउ मुख
चुंबत नीके ॥ लाल भुजा उर धरे करे भुज अंसन पीय के ॥| पीबत पीबाबति
अधर मृदु हो कर मुख बीरी देत ॥ खंडित दसनन अरध फुनि हो अपुने
मुख धरि लेत ॥ फगुवा ॥१४। सुनि आए सब ग्वाल सबै नाना रंग भीने ॥
अरगजा कुँमकुम नीर सरस सौंधे सँग लीनें ॥ फूलन माल गरे धरी हो
अरु फुलेल धरच्ौ माथ ॥ गोद गुलाल बीरा मुखे हो धरि पिचकारी हाथ ॥
फगुवा ॥१५॥ तब बोले बलराम ग्वालि घेरो इक ठौरी ॥ ठौर ठौर तैं जाई
रोकि रहो ब्रज की रोरी ॥ इक इक गहि डारियौ हो कुसुम रंग के माँझ ॥
इन जुबतीन में इक धरी हो जान न पावे साँझ ॥ फयुवा ॥१६॥ ओर
सिमिट सब ग्वाल प्रथम पूजो बलदेवा || रोरी हरद गुलाल करो याही
की सेवा ॥ सौंधे कनक बेला भरे हो लै बल पै ढोरी ॥ तारी हाथ बजाई
के मुख बोलत हो हो होरी ॥ फगुवा ॥१७॥ सुबल सुबाहु उठे बाँधि फेटा
अरू दौरे ॥ केसर के सत कलस आनि जुबति पै ढ़ोरे | मोहन पिचकाई
लई हो चोवा चंदन घोर और सखीन की ओट के श्री भौंमिनी मुख दई
छोर ॥| फगुवा ||१८॥ सब पिचकाई भरौ करौ अब के एकु खेला एकही
बेर सौंधे भरो तुम कान्ह अकेला ।| छूटी एकु ही और सबै हो धार बिबिधि
बिथि रँग || घन जानौं बरखत मानौं अमृत हो चातक श्री
नवरंग ॥ फगणुवा ॥१९॥ लै गुलाल नंदलाल जुबती मंडल मधि दौरे ॥
सब सखियन में भाँम मूठि डारति मुख मोरे ॥ तेल गुलाल लगाई के हो
हाथ पिछोडे कीन | रसिक सिरोमनि साँवरे हो सबन के मुख भरि
लीन ॥ फगुवा ॥२०॥ तब राधां अति चतुर हडैसति मोहन ढिंग आई ॥
करी रसिली बात हेरी मुख रहे कनन््हाई ॥ सैन दई सब सखियन सौं हो
ढिग आई हरि वाई ॥ श्याम परे बस मैन के हो मुरली व लई है
छिनाई ।॥| फगुवा ॥२१॥ कान लागि कै कह्मौ सखी स्यामा की स्यामें ॥
तो तुम्हे मुरली देहुं नैकु पकरावी रामे ॥ इतनौ कहत में और सखी हो
चटक ही में पट मार ॥ पितांबर तब लै भजी हो मोहन रहे निहार ॥| फग॒ुवा ॥२२॥ मधुमंगल कहति स्याम हलधर पकरायौ ॥ सब
गोपीन की घरूनी करो जीय को तुम भायौ | कुँमकुम केसर कुसुम रंग
हो हरद लगावत गाल ॥ इक आँखि आँजी सखी तब हँसी सकल ब्रज
बाल ॥ फगुवा ॥ २३॥ तब ब्रजरानी आई बीच कीनों तिहिं औसर || बिबिधि
बसन परिधान हार दीने है नौसर ॥ पीतांबर मुरली लै हो दई स्याम के
हाथ ॥ तब निकसी निज जेह तें हो भरे जात ब्रजनाथ ॥ फगुवा ॥२४७॥ इक उछारत फूल इक गुलाल उड़ावे ॥ उरप तिरप गति लेति इक पट
तार बजाबे ॥ सौंधे सौरभ नभ बढ़यौ हो धरनी अरगजा कीच || ग्वालिनी
मिलि उद्यम रच्यौ हो ब्रज गलीयन के बीच ॥ फगुवा ॥२५॥ तब राधा
नंदलाल देखि रानी बिहँसानी ॥ कारि आरती अरघ अंग अंग अति सुख .
सानी ॥ करि न्योछावर तौरि तृन हो परो सत्नू सिर धूल ॥ दुंदुभी देव
बजाव ही हो बरखन लागे फूल ॥ फगुवा ॥|२६॥ हरि जसु गावति चली
सबै निज घर ब्रजनारी ॥ मदन गुपाल कै सँग रंग भरि भींनी सारी ॥
देत असीस जीयौ स्दाँ हो “ब्रज जन' जीबन प्रान ॥ राज करौ वृषभानुजा
हो सो गिरिधरन सुजान ॥ फगुवा ॥२७॥ | Dhanashri |
Joe hari charan saroj vimukh bhaye vipra janamate kahaju saryau. | Part1-084 | जो हरि चरन सरोज विमुख भये विप्र जनमते कहाजु सरयौ।
जो कोउ श्वपच भजत भगवंते कहो अब ताको कहा वियर्यो ॥ वेदव्यास सरखे
अधिकारी अंशकला द्विजरूप धरयौ | सतरे पुराण किये परसीधे तोऊ अंतश्करन
जर्यौ ॥ जब नारदमुनि तत्व बतायो सुख उपज्यो संताप टस्बौ । भज क्ृृष्णदास
काज सब सरहे करम धरमते कोउ न तस्थौ ॥ | Kanharo |
Aaj atee anand hott badhaai .. | Part2-270 | आज अति आनंद होत बधाई ॥
श्रीलक्ष्मण गृह प्रकट भयेहें श्रीवललभ सुखदाई ॥१ ॥
बंदनवार बांधत सब द्वारें मंगल कलश सजाई॥
विप्र भाट चारण बंदीजन सबहिन मन हुलसाई ॥२॥
जातकर्म कियो श्रीलक्ष्मण भट द्विजपें बेद पढाई ॥
देख स्वरूप भयो अति आनंद पूरण ब्रह्म दृढाई ॥३ ॥
गाय वच्छ सब दे उमड्यो मन विप्रनकों जु बुलाई ॥
सोंनेरूपे सींग मणि जटित अंबर अरुण उढाई ॥४॥
देवलोक दुंदुभी बजाई पोहोपन वृष्टि कराई॥
शेष गणेश निगम यशगावत श्रीलछमण भाग्य बडाई ॥५॥
जयजयकार भयों तब जगमें कहाकहों अधिकाई॥
श्रीलछमणसुत जयजय बोलत चरणगहे शिरनाई ॥६ ॥ | Devgandhar |
Jhulau paalnen balijaay maay vrajke ujiyaare | abahi dii | Part1-099 | झुलौ पालनें बलिजाय माय व्रजके उजियारे | अबही दि
मंथू आनि देहुँगी नवनीत पाणि काहेकीं आ र करत कान्ह कुंवर बारे ॥१॥
तुमती अति सुभग रूप नख शिख सुंदर स्वरूप मेरे ब्रज भूपसों अब कौन कहै कारे।
फेरों चकडोर बंगी फिरकनी नवरंग चंगी झूमरि मनि मानिक खबित भोंरा
रतनारे ॥२॥ | Bilawal |
Kunj mahal key angan baithe sriradha arr girivar dhaari .. | NityaPad-278 | कुंज महल के अंगन बैठे श्रीराधा अर गिरिवर धारी ॥
जल बीरा चंदन वनमाला सखी कर लै ढोरत बीजनारी ॥१॥
छूटत हैं चहुँ और फुहारे सीतल पवन बहुत सुखकारी ।|
छाई घटा छटा कहा बरनू मंद मंद चमकत चपला री ॥२॥
हंस चकोर परेवा बोलत नाचत मोर गावत कोकिला री ॥
कृष्णदास प्रभु ले कर बीना बजवत रिझवत प्रान पियारी ॥३॥ | Adano |
Dampati rasbhare bhojan karat ladili laal. vyanjan madhure charpare | NityaPad-080 | दंपति रसभरे भोजन करत लाडिली लाल। व्यंजन मधुरे चरपरे
खाटे खारे खटरस धरे बनाय जसोदा जिमावत जोरी रसाल॥। १॥| पथ ओदन अर
दारभात गुंजा मठरी जलेबी घेवर फेना रोटी चंद्रकला रुचीसों जेंबत प्यारो मदन
गोपाल। नंददास प्रभु प्रिया प्रीतम पररुपर हसत कोर भरत ललिता मनुहार करत
छबि पर बल बल जात ॥२॥ | Aasawari |
Banathan bhogi russ bilsanakon bhor bhawan thaade piyapyari .. | Part2-233 |
बनठन भोगी रस बिलसनकों भोर भवन ठाडे पियप्यारी ।।
ओढे कवाय फरगुल जो परस्पर सीत समय सुंदर सुख कारी ।।१।॥।
ऋतु हेमंत शिशिर दोर ठाड ी लेकर सोंज विविध रुचिकारी ।।
कृष्णदास प्रभुको मुख निरखत अति आतुर भये पिय प्यारी ।। २।। | Malkos |
Shrimad ballabh namonmo.. | Part2-308 | श्रीमद बल्लभ नमोनमो॥
विमल बाहु जिनद्विजवपुधायों पुरुषोत्तम जय नमोनमो ॥१॥
स्वयंभुवकीनों मुख प्रकटित मार्ग वरण प्रति नमोनमो
आगमअगम निगम सब जानत सबविधि समरथ नमोनमो ॥२ ॥
सकलकला संपूरण गुणनिधि आदिअंत जय नमोनमो ॥
धर्म अर्थ पुष्टि मर्यादा ज्ञान अगोचर नमोनमो ॥३ ॥
आगें एसो कोऊ न प्रकटित बहोरि न प्रकटित नमोनमो ॥
नंद नंदनको अंतःकरण प्रभु जय हरि वललभ नमोनमों ॥४॥
निज इच्छा भई जबहीं मनमें आपहि प्रकटित नमोनमो ॥
गीता भागवत अमृत रसमय यश निस्तारण नमोनमो ॥५ ॥
हतित पतित उद्धारण कलि में जग निस्तारण नमोनमो ॥
नामनिवेदनसेवा सबवबिध आप सिखावत नमोनमो ॥६ ॥
त्रजपति वललभ एकही जानों भेदनहीहे नमोनमो।
भजनानंद रसिक गिरिधारी आप दिखावत नमोनमों ॥७ ॥
शिवसनकादिक नारद मुनि जन पार न पावत नमोनमो ॥
में मतिमंद नाहिमतिमोटी कृष्णदास प्रभु नमोनमो ॥८ ॥ | Gouri |
Aaj gend khelanakun nikre hari haldhar dou bhaiya . | Part2-238 | आज गेंद खेलनकुं निकरे हरि हलधर दोउ भैया ।
यह संक्रांति मकरकी कहिए घरघर तिलवा खिचरो घेया॥१॥
साज सिंगार सबे मिल निकरे हाथन गेंद पाटकी लैया।
चले लिवाय संग श्रीदामा पाछे बड़े गोपके रैया ॥२ ॥
यह चोगान बड़ो आछो हे इहां खेल मचावोरे भैया।
अपनी अपनी जोरी करले बलदाऊ और कुंवर कनैया ॥३ ॥
श्रीदामा जब खेलन लागे आनंद उर प्रसन्न ठेया॥
फेंकत गेंद आपु आपस में उचटी जाय करे रुनदेया ॥४ ॥
देखत ठाडे ब्रजजन आये या शोभा सुख श्रवण सुहैया ॥
सांझु भई सब चलोरे घरनकुं करत शंख ध्वनि वेणु बजैया ॥५ ॥
गोपी सब झरोखन ठाडी डारत कुसुमभाल मुसकैया ॥
जन्म जन्म त्रजवास वसो यहे गोविन्द बलबल जैया ॥६ ॥ | Maalav |
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