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Sheetkal Ke Pad

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Kirtan Title
Page
Kirtan
Raag
Gangapavan neer bahat.. taar lait paataki yon
Part2-337
गंगापावन नीर बहत॥ तार लेत पातकी यों कहत नित्य प्रति हरि जूके चरण रहत॥१ ॥ सकल सिद्धि यमुना जू के संगम करत सबन को दीनसहत ॥ रसिक करत तुम सों बिनती मोहि दीजे दरस याते हरिपद चहत ॥२ ॥
Bilawal
Aaj atee shobhit madangopal ||
Part3-006
आज अति शोभित मदनगोपाल || किरिट मुगट छबी अधिक बिराजत उर वैजंयती माल ।॥।१॥ ठाडे सिंघ के द्वार राधे संग बेनु बजाय रसाल || कमल लिये कर परमानंद प्रभु बलि बलि गई ब्रजबाल ॥२॥
Lalit
Gahwar russ saghan nikunj chhayaatar ropyo doll
Part3-381
गहवर रस सघन निकुंज छायातर रोप्यो डोल तहां नागरी नागर दोऊ प्रेमसुं झूले ॥ भूषण अंग बने हीरामणि कटि तट मानों घनदामिनी छबि राजत नलि पीत दूकूले ॥|१॥ बीरी खात खवाबत प्रमुदित मन गावत सारंग राग गानसों मनही मन फूले ॥ केसर चोवा अगर गुलाल उडे और केलि कपूरन धूले ॥२॥ मृदंग ताल डफ बीना मधुर स्वर चहु और गावत उपमा कहे दोऊ को समतूले ॥ यह सुख देख कोन धीरज धरे कहे जोविंद सुरनर मुनि मन की गति भूले ॥३॥
Sarang
Nirtat radha nandkishore .. taal mridang sahchari bajawat
Part1-322
निर्तत राधा नंदकिशोर ॥ ताल मृदंग सहचरी बजावत बिच बिच मोहन मुरली कलघोर ॥१॥ उरप तिरप पगधरत धरणि पर मंडल फिरत भुजन भुज चार ॥ शोभा अमित विलोक गदाधर रीझ् रीझ डारत तृणतोर ॥२॥
Bilawal
Chalan chaahat payan gopal . laye lagaay anguri nendrani
Part1-158
चलन चाहत पायन गोपाल । लये लगाय अँगुरी नेंदरानी सुंदर मूरति श्याम तमाल ॥१॥ डगमगात गिरि परत पोहोमिपर भुज आ्राजत नंदलाल | जनु शिर पर शशि पर शशि जनु आधौमुख झुकत नल्रिन नमिताल ॥२॥ धूरि घूसर तन नैनन अंजन चलत अटपटी चाल | जन पगधरि उपजत्त सगरी गति विहरत बाल मराल ॥३॥ लट लटकत अरु चारूु चखोड़ा सुटि शोभित भूभाल ॥ सूरदास ऐसी सुख देख्यौ नहीं कहा जियो बहु काल ॥४॥
Jetashri
Logankitahun jhoojhatbori ...
NityaPad-193
लोगनकितहूं झूझतबोरी ।॥ दधिमाखन गठबंधनदेराखत करत-फिरतसुतचोरी ।।१॥ जाकेघरकीहानिहोतनित सोनहींआनकहेंरी ।। जातपांतिके लोगनदेखत बहुनहिंबातबनेरी ॥२॥ घरघरकान्ह खाइबेडोलत अतिकृपनतूहेरी ॥ सूरस्यामको जबजोभावे सोईतबतूदेरी ॥३॥।
Bilawal
Herry herire bhaiya ..| hailey daiy kinn gavahu hoe bhalau banyau haye kaaj.
Part1-056
हेरी हेरीरे भैया ॥| हेली दै किन गावहु हो भलौ बन्यौ हे काज। रानी जसुमति ढोटा है जन्यी आयौ ब्रजमें राज ॥१॥ पटआयौ प्यौसारसों और जसुमति पहिरै तायि ॥२॥ नेतिनेति जासूँ कहें ध्यान न आवै रूप । सो घर बावा नंदके परयौ देखियत सूप ॥ ३॥ फूले फिरत गुवालिया हो विप्रहि पूछे धाय ॥ कहा कुँवरकौ नाम है बेग बतावी' आय ॥४॥ नामन की गिनती नहीं और सबहिनको सिरताज ॥ पहलेंहि तो यह सुन्यौ याकौ नाम गरीब निवाज ॥५॥ बूढ़ीबॉझ खवें सबे हो खीर समुद्र बहाय ॥ चाटत चरन गुपालके मानों इनहीकी जाय ॥६॥ सब ग्वालन मिलिभतौ मत्यौ हो मनमें अति आनंद ॥ आवौ पकरी नचावहूं व्रजपति बाबा नंद ॥७॥ ऊंचे मणि कौ . चोंतरा हो जहाँ बैठ्यो परम उदार | देखत गोरो सो लग्यौ भोरों चित्त उदार ॥८॥ लघु भैया पॉयन परे अरु सकुचे व्रजराज ॥ उठि किन बाबा नॉँचहू हो पुत्र भयें ते आज ॥९॥ बाबा नंद नचावहीं हो संग लिये सब ग्वाल । नाचत थोंदा हालियो हो देखि हँसे व्रजवाल ॥१०॥ सुबल कहें मधु मंगला चलि नंदीसुर जाहीं । जसुमति जूके हाथकी माँगि खुरचनी खांहीं ॥११॥ एक ओर सब ग्वारिया एक ओर सब पोंनी । पहरावत मधुमंगलें या व्रजकी महतोंनी ॥१२॥ फूलि कह्मौ वृषभानजू हो पूरब पुन्य सहाई ॥ किरति कन्या हें जनी देंहों कुँवर कन्हाई ॥१३॥ मैया मैया कहि टेरहीं कहा बड़े कहा छोट । ठकुराई तिहूँ लोककी होउरी अहीरन ओट ॥१४॥ यह पद गायौ हेतसौं हो गंग ग्वाल सुख पाय । रोम रोम रसना करों मोपै तोउ न बरन्यौ जाय ॥१५॥
Gori
Shyam subhagatan sobhit chheenten nikilagi chandan
Part3-017
श्याम सुभगतन सोभित छींटें नीकीलागी चंदन की ॥ मंडित सुरंग अवीर कुंकुमा ओर सुदेस रजबंदन की ॥ १॥ कुम्हनदास मदन तनमन बलिहारकीयो नंदनंदन की ॥ गिरिधरलाल रची विधिमानो युवतिजन मनफंदनकी ॥२॥
Basant
Munn haryon ree bihaari kii dekhi latak .. merey
Part3-222
मन हर्यों री बिहारी की देखि लटक ॥ मेरे मन में रही जाकी मूरति अटक ॥१॥ जमुना तट पनघट के ऊपर ठाड़ौ त्रिभंगी लाल ठठकि ॥ चटक-चटक मुख गारी गाबैं मटकि-मटकि नाचै गति लै लटकि ॥२॥ मोर मुकुट कटि पियरौ सौ पट, जाके देखति भजी जिय की भटक ॥ ब्रज दूल्हे की रूप माधुरी मेंटत मान मदन की खटक ॥ ३॥
Kafi
Jaba hari hoe hoe horry gaaven .. taruni youth tarani
Part3-347
जब हरि हो हो होरी गावें ॥ तरूणी यूथ तरणि तनया तट आरज पथ त्यज आवें ॥९॥ निरख नयन मनमोहन पियको अपने नयन सिरावें ॥| विविध कुसुम की दाम श्याम को रबक जाय पहरावें ॥२॥ अति कमनीय सो कमल वरण की कटि काछनी कछाबें ॥ मंजुल मोर मुकुट मकराकृत मरूबट मुखहि बनावें ॥३॥ ताल मृदंग मुरज डफ महुबर वीना जंन्न सजावें | नव नागर नटे वष धरें मध्य ठाड़े वेणु बजावें ॥४॥ कोऊ झील कोऊ मंद घोर स्वर तान न गाय रिझावें ॥ ललित त्रिभंगी नवल रंगीलो अंग सुधंग नचावें ||५॥ हाव भाव सों निपुण नागरी नाना भांत हँसावें ॥ रीझ रीझ तृण तोर सोर कर युग कपोल परसावें ॥६॥ कोऊ एक सन्मुख बैठ लाल के अंचल अवनि बिछाबे || ताहि आपनो पीतांबर मन मोहन विहस उढावें ॥७॥| कोऊ एक केसर कुसुम वारि घस घोर कलश भर लावें ॥ रत्न जठित पिचकाई भर भर पियकों छिरक छिरकावें ॥८॥ चोवा मेद जवाद साख गोरा घनसार मिलावें आपुस मांझ मतो मिल कर ले मोहन मुख लपटावें ॥९।॥ एक पिया को वेष पलट सिर फेंटा ऐंठ बधावें ॥ बरूहा पिच्छ धर नूतन मंजुरी दक्षण दिश थिरकावें ॥१०॥ कनक कटि पट फेंट बांध के कटि तट वेणु धरावें ॥ सेली वेंत अंस धर ताकों मन्‍्मथ मंत्र पढ़ावें ॥| १ १॥| कोऊ एक मेन महा मदमाती आलिंगन दे आवैं ॥ निरलज भई परिरंभण दे दे अधर सुधारस प्यावें ॥१२५॥ तब ललिता ले मोहनजू को नारी को वेष बनावें ॥ नवसत द्वादश साज लाडिली नवल पियापें पठावें ॥१३॥ अति सुकुमारि सलोनी स्यामा रति गुण ग्राम दृढावें ॥| निरख हरख पुलकित तन दंपति ।। अतुलित प्रेम बढावें | १ ४॥ अद्भुत एक विचित्र माधुरी सो पिय को समझावें ॥ हँसन लसन चितवन मिलवन में सहज उरझ सुरझावें ॥१५॥ एक सखी ले बूका वंदन भर भर मुठी चलावें ॥ सुरंग गुलाल उडाय अधिक सो लोचन लाज नसावें ॥ १ ६॥। नवल कुसुम की ले नवलासी कमलन मार मचावें ॥ प्रेम छकी डोले मन खोले हो हो हो कर धावें ॥ १ ७॥ मगन भई आनंद सिंधु में तन मन सुधि विसरावें ॥ क्रजजन मीन भये रस सागर अपनी तृषा बुझावें ॥ १ ८॥
Bihaag
Yeh tau aeka gaam koo baas .. kahee kaisenke basiye nishdin
Part1-233
यह तौ एक गाम को बास ॥ कही कैसेंके बसिये निशदिन निमिष न छाँड़त पास ॥१॥ यह घाटी पेंड्रो सब ब्रजकौ और न कहूँ निकास॥ नंदनंदनकौ सहज थान यह बालक वूंद विलास ॥२॥ कबहुँक भोजन छीन लेत हठ कबहूँ करत दधि नास ॥ कबहुँक भुज गहि चलत कुंजमे यह गति कहिये कास ॥३॥ बोलि न सकों सकुच अति जियमें लोकलाज कौ त्रास॥ गिरिधरलाल जानि पाये हो जानत कुंभनदास ॥४॥
Bilawal
Mangal mangalam‌ vraj bhuvi mangalam‌ ..
NityaPad-131
मंगल मंगलम्‌ ब्रज भुवि मंगलम्‌ ॥ मंगलमिह श्रीनंदयशोदा नाम स्वकीर्तनमे तदरूचिरोत्संग सुलालित पालित रूपम्‌ ॥१॥ श्री श्रीकृष्ण इति श्रुति सारं नाम स्वार्तजनाशयतापापहमिति मंगलरावम्‌ ॥ व्रजसुंदरी वयस्यसुरभीवृंद मृगीगणनिरूपमभावा:मंगल सिंधु चयायम्‌ ॥२॥ मंगलमीषत्स्मितयु तमी क्षण भाषणमुन्नतनासापुटगत मुक्ताफलचलनम्‌ | कोमलचलदंगुलिदल संगत वेणुनिनाद विमोहित बूंदावन भुवि जाता ॥३॥। मंगलमखिलं गोपीशितुरति मंधथरगति विभ्रममोहितरासस्थितगानम्‌ ॥ त्वं जय सततं गोबर्धनधर पालय निजदासान्‌ ॥।४॥
Bhairav
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