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Sheetkal Ke Pad
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Kirtan Title | Page | Kirtan | Raag |
|---|---|---|---|
Gwalan moson curry dhithai.. mokon apani jaati dikhaai ..1.. | Part2-078 | ग्वालन मोसों करी ढिठाई॥ मोकों अपनी जाति दिखाई ॥१॥
तेतिस कोटि सुरनको राई॥ तीन भुवन भर चलत बडाई॥२॥
साहिबसों जो करत ढिठाई॥ ताकों नहीं कोठ पतिआई ॥३॥
इन अपनी परतीत घटाई।॥ मेरे वैर कित बचिहें जाई ॥४ ॥
नई रीति यह अबहि चलाई॥ काहू इनहीं दियो बहेकाई ॥।
ऐसी मति इन अबकें पाई ॥५ ॥
काकी शरण रहेंगे गे जाई ॥ इनदीनों मोकों विसराई ॥६ ॥
नंद आपनी प्रकृत गमाई ॥ जानी बात बुढाई आई ॥७ ॥
अहीर जाति कोई न पत्याई ॥ मातपिता नहि मानें भाई ॥८ ॥
जान बूझ इन करी ढिठाई ॥ मेरी बलि परवतहें चढाई ॥९ ॥
सूरदास सुरपति रिसपाई ॥ कीडी तन ज्यों पांखहुं आई ॥१० ॥ | Bilawal |
Jaanaki houn raghupati kau cheraun .. beera dey raghunath pathaayau | Part1-299 | जानकी हों रघुपति कौ चेरौं ॥ बीरा दे रघुनाथ पठायौ
शोध करनकों तेरी ॥१॥| दस और आठ पद्म बनचर ले चाहत हैं गढ़ घेरो ॥
तिहारे कारन श्याम मनोहर निकट दियौ है डेरौ ॥२॥॥ अब जिन शोच करो
मेरी जननी जनम हों चेरौ ॥ सूरदास प्रभु तिहारे मिलनकों शारद रंक कित
फेरौ ॥३॥ | Maru |
Chalo sakhee kunj gopal jahaan .. terison madanmohanpein chala lejaaun tahaan ..1.. | NityaPad-228 | चलो सखी कुंज गोपाल जहां ॥ तेरीसों मदनमोहनपें चल लेजाऊं तहां ॥१॥
आछे कुसुम मंदमलयानिल तरु कदंबकी छांह ॥
तहां निवास कियों नंदनंदन चित तेरे मन मांह ॥२॥
ऐसीरी बात सुनत ब्रजसुंदर तोहि रह्मो क्यों भावे ॥
परमानंदस्वामी मनमोहन भाग्य बडेते पावे | ३॥ | Saarang |
Phool mahal baithi radhaju sakhee saheli sanga .. | NityaPad-266 | फूल महल बैठी राधाजु सखी सहेली संग ॥
नानाभांतके भूखन पहरे फूलन सारी रही फबि अंग ॥१॥
फूलनकी चोली अंग फूलन बाजूबंध बनाये ॥
फूलनकी बेंनी सिर राजत फूलनकी रचिंमांग भरा ये ॥२॥
सीस फूल सिर धर प्यारी के फूले फूलन अलक संबारि ॥
हार बन्यो फूलनको उर पर तेसीय बनी छबि अति सुकुमारी ॥३।।
नवरंग लाल गोवर्धनधारी नवरंग बनी कुंज सुखकारी ॥
यह छबि निरख निरख निरख दोउनकी सूरदास तन मन धन वारि ॥४॥ | Kanharo |
Badhaai submill gaavo aaj... | Part2-273 | बधाई सबमिल गावो आज।॥
श्रीमद् वृन्दाबनविधु प्रकटे आनंद निधि ब्जराज॥१॥
तैलंग तिलक द्विज लक्ष्मण भट गृह आये भक्ति विस्तार॥
बाजत तूर तरुणी मिलगावत बांधत बंदनवार ॥२ ॥
वेद बिदित लीला अबतारी निजमति सेवासार ॥
गोविंद प्रभु वललभपद अंबुज सुमरत भव निस्तार ॥३ ॥ | Devgandhar |
Aaye aaye hoe tum sthaam kahaante bhorahi bhawan hamaare .. kahi | NityaPad-047 | आये आये हो तुम स्थाम कहांते भोरही भवन हमारे ॥ कहि
गये हमसो वसे औरनके सांचे बोल तिहारे ॥ १॥ सगरीरेन मोहि मग जोवतभई
बिरहव्यथा भई भारे ॥ ब्रजपति देहदिसा बिथकित भई तोऊ मेरे नयनके
तारे ॥ २॥ | Lalit |
Taadinate mohi adhik chatpati .. | NityaPad-225 | तादिनते मोहि अधिक चटपटी ॥
जादिनते देखे इन नयनन गिरिधर बांधे माई पाग छूटपटी ॥॥१॥
चलेरी जात मुसकात मनोहर हँसजो कही एक बात अटपटी ॥
होंसुन श्रवणन भई अतिव्याकुल परीजो हृदय में मदन सटपटी ॥।२॥
कहारी करुं गुरुजन भये बैरी बैर परे मोसों करत खटपटी।॥
परमानंदप्रभु रूप विमोही नंदनंदनसो प्रीति अतिजटी ॥३॥ | Saarang |
Khwelat madangopal faag suhabanon .. vrajjeevan | Part3-153 | ख्वेलत मदनगुपाल फाग सुहाबनों ॥ ब्रजजीवन
नंदकोलाल अनंगलजाबनों ।। १॥ सुबल सुबाहु श्रीदामा सखा संग राजही ॥
बहुआबज रुंज मुरज मुरली डफ गाजही ॥२५॥ करनकनिक पिचकाई फेंट
अबीरकी ॥ बहुभावरसों भरिकाबरि केसरि नीरकी || ३॥ सजिकें साज समाज
चले वृषभानके || मुनिमनसा गई भूलि सुनत धुनि कानकें ॥४॥ उतत्ते जुरि
झुंडन आंई ब्रजबासिनी ॥ तिनमें कुबरि किसोरी नित्य बिलासनी ॥५॥
रंगरंगीलो साज लिये नवनागरी ॥ बरनबरन लीये राजत फूलन कीछरी
॥६।॥ जुरिआये दोऊटोल पोरी ब्रजरायकी ॥ इतही चेत उत गारी देत
बहुभायकी ॥७॥ जे कबहूं बधूनवदरसी रवि ने कहू ॥ ते गुरजन की लाज
करतन हीं एकट्दू ॥८।| खेलनकों हरिसों हुलसी सब आवडी | भरि कुंकुम
कनिक कटोरन ओट द्रावही ॥९॥ छिरकी जाय परस्पर मोहन भामिनी ॥
उडत गुलाल अबीर कियो दिन जामिनी ॥१०॥ संग सखा नहीं सुझत
कीधों कहां गये ॥ सब सखीयन मिलि स्याम अचानक गहिलये ॥£१ १॥
घिरिआंई सब बाम ठोर दसवीसतें ॥ दीयो हे अरणजाढारि मनोहर सीसतें
॥१२॥ लेललिता दई गांठि नील पटपीतसों ॥ घनदामिनि ज्यों राजत
मोहनमीत सों ॥१ ३॥ फगुवा मांगत रंग रह्यो नकद्यो परे || यह सुख देखत कोन अबधीरजकों धरे ॥१४॥ खेलि फाग नरनारि भरे अनुरागसों ॥
ब्रजबासिन में स्यथाम संग बडभाग सो ॥१५॥
| Dhanashri |
Tapan lagyo dhaam parat atee dhoop bheya kahu chheya sheetal | NityaPad-218 | तपन लाग्यो धाम परत अति धूप भेया कहु छेया शीतल
देखो।। भोजन को भड वार लागीहे भूख भारी मेरी और तुम पेखो ॥१॥
बरकी छैयां दुपहरीकी विरियां गेया सिमिट सबही जहां आवबे ॥ नंददास प्रभु
कहत सखनसो सोड़ ठोर मोहि भावे ॥२॥ | Saarang |
Mohan ghoomat ratnare nayan sakuchat kachhu kahat bayne saine heen | NityaPad-148 | मोहन घूमत रतनारे नयन सकुचत कछू कहत बेन सेन हीं
सेन उत्तर देत नंदके दुलारे ॥ भूषण वसन अटपटे सीस पाग लटपटी रतिरण लई
झटपटी सुभग स्यथाम प्यारे ॥ १॥ सुवश कियो कुंजसदन मोर आये जीत मदन
पलट परे बसन अजहुं न संवारे ॥ चतुर्भुज प्रभु गिरिवरधर दर्पन ले देखिये जू
सेंदुरको तिलक भाल अधरन मिस कारें २॥ | Bilawal |
Yeh brat maadho prathamaliyo.. | Part2-333 | यह ब्रत माधो प्रथमलीयो॥
जो मेरे भक्तनकों दुखदे ताकोफाईं नखनहीयो ॥१ ॥
जो भक्तनसों वैरकरतहे परमेश्वरसों वैरकरे ||
रखवारीकों चक्रसुदर्शन माथे ऊपर सर्दांफिरे ॥२ ॥
पराधीनहों अपने भक्तनकों जाकारण अवतार धयों ॥
यहजु कही हरि मुनिजन आगें अभिमानीको गर्वहयों ॥३ ॥
भजते भजों त्यजों नहि कबहू पारथप्रति श्रीपति यों भाखी॥
परमानंददासको ठाकुर अखिल भुवन सबसाखी ॥४ ॥ | Kanharo |
Tererilalmeromakhankhayo .. | NityaPad-191 | तेरेरीलालमेरोमाखनखायो ॥
भरदुपहरीलखसूनोघर ढोरढंढोर अबही उठधायो ॥ १॥
खोलकिवार अकेले मंदिर दूधदह्योसबलरकन खायो ॥
छीकेतेंकाह खाटचढमोहन कछूखायो कछुभूढरकायो ॥२॥
नित्यप्रतिहानि कहॉलोसहिये यहढोटा ऐसे ढंग लायो ॥
परमानंद रानीतुमबरजो पूत अनोखोतेंही जायो ॥ ३॥। | Bilawal |
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