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Sheetkal Ke Pad
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Kirtan Title | Page | Kirtan | Raag |
|---|---|---|---|
Pratham cons pootana pathaai . nand gharani suta liye jahaan baithi | Part1-089 | प्रथम कंस पूतना पठाई । नंद घरनि सुत लिये जहाँ बैठी
चली चली निजधाम जु आई ॥१॥ अतिमोहनि नाम धरी लीनौ देखत ही
सबके मन भाई । जसुमति देखि रही वाकौ मुख काकी बधू कोन थों आई ॥२॥
नंदसुवन तबही पहेंचानी आसुर घरनी असुर की जाई । आपुन ब्रज समान भये
हरि मानी दुश्खित भई भई पराई ॥३॥ अहो महरी पाँ लागन मेरौ में तुमरो
सुत देख न आई । यह कही गोद लिये अपने तब त्रिभुवन पति मन मन
मुसकाई ॥४॥ मुख चुँम्यो गहि कंठ लगाये विष लपटे स्तन मुख नाई । पय
सेंग प्रान खेंचि हरि लीने जोजन एक परी मुरझाई ॥५॥ न्राहि त्राहि ब्रजधन
आई अति बालक क्यों बच्यौ कन्हाई । अति आनंद सहित हरि पायौ हिरदे माँझ
रहे लपटाई ॥६॥ करवरटरी मेरेकी घरघर करत आनंद बधाई । सूरश्याम
पूतना पछारी यह सुनि जिय डरप्यौ नृपराई ॥७॥ | Aasawari |
Juri chaleen sohile bhanrai ghar naval prembhar baalaa | kanchan | Part1-180 | जुरि चलीं सोहिले भानराय घर नवल प्रेमभर बाला | कंचन
बरन बसन पहिंरें तन गावत गीत रसाला ॥१॥ कबरी गुही जुही फुलनसों
सेंनी चढ़ी हजारा । चिकुर चंद्रकी राजत गाजत छबिकौ राज दुवारा ॥२॥
गौर छटा दामिनी ज्यों राजत नीलांबर के माँझ । मानों इंदु किरन चहुँ दिसतें उदित
भई है साँझ ॥३॥ दुलरी हार हमेल बिजौठा बाजूबंद अति राजे । पोंहोंची
गजरा रतन चौकी कर मुँदरी नग छबि छाजे ॥४॥ रतन जटित कंचन के नूपुर
सुंदर मूदु षग सोहें । मानों नखचंद्र किरन परकासी त्रिभुवनकौ मन मोहें ॥५॥
गज गामिनी कंचनी अवनी पर चलत छबीली चाल | कंचन थार लसत कर कमलन
बारों इंदु रसाल ॥६॥ पोंहोंची श्रीवृषभान भुवनमें आनंद उमरग्यो भारी ।
नाचत गावत करत कुलाहल प्रेम छके नरनारी ॥७॥ गुननिधि छब्िनिधि
सुखनिधि राधे कीरत कीरत छाई । हरखत बरखत सुमन देव मुनि देत असीस
सोहाई ॥८॥ यहि विधि छबिकी छटा छबीली कापै बरनी जाई । जैसो रूप
लाल हित हिय मैं राखी नैनन मांझ समाई ॥९॥ | Aasawari |
Aaj bhalo sankranti punya dinn taate modak leho merey | Part2-237 | आज भलो संक्रांति पुन्य दिन ताते मोदक लेहो मेरे
लाल। बरसाने ते न््योति बुलाई संग लिये व्रजबाल ॥१॥
नीके धोय मधुर रस बांध्यो भरि-भरि राखे कंचन थाल ।
बैठो रतन जटित सिंहासन सखा संग लै अपुने ग्वाल॥२॥
खेलो बैठो आय परस्पर सखा मंडली जोरि गोपाल।
आपुन खाओ देहो सबन कों करो परस्पर ख्याल ॥३ ॥
देखत फूलत मात-बबा दोउ बारत हैं मोतिन की माल।
'कुंभनदास' प्रभु गोवर्धनधर प्रेम प्रीति प्रतिपाल ।४॥ | Kanharo |
Kaanh akelei sowat. | NityaPad-343 | कान्ह अकेलेई सोवत।
सपने में तेरौ मुख देखत तब उठि मारग जोवत ।।
सीतल छांह कदम की बैठे तेरौ ई रूप विचारत |
कबहुँक मौन करि रहत ध्यान धरि कबहुँक दृष्टि परत |
नव पल्लव सुमन कदम-दल रचि-रुचि सेज संवारत |
'परमानंद' प्रभु तेरे हि कारन अति संचित हरि आरत ॥। | Bihaag |
Aaj raavalmein bheer bhaee | abb vraj basi sukh leuu sakhiri | Part1-197 | आज रावलमें भीर भई | अब व्रज बसि सुख लेऊ सखिरी
प्रगटी कुंवरी रसमई ॥१॥ जा निधिको शिव विधि चाहत है सो कीरति तुम
ही को दई । “रामदास” प्रभु सुनि गोकुल आयो जसुमति पहेरावनी दई ॥३॥
| Goud Saarang |
Bhadhomas krishna ekadashi .. shubh lagn | Part2-282 | भाधोमास कृष्ण एकादशी ॥ शुभ लग्न
नक्षत्र गुरुवार ॥ श्रीलक्ष्मणगृह प्रकट होयकें ॥ भूतल लियो अवतार ॥छंद ॥
भ्रूतल लियो अवतार श्रीवल्लभ देवीजीव उद्धारियां॥ पंच दोष सब दूर
करिकें शरण जेजन आईयां॥ शरण आये जेजन तारे सकल ताप
निवारियां॥ अवल्लम युखचद बंद प्रगटे जगत यश विस्तारीयां ॥१॥
मायामत खंडन करि ॥ निगम स्मृति सत्य करि भाख्यो॥ भक्ति
मुक्ति सब पूरन काम ॥ पुष्टि मार्ग प्रकाशित नाम ॥छंद॥ नाम वलल्लभ
प्राण वल्लभ ध्यान बलल्लभ ध्याईयें॥ विश्राम बल्लभ भक्तजनके
श्रीवललभ गुण गाइयें॥ वललभ लखि आनंद बाढ्यो कोटि मनमथ
वारियां॥ श्रीवल्लभ मुखच्ंद प्रगटे जगत यश विस्तारीयां॥२॥
अदेयदानके दाता तुमहीं ॥ निजजन कृपा प्रेमरस बरखहीं ॥ पतित उद्धारन
नाम तिहारो ॥ कृपादृष्टि मोपेजु निहारो ॥छंद ॥ कृपादृष्टि निहारो मोपें दास
अपनों जानीयें ॥ दोष मेरे जिन बिच्चारो भवसागरतें तारीयें॥ मीठे मधुरे
बोल तुमारे ब्रजवासी हरखे हियां॥ श्रीवल्लभ मुखचंद प्रगटे जगत यश
विस्तारीयां ॥३ ॥ श्रीभागवत मथन सुबोधिनी ज्ञाता॥ दैवी जीवनके ये
सुखदाता॥ भक्तिमारग प्रकटे भान॥ निजजनको मेदयों
अज्ञान॥छंद॥ अज्ञान मेटे भक्तजनके देवी केहि विधि जानीयें॥
ब्रह्मसंबंध आज्ञाजु दीनी शरण मेरी आनीयें॥ सारस्वतकल्पकी लीला
प्रगट ताही दिखाइयां॥ श्रीवललभ मुखचंद प्रगटे जगत यश
विस्तारियां ॥४ ॥ | Bilawal |
Laal khelat faag pragat karat anurag kesar | Part3-042 | लाल खेलत फाग प्रगट करत अनुराग केसर
अबीर अरणजा श्रीअंग सुंदरि भरत सुहाग ॥१॥
हीरा खचित पिचकाई चलावे छिरकत महा बडभाग ॥
वल्लभदास प्रभु गोकुलेश मिल उपज्यो प्रेमपराग ॥२॥ | Sarang |
Dekh sakhee nava chhel chhabilo | leo mero chita chori . | NityaPad-177 | देख सखी नव छेल छबिलो | लियो मेरो चित चोरी ।
अरविलो आनत एंडानो ओर आक्रत नैन ही की चोर |
शोभा अंग प्रीत रूपमाधुरी शीशदुमालो अति छबि छोर |
कुंदन लोल कपोलन झांई अरुन उदय मानो
किरन चहुं ओर। कहेत न बने देखे बन आवे सदा बसो मन नंदकिशोर।
चत्रभुज प्रभु गिरिधरनलाल पर रीझी डारत त्रणतोर | | Saarang |
Jemat dekh nand sukh paaye .. kaanh devta pragat dikhaaye ..1 .. | Part2-073 | जेंमत देख नंद सुख पाये ॥ कान्ह देवता प्रगट दिखाये ॥१ ॥
ब्रजवासी गिरि जेंमत देखे॥ जीवन जन्म सुफल कर लेखे ।२॥
ललिता कहत राधिका आगें॥ जेंमत कान्ह नंद करलागें॥३॥
में जानी हरिकी चतुराई॥ सुरपति मेट आप बलिखाई ॥४ ॥
उत जेमत इत बातन लागें॥ कहत श्याम गिरि जेंमत आगें॥५॥
में जों बात कही सोई आई॥ सहख्रभुजाधर भोजन खाई ॥६ ॥
ओर देव इनकी शरनाई ॥ इत बोलत उत भोजन खाई ॥७ ॥
सूरदास प्रभुकी यह लीला नंदनंदन ब्रज छेलछबीला ॥८ ॥ | Bilawal |
Praat samein shree vallabhasutake vadan kamal koo darshan keeje .. | NityaPad-008 | प्रात समें श्री वललभसुतके वदन कमल को दर्शन कीजे ॥
तीन-लोक-बंदित पुरुषोत्तम उपमाहि पटतर दीजे ।।१॥
श्रीवल्लभकुल उदित चंद्रमा यह छबि नयन चकोर पीजे ॥
नंददास श्री वललभसुत पर तनमनधन न्योछावर कीजे ॥२॥। | Bibhaas |
Aaj nandlal navkunj raspunjate, latak aaye sakhee bhawan | NityaPad-139 | आज नंदलाल नवकुंज रसपुंजते, लटक आये सखी भवन
मेरे ॥ हों ज़ु गमार सुख सेज में फस रही गिरिधरन सेन दे मधुर टेरे ॥१॥। जब में
निंद्रा तजी सकल सिंगार सजि द्वार कपाट खोल चलि सवेरे | मुरली को नाद
सुनि भ्रवन तब उठी चलि ढिंग आय पाय परी नाथ केरे ॥ २॥ मानों मकरंद उर
महल में ले चली हसि हसि प्रेमसों बदन हेरे ॥। कृष्णदास कर जोर विनति करे
धन्य बड़भाग सखी आजतेरे ॥ ३॥ | Bhairav |
Aeye teree chaal kii chalan tedhhi baat kii bolan tedhhi mridumuskan tedhhi tedhoi badan .. | NityaPad-286 | ए तेरी चाल की चलन टेढी बात की बोलन टेढी मृदुमुसकान टेढी टेढोई बदन ॥
ग्रीवा की झुकन टेढीकंटि की लचन टेढी चरन धरन टेढी बंसी की बजन ॥१॥
पाग की बंधन टेढी कुटिल अलक टेढीभूकुटी कमान टेढी टेढे स्थाम घन ॥
कलंगी हलन टेढी उर बनमाल टेढीअलक झलक जलकन ॥॥२॥
चंदन की खोर टेढी चंद्रिका चटक टेढी टेढो आड बंद दिये मदन मोहन ॥
टेढे हैं त्रिभंगी लाल टेढी टेढी सब चाल टेढे को भरोसो मोंहि सूर' हों सरन ॥३॥ | Adano |
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