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Sheetkal Ke Pad
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Kirtan Title | Page | Kirtan | Raag |
|---|---|---|---|
Suni badbhagin hoe nendrani god khilawat laal . anendki | Part1-066 | सुनि बड़भागिन हो नेंदरानी गोद खिलावत लाल । आनेंदकी
निधि मुखलाल कौ ताहिं निहारत निश और बासर छबि नहीं परत बखानी ॥१॥
गुन अपार बुद्धि विस्तार कही न परत निगमबानी । हरिनारायन श्यामदासके प्रभु
देखी जसुमति कूख सिरानी ॥२॥ | |
Aaj baney mohan jhoolat doll .. baam anga lagi | Part3-376 | आज बने मोहन झूलत डोल ॥ बाम अंग लगि
सोहति भामिनि सौभग सींव अतोल ॥ दुडूँ ओर प्रमुदित मन पुलकित ब्रज-
बनिता मिलि टोल ॥ तेल-गुलाल मिलाई करनि सो मंडित करत कपोल ॥
रतन-जटित पिचकारिनि छिरकत केसरि-रंग अमोल ॥ पंचम राग अलापति-
गावति मधुरे-मधुरे बोल ॥ सुरंग गुलाल अबीर उड़ावत चहुँ-दिसि भरि-
भरि डोल ॥ बाढ़ी भक्ति दास 'परमानँद' जग में बाजत ढोल ॥ | Pancham |
Syamlal aaou | NityaPad-207 | स्यामलाल आओऔ
हो आई छाक सलौनी । डला लाल के घर तें आयो मारग में दै दौनी ।। सियरे
भए स्वाद नहीं पैयतु रसके गए रसाइनि नहीं हौनी 'परमानंद' छकहारी बाँकी
टेरति टेर सलौनी ॥ | Saarang |
Gokul pragate bhaye hari aaya .. adham udhaaran asur | Part1-008 | गोकुल प्रगटे भये हरि आय ॥ अधम उधारन असुर
संहारन अंतरजामी त्रिभुवनराय ॥१॥ जागी महरि पुत्र मुख देख्यों पुलकि गात
उरमें न समाय ॥ गदगद कंठ बोल नहीं आवै हरषवंत्त वे नंद बुलाय ॥२॥
अब हो कंत दैव परसन भयौ पुत्र भयो देखी मुख आय ॥ दौरि नंद जब सुतमुख
देख्यौ सो सुख शोभा बरनी न जाय ॥ ३॥ जब वर पायौ तब घर आयौ आनंद
मगन कै बजी बधाय ॥ सूरदास पहले यह मांग्यौं दूध पिबावत जसुमति
माय ॥४]॥| | Devgandhar |
Hari murali key haath bikaane .. vaha apamaan karat naan | Part1-283 | हरि मुरली के हाथ बिकाने ॥ वह अपमान करत न
लजाने ॥१॥ वह अपने कर लियें दिवाने ॥ बारबार वा यशहिं
बखाने ॥२॥ ठाढ़े रहत पाँय न पिराने ॥ ऐते पर मन रहत डराने ॥३॥
आयुस देत सुनत मुसकाने ॥ जीवन जन्म सुफल कर माने ॥४॥ वह गरजत
वे हरे बताने ॥ बारवार अधरन पर ठाने ॥५॥ त्रिभुवनपति जे कहियत
बाने ॥ तातें सब तन दशा भुलाने ॥६॥ वा आगें हम सब बस गाने ॥
वह गावत वे सुनत पगाने ॥७॥ सूर नेति निगम निज गाने ॥ ते मुरली के
नाद ठगाने ॥<८॥ | Bilawal |
Aho bali darein thaadhe waman .. chaaryon veda padhat mukhpathti | Part1-217 | अहो बलि दरें ठाढ़े वामन ॥ चारयों वेद पढ़त मुखपाठ टी
अति सुमंद स्वर गावन ॥१॥ बानी सुनि बलि बूझ्नन आये अहो देव क्यो
आवन ॥ तीन पेंड़ वसुधा हम माँगें परनकुटी एक छावन ॥२॥ अहो अहो
विप्र कहा तुम मांग्यौ अनेक रतन देहुं गामन ॥ परमानंद प्रभु चरन बढायौ लाग्यौ
पींठ नपावन ॥३॥ | Dhanashri |
Praat samay navkunj dagaraten tanman phuli aavat raadhe .. maano | NityaPad-140 | प्रात समय नवकुंज डगरतें तनमन फुली आवत राधे ॥ मानो
मिले अंक भर माधो अंग अंग प्रगटत प्रेम अगाधे ॥१॥ नेनबेन मुसक्याय बदन
छबि बिकसत पदम् जु आधे ॥ चंचल चपल बंक अवलोकिन काम नचावत
ततथै ताधे ॥।२॥ जिही रस मत फीरत मानो मधुकुर भ्रमत रेहेत दिन साथे ॥॥
सो रस दियो दास परमानंद सुनिकट आराधे ।। ३॥। | Bhairav |
Godlal leey mangal gaavati hamre aangan aaee ..1.. bhaav | Part1-173 | गोदलाल ले मंगल गावति हमरे आँगन आई ॥१॥ भाव
भरी पौढ़ी रानीजू नंदराय जगाई । चोंकि परी यह बात श्रवण मुनि गहि भुज राद .
उठाई ॥२॥ हम तुम देखें इनकों यह सुख कहा कुलाहल लाई । बहुरि उछंग
दिये जसुमतिकी चंद्रावलि सुखदाई ॥३॥ आपुसमें पहिरावत रतनन भूषण
चीर सुहाई । श्रीविद्लगिरिधरन खिलावत बारत कछु न अघाई ॥४॥ | Saarang |
Bair sadaa hamson hari keenau .. prathmaahin roque rahey gahi marag | Part1-280 | बैर सदा हमसों हरि कीनौ ॥ प्रथमाहिं रोक रहे गहि मारग
दधिले जान न दीनौ ॥१॥ पुनि सन हस्यो भेदही भेदर्हिं इंद्रिन संग गहि
लीनौ ॥ ता पाछें ए नयन बुलाये उन उनहीकों चीनौ ॥२॥ अब मुरली
बैरिन उपजाई निपटि भई हम भीने ॥ सूर परे हरि खोज हमारे ऐसे परम
नगीने ॥३॥ | Ramkali |
Mohan khelat aaye faag .. praat samey uthhi | Part3-084 | मोहन खेलत आये फाग ॥ प्रात समे उठि
लटकि आये ढरकि टेढी पाग ॥१॥ अंजन अधर गुलाल भाल पर अद्भुत
भेख सुहात ॥ केसर छींट कट्ं कं उर पर अरगजा भींजे गात ॥२॥ बोलत
मुखतें होरी होरा सुरत समागम रात ॥ रसिकराय रैन सब जागे समर
सुमर मुसिकात ॥३॥ | Lalit |
Krishna tarani tanaya teer rasmondallerchyou adhar curr madhur swar venu | Part1-338 | कृष्ण तरणि तनया तीर रासमंडलरच्यौ अधर कर मधुर स्वर वेणु
बाजै .॥ युवतती जन यूथ संग नृत्यत अनेक गति निरख अभिमान त्यज
कामलाजै ॥१॥ स्याम तनपीत कोशेय पद नख रुचिर चंद्रिकां सकल भुव
तिमिर भ्राजै ॥ ललित अवतंस भुव धनुष लोचन चपल चितवनि मानो मदन
बाण साजै ॥२॥ मुखर मंजीर कंटि किंकिणी क्वणित रव बचन गंभीर मानों
मेघ गाजें ॥ दास कुंभननाथ हरिदास वर्य धर नखशिख स्वरूप अद्भुत
बिराजें ॥३॥ | Gouri |
Oon kahaa kahuun chhabi karat kaleu .. | NityaPad-030 | ऊँ कहा कहूँ छबि करत कलेऊ ॥
थार साज बिंजन धर राखे कर कर कोर मुख देऊ ॥।१॥
गरज गरज बरसत चहुँदिसतें मनमोहन कछु ओर ही लेऊ ॥
सुनत वचन जनन ी के सूर प्रभु कही न जात मुख से हू ॥॥२॥ | Malhaar |
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