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Sheetkal Ke Pad
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Kirtan Title | Page | Kirtan | Raag |
|---|---|---|---|
Praatasmein harinam leejiye anandamangalmein dinn jaay ..| chakrapani | NityaPad-135 | प्रातसमें हरिनाम लीजिये आनंदमंगलमें दिन जाय ॥| चक्रपाणि
करूणामय केशव विघ्रविनाशन यादवराय ॥ १॥ कलिमल हरण तरण भवसागर
भकक्तचिंतामणि कामधेनु ॥ एसो समर्थ नाम हरीको वंदनीक पावनपद रेनु ॥ २॥
शिव विरंचि इंद्रादि देवता मुनिजन करत मामकी आस | भक्तवत्सल हरिनाम
कल्पतरू वरदायक परमानंददास ।। ३॥। | Bibhaas |
Banyau morr mukut natavarabapu shyamsunder kamal nayan bonki | Part1-345 | बन्यौ मोर मुकुट नटवरब॒पु श्यामसुंदर कमल नयन बॉँकी
श्रोंह ललित भाल घुँघरवारी अलके ॥ पीतबसन मोतीमाल हियें पदक कंठलाल
हँसन बोलनि गावन गंडन श्रवण कुंडल झलकें ॥१॥ करपद भूषण अनूप
कोटि मदन मोहनरूप अद्भुत बदनचंद देख गोपी भूली पलके !| कहि भगवान
हितरामरायप्रभु ठाढ़े रासमंडलमें राधासों बाँह जोटी कियें हियैं प्रेमललकें ॥२॥ | Kanharo |
Salaunen shree gorai gaat sunder nagri .. huns | Part3-168 | सलौनें श्री गोरै गात सुंदर नागरी ॥ हंस
चाल रबि तें छबि नीकी चंचलता लै मीन | अंबुज जोति बदन छबि तिय
की चंदा भये मलीन ॥ सुंदर नागरि ॥१॥ छूटी लर लपटी छतियन पै
सोभा बरनी न जाई || माँनों माँगन चली हे सुभ्र पै मौतिन चौक पुराई |
सुंदर ॥२॥ केवरा कर कंकन सोहै कंठ सोहे दुलरी ॥ माथे तिलक भाल
माँनौं राजति कामिनि काम भरी ॥|सुंदर।। ३॥| केसर लंक बरन चंपे को बोलति
है पिक बैंन ॥ आसा नासा ईल कील माँनौ लुटै सारंग बैंन ॥सुंदर॥४॥
थोरे दिनन की गोरी भोरी होरी खेलन आई ॥ “रामदास' प्रभु मिले परसपर
. चितवनी चली मुसिकाई ॥सुंदर॥५॥ | Dhanashri |
Nayana shyam sadaa sanga maane. nennerous barkhat | Part2-351 | नयना श्याम सदा संग माने। नेननरस बरखत
उर अंतर तातें वे अधिकाने ॥१ ॥ देख देख थाकी सुघराई बहुनायक जो
लुभाने। परमानंददास को ठाकुर श्री मुखतें जो बखाने ॥२ ॥
| Sughrayi |
Aaj sakhee bhayo achal anand .. nandrai pramudit jasumati | Part1-016 | आज सखी भयो अचल आनंद ॥ नंदराय प्रमुदित जसुमति
सुतजायो गोकुलचंद ॥१॥ बगरनि बंदनमाल साधिये धुजा पीतरंग फंद ॥
व्रजाधीश प्रभु ब्रजजन गावत पंच शब्दद्विजछंद ॥२॥ | Devgandhar |
Govind girichadh terat gaay .. | NityaPad-104 | गोविंद गिरिचढ टेरत गाय ।।
गांग बुलाई धौमर धौरी टेरत वेणु बजाय ॥ १॥
श्रवण नादसुन मुख तुणधर सब चितई सीस उठाय ॥
प्रेम विवशव्हेहूंकमार चहुंदिशते उलटी धाय ॥।२॥।
च॒तुर्भुजप्रभु पटपीत लियें कर आनंद उर न समाय ॥
पोछत रेणु धेनुके मुखतें गिरि गोवर्धनराय ॥। ३॥॥ | Poorvi |
Douu curr chonkhani mukh chonkhat . nitprati mudit jasoda raani | Part1-165 | दोऊ कर चोंखनी मुख चोंखत । नितप्रति मुदित जसोदा रानी
बल मोहन तन पोषत ॥ नंदराइ बड़ भाग तुम्हारी बाबा कहि मुख घोषतत ।
“परमानंददास” कौ ठाकुर प्रान पूतना पल में सोषत ॥ | Nat |
Gokulmein baajat kahaan badhaai . bheer bhaee haye nandju key dwaare asht | Part1-048 | गोक ुलमें बाजत कहाँ बधाई । भीर भई है नंदजू के द्वारे अष्ट
महासिद्धि आई ॥१॥ ब्रह्मादिक रुद्रादिक जाकी चरन रेनु नहीं पाई । सोई
नंदजूकों पूत कहावै कौतुक सुनों मेरी माई ॥२॥ ध्रुव अंबरीष प्रहलाद विभीषण
नितनित महिमा गाई । सो हरि परमानंदकौ ठाकुर ब्रजजन केलि कराई ॥३॥
| Sarang |
Aabhushan angang teuu anuchar sanga roop bhoop leeyen raajat shobha paay .. | Pustak1-319 | आभूषन अंगअंग तेऊ अनुचर संग रूप भूप लीयें राजत शोभा पाय ॥
नवयौवन छत्र धरें सौभगता चमर ढरें गर्व सिंहासन बैठी आय ॥१॥
मानों नयना तुरंग कवच कंचुकी कस अंग कीयौ मुकाम अनंग मैत्री मिलाबन सुहाय ॥
अंचल ढाल ढरकत गज उर पर सूरदास मदनमोहन परे हैं
राधा बस रीझ दान दीजै घूदु मुसक्याय ॥२॥ | Saarang |
Sukhad ravikoti summ bhawan bhraaje . udayau anandanidhi gupt | Part1-070 | सुखद रविकोटि सम भवन भ्राजे । उदयौ आनंदनिधि गुप्त
संकेतमें प्रगट दुंदुभी दिव्य तूर बाजे ॥१॥ कमललोचन अद्भूत अमित शोभा
बढ़ी पढ़ि न आबै बदत नियम चारो । शिव ब्रह्मा सुर वचनते धरनी कौ प्रगट
प्राणेश द्वै भार टास्बो ॥२॥ महामुनि कंठ जीवन मुक्तिकी रूप ब्रह्म शाखा
त्रिय शक्ति कीनी । सहस्र कुंतल बिथुरी कंज मधुपावलि पीबत मकरंद झनकार
हीनी ॥३॥ सांख्य योगाधिपति श्रवन कुंडल धरें हरे नैनन एन तात माता ।
दसन दामिनी छठा श्याम अंग घन घटा हदें श्रीवत्स अंक विश्वत्राता ॥४॥
हरित बनमाल दुति कंठ हिंडोलगति देखि सुरनाथ कर धनुष छाँडयौ | चार आयुध
चार भुजनमें धरें छबि देखि वसुदेव आनंद बाढ्यों ॥५॥ निगम आगम वचन
मेघ गंभीर सम सुखद सरस विस्तार कीनौ । विविध उपदेश आनकदूंदुभीकौं दियो
मुदवति ब्रह्मपथ बोध दीनो ॥६॥ जननी जाचन हेत दै भुज प्रभुभये स्तुति
प्रसन्न बदन कहा कहूँ शोभा । कुसुम सुकुमारसुत प्रसूत प्रपंच युत गति मति कथित
तहाँ भये सुलोभा ॥७॥ जड़ जात लोह बंधत मोक्ष भयौ प्रीति करि स्मरण
किये क्यों न लेखे । असुरगण यूथ यूथाधिपति भ्रम भयो चले व्रज ईश तहाँ कहाँ
विशेष ॥८॥ सप्तपातालते नागपतिकी छठा आई प्रभु शीशपर छत्र तान्यो |
कूजत कोकिल पवित्र सिंघकल माधुरी धन्य वसुदेव सुत अधिक मान्यो ॥९॥
द्रुम लता फूली स्तबकाकार होइकें विवशभये प्राणपति चरन लागे। जलद कण
एकएकहि परत हरि हेत मनहुँ पुलकित वृक्ष ख़वत रागे ॥१०॥ सिंधुके निकट
गये महाभकत मेघ तब पति जानि लाजिके कटक भाजे | आपगति स्थूल सुर जानि
आपहि खिसेहेत याते विधु नक्षत्र राजे ॥११॥ जगतहिं को भवत विशुद्ध मति
सौरिमहाभाग्य वर भाग्य गाऊँ । तरणिजा कूल अति अमिय पूरण बहै गवनकौ
हेत सुनिजे बनाऊँ ॥१२॥ सिंधुगृहणी सुतानाथ आये जानि ब्रीड़ाते सकुच
अति तन दुरायौ । कनक अर्घादि उपचारकों थकि रहे जामात्रा बहुत आनंद
पायौ ॥१३॥ चले अंतर मध्य वृष्टि घोषमें जसुमति भवनमें अपर अजनी ।
लीनी दुहिता हाथ कुँवरकों तहाँ धरें हरण करि नाथ ब्रह्मांड रजनी ॥१४॥
व्रजनाथ नंद आनंदमय विमल वषु सुख देन निज रूप प्रगट कीनौ । लीला विस्तार
करि रिपु यूथ सकल हर धरि गिरिराज ब्रज राखि लीनौ ॥१५॥ | Maroo |
Janpayeho lalana valval vrajnupatikunwar .. | NityaPad-150 | जानपायेहो ललना वलवल ब्रजनूपतिकुंवर ॥
जाकेविवशसबनिशजागेतबही अनुसर || १॥ अपनी प्यारीके रतिके चिन्हहमर्हिं
दिखावन आये देते लोन दाथे पर॥ गोविंदप्रभु शामलतन तैसेई मनन जनमतहीते
युवतिन प्राणहर ॥२॥ | Bilawal |
Bamana ray kaha ray muhurt, kaba nandanandan piya ghar aave.. | Part2-352 | बमना रे कह रे मुहूर्त, कब नंदनंदन पिय घर आवे॥
निस दिन बैठी मारग देखूँ, को 5 कक ऐसी बात सुनावे ॥१ ॥
तोको दूँगी इच्छा भोजन, जो तेरे जिय भा वे ॥
रसिक प्रीतम बिन भई हों ब्याकुल, मोको क्यूँ न जिवाबे ॥२ ॥ | Suha |
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