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Sheetkal Ke Pad
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Kirtan Title | Page | Kirtan | Raag |
|---|---|---|---|
Gaayo naan gopal manlaayo naan nivarlaj paayo naan prasaad sadhumandali mein jaayake .. | NityaPad-348 | गायो न गोपाल मनलायो न निवारलाज पायो न प्रसाद साधुमंडली में जायके ॥
धायो न धमक बूंदाविपिनकी कुंजनमें रह्मो न शरण जाय श्रीविद्दलेशराय के ॥। १॥।
श्रीनाथजीको देखके छक्यो न छबिली छबि सिंह पोर पर्यो नाहीं सीसहू नवायकें ॥॥
कहें हरिदास तोहि लाजहुँन आई कछु मानस जन्म पायो पै कमायो कहा आयकें ॥२॥ | Bihaag |
Mundariya merrie dey lalaa tohi baabaa nandmaharki aanaho ... | Part1-297 | मुंदरिया मेरी दे लला तोहि बाबा नंदमहरकी आनहो ॥।
तोहि ब्रजरानीजू की सौंहहो ॥| अहो लाल झगरौ कछुअन कीजिये हो एक
गामकौ बास ॥ जतीया चारें को बड़े को ठाकुर को दास ॥१॥ अहो लाल
इतने ते इतनी भई हो संगही खेलत खात ॥ अब चितबत लज्जा भई हो
सिथिल होत सब गात ॥२॥ अहो लाल भूषन होय दुराइये मोपें करन
दुरायो जाय ॥ जब ग्रह गमनहों करौं हो देखि मेरी माय रिसाय ॥३॥ अहो
लाल इतनी बात न जानीयै हो मुंदरी रतन अमोल ॥ जतन जतनकर राखियौ
तेरी सब गैयनकौ मोल ॥|४॥ अहो पिया मुँदरीतौ बनमें गई हो चलौ हम
तुम देखन जाँय ।। ढूँढठन मिस तहाँ तें चले दोऊ कंठ भुजा उर लाय ॥५॥।
मिस ही मिस वहाँ तें चले दोऊँ कुंजमहल में आय ॥ प्रभु मुक्कुंद राधा
मिली देखत माधौं जन सचुपाय ॥६॥ | Kedaro |
Dekho dekhauri nagarnut nirtat kalindi tata gopin key madhya | Part1-321 | देखो देखौरी नागरनट निर्तत कालिंदी तट गोपिन के मध्य
राजें मुकुट लटक ॥ काछिनी किंकणी कटि पीतांबर की चटक कुंडल किरण रवि
रथकी अटक ॥१॥ तत थेई ताता थेई शब्द सकल घट उरप तिरप गति पयकी
पटक ॥ रास में श्रीराधे राधे मुरलीमें एक रट नंददास गावै तहाँ निपट
निकट ॥२॥ | Ramkali |
Aaj chhati kii raat dyos atee hii madoolkaari . sujas sunyo | Part1-203 | आज छटी की रात द्योस अति ही मड़ूलकारी । सुजस सुन्यो
वृखभानराय को भादों पक्ष अति उजियारी॥१॥ दूर देस के जुरे न््योतकी सब
मन यह ही बिचारी | लगन एक साध्यो सुभ तबहीं यह न होय विधि की
ओलारी ॥२॥ नाग लोक सुरलोक सुभूतल नाहिन यह सोभा अति सारी ।
अर्धाड़ी मोहन की जाई श्री वृषभान सुता री ॥३॥ कवि को विधि ये कहत
न आवे सेस सारदा त्रिपुरारी | कुंवरि सो मड़्ूलमय अति कीरति “अग्रदास' यह
सुता उर धारी ॥४॥ | Kanharo |
Dekhiyat madhojuke mehel . jethmas atee jadaat maghmas | NityaPad-248 | देखियत माधोजुके मेहेल । जेठमास अति जडात माघमास
कहेल । दूरिहीते देखियत है बादर केसे पहेल । बीच बीच हरत स्थाम जमुनाकेसे
देहेल । श्रीपति को कहा काज यही बात की सेहेल ॥ परमानंददास तहां
करत फिरत टहेल ॥ | Saarang |
Patihaaye naina kahein deit rawre kaisen chori durey .. | Pustak1-345 | पतिहाये नैना कहें देत रावरे कैसें चोरी दुरे ॥
तुम मुकरत हो ये आनन चंढ़ि गरजत गाजि बादर करत कैसेंधीं मुख मुरे ॥१॥
सोचे न झूठे करत इन बातन साह भयो चहत असि विधि तुमहीकों फुरै ॥
चतुरबिहारी गिरिधारी जानि पहचाने जू तूमसों झगरौ कौन करे ॥२॥ | Bihaag |
Arey teree yaahi mein banaai .. yeh marag tum roque rahet hoe | Part1-266 | अरे तेरी याही में बनआई ॥ यह मारग तुम रोक रहेत हो
छीन छीन दधिखाई ॥१॥ तुम जानत हो घेरी हमने रही अपनी समदाई नंददास
प्रभु तनक छाछ मैं निकस जात ठकुराई ॥२॥ | Kalyan |
Yeh kaun tave teree kanhaiya jabtab maarg roke .. | NityaPad-273 | यह कौन टेव तेरी कन्हैया जबतब मार्ग रोके ॥
कैसेके पनिया जाय युवतीजन आडोई ठाडोहै कुलट लिये दृूग झोके ॥१॥
कबहुंकपाछेतें गागर डार देत ऐसें बजाबे तारी जैसें कोऊ चोंके ।|
रसिक प्रीतमकी अटपटी बातें सुनरी सखी समझ न पर वाकी नोंकें ॥२॥ | Saarang |
Chhakakon bhaee aver aaee naanhe | NityaPad-210 | छाककों भई अवेर आई नांहे
छक हारी मोहें लागी भुक भारी केसके रहोंगो ॥ ऐगैयां मेरे मनकी छैयां दोहेगे
बलदाऊ भैया दुध पीय रहुंगो।॥१॥ बावा सों कहा कहों मैया सुधभुल गई
मथत हे दूध मधुर माखन होहु चहुंगो ॥ श्रीविद्ल गिरधरन लाल कहे दाव मेरो
पर्योहे तब सोही सोही करुंगो ॥२॥ | Saarang |
Useer bhawan chhaayo suman taamein baithe radha raman arrie uns bhuj mellie .. | NityaPad-246 | उसीर भवन छायो सुमन तामें बैठे राधा रमन एरी अंस भुज मेली ॥
मृगमद घसि अंग लगाय कपूरजलसों चुचाय सीतल लागे दोऊरी करत सुखद केली ॥१॥
गावे सारंगराग सरस स्वर कोकिला सुरतरस चलेतें न चलाय रससों पुलकित द्र॒मवेली ॥
जगजन्नाथहित विलास ग्रीष्म ऋतु सुखनिवास ललितादिक निरख निरख पावे रसझेली ॥२॥ | Saarang |
Sikhwat ketee raati gaee. | NityaPad-125 | सिखवत केती राति गई।
चंद्र उदे बर दीसनि लाग्यो तू नहिं और भई ॥
सुनि हो मुगध ! कह्ौ नहिं मानति जामी हृदे कई ।
परमानंद' प्रभु को नहि मिलती तौ प्रतिकूल दई ॥। | Kalyan |
Navavasant aagam navnagari navnagar giridhar sanga khelat .. | Part3-059 | नववसंत आगम नवनागरी नवनागर गिरिधर संग खेलत ॥
चोवा चंदन अगर कुंकुमा ताकि ताकि पियसन मुख मेलत॥१॥
पोहोपांजुलि जब भरत मनोहर बदन ढांपि अंचल गति पेलत ॥
चत्रभुज प्रभु रस रास रसिक को रीझि रीझि सुख सागर झेलत ॥२॥ | Basant |
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