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Sheetkal Ke Pad
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Kirtan Title | Page | Kirtan | Raag |
|---|---|---|---|
Chalauri murali suniye kaanh bajaai yamunatir .. ttaj | Part1-284 | चलौरी मुरली सुनिये कान्ह बजाई यमुनातीर ॥ त्तज
लोकलाज कुलकी कान गुरुजनकी भीर ॥१॥ यमुना जल थकित भयौ बछरा
न पीवें क्षीर ॥ सुर विमान थकित भये थकित कोकिल कीर ॥२॥ देहकी
सुध बिसर गई विसस्यौ तनकौ चीर )। मात तात बिसरगये बिसरयौ पूत घालम
बीर ॥३॥ मुरली ध्वनि मधुर बाजै कैसें कि धरों धीर ॥ सूरदास प्रभु
मदनमोहन जानत हो परपीर ॥४॥ | Bilawal |
Prenkhparyak giridharan sohein | prem anand bharee gopika curr | Part1-090 | प्रेंखपर्यक गिरिधरन सोहें | प्रेम आनंद भरी गोपिका कर
धरें देत झोंटा तहाँ काम मोहें ॥१॥ मंद मोहन हँसत दंत कांती लसत बजत्त
नुपूर मधुर रुनत कारि। भाल मसि बिंदु केसरी तिलकहि लसे नैंन अंजन मनसिज
बानमारी ॥२॥ अलक राजत मुख भुज पसारत सुख हरत गोपांगना मान तिहि
समय तहाँ । देत सुख सिधु गोपिका मननकों सूर शोभा निरखि वारि तन मन
जहाँ. ॥३॥ | Ramkali |
Gaihon khirak duhaavan gaay .. khor | NityaPad-296 | गइहों खिरक दुहावन गाय ।। खोर
सांकरी छैलछबीले अंचल पकरयो धाय ॥१॥
तैसी ये निसि अंधियारीकारी श्याम नजानें जाय |
ये गोरे तन घरके वैरी बनमें दह बताय ॥ २॥
कुच भुजबिचअटक नटनागर रहे कंठ लपटाय ॥
तब कछु सुध न रहीरी मो तन की धरणि परीमुरझाय ।। ३॥
सुखमें दुख उपज्यों उत चितवत नयनन रहे अरुझाय ।। चली जातही
अजर पंथमें लीनी व्यास बचाय ॥।४॥ | Gori |
Duhi- duhi lyawati dhauri gaiya | | NityaPad-207 | दुहि- डुहि ल्यावति धौरी गैया |
कमल-नयन को अति भावतु है मथि-मधि प्यावति घैया ॥
हँसि-हँसि ग्वाल कहत सब बातें सुनु गोकुल के रैया !
ऐसौ स्वाद कबहुं न चखायो अपनी सौंह कन्हैया !
मोहन! भूख अधिक जो लागी छाक बॉटि लेहु भैया !
परमानंददास' कौं दीजै फुनि - फुनि लेत बलैया ॥ | Saarang |
Kunjamahalmein lalana rasbhare baithe sanga pyaari .. | NityaPad-314 | कुंजमहलमें ललना रसभरे बैठे संग प्यारी ॥
रुचित रुचित बनमाल बदनपर मृगमद तिलक संवारी ॥ १॥
घनचय चिकुर कुसुम नानाविध ग्रथित मुदुलकर चंपक बकुल गुलाब निवारी ॥
गोविंदप्रभु रसवशकीनें वृषभाननंदिनीते मदनमोहन गिरिधारी ॥। २॥। | Adano |
Dhota merrie dohni durai .. | NityaPad-188 | ढोटा मेरी दोहनी दुराई ॥
मौपेते लीनी देखनको यह धोंकों नवडाई ॥१॥
निपट सवेरीहों उठ आतुर खिरक दृह्ा वन आई ॥
जान अकेली याढो टानें बहुत भांति खिजाई ।।२॥
द्वार उघार खोलदीये बछराव खटगैया चुखाई ।।
हों पचचिहारी कहीनहीं मानत वर्जत नाके आई ॥।३।।
घर मेरी सास त्रासेगीहौं कहा उत्तर देहूं जाई ।।
परमानंदप्रभु तब हँसदीनो भई बात मनभाई ।॥।४।। | Bilawal |
Lalit vrajadesh giriraj raaje .. ghosh seemantini sanga girivar | NityaPad-224 | ललित व्रजदेश गिरिराज राजे ॥ घोष सीमंतिनी संग गिरिवर
धरन करत नित फले तहां काम लाजे ॥१॥ त्रिविध पवन संचरे सुखद झरणा
झरे, छूलित सोरभ सरस मधुप भ्राजे | ललित तरु फूल फूल फूलित खट ऋतु
सदा, चत्रभुजदास गिरिधर समाजे ॥।२॥ | Bhairav |
Jasumati suta janm suni phoole vrajrajaho . badebais pooran ghar | Part1-038 | जसुमति सुत जन्म सुनि फूले ब्रजराजहो । बडेबैस पूरन घर
आयौ यह काजहो ।।१॥ ब्रज गाय सिंगारी सब बसन भूषण साज । देखनकों
आय जुरे गोपी गोप समाज ॥२॥ सगरे मिलि नायें गावे छांड़ि लोक लाज॥
दूध दही माखन लै छिरकें करि गाज ॥३॥ नंद सबन दीने थेनु रतन बसन
नाज । प्रगट भये रसिक प्रीतम गोकुल सिरताज ॥४॥ | Dhanashri |
Raasmein rasik mohan baney bhamini .. subhag paavan pulin | Part1-349 | रासमें रसिक मोहन बने भामिनी ॥ सुभग पावन पुलिन
सरस सौरभनलिन मत्त मधुकर निरक शरदकी यामिनी ॥१॥ त्रिबिध रोचक
पवन ताप दिनमणि दवन तहाँ ठाढ़े रवन संग शत कामिनी ॥ ताल बीणा मृदंग
सरस नाथत सुधंग एकतें एक संगीतकी स्वामिनी ॥२॥ रागरागिन जमी विषिन
बरखत अमी अधरबिंवन रमी मुरली अभिरामिनी | लाग डाप उरप सप्तस्वरनसों
सुलप लेत सुंदर सुभग राधिका नामिनी ॥३॥ ततथेईथेई करत गतिब नूतन
धस्त पगन डगमग धरत मत्त गजगामिनी ॥ धाय नवरँग धरी उरसि राजत खरी
उभय कलहंस हरिवंश घनदामिनी ॥४॥ | Kedaro |
Banyau raas pulin madhya kalindanandini || jall seekarta sahit | Part1-325 | बन्यौ रास पुलिन मध्य कलिंदनंदिनी || जल सीकरता सहित
मलय वायु मंदिनी ॥१॥ कुसुमित राजीव शरद रैन चंदिनी ॥ मधुप पाँत
सुभग चरणकमल बंदिनी ॥२॥ गोवर्द्धनाथकी गतिगयंदिनी ॥ क्रृष्णदास
सगुण शरद चंद फंदिनी ॥३॥ | Todi |
Yeh gati naach nachaav naee .. vrindaavanmein rasbillas sukh baadhati | Part1-338 | यह गति नाच नचाव नई ॥ वृंदावनमें रासबिलास सुख बाढति
सई ॥१॥ भॉंतिभाँति राग गाबत स्वर अलापत केई ॥ उरप तिरप मान
लेत तत ताथेई ॥२।॥ श्याम सुंदर करत क्रीड़ा प्रेमघटा छई ॥ कुंभनदास
प्रभु गिरिधर छिनि छिन प्रतिनई ॥३॥ | Gouri |
Jembat lalana laalan sanga. manimay mahel birajat dou parada | NityaPad-080 | जेंबत ललना लालन संग। मणिमय महेल बिराजत दोउ परदा
परेहे सुरंग ।|१॥ धरी अंगीठी धिकत कनक की सनमुख दोउराजे ॥ रतन जटित
सिंहासन तामें गादी तकिया साजे ॥ २॥ सुंदर झारीभर ि यमुनाजल धरिसखी की
और ।| कनकथार नव ओदन खीचरी धरि व्रजजन चहुं और ॥ ३॥ रोटी लीटी बहु
घृत चुपरी नीकी धरि कर प्रीत । ललितादिक मनुहार करत दोउ जेंबत अतिरस
रीत ॥४॥ प्यारी कोर देत प्रिय के मुख प्यारों मुख में मेले। रसिक प्रीतम रस रीत
प्यारी रतिनाथ कंठ भुजा दोउ झेले ॥५॥। | Dhanshree |
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