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Sheetkal Ke Pad
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Kirtan Title | Page | Kirtan | Raag |
|---|---|---|---|
Bolat syaam manohar baithe kadamb khand or kandambaki chhaiyaan .. | Part3-002 | बोलत स्याम मनोहर बैठे कदंब खंड ओर कंदंबकी छैयां ॥
कुसुमित द्रुम अलि गुंजत सखी कोकिला कल कूजत तहियां ॥१॥
सुनत वूतिका के बचन माधुरी भयो हे हुलास जाके मन महियां ॥
कुमनदास ब्रज कुंवरि मिलन चली रसिक कुंवर गिरिधरन पैंयां ॥२॥ | Malkoos |
Hoe pyaari horry khele russ bharey vraj jubtin | Part3-261 | हो प्यारी होरी खेले रस भरे ब्रज जुबतिन
के संग री प्यारी || एकत' आईं सबै जुरीं सौधे भीने अंग री प्यारी ॥१॥
केसर कलस लिये धरें कटि गुलाल सुरंग री ॥ पिचकाई नगन जराय
जरी खेलत होत अनंग री ॥२॥ कोऊ कंचन सों धरे छोरत देखि सुकंठ
री ॥ केसर आड लिलाट करे कोउ लेत उछंग री ॥३॥ कोऊ बजावत
किन्नरी कोउ उठाई मृदंग री ॥ कोऊ आओचका हँसि परी तोरत तान तरंग
री ॥७॥ लायक नारी बनाय के झूठो नाम कराय री ॥ घूँघट अधिक तनाय
के नारीन में ले जाय री ॥५॥ कोउ कुल वधु जनायकें कहत बात मुझुझाय
री ॥ नैसँकु लाये मनाय के नीके खेल खिलाय री ॥६॥ जब ही चरन
गनाय के धरत चोंप चित लाय री ॥ पाछे तें सिर नायके हँसत कंठ लपटाय
री ॥७॥ कोऊ झुमत नायके देत अबीर उड़ाय री ॥ अरगजा अधिक सनाय
के वदन पानि परसाय री ॥८॥ मिलि आई सब भामिनी पकरि लिए चहं
ओर री ॥ उलंटे लगी मानो दामिनी रह्मो बीच घनघोर री ॥९॥ एक
कहे ए कामिनी लेडो अप अपनी कोर री ॥ बिसवासी गजगामिनी बाँधि
छोरे सो छोर री ॥१०॥ तब धाई सुखधामिनी राजत रूप मरोर री ॥
ज्यों उजियारी यामिनी एक एकते जोर री ॥११ ॥ आई हैं अभिरामिनी
झटठकि लयो कर जोर री ॥ हैं तुमारो एक स्वामिनी सोच करो किन ओर
री ॥१२॥ हैंसिं ग्रीवा भुज मेल ही कोऊ उठत अति गाज री ॥ अंस बांह
धरि पेलही कोऊ जात गहि भाज री ॥१३॥ केतेक रूप नवेलही सोहत
खरी विराज री ॥ केतेक बेस नवेल ही निरखी रहत काम लाज री ॥१४॥
इहि बिधि होरी खेल ही मनमथ सेना साज री ॥ तेरे तो अलबेली ही
कहा रही जिय लाज री ॥१५ ॥ मदन मोहन पिय के लही रस सागर
की राज री ॥ यह सुनि चली अकेली हेली धाय कंठ मधि राज री ॥१६॥
श्री विद्ठेल पद पद्म की जैए बलि बलिहार री ॥ '“गोकुल पति' सुख सदन
की मावत सरस धमार री ॥१७॥ | Sarang |
Dekhari dekh navarkunj ghana saghan tarr thaade girivardharan rung | NityaPad-172 | देखरी देख नवर्कुंज घन सघन तर ठाडे गिरिवरधरन रंग
भीने। मुकुट सिर लाल कटि काछििनी बेनु कर राधिका संग भुज अंस दीने ॥ १॥
मकरकुंडल स्रवन झलक अंग पर रही मानों चंदन जु तन खोर कीने ॥। निररित्रि
गोविन्द छबि सघन नंदनंदकी बारि तनमन दोउ प्रेम भीने ।। २॥॥ | Bilawal |
Muraliya aise shyam rijhaaye .. nandanandanke guna naheen jaanat | Part1-290 | मुरलिया ऐसे श्याम रिझाये ॥ नंदनंदनके गुण नहीं जानत
अतिश्रमतैं यह पाये ॥१॥ तु॒व ब्रतकौ फल बहै दिखायौ चीरकदंब चढाये
॥ कह्नौँ कहा सब वैसेंहि आवहु युवतिन लाज छुड़ाये ॥२॥ तब दै चीर
आभूषण बोले धन्य धन्य शब्द सुनाये ॥ सुनहुँ सूर ब्रजनारी भारी इतनेही
हरख बढ़ाये ॥३॥ | Saarang |
Horry dey khyaal bich yeh kyakita .. menul- | Part3-318 | होरी दे ख्याल बिच यह क्याकीता ॥ मेनूल-
गाय छरी फूलोंदी सिरदा घृंघट खोल बेलीता ॥१॥ पथां जुलाल आंखों
विचमैंडी देखनदासुख छीताबेछीता ।| सखी देखेंदी लाजमरोंदी चुंबन
गालोंदीता ॥२॥ ऐसी न कीजे निगडनंददे कह्लेलांदा ब्रज जनदा मीता ॥
रसिक प्रीतम नाल हा हा खांदी हों हारी तू जीता वे जीता ॥३॥ | Bihaag |
Sethh purushottardaske ghar parmanand bhayo ree. | Part2-329 | सेठ पुरुषोत्तरदासके घर परमानंद भयो री।
दुलहे बन आये पिय प्यारे बिरह न जात सह्यो री ॥१ ॥ बेटी रुक्ष्मणि सुत
गोपाल जु मनवांछित फल पायो जु। सब मिल गाय बजाय प्रेमसों बराती
बना पधरायो जु ॥२ ॥ | Noor Sarang |
Mohanrai maniri | NityaPad-326 | मोहनराय मानीरी
तेरी बतियां ॥ मदनमोहन पिय बैठे एकांतहवै दीनो सुहस्त जाय पतियां ॥१॥
जबलग धीरजधररी सयानी दिनगत याम जोलों होय अधरतिया ॥ कुंभनदासप्रभु
दूतीके वचनसुन परमसीतल भई छतियां ॥२॥॥ | Bihagaro |
Tum podhau houn sez banaauun.. chova | NityaPad-342 | तुम पोढौ हों सेज बनाऊं।। चोवा
चरन रहौं पाटीतर मधुरे सुर केदारो गाऊँ।।९॥ सहचरी चतुर सब जुर आई दम्पति
सुख नेंनन दरसाऊं ॥ आसकरन प्रभु मोहन नागर यह सुख श्याम सदा हों
पाऊं॥२॥ | Bihaag |
Bolat madan gopal laal suna manini .. jini | Part3-313 | बोलत मदन गोपाल लाल सुन मानिनी ॥ जिनि
करो एतो मान आये सुन मानिनी | आयो सरस वसनन््त समय सुन माननी ॥
रहो काहको मान आये सुन मानिनी ॥ १॥ उत्तर धरनितें घर चल्यो सुन०।
सुंदर दिनमनि पिय आये सुन०। छाड कछु इक मान जानि सुन०। दछिन
बिच छिन तीय आये सुन० ॥२॥ मलयपवनकी आजुही सुन०। ज्है गई
ताती वाय सुन०। जानु दछिन दिस विरहिनी सुन०। लीनो विरह उसास
सुन० ॥३॥ वह सुन कानन कान दे सुन०। कोकिलकी कुहदकानि सुन०।
आनक मानो ऋतुराजको सुन०। सिर पर बाज्यो आन सुन० ॥७॥ जिहि
डर वल्लिन मान छाँड सुन । उलही आनिके पेट सुन०। नायक द्रमन कंतसों
सुन०। कैसे गई है लपेट सुन० ॥५॥ साम गई रजनी भइ सुन०। गईं रविमंडल
छाई सुन०। थिरचर ये सब रहसिके सुन०। मिलि पियनिसों जाई सुन०
॥६॥ ठोर-ठोर मिलि मधुप पुंज सुन ०। गुंजे सौर मचाई सुन०। मानो विहरत
मधुप छबि वधु सुन०। नूपुर जु बाजत पाई सुन० ॥७॥ मिल कुंजहि किल
कोकिला सुन०। कोमल कंठ सुजाति सुन०। अटन चढ़ि मानो मधु वधु
सुन०। करत परस्पर बाति सुन० ॥८॥ मोर विहंगम रंगभरे सुन०। करत
कुलाहल भोर सुन०। मानो मन्मथ कुँवर छूटयो सुन०। पर्यो मधु नगरी
सोर सुन० ॥९॥ त्रिगुन पवन चंचल तुरंग सुन०। चढ्यो तिहिं राज विदेह
सुन०। उडी जु पोहोपबन राजत सुन०। बढी मानो खुर खेह सुन० ॥१०॥
खग बंदीजन वबदत बिरद सुन०। मदन जहाँ सिरमौर सुन० तिनमें कपटी
कहत मानों सु० । एके तू नहीं और सुन० ॥११॥ कुसुम सरासन कर
धरे सुन०। विषमें विष भरे बान सुन०। को सहिहे तिछन खरे सुन०। चढ़े
चंद खरसान सुन० ॥१२॥ वृन्दावन मिलि रस भयो सुन०। नव कुमुमाकर
चारु सुन०। ज्यों कुचमंडल जुबतिके सुन०। मंडित मंजुल हारू सुन० ॥ ६ ३॥
तरूनी मुकुटमनि बाल तू सुन०। लाल रसिकमनि राय सुन०। कीजिये सुफल
वसनन्त मम सुन०। नंददास बलि जाय सुन० ॥१४॥ | Gouri |
Guru mahima. guru binu assie kaun karey .. | NityaPad-373 | गुरु महिमा। गुरु बिनु एसी कौन करे ॥
माला तिलक मनोहर बानो ले शिरछल्र धरे || १॥
भवसागरतें बुडत राखे दीपक हाथधरे
सूरस्याम गुरु एसो समरथ छिन में ले उद्धरे ॥२॥ | Bihaag |
Naumike dinn nobat baaje kaushalya suta jaayo.. | Part2-254 | नौमिके दिन नोबत बाजे कौशल्या सुत जायो॥
सातघरी दिन उदित भयोहे सब सखियन मंगल गायो॥१ ॥
कांप्यो सिंधु कंगूरा ढरियो लंका अगम जनायो॥
सब लंकामें शोक पययोहे राजदेव गृहआयो ॥२ ॥|
दशरथ मन आनंद भयोहे वंश हमारे गृह आयो॥
विप्र बुलाय शोधना कीनी अभे भंडार लुटायो॥३॥
कंचनके बहु कलश बनाये मोतिनचौक पुरायो॥
घरी एक निगम सोच हियभाख्यो रामचन्द्र गृहआयो ॥४ ॥
गृहगृहतें सब. सखी बुलाईं आनंद मंगल गायो॥
दशरथराय दोऊ आंगनमें आदर कर बैठायो ॥५॥
दशरथ उठ बजार पथधारे सारी सुरंग बस्थायो॥
जो जाके जैसो मनभायो तेसो ताहि पहरायो ॥६ ॥
पाट पटंबर खासाझीनो जेसो जाहि सुहायो ॥
परमानंददास कहांलों बरनों तीनलोक यश छायो ॥७ ॥॥ | Bilawaal |
Jaani mesh sankraati | NityaPad-216 | जानि मेष संक्राति
श्री विद्डल धरत भोग सतुवाको गिरिधर । धूप दीप तुलसी संखोदक कर
संकल्प दान दे द्विजबर ॥१॥ मेवा मोदक ले कर अपने अरोगत हैं स्थाम सुन्दर
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