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Sheetkal Ke Pad
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Kirtan Title | Page | Kirtan | Raag |
|---|---|---|---|
Dothkar jore bhaye sub thaade.. dhanya dhanya bhaktanke chaade ..1 .. | Part2-075 | दोठकर जोर भये सब ठाडे॥ धन्य धन्य भक्तनके चाडे ॥१ ॥
तुमभोक्ता तुमही प्रभुदाता ॥ अखिल ब्रह्मांड लोकके ज्ञाता।२॥
तुमकों भोजन कोन करावे॥ हितके वश तुमकों कोउपावे ॥३ ॥
तुमलायक हमारे कछुनाईं॥ सुनत स्यामठाडे मुसिकाईं॥४ ॥
ललिता सखी देवता चीन्हों॥ चंद्रावलि राथे कहि दीनों ॥५ ॥
दे वबडो यह कुंवर कन्हाई ॥ कृपाजान हरिताहि चिन्हाई ॥६ ॥
सूरश्याम कहि प्रगट सुनाई ॥ भये तृप्ति भोजन गिरिराई ॥७ ॥ | Bilawal |
Shayamadhaktar chhaak aarogat mandaliruchi prem sukhakaari .. | NityaPad-217 | शयामढाकतर छाक आरोगत मंडलीरुची प्रेम सुखकारी ।।
उसीर महेल मध्य कुसुमरावटी बनी सधनकुंजलतामें राजत पियाप्यारीकेलि मनुहारी ॥१॥
जाई जुई चमेली बेलि रायबेलि कदम सिखंडी मध्य गुलाब फूलरी॥
ब्रजाधीश सुख विलास जेंवत हरि मंडल मध्यतामें समीप ठाडी ढोरत बींजनारी ॥२॥ | Saarang |
Phoolmahel mein phoole douu neel kamal aru peet chameli ... | NityaPad-262 | फूलमहेल में फूले दोऊ नील कमल अरु पीत चमेली ॥।
स्यामाजु अति सुखद सरोवर तिन करि सींचत मन मधुकर रसनिपुण नवेली ॥१॥
फूली ललित लतनद्रग ललिता चंद्रभगा चंपो शीर मूली ॥
इन्दर्विंदु विपुल कलीसी भामावेली विलोक सहेली ॥२ ॥
यह सुख सखी कहत नही आवे ग्रीष्मक्रतु प्रीतम संग खेली ॥
एसेई फूल फूलो ब्रज निशदिन गोकुलनाथ करो नित केली ॥३॥ | Saarang |
Kartaho sabey sayanibat ..| joe low dekhein nahin | NityaPad-094 | करतहो सबे सयानीबात ॥| जो लो देखें नाहिन
सुंदरकमलनयन मुसकात ।। १॥ सब चतुराई बिसर जातहै खानपानकी तात ।।
विनदेखें छिन कल न परतहे पलभर कल्पविहात ॥। ३।। सुन भामिनिकें वचन
प्रनोहर मनमें अतिसकुचात ।। चतर्भुजप्रभु गिरिधरनलाल संग सदा बसों दिन
रात ॥ ३॥ | Ramkali |
Daan niveri laal ghar aaye .. aarti karat | Part1-264 | दान निवेरि लाल घर आये ॥ आरती करत
नंदजुकी रानी और हँसि हँसि मंगल गीत गवाये ॥१॥ ऐसे बचन सुने मैं
श्रवणन बड़े महरि के पूत कहाये ॥ फिरि फिरि राय बात हँसि बूझत हमकों कहौ
कहा तुम लाये ॥२॥ लाऊँ कहा सुनों किन मोपै छीन छीन सबने दथि
खाये॥ श्रीविड्डलगिरिधरनलालनें बातन ही दोऊ बौराये ॥३॥ | Bihagaro |
Itahi shyam gopan sanga thaade .. bhojan karat adhik ruchibadhe ..1 .. | Part2-074 | इतहि श्याम गो पन संग ठाडे ॥ भोजन करत अधिक रुचिबाढे ॥१ ॥
गिरि तन शोभा श्याम बिराजे॥ श्यामहि छबि गिरिवरकी छाजे ॥२ ॥
गिरिवर उरहि पीतांबर धारें ॥ मोतिनकी उरमाला भारें ॥३॥
अंग भूषण श्रवण मणि कुंडल॥ मोर मुकुट शिर अलकें कुंतल ॥४॥
छबि निरखत सब घोष कुमारी॥ गोवर्द्धन छबि श्याम तुमारी ॥५॥
सूरश्याम लीलारस नायक॥ जन्म जन्म भक्तन सुखदायक ।।६ ॥ | Bilawal |
Nahaat baladaau kunwar kanhai .. | Part2-038 | नहात बलदाऊ कुंवर कन्हाई ॥
अति सुगंध केसर वस्तु री जलमें घोर मिलाई ॥१॥
रत्नजटित आभूषण वस्तर ब्रजरानी पहेराये ॥
अति आनंद निहारत फिर फिर आछो भांत बनाये ॥२॥
यह दिन दीपमालिकाको सुख मानतहें नंदलाल ॥
फूले गोप ग्वाल सब मानत और सकल ब्रजबाल ॥३ ॥
अप ने संग सखा सब लीने खिरिक खिलावत गाय॥
राजतहें गिरिधर श्रीविद्डुल सब मन हुलस बढाय ॥४ ॥ | Devgandhar |
Aavat baabaa nand koo haathi .. baahu bisal kamal dall | Part2-346 | आवत बाबा नंद को हाथी ॥ बाहु बिसाल कमल दल
लोचन संकरषन को साथी ॥१ ॥। अपनी इच्छा रहत ब्रज भीतर गायन के
संग खेले ॥ केसि तृणावर्त कों मार॒यों सकट पूतना पेले ॥२ ॥ श्रीवसुदेव
देवकी नँदन कंस बंसकों काले ॥ 'परमानँद' दास कों ठाकुर नायक नंद
को लाले॥३ ॥ | Suha |
Raadhe tuu atee rangbhari mein jaani millie mohanason anchal | Part2-354 | राधे तू अति रंगभरी में जानी मिली मोहनसों अंचल
पीक परी ॥ छुटी लट छूटी नकबेसर मोतिन की दूलरी ॥ मैं जानी तें फौज
मन्मथ की लूट लई सगरी ॥२॥ अरुन नेन मुख सरस नासिका कुसुम
गुहित कबरी ॥ सूरदास प्रभु नगधर के संग सुख समुद्र तरी ॥३ ॥ | Goud Sarang |
Banyo bago | NityaPad-237 | बन्यो बागो
बामना चंदनको ॥ चंपकलीकी पागबनाई भालतिलक नवबंदनको ॥॥१॥
चोलीकी छबि कहत न आवबे काछोटा मनफंदनको ॥ परमानंद आनंद
तहांनित मुख निरखत नंदनंदनको ॥२॥ | Saarang |
Japat syaam tere guna baithe | NityaPad-232 | जपत स्याम तेरे गुण बैठे
कदम्ब की छैयां || उन तो विनती बहुत कर पठई तू जो करत है नैयां ॥१॥ नेंक जो
दृष्टि परत नकरखी बह छबि तेरे नैनन महियां ।। सूरदास प्रभु गिरिधर बौली चली
है टेक परी बहियां ॥२॥ | Saarang |
Horry khelati hain vraj nand-ladaitau-laal .. chova | Part3-077 | होरी खेलति हैं ब्रज नंद-लड़ैतौ-लाल ॥ चोवा
चंदन औरू अरगजा कंठ सोहै मौंतिन की माल ॥१॥ कोऊ गुलाल केसर
भरि लिए कोऊ कंचन-थाल ॥ एकु नाँचत एकु मृदंग बजाबति, गावति
गीत-रसाल ॥२॥ छिपत फिरत हैं कुंजन महियाँ, हो हो करत बिहाल ॥
चतुरभुज' प्रभु पिय गरैं लगाई लई, रीझि दई उर माल ॥३॥ | Bhairav |
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