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Sheetkal Ke Pad
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Kirtan Title | Page | Kirtan | Raag |
|---|---|---|---|
Adubhut teree baat kanhaiya | tum joe tanak govardhan dhaaryau | Part1-162 | अदूभुत तेरी बात कन्हैया | तुम जो तनक गोवर्धन धारयौ
एकही हाथ लियौ कैसे भैया ॥१॥ यमुना पैठि गह्मौ पुनि काली रहे सब लोक
दिखैया । केशि तृणावर्त तैं मारे और पूतना हनी यदुरैया ॥२॥ बच्छ बाल
अधघासुर लीला तुमही भये ता ठौर नन्हैया । परमानंद प्रभु बहुतक ऐसी अपनो
मरम कही नंद डुहैया ॥३॥ | Saarang |
Parosat pahuni tyo naari .. jenwat ramkrishna douu bhaiya | NityaPad-083 | परोसत पाहुनी त्यो नारी ॥ जेंवत रामकृष्ण दोऊ भैया
नंदबावाकी थारी ।। १॥| मोही मोहनकी मुख निरखत विकल भई अतिभारी ॥
भूपर भात कोरें भई ठाढी हसत सकल ब्रजनारी ॥२॥ के याहि आंच
हियेंकी लागी नवजोवन सुकुमारी ॥ परमानंद यशोमति ग्वालिन सेनन बाहिर
टारी ॥३॥। | Saarang |
Kesari uparna odhain kesar kii dhauti .. | Part3-039 | केसरी उपरना ओढ़ैं केसर की धौती ॥
केसर को तिलक सोड़े श्रीविड्जल छबि जौती ॥१॥
खट मुद्रा सोभित माला उर आभूषन भूषित सब अंग ॥
नख सिख निरखति श्रीवल्लभ सुत लजित भयों अनंग | २॥
आयों ऋतुराज परम रमनीक अति सुखकारी फागुन मास ॥
अति सुखदाइक कृष्ण सप्तमी ब्रजपति पूरी आस ॥३॥
आजु बडो दिन महा महोच्छव करत श्रीविद्वलनाथ ॥
गिरधर आदि प्रभृति सप्त सुत निजजन कीए सनाथ ॥४॥
कीए सुगंध फूलेल उबटनो कीए जु केसरि स्नान ॥
कीए सिंगार मनोहर सब अँग पीत बसन परिधान ॥५॥
नख सिख विविधि भाँति आभूषन सोभित गिरिधर लाल ॥
कुलह केसरी सीस विराजीति मृगमद तिलक सुभाल ॥ ६।॥।
खट रस विंजन विविधि भाँति के कीए पकवान रसाल ॥
आदर सौं जिमावति भावति गोकुल के प्रतिपाल ॥७॥
दे बीरा छिरकतिचोवा चंदन कुँमकुम अबीर गुलाल ॥
ज्यों गुलाब कुसुम अति सोभित,सोभित सुंदर भाल | ८॥
गावति गुन गंधर्व गलित मन बाजति सरस मृदंग ॥
ताल रबाब झांझि ढफ महृवरि राजत सरस सुधंग ॥९॥
अति आदर सौंकरि न््योछाबर आनंद उर न समाई ॥
आरति वारत श्रीमुख उपर 'गोविंद' बलि बलि जाई ॥१०॥
| Hindool |
Badhaaye aaj nandmahar ghar phoole firat narnari . aeka gawat | Part1-044 | बधाये आज नंदमहर घर फूले फिरत नरनारी । एक गावत
एक भुदंग बजावत एक नाचत दे दे तारी ॥१॥ तोरन चित्र संवार साथिये द्वार
बांधी बंदनवार । जगन्नाथ प्रभु प्रगटे ब्रजमें सब भक्तन हितकारी ॥२॥
# राग सारंग ऋ सोरन कलस धुजा पौरिनपर आछी भाँति सवारें । हरद दही
रोरिनके छिरके सब गोपिनके द्वारें ॥१॥ भीर रहत नरनारिनकी यह गावत
गीत बधाये । काहू नहीं सुहात कछु अब ललन भाँवते पाये ॥२॥ आनंदमें
बीतत सगरी दिन इन ढोटा के जाये ॥ श्रीविह्लगिरिधरन प्रगटिकें बहुत बधाए
गवाये.. ॥३॥ | Sarang |
Madhur mohan mukhahin murali baajau . sunahi kinn kaana daiy | Part1-296 | मधुर मोहन मुखहिं मुरली बाजौ । सुनहि किन कान दै
सुघर ब्रज-नागरी राग केदारौ, चर्चरी ताल साजैं॥ सप्त सुर-भेद वधान तुअ
नांउ लै करत गुन-गान मिलि, तुअ हित काजै | छीत-स्वामी' नवल लाल
गिरिधरन को वेगि मिलि भेटि, मन्मथ-दाह दाजै ॥ | Kedaro |
Kamalmukh dekhat kaun aghaay.. sunari sakhee | Part2-353 | कमलमुख देखत कौन अघाय॥ सुनरी सखी
लोचन अलिमेरे मुदित रहे अरुझाय ॥१ ॥ मुक्तामाल लाल उर ऊपर जन
फूली बनराय ॥ धर अंग अंग पर कृष्णदास बलजाय ॥२॥
८ राग सुहा ए० (४२) नई बात सब नई रीत सब नई देखियत हे पिय
प्यारी॥ नई हसन नई नेनन की फरकन नई बिलसत भई अचरा की
फरकन न्यारी॥१॥ नई चलन नई मूरत नई गत नई अंग सोहे सारी ॥
रसिक प्रीतम सों नई एक रति उपजी बरनत विमल विहारी ॥२ ॥। | Suha |
Dekh sakhee phoolan ashtakhambha bethehen giridhar peeya pyaari .. | NityaPad-261 | देख सखी फूलन अष्टखंभा बेठेहें गिरिधर पीय प्यारी ॥
सेवती सुबन जुथीका गूंथी मालती माधवी वेलीनिवारी ॥१॥ फूलन छाजे
फूलनकी छत्री फूलनके कलसा झूमिकारी ॥ फूलनके गादी तकीया चौखंडी
फूलन रची विचित्र पीछवारी ॥२॥ फूले सिंघासन फूले विहरत दंपति फूल
सखी फूलवारी ॥ गूढ भाव अंतर आनंदनिधि फूलत कृष्णदास बलिहारी ॥३॥ | Saarang |
Natvargati nrityat hain bhaktan urr parsat hain pulkit tunn harkhat hain raasmein lalbihari .. | Pustak1-328 | नटवरगति नृत्यत हैं भक्तन उर परसत हैं पुलकित तन हरखत हैं रासमें लालबिहारी ॥
बाजत ताल मृदंग उपंग बाँसुरी बिना स्वर तरंग ग्रग्नता ग्रज्ञता थुंग थुंग लेत छंद भारी ॥१॥
कटी काछिनि पीत सुरंग मोर मुकुट अति सुधंग राख्यौ अर्धभाल ललित शीश पेच सवारी ॥
आरती वारति यशोदा माय लेत कंठ उर लगाय देखत सुरनर भुनि और रामदास बलिहारी ॥२॥ | Saarang |
Houn paniya naan jaihon merrie | NityaPad-270 | हों पनिया न जैहों मेरी
मटुकी झटककर पटकी ॥ अचानकआन गहीहों सांवरे मेरेसेंग की सबसब
सटकी ॥१॥ काल्हि दुपहरगईहूं कुंजमें कोजाने याघटकी ॥ प्रभुकल्याण
गिरिधरकी माधुरी सो मेरेनयन अटकी ॥२॥ | Bilawal |
Arrie sakhee niksi vrishbhan kumari horry khelan syamason .. | Part3-182 | एरी सखी निकसी वृषभान कुमारि होरी खेलन स्यामसों ॥
रंग हो हो हो हो होरियां ॥ एरी सखी उडत अबीर गुलाल
कटिपिच काई भामसों ॥१॥ शोभित राधाबाल सब सुंदरिनमें सोहनी ॥ शोभित लहेंगालाल मोहन को मनमोहनी ॥२॥ झूमक सारी पीत अंगिया
कुचन पर राजही ॥ सोहे नकवेसर आड पायल रुनझुन वाजहीं ।। ३॥| आभूषण
बहुंसार मन््मथ कोटिल जाबही ॥ राधा वदन चंददेख युवती नक्षत्र छबि
पावही ॥४॥ आवत बल नंदनंद चहुुंओर डफ वाजही ॥ उडत गुलाल सुरंग
सुबल तोक मध्य गावहीं ॥५॥ केसर के भरमाट पिचकाई इत उत्तचली ॥
चोबवा मृजमद सान बलमोहन के मुखमली ॥|६।।| सबको मनहर लेत गजगति
चाल चलनमें ॥ ज्यों घन पूरनचंद राधा ससियन दलनमें ॥७।। फूलदंडागहि
हाथ मारत सबहिन भालसों ॥ ज्यों मृगसेना देख लपटी स्यामत मालसों
॥८॥ घेर लिये नंदलाल घनघेरद्यो मानो दामिनी ॥ मुरली पीतांबरछीन
चली ललिता गजगामिनी ॥॥ चंद्रावलि चलीजाय दोऊ दृगन अंजन
कियो ॥ पुष्पन जेंदचलाय दोउन मुख बीरा दियो ॥ ९ ०॥ बाजत ताल मृदंग
मुरली वेणु सुहावनी ॥ हो हो हो सब बोल बलमोहन कोनचावनी ॥१ १॥
झूमक खेल मचाय सब हिन को बैठारकें ॥ बंसलिये कर धाय सखादीये
सब मारकें ॥१२॥ दुंदुभी देव बजाय फूलन वरखत आयकें ॥ सुर ललना
भईचूर श्रीमुख देखें जायकें ॥ १ ३॥ देवमुनी मनपंग खेल फाग मनमेलहे ॥
छबि देखत कृष्णदास खेल फाग को कहा कहे ॥१४॥ | Kaafi |
Apane apane toll kahat vrajwasiyan .. | Part2-100 | अपने अपने टोल कहत ब्रजवासियां ॥
शरद कुहू निश जान दीपमालिका जो आई॥
गोपन मन आनंद फिरत उनमद अधिकाई ॥
ऐं पन थापे दीजीयें घरघर मंगलचार ॥
सातवरसको सांवरों खेलत नंददुबार ॥१ ॥
बैठ नंद उपनंद बोल वृषभान पठाये ॥
सुरपति पूजा जान तहां चल गोविंद आये॥
बारवार हाहा करें कहो बावा यह बात ॥
घरघर गोरस संचियें कोन देवकी जात॥२॥
कान्ह तुमारी कुशल जान एक मंत्र उपेहें ॥
खटरस व्यंजन साज भोग सुरपतिकों देहें॥
नंद कह्मो चुचकारकें जा दामोदर सोय॥
बरस दोसको झोसहे महामहोत्सव होय ॥३ ॥
तब हँस बोले लाल मंत्र बहोयों एक कीनों ॥
आदि पुरुष निज जान रेंन सपनों मोहि दीनों॥
सब देवनको देवता गिरि गोवर्द्धन राज ॥
ताहि भोग किन दीजियें सुरपतिको कहा काज ॥४ ॥
बाढे गोथन बूंद दूध दधिको कहा लेखो॥
यह परचो विद्यमान नयन अपने किन देखो ॥
तुम देखत बल खायगो मोंहों मांग्यो फल देय ॥
गोप कुशलजो चाहियें तो गिरि गोवर्द्धन सेय ॥५ ॥
गोपन कीयो विचार सबन मिल शकट जो साजे ॥
बहु विध कर पकवान चले जहां बाजन बाजे ॥
एक बनही बनकों चले एक क नंदीसुर भीर ॥
एकन पेंडो पावही फूले फिरत अहीर ॥६ ॥
एक चले एक वनही वनछाये॥
एक गाबें गुण गोविंद प्रेम उमगे न समाये॥
गोपनको सागर भयो गिरि भयो मंदराचार।
रत्न भईं सब गोपिका कान्हे विलोवन हार ॥७ ॥
ब्रज चोरासी कोस परे गोपनके डेरा ॥
लंबे चौवन कोस जहाँ त्नजवास वसेरा॥
सबहिनके मन सांवरो देखियत सबन मंझार॥
कौतुक भूले देवता आये लोक विसार ॥८ ॥
लीने विप्र बुलाय यज्ञ आरंभन कीनों ॥
सुरपति पूजा मेंट राज गोवर्द्धन दीनों ॥
देव दीवारी श्यामही सब मिल पूजन जाय॥
नंद प्रतीत जो चाहिये तो तुम देखत बलिखाय ॥।९ ॥
प्रथमही दूध न्हवाय बोहोरि गंगाजल ढार्यो ॥
बड़ो देवता जान कान्हको मतो बिचायों॥
जेसेहें गिरिराजजू तेसो अन्नको कोट॥
मग्नभये पूजा करें नरनारी बड़ छोट ॥१० ॥
सहस्र भुजाउरधरें करें भोजन अधिकाई ॥
नख शिखलों अनुहार मानों दूसरो कन्हाई ॥
ललिता राधासों कहे तेरे हदें समाय॥
गहे अंगुरिया नंदकी सो ढोटा पूजा खाय ॥११॥
पीत दुमालों बन्यो कंठ मोतिनकी माला॥
सुंदर सुभग शरीर झलमले नयन विशाला॥
श्यामकी शोभा गिरि भयो गिरिकी शोभा श्याम॥
जेसो परवत भातकों ढिंग भैया बलराम ॥१२॥
व्यंजन बहुत बनाय कहांलों नाम बखानों॥
भयो भातको कोट ओट गिरिराज छिपानों ॥
बरा बिराजे भातपे चंदा पटतर सोय ॥
यज्ञपुरुष भोजन करे सब देवन सुख होय ॥१३॥
जेसी कंचनपुरी दिव्य रलनसों छाई॥
बलि दीनीहे प्रात छांह चलि पूरव आई॥
बदरोला वृषभानकी रही विलोवन हार ॥
ताकी बलि उन देवता लीनी जाला ॥१४ ॥
सब सामग्री अरपि गोप गोपिन करजोरे ॥
अगणित कीने स्वाद दास बरणे कहा थोरे॥
यह विध पूजा कीजिये कह्यो सबन समुझाय॥
श्याम कह्यों सूरदाससों मेरी लीला सरस बनाय ॥१५ | | Bilawal |
Giridhar dolat poin poin . anguri gahein nandbawa kii | Part1-152 | गिरिधर डोलत पॉइन पॉइन । अँगुरी गहें नंदबावा की
घुटुरूवन के चाइन ॥१॥ लटपटाइ पग धरत अटपटे जसुमति लेत बलाइन ।
कडुला कंठ बाघनख राजत अंग अंग सुखदाइन ॥२॥ यड़ सुख ब्रह्मादिक कों
दुर्लभ जो जीवत संत आइन | सो सुख सूरश्याम कहाँ पैयत जो सुख व्रज की
गाइन. ॥३॥ | Bilawal |
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