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Sheetkal Ke Pad
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Kirtan Title | Page | Kirtan | Raag |
|---|---|---|---|
Khelat manmohan horry atee russ rung bheene .. | Part3-322 | खेलत मनमोहन होरी अति रस रंग भीने ॥
गाय गाय और रीझरीझ मीठी मीठी तानन लीने ॥१॥ काहूको हार तोर
काहूकी भुज मरोर काहूकी कंचुकी के बंद छोर दीने ॥ कृष्ण जीवन लछीराम
के प्रभु देखे कोटि मदन की छबि छीने ॥२॥ | Kalyan |
Lehu lalan kachhu karhu kaleu apune haath jimaaungi. seetal | NityaPad-030 | लेहु ललन कछू करहु कलेउ अपुने हाथ जिमाऊंगी। सीतल
माखन मेल जु मिसरी कर कर कोर खवाऊंगी ॥ १॥
ओद्यो दूध सद्य धोरीकोसियरो कर कर प्याऊंगी ॥
तातो जान जो नहि सुत पीवत पंखा पवन ढुराऊंगी ॥ २॥
अमित सुगंध सुवास सकल अंग कर उबटनो गुन गाऊंगी।
उष्न सीतल हु न्हवाय लुछीने चंदन अंग लगाऊंगी ॥३॥
त्रिविध ताप नस जात देख छबि निरखत हियो सिराऊंगी।
परमानंद सीतल कर अंखियाँ बानिक पर बलजाऊंगी ॥४।। | Bibhaas |
God bethaay jimabat maiya .. suodan ghritasaani jasoda | NityaPad-080 | गोद बेठाय जिमाबत मैया ॥ सुओदन घृतसानि जसोदा
श्रीमुखमेलत कुंवर कन्हैया ॥१॥ आसपास ब्रजके सबलरिका संगके सखा
बलभैया ॥ खेलत खात हसत लाडीलो जसुमति लेत बलैया ॥२॥ रुची
अपनीसो भोजन कीनो कछु पियो कर घैया ॥ रसीक सुहेत बीरी आरोगत जे पठाड़ नंदरैया ॥३॥। | Dhanshree |
Sriyamunaji param kripal kahaave, darsan tein agh doori jaat hain | NityaPad-014 | श्रीयमुनाजी परम कृपाल कहावे, दरसन तें अघ दूरि जात हैं
हरिलीला सुधि आवे ॥१॥ जे जन तेरे निकट बसत हैं नंदनवन रस पावें, जीव
कृत्य देखत नहिं कबहूं अपनो पक्ष दृढ़ावे ॥२॥। कर्तुमकर्तुमन्यथाकर्तु यह सुन
मन ललचावे, 'रसिकदास' को दास जानियें तातें बह जस गावें ॥३॥ | Bhairav |
Dhaathi bhandwar haye aayee . suraj vansh rajanke raaja taako yash | Part1-207 | ढाठी भानद्वार है आयी । सूरज वंश राजनके राजा ताको यश
मैं गायो ॥१॥ वृषभान नृपतिके सुन्यों बधावों अति आतुर द्ै धायौ ! प्रगटी
है श्रीकुँवरि लाड़िली भयौ मैया मन भायौ ॥२॥ लोक चुतुर्दश दूंदुभी वाजे
गगन विमानन छायौ । वृंदावन की राधारानी नारद भेद बतायौ ॥३॥ जाको
ध्यान धरतहैं मुनिजन अंत न काहू पायौ । जाके हित प्रगटे त्रिभुवव पति निगमन
सुजस सुनायौ ॥४॥ ऐसे बचन सुनत ढाढ़ी के आगे टेरि बुलायौ । व्यास वंश
की जानि आनि ये गरीबदास पहरायौ ॥५॥ | Maru |
Shree gangaa taiy tribhuvan jass chhaayo.. sagar vans | Part2-338 | श्री गंगा तै त्रिभुवन जस छायो॥ सगर वंस
तारन के कारन भगीरथ ले आयो ॥१ ॥ जटा संकरी मात जान्हबवी परसत
पाप नसायो॥ महा मलीन पापी अपराधी सौं बैकुंठ पठायो ॥२ ॥ जे जे
कार करत सुर नर मुनि भागि अपुने आयो ॥ 'कृष्णदास' सुर सुरी महातम
बेद पुरानन गायो ॥३ ॥ | Bilawal |
Pariva prathmaahin horicellan nikse shyama shyam .. | Part3-282 | परिवा प्रथमाहिं होरीसेलन निकसे श्यामा श्याम ॥
फाल्गुनमास सुहावनो नृपतिभयो तहांकाम ॥९१॥ छ्विजदु्ुंदिसिमावत अलि
पिक कोकिल कीर ॥ नवबसंत द्रुमफूले मलयजु मंदसमीर ॥२।| तीज तरूनी
तन कंचुकी सोभित मोतिंनहार ॥ सेंदुर मांग संवारी नवसत साज सिंगार
॥३॥ चोथचतुर चली गावत झूमक नंदजुके द्वार || सुनि कामिनी कोलाहल
निंकसे हलधर ग्वार ॥४॥ पांचेपंच सबद अति बाजत बाजे अपार ॥ इतकी
ओर ब्रज सुंदरी उत श्रीनंदकुमार ॥५॥ छटकों छेंल छबिलो निकस्यो
खेलनफाग ) मोहन वेन वजाबै जावे गौरी राग ॥६॥ साते चंदन वंदन
केसरि घसी बनाय ॥ कृष्णामर कस्तूरी केसु कलस भराय ॥७॥ आठें
कंचन पिचकारी भरि भरि लिने हाथ ॥ तकि तकि नबल किसोरी छिरकी
कुंबर ब्रजनाथ ॥८॥ नवमी नबल राधिका अरगजा दीयो डार ॥ हो हो
बोलत डौलत नांचत दै करतारि ॥९॥ दसमी दसों दिसतें अबलन पिय
लीनें घेरि || मैनआंजि मुख मांडति हंसत वदन तनहेरि ॥१०॥ एकादशी
एक सखी डार्यों सुरंग गुलाल ॥ एकजु मुख चुंबन करे एक गहे बनमाल
॥१ १॥ द्वादशी फजुवा मांगति इंसि इंसि गारी देहि ॥ एकजु मुरली ले
रही एक कहे फिर लेहि ॥१२॥ तेरस तरुणी जनमिल सुगह गहें बलवीर ॥
कुमकुम मुख लपटायो छिरकत नबल अबीर ॥१३॥ चौदस चहूं दिसते
लिने गांठ बजोरी ॥| मदनमोहन नव दूल्हे दुलहनी राधागोरी ॥१४॥ पूरण
ससि पून्योनिस होरी हरस्त्रि लगाय ॥ परवा बसनजु साजे चले जमुना
जल नहाय ॥१५| यह बिधि होरी खेलहीं ब्रजजन संग लगाय ॥ सूरदास
बलिजाय गिरि गोवरधनराय ॥१६॥ | Gouri |
Navanikunj devi radhike vardaini devpriye vrindavan boond | Part1-312 | नवनिकुंज देवी राधिके वरदाइनी देवप्रिये वृंदावन बूंद
वासिनी ॥ करतलाल आराधन साधन करमन प्रतीत नामावलि मंत्र जपत
जयविलासिनी ॥१॥ प्रेंम पुलकि भावित गावत अति आनंद भर नाचत रूप
छवि देख मंद हासिनी ॥ अंगन पट भूषन पहेराय आरसी दिखाय तोरत त्रण ले
बलाय सुख निवासिनी ॥२॥ कर जोरें चरण गहे अम्नृत चारु बचनावलि विनती
सुनौ दासकी दुखरासि नासिनी ॥ प्रतिपालौ करुणा मई सोसु जीउत गानई
प्राणदान दैहौ बदत व्यास दासिनी ॥३॥ | Bilawal |
Gopijan valallabh jayamukund .. mukh murlinad | Part3-034 | गोपीजन वलल्लभ जयमुकुंद ॥ मुख मुरलीनाद
आनंदकंद ॥ध्रु०.॥ जयरास रसिक रबनी सुवेस ॥ सिखिन शिखंड विराजे
'केस ॥ गुजान वनधातु विचित्र देह || दरसन मनहरन बढावेनेह ॥ १॥| जयसुंदर
मंदिर धरन धीर ॥ वृंद्वावन बिहरत गोपवीर ॥ वनिता सत्तजूथहें पर्मधाम ॥
लावन्यकलेवर कोटि काम |।२॥ जयजय वैजंतीवनी माल ॥ जयकमल अरुन
लोचन विसाल ॥ कुंडल मंडित भुजदंड मूल ॥ निर्तकरत कालिंदी कूल
॥३॥ जयजय पुलकित खण मृगमराल ॥ सुरनर मुनिध्यानी ध्यानटाल ॥
सारसपिक मूर्छित सुतान॥ थकित भए सुरमुनि विमान || 8॥ जयजयश्रीकृष्ण
कलानिधान ।। करूनामय जदुकुल जलजभान ॥ भगवंत अनंत चरिजत्नतोर ॥
कहें माधो दास मनमगन मोर ॥५॥ | |
Pahere laal evetparadani jheeni | | NityaPad-255 | पहेरे लाल एवेतपरदनी झीनी |
मृगमद छाप कीनी केसरकी सीतल अरगज़ा भीनी॥।|१।।|
गोरोचनको तिलक बिराजत अतिसुगंध कपूर मिलानी।।
कमल लीये कर परमानंद शोभा निरख प्यारी रूप लुभानी॥२॥ | Saarang |
Bagdhish mahaprabhujiko japana.. panchdosh yaa | Part2-317 | बागधीश महाप्रभुजीको जपना॥ पंचदोष या
तनमें जीवके ते छूटे इनके गृहे शरना॥१ ॥ सीतल दृष्टि सदा दैवीनपर
त्रिविध ताप निज जनके हरना।॥ वल्लभ ध्यान धरो नित्य चित्तमें यह
रीतिसों भवसागर तरना ॥२ ॥ | Kanharo |
Jaanat houn jaise gunan bharey hoe ... kahuko duraav karat nandanandan | NityaPad-141 | जानत हों जैसे गुनन भरे हो ॥। काहुको दुराव करत नंदनंदन
जहीं जाऊं तहीं कान्ह ढरे हो ॥ १॥ रैन उनींदे नेन अरुन छबि आलस बस सब अंग
परे हो ॥। चंदन तिलक लग्यो कहुं बदन स्थाम सुभग तन नख उघरे हो ।।२॥ सब
बिध चोर चतुर चिन्तामनि वृजजुबतिन के मन जो हरे हो ॥। ऐते ऊपर कोहे सूर
प्रभु सोंह करन को होत खरे हो ॥।३॥ | bilawal |
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