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Sheetkal Ke Pad
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Kirtan Title | Page | Kirtan | Raag |
|---|---|---|---|
Bhalei merey aayeho piya teak dupahareeki biriyaan .. shubhdin | NityaPad-227 | भलेई मेरे आयेहो पिय टीक दुपहरीकी बिरियां ॥ शुभदिन
शुभ नक्षत्र शुभमहूरत शुभपलछिन शुभघरियां ॥१॥ भयोहै आनंदकंद मिट्यो
बिरहदुःखटंद चंदनघस अंगलेपन और पायन परियां ॥ तानसेन के प्रभु मया
कीनी मोपर सूखीवेल करी हरियां ।॥२॥ | Saarang |
) juvatin sanga khelat faghari .. balakvrind karat | Part3-045 | ) जुवतिन संग खेलत फागहरी ॥ बालकवृंद करत
कोलाहल सुनतन कानपरी ॥ बाजत ताल मृदंग बांसुरी किन्नरसुर
कोमलरी ॥ तिनहूं मिले रसिक नंदन मुरली अधरधरी ॥२॥ कुंकुम वारि
अरगजा विविध सुगंध मिलाय करी ॥ पिचकाईन परस्पर छिरकत अति
आमोद भरी ॥३॥ टूट्तहार चीर फाटत गिरी जहां तहां ढंरनढरी ॥ काहू
नहीं संभार क्रीडारस सब तन सुधि बिसरी ॥४॥ अतिआनंद मगन नहीं
जानत बीतत जाम घरी ॥ कुमनदास प्रभु गोवर्धनधर सर्वस दे निवरी ॥५॥ | Basant |
Unidi aankhen rangbhari durat naheen patot... khanjanmeen mrigchheen | NityaPad-049 | उनीदी आंखें रंगभरी दुरत नहीं पटओट॥। खंजनमीन मृगछीन
भयेहें वार डारों लख कोट ॥। १॥ ढुरनमुरन झमकन अनियारे चंचल करतहै चोट ॥।
चतुरविहारी प्यारीकी छबि निरखत बांधत रसकी पोट ॥। | Lalit |
Eto jhaka jhorati sondhen boratihain gori sukhakaari .. | Part3-052 | एतो झक झोरति सोंधें बोरतिहैं गोरी सुखकारी ॥
हाहा बिहारी बलाये लेहों तुम खेलोक्योंन सम्हारी ॥१॥ केसरि कनक
मोरी भरिभरि लेलेदेति पिय परढारी ॥ सकल कोमल गात रसिकतुम
देखोजियन बिचारी ॥२॥ सखीबुंद मनमोहनगहि घेरे भरलीने अंकवारी ॥
प्यारी बहोत अरगजाजीभी देख रिषीकेश बलिहारी ॥३॥ | Basant |
Jaavo gharahi balhariteri.. sez jaay sovo tumeri.. 1.. | Part2-070 | जावो घरहि बलहारीतेरी॥ सेज जाय सोवो तुमेरी॥ १॥
में ता मारे पाछें॥ भवन जावो तुम मेरे बाछें ॥२ ॥
तब कान्ह ॥ मंत्र कह्मो एकमन उपजाई ॥३ ॥
आज एकसपनें कोड आयो ॥ शंख चक्र भुज चार बनायो ॥४ ॥
मोसों यह कहि कहि समुजायो॥ यहपूजा तु कि नहि सिखायो ॥५ ॥
सूरश्याम कहि प्रकट सुनायो ॥ गिरिगोवर्द्धन देव बतायो ॥६ ॥ | Bilawal |
Tum sunau bhaiya balbirke || jaati paanti neeken humm jaanat | Part1-237 | तुम सुनौ भैया बलबीरके || जाति पाँति नीकें हम जानत
बासी याहीं त्तीरके ॥१॥ जान देहु घर जॉहिं आपुने नहिं सहायक भीरके ॥
बात बातकौ मरम न जानत पावनहारे छीरके ॥२॥ घाट बाट रोकत जु रहत
हो मोल करत जनु चीरके ॥ श्रीविट्ठलगिरिधरनलाल तुम दानी जमुना
तीरके ॥३॥ | Bilawal |
Kaahekun tum pyaare sakhee bhesh keeno .. bhushanavasansajen | NityaPad-122 | काहेकूं तुम प्यारे सखी भेष कीनो ॥ भूषणवसनसाजें
वीनाकरलीनो ॥१॥ मोतिन मांग गुही तुम कैसेहों प्यारे ।। हम नहिं जाने पहचाने
कोनके दुलारे ॥ ३॥ रूँंसवेको नेम नित्य प्यारी तुम लीनो ॥ ताहीके कारण हम
सखी भेषकीनो ।। ३॥ सबसखी दुरदुर देखी कुंजनकी गलियाँ ॥ नंददास प्रभुप्यारे
मानलीनी रलियां ॥४॥ | Bihagaro |
Madanmupal lalson rasbhari khelat gokul | Part3-080 | मदनमुपाल लालसों रसभरि खेलत गोकुल
नारी ॥ ऊंचेसुर गावत मन भावत लोकवेद डरडारी ॥१९१॥ चोवा मेद
जवादसाख गोरा मृगमद घनसारी ॥ मथिमांडत मुख मुरलीधरको हंसत्देत
करतारी।।५॥ कनिक कचोल कुसम वारि घसि घोरि कुंकुमा रंग ॥ रतनजटित
पिचकाई भरिभरि छिरकत प्रीतम अंग ॥|३॥ अति सौरभ बूकावंदन रज
डारत सुभग अबीर || सुरंग गुलाल उडाबत लालन मुख पोंछति अंचलचीर
॥४॥ मोहनलाल नवल नागरके मंडित करत कपोल ॥ उरश्रीफल कुंकुमसों
चरचित क्रीडत मदन कलोल ।।५॥ तृनतोरत सहंचरी ब्रजपति कीं अद्भुत
सोभा देखि | कोटिमेन रतिमति भुलत हें हाव भाव उर लेखि ॥६॥ | Devgandhar |
Barasganti giridharanlal kii gopin nyaut bulaaye juu .. | Part1-026 | बरसगांटि गिरिधरनलाल की गोपिन न्यौत बुलाये जू ॥
जसुमति मुदित सबन बोलनकों घरघर नंद पठायेजू |॥१॥ गामगाम प्रति
पोरिपौरि प्रति घरघर नंद पधारे । आदर दे बड़े गोपिनकों एक आसन
बैठारे ॥२॥ गाम गामते शकट जोरिकें नंद महर घर आये । सुनि व्रजरानी
ब्रजवासिन मिलि सनन््मुख कलश पठाये ॥३॥ घरघर धूप दीपावलि करिकें निज
मंदिर पधराये । आदर दै बड़डे गोपिनकों जोरि सभा बैठाये ॥४॥ प्रेममुदित
गावत नरनारी जसुमति मंदिर आईं | कंचनथार बधाये सजि सजि न्यौतौ टीको
लाई ॥५॥ चंदन अगर कपूर सुवासित आंगन भवन लिपाये । बंदनमाला
साथिये द्वार मोतिन चौक पुराये ॥६॥ कनकपीठि तापर युग धरिंकें दक्षिण
चीर बिछाये । महर महरि गिरिधरन गोद लै मुदित तहाँ बैठाये ॥७॥ अन्वाचार्यमुनि गर्ग पराशर कुश आसन पधराये | बड़डे देव पूजाय लालकों बहुविधि
दान दिवाये ॥८॥ बंदीजन सबदारें गावें घुरे निसान नगारे । देव दूँदुभी गगन
बजावत ब्रज कुतृहल भारे ॥९॥ दे असीस द्वारे तहाँ याचक भये सबन मन
भावे । मोह मांगे सबहिनकों नखसिख पटभूषण पहराये ॥१०॥ राई लोन
उतारि आरती प्रमुदित मंगल गाये | अति उछाह भरे भरे लालनकीं सबकी गोद
दिवाये ॥११॥ बरन बरन आभूषन सारी व्रजतरुनी पहराई । प्रमुदित बहुरि
चलीं निजगृहकों मानों रंक निधि पाई ॥११॥ नंदराय बड़डे गोपिनकों चरनन
सीस नवाये । जोरि उभय कर करत बीनती कृपा पुन्य फल पाये ॥१३॥गोपवृंद ऋषिवृंद बिदा है देत चले आसीसा । ब्रजपति ब्रजरानी हरि हलधर जीवों
कोटि बरीसा ॥१४॥ | Asawari |
Badhaavau vrajaraajken gaavi sakhi mangalchar ..dhru... raani | Part1-058 | बधावौ व्रजराजकें गावी सखि मंगलचार ॥ध्रु.॥ रानी
जसुमति कूखि चंद्रमा प्रगट्यौ पूरन कला प्रकास । सुधा वृष्टि ब्रजजन शीतल किये
बिविध ताप तन नास ॥१॥ कुमुद कलीसी फूली जुबती नंद भवनमें आई ।
प्रमुदित नैन चकोर बदन लखि आनंद उर न समाई ॥२॥ रीझी प्रान करति
नोछावरि छिनुछिनु लेत बलाय । फूले ब्रजजन बदत न काहू मानों रंक निधि
पाय ॥३॥ जुवतिनकों पहरावत नयेनये भूषण वसन अमोल । व्रजरानी लगि
पॉय सबनके हँसिहँसि देत तंबोल ॥४॥ पहरे गोप ओप पट भूषन उपमा
बरनी न जाय | कविजन कहत लजात निरखि सुख मानों लोकके राय ॥५॥
मायध सूत विप्र बंदीजन आवत ब्रज पति धाम । ढाढ़ी भाट बिर्ध गोपनके लै ले
बोलत नाम ॥६॥ देत तिन््हें गोगज बसन कंचन मणि मुक्तादान | मान करि
नंद सबनकों पूरे मनके काम ॥७॥ कंचन मणिमय बने झरोखा हीरा लगे
अपार । निरखि सदन छबि निधिपति सुरपति लजत कोटि शत मार ॥८॥
भवन चतुर्दश तीन लोक आनंद रह्मौ जहाँ तहाँ छाय | दामोदर बलि रामकृष्णकौ
रहसि बधायों गाय ॥९॥ | Gori |
Khelat faag sanga milli douu anand bhari piya | Part3-177 | खेलत फाग संग मिलि दोऊ आनंद भरि पिय
प्यारी हो ॥ नवल किसोर रसिक नंदनंदन नव वृषभान दुलारी ॥ १॥ नवक्रतु
राज लताद्रुम फूले बरन बरन छवि न्यारी ॥ गुंजत मधुप कीर पीक कुंजत
श्रवन सुनत सुखकारी ॥२॥ तेसेई सुभग गौर सामलतन बनी जोटइक
सारी ॥ कमलनेन पर बूकामेलत हँसि सकुचत कुमारी ॥३॥ भरि अरगजा
कनिक पिचकाई धांईसवे ब्रज नारी ॥ भरत भावते मदन गुपाले बढ्यो
रंग अतिभारी ॥४॥ वोहोरच्यों मिलि दसपांचअली गोविंद भरे अकवारी ॥
चोवा चंदन अगर कुंकुमा दियो सीस तें ढारी ॥५॥ प्रेम मगन मोहन सुख
निरखत तन सब दसा बिसारी ॥ चत्रभुज प्रभु सुरनर मुनि मोहे गुननिधान
मिरिधारी ॥६॥ | Jetshri |
Meretu jiyamen vasat navalpriya | NityaPad-333 | मेरेतू जियमें वसत नवलप्रिया
प्राणप्यारी ॥ तेरेई दरसपरस राग रंग उपजत मान न कीजे हा हा री ॥१॥ तुही
जीवन तुही प्राण तुही सकलगुणनिधान तो समान और नाहिन मोकों हितकारी |
व्यासकी स्वामिनी तेरी मयाते मैंपायो है नामविहारी | २॥ | Poorvi |
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