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Sheetkal Ke Pad

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Kirtan Title
Page
Kirtan
Raag
Tey joo alapi pyaari sunder todi. rijhyave rasik gopal vinodi
NityaPad-072
ते जु अलापी प्यारी सुन्दर टोडी। रिझ्ञवे रसिक गोपाल विनोदी बदन देखि उडपति नभ विथकित हर्षित मन गति भई निगोडी ॥१॥ दंपति सुघरराय चूडामणि केलिकला केतक रस कोडी । 'कृष्णदास' गिरिधरन बिलोकत लज्त मन्मथ लहो नवोड़ी ॥२॥।
Todi
Chalchal jahaan srigovardhadhar bahubidhi shobha raajain ree ..
Pustak1-327
चलचल जहाँ श्रीगोवर्द्धधर बहुबिधि शोभा राजैं री ॥ नंदकिशोर यशोदानंदन कोटिमदन छबि लाजैं री ॥१॥ मोर मुकुट पीतांबर सोहै मुख मुरली कलबाजें री ॥ श्रीमदृबल्लभ यह अवसर रसिकन शिर नित्य गाजै री ॥३॥
Khat
Chalau navnagari roop guna aagari raas thaanyau laal subhag
Part1-354
चलौ नवनागरी रूप गुन आगरी रास ठान्यौ लाल सुभग जमुना तीर ॥ साज भूषन सकल मुदित करि मुख कमल बिबिध सौरभ मिलयी पहरि दक्षिण चीर ॥१॥ अधर मुरली लसे प्रान तो में बसे नहिं भावै कछु बढ़ी अति समर पीर ॥ जाय मिलि बिमल मति ठाठ सब अगम गति ज्यों जीय सुख लेहु मीन पाबै नीर ॥२॥ कटि जटित पीतपट सीस लटकत मुकुट क्वणित नूपुर मधुप हंस कोकिल कीर ॥ दास कुंभनप्रभु सप्तसुरसों मिले गावत केदारो राग गिरिवरधरन धीर ॥३॥।
Kedaro
Jaya shree vallabh charan kamal shir naaiye |
NityaPad-004
जय श्री वललभ चरन कमल शिर नाइये | परम आनन्द साकार शशी शरदमुख मधुर वानी भक्त जनन संग गाइये ।जय.।। राज तम छांड मध्य सत्व के संग गही राखि विश्वास प्रेम पंथ को धाइये।॥। कहे ब्रजाधीश वृंदाविपिन दंपति ध्यान धर धर हिये दृगन सिराइये ।|जय.॥
Bhairav
Suni devaki koo hitu hamaare . asur cons apvansh vinaasit
Part1-050
सुनि देवकी को हितू हमारे । असुर कंस अपवंश विनासित शिर ऊपर बैठे रखबारे ॥१॥ ऐसौ को समरथ त्रिभुवनमें जो यह बालक नेंकु उबारे | खरग धरे तिहिं देखत अवनीपर छिनमांझ पछारे ॥२॥ यह सुनिके अकुलाई प्यारी भरि नैंनते आँसू ढारे | दुखित भये वसुदेव देवकी प्रगट भये धरिकें भुज चारे ॥३॥ बोलत उठे प्रतिज्ञा प्रभु यह मोते उबरे तो यह मारे । अति दुखमें सुखदियौ पितु मातें सूरके प्रभु भवन पथारे ॥४॥
Sarang
Vrajwasi sabai anand bharey hoe hoe merey lalnan
Part3-218
ब्रजवासी सबै आनंद भरे हो हो मेरे ललनां रसिकराई सिर मौर ॥ध्रु०) खेलनि कौ उद्युति भर बल मोहन कियौ बिचार ॥ भवन भवन अपने सुनि गोपी लागी है करन सिंगार ॥ १॥ मज्जन करि तन अंबर पहिंरे तन बरन बरन बहु भांति ॥ आगै धरि दरपन मुख निरखति मंद मंद मुसिकाति ॥२॥ चिकुर सुगंध सगबगे सुंदर बैंनी गुही बनाई ॥ मांनौ बृष्टि श्री खंड खंभ पै रही उरगिनी लपटाई ॥३॥ सीसफूल सिर मांग संवारी मुकता वारि सुढार ॥ मांनों इंदु बैठे करि मंडल उड़गन अमित अपार ॥४॥ करनफूल जुग अलक बदन बिधु अद्भुत है यह बात ॥ मानौं सुमेर कौ तिमिर हरन कौ उदै करत निस प्रात ॥५॥ भाल सुदेस तिलक मृगमद कौ कबि छबि करति बिसेष ॥ तिरलोकि जीतन क्हों मांनौं करी है अनंग कर रेष ॥६॥ भ्रकुटी-बंक निसंक निरखिर छबि किधों मैंन सारंग || आनन नवल कमल मधि मानौं है सखी सुधा तरंग ॥७॥ दै नैननि अंजन खंजन अलि, माँनौं कुरंग कमोद ॥ बारबार पॉइन लागति है माँनौं बढ़ावति है मोद ||८॥ नासा पुट बेसरि केसरि कौ जैसौ सुवन सुरंग ॥ मांनों उमे-जलज खेलति है, बधु राकेस उछंग ॥९॥ अधर-बिंब दाओऔं कन मांनों दसनावलि छबि देति ॥ मधुर मधुर रसना पिक बोलति जुगल फलनि रस हेत ॥ १०॥ साँवल बिन्दु बन्यौ सखी मधि ठाड़ी सहज सुभाई || अतन- जतन करि कनक कंज दल खची नीलमनी आई ॥१६९१॥ कंठ पोति पदक की रही फबि दुलरी चौंकी हार ॥ झवा सुघट पाट भरे रूरिकत उर पै बारंबार ॥ १२ जगमगात भूषन जराई के लटकत भूज मखतूल ॥ माँनौ सखी प्रणंट दोखियतु है रति-बेलि फल-फूल ॥|१३॥ कटे किंकिनि सप्त सुर राजै जे हरि नूपुर, बिछिया बाज ॥ जहाँ तहँ उठि चलि माँनौ मराल मत्त गजराज ॥ १ 8॥ कंचन कलस लिए केसरि भरि चोवा अबीर जुलाल ॥ उत तै राम कृष्ण बनि आए, संग रंगीले ग्वाल ॥ १५॥| लाल पाग चन्द्रिका मनोहर कुंडल करन गरे बनमाल ॥ पीतांबर काछिनी पिचकाई छिरकति अंग ब्रजबाल ॥ १ ६॥ नवनागरि धाई सनमुख सब मदन मोहन की चोरी ॥ छिराकि भरे किए बस अपने, नागर-नंद किसोरी ॥१७॥ छूटिलट बिगलित पट दंपत्ति नहिं तन मन हिं संभार ॥ प्रेम-मत्त रस-रक्त रसिक वर, हिलि- मिलि करत बिहार ॥|१८॥ ठौर-ठौर बाजे बाजति हैं पटह जु भेरी मृदंग ॥ बैनु रबाब किन्नरि महुवरि मुरली चंग उपंग ॥६९॥ वर किन्नर तूबर गंधरब मिलि बिमल कर हि करि गान ॥ “जुगल चंद” आनंद भरे हैं देति रतन मनि दान ॥२०॥ नंद कुंवर फगुवा जुबतिन कौं मेबा दियो मंगाई ॥ कर जोरै सनमुख सबहिन के पट भूषन पहिराई ॥२१॥ हरि नारायण प्रभु होरी खेलति फागु बढ्यौ अनुराग ॥ यह लीला जो सुने सुनावे 'श्यामदास' बड़भाग ॥२२॥
Kafi
Aayou karnavedh dinn neekau. gurki bhelri haath nivaai kiau rochan
Part1-138
आयोौ कर्णवेध दिन नीकौ। गुरकी भेल्री हाथ निवाई कियौ रोचन कौ टीकौ ॥१॥ गुरु शशि नक्षत्र बार बल पहुँच्यौ दिन मनि अति सुखदाई । सौने कंठ भूषन पहराये हाथ सुहारी पाई ॥१॥ विग्रन दान मान बहु दीनौ पूजा करी गुरुदेवा । कृष्णदासकों यह वर दीजै पद पंकजकी सेवा ॥३॥
Saarang
Pichhora khasako katibandhe .. way dekho aabat nandanandan nayan kusumshar saandhen ..1..
NityaPad-289
पिछोरा खासाको कटिबांधे ॥ वे देखो आबत नंदनंदन नयन कुसुमशर सांधें ॥१॥ स्याम सुभगतन गोरज मंडित बांह सखाके कांधें ॥। चलत मंदगति चालमनोहर मानों नटवागुणगांधें ॥२॥ यह पद कमल अवही प्राप्त भये बहुत दिनन आराधें ॥ परमानंदस्वामी के कारण सुरमुनि धरत समाधें ॥३॥
Hameer
Krishna janm suni apane patison hansi dhaadhin yon baliju | jaau
Part1-126
कृष्ण जन्म सुनि अपने पतिसों हँसि ढाढ़िन यों बालीजू | जाउ जाउ तुम नंद नृपतिकें दान कोठरी खोलीजू ॥१॥ तुमकों मिलेगी वागौ बीड़ा और दक्षिणा भरे झोरा । हमकों लैयो नखशिख गहनों जेहरि सहित एक जोरी ॥२॥ लैयो कंत जुगतिसों लैयो हम चढ़िवेकों डोली । छोटीसी भेंसि सुबन सींगन की टहल करनकों गोली ॥३॥ साज सहित एक घुड़िला लैयो गैया दूध अतोली । सुंदरसौ एक हस्ती लैयो हस्तिन संग अमोली ।|४। सिज्या सहित एक ढलीया लैयो ओर पाननकी ढोली । बीरी करि करि मोहि खवावबै लैयो संग तँमोली ॥।५॥| जन्म जन्म काहु नहीं जाचों फिरि नहीं मांडों झोली। नंददास नंदरायकौ ढाढ़ी भयौ अजाचिक ढोली ॥६॥।
Maroo
Raniju bhale kaam tum keene | hansi hansi kahat sakal
Part1-009
रानीजू भले काम तुम कीने | हँसि हँसि कहत सकल ब्रज सुंदरि जाय पूत सुख दीने ॥१॥ हम यह नई सुन सुन ब्रजरानी मन अभिलाष पुजायौ || तुम पर कहा कहा हम बारें सुंद' बदन दिखायो ॥२॥ एसेई कौतूहल दिनदिन होठ सदा यह आंगन ॥ श्रीविइलगिरिधरनलाल ये अपने कुलके मांडन ॥३॥
Devgandhar
Gawat giridharan sanga param mudit raas rung urap tirap lait taana naagar nagri ..
Pustak1-353
गावत गिरिधरन संग परम मुदित रास रंग उरप तिरप लेत तान नागर नागरी ॥ सारीगम पथ निगमप धनी उघटत गति सप्तसुरन लेत लाग डाट सुलप अति उजागरी ॥१॥ चर्बित तांबूल देत धुब॒ताल गतिहीं लेत गिडिगिडिगिडि थुंगधुंग अलाग लागरी ॥ सुरतिकेल रतिबिलास बलि बलि बलि कुंभनदास श्रीराधानंदनंदन बर सुहागरी ॥२॥
Kedaro
Vrajvasi jaane russ reeti ..
NityaPad-358
व्रजवासी जाने रस रीति ॥ जिनके हृदय और नहीं भावत नंदसुबन पदप्रीति ॥१॥ सर्वभाव सर्वात्मानिवेदन रहत हैं त्रिगुणातीत ॥ करत महलमें टहल निरंतर जात याम युगवीत ॥२॥ जिनकी गति और नहीं जाने बिच जबनिका भीति ॥ कोई एकलहे दासपरमानंद गुरुप्रसाद प्रतीति ॥३॥।
Gori
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