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Sheetkal Ke Pad

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Kirtan Title
Page
Kirtan
Raag
Deep daan kiyo sakal vraj aaj kuhu mangal adhikai ..
Part2-057
दीप दान कियो सकल ब्रज आज कुहु मंगल अधिकाई ॥ जगमगात खिरकन पर दिपक लागत मनहीरा छबि पाई ॥१ ॥ बर सिंगार कहाये गायन नाना रंग के सिंग रंगाये। पांय पेंजनि सीसन पटीआ लटकन सबके कंठ बंधाये ।॥२ ॥ धौरी धुमर गांग बुलाई बछरा सहित आतुर वे थाये॥ देखी ठाडे नंद लाडीले श्रीविट्ठुल गायन कान जगाये ॥३ ॥
Bilawal
Russ saras baso barsanonju .. raajat ravani
Part3-097
रस सरस बसो बरसानोंजू ॥ राजत रवनी करबानों ॥ मनिमय मंदिर तहां सोहे॥| रविशशि उपमाकों कोहे || १॥ वृषभान गोप तहां राजें ॥ ताकी कीरति जगमें गाजें ॥ नितपरम कुलाहल भारी | जावत गारी ब्रजनारी ॥२॥ जब दिन होरी को आयो ॥ न्योंतो नंदगाम पठायो ॥ सुनिकें मनमोहन धाये | सब सखा संग ले आये ॥३॥ जब जसुमति न्‍योति बुलाई | समधिन समध्यानें आई ॥ कीरति आदर कर लीनी ॥ मनुहार बहोत विधि कीनी ॥॥४॥ अतिकृपा अनुग्रह कीने ॥ हमतो अपने करिलीने ॥ गुनगनेन परें कछू गाथा ॥ कीनों ब्रज सकल सनाथा ॥५॥ तुमतो सबकी सुखरासी ॥ ये सुफल किये ब्रजवासी ॥ आवो निज भवन बिराजो ॥ बरसानों सकल निवाजो ॥६॥ तुमतो सबकी सुखदाई ॥ मुखकीजे कोन बडाई ॥ तुमतो यह निजब्रत लीनों || जिनजो जाच्यो सोदीनों ॥७॥ यह जस तुमारो जगजानें || मुखपर कहि कोन बखानें ॥ तब करगहि ढिंग बेठारी ॥ जावत मंणल ब्रजनारी ॥८॥ तुमसों पूछें एक बाता ॥ तुम सांची कहो सब गाता ॥ जबगर्ग तिहारे आये ॥ वोहो नाम कृष्णके गाये ॥%॥ मुनि बासुदेव करिलेखे ॥ वसुदेव कहां तुम देखे ॥ यह सुनिसुनि बात तिहारी ॥ अचरज उपजे जीयभारी ॥१०॥ ओरोसंका जीय आवे ॥ ये भेद कोऊ नहीं पावे ॥ पति साधु परम तुम पायो ॥ यह पूत कहां ते जायो ॥११॥ याके गुन रूप नियारे | यह मिलेन कुलहि तिहारे ॥ कछू कह्मों हमारो कीजे ॥ वसिकें सबकों सुखदीजे ॥१२॥ रहियें कछू दिवस हमारे ॥ हम तोहें सकल तिहारे ॥ यह दोऊ एक करि जानों ॥ नंदगाम सोई बरसानों ॥१३॥ जानत ज्यों नंद तिहारे ॥ तेसेई वृषभान हमारे ॥ ये दोऊ परम सनेही ॥ ये एक प्रान द्वे देही ॥१४॥ सुनिसुनि जसुमति मुसिकानी ॥ बोली मधुरी एकवानी वसियें कछू दिवस तिहारे कीरति चलि बसो हमारे ॥ १ ५॥ तब हंसी सकल ब्रजनारी ॥ जसुमति की ओर निहारी ॥ ब्रजभयो कुलाहल भारी ॥ नांचत दे दे करतारी ॥१६॥ यह रस बरसे बरसाने ॥ विन कुंवरि कृपा को जाने ॥ कीरति जसुमति जसगायो ॥ ब्रजवास माधुरी पायो ॥१७॥
Bilawal
Naari jaari dey gaee way maaee hoe hoe horry aaee ..
Part3-336
नारी जारी दे गई वे माई हो हो होरी आई ॥ मदन मोहन पिय बांसुरी बजाई श्रवण सुनत गृह त्तज जुरधाई ॥ १॥ चंद्रावलि अंजन ले आई पकर मोहनजु की आंख अंजाई ॥ फगुवा विन दीयें कैसें जेडो धोंधी के प्रभु कुंवर कन्हाई ॥२॥
Nayaki
Dharahi aeka gwar bulaai ..
NityaPad-200
धरही एक ग्वार बुलाई ।। छाक सामग्री सबही जोरकें करदे तुरत पठाई॥१॥ क्यो जाय वूंदावन जैयो तू जानत सब प्रकृत कन्हाई॥। प्रेम सहितले चली छाक कहि है हैं वे भूखे दोऊभाई ॥।२॥ तुरत जाय वृंदावन पहुँची ग्वालबाल कहुं कोउ न बताई ॥ सूरस्थामको टेरत डोलत कितहों लाल छाक मैंलाई ।।३॥।
Saarang
Nayan bhaye bush mohanate .. jyon kurangbash hott naadke tarat
NityaPad-096
नयन भये बश मोहनते ॥ ज्यों कुरंगबश होत नादके टरत नहीं ता भ्रृहनते ।।९१॥ ज्यों मधुकर वश कमलकोशके ज्यों चंदचकोर ॥ तेसेई वश भये स्थामके गुडिया वश ज्यों डोर ॥२॥ ज्यों वश स्वातीबूंदन चातक ज्यों वश जलके मीन ॥ सूरजप्रभुके वश भये एसे छिनछिन प्रतजु नबीन ॥। ३॥
Ramkali
Ritubasant key aagam aalee prachuramadan koo jore ..
Part3-018
ऋतुबसंत के आगम आली प्रचुरमदन को जोर ॥ कैसें धरें कुलबधू धीरज खेलत नंदकिशोर ॥१॥ तेसीये गिरि गोवर्धन पर नूत मंजुरी मोरी ॥ सुनसुन चलीं लालभिरिधरपे बनबन नवल किशोरी ॥२॥ जायमिली अनुराग भरी रस फाग श्यामसों खेली ॥ व्रजपति श्यामत मालहिं लपटी मानों कंचनबेली ॥|३॥
Basant
Aaj hamaare jevo mohan soee kii jey nand raniju .. kahaa bhawan mein durr
NityaPad-081
आज हमारे जेवो मोहन सोई कि जे नंद रानिजु ॥ कहा भवन में दुर जो रहे हो धर्यो दध ओदन पा निजु ॥१॥ बड़ी बेर की ऊठी बहु बेटी कोऊ भोरी कोऊ स्यानि जु ॥ बो विध बिजन खाटे ऊर मिठे ले आई मन मानिजु ॥२॥ कहेत रोहनि जसोधा आगें प्रेम लपेटी बानिजु ॥ सेनन में सब समुझ समुझके मनही मन मुसक्यानिजु ॥३॥ बल दाऊ को टेर लेत हें केहे केहेः मधुरी बानिजु ॥ कुंभनदास प्रभु भोजन मेहेमां निग मन जात बखानिजु ॥४॥
Nat
Laalan bethekunj bhawan .. saa ree gagan mamm pa dha nii urap tirpagati
NityaPad-176
लालन बेठेकुंज भवन ॥ सा री ग॒ मं प ध नि उरप तिरपगति अंगअंगसुखभरन ॥ सारंग राग अलापत गावत लेतलान सुखकरन ।। कल्याण के प्रभु गिरिधर मन आनंद भयो सुख अतिनेनन ॥।२॥
Saarang
Laaee jasomati maiya bhojan keeje laal .. vinjan dharey
NityaPad-219
लाई जसोमति मैया भोजन कीजे लाल ॥ विंजन धरे चटपटे मीठे लीजे हो सुंदललाल ॥९॥ चंदन भवन बनाय स्वच्छ कर कर दिठोंना भाल ॥ परमानंद प्रभु ललित त्रिभंगी बहत चहूंदिस ख्याल ॥२॥ हक राग सारंग
Saarang
Huzz achman keejiye kripanidhan |
NityaPad-087
हज अचमन कीजिये कृपानिधान | यमुनोदक कंचन झारी भरलाई चंद्रावली सुजान ॥१॥ पनवारों भक्तनकोंदीजे नारद तुंबरगान ॥ जेंबत युगल उठे जो परस्पर गावत जनकल्यान ॥। २॥।
Dhanshree
Aho russ moran morey laal syaam tamaal horry
Part3-250
अहो रस मोरन मोरे लाल स्याम तमाल होरी खेलहीं ॥ कनकलता संकुलित सघनपर आनंदमय रस फेलहीं ॥ध्रु०॥ गृहगृहते नवला चपलासी जुरजुर झुंडन आईं ॥ लहेंगा पीतहरे ओर राते सारीश्वेत सुहाई ॥ अतिझीनी झलकत नवसत तन करन जटित पिचकाई ॥ कंचुकी कनक कपिश सब पहहरें तहां उरजन की झांई ॥१॥ कहां लोक हों सकल शोभा युत ए गोकुल की नारी ॥ अंगअंग मिरिधर गुणालंकृत विधन जात बिस्तारी॥ प्रफुल्लित बदन तंबोल भरे मुख गावत मीठी गारी ॥ ध्वनि सुन श्रवण निकसे सिंघपौरी मोहन लाल निहारी ॥ २। उतते श्रीवृषभान दुलारी आवत रूप छटठारी ॥ छापेरी झूमक अंग साजे चहुंदिश लगी किनारी ॥ बेनी चंपक बकुलन ग्रंथित रुचिर सखिन संवारी ॥ मोतिन मांग ओरसीस फूल मध्य रत्न जटित फुलकारी ॥३॥ श्रवणन कुसुमजराऊराजे लरे डेड्वे दुह ओरें ॥ पटियनपे जुलसत दमकन में छबि की उठत झकोरें ॥ चलदल पतन्न प्रवाल वज्ञसो कोंधत पंकति जोरें ॥ भाल दिपत आड मृगमद में बक्रश्नोंह जुगमोरें ॥४॥ अखियां सुखी सुखेन बडेरी कहा कहों लोनाई ॥ सेत अरुण ऊपर मधुराई तामें कछु चिकनाई ॥ वसीकरण रससों मिल रचपच अंजन रेख बनाई || रस वस ललकें ऊपर झलकें परमावधि चपलाई ॥५॥ नासा सौभग निपट सुढारी वेसर सिखी आकारी ॥ पन्ना करच चूनी बहुबरणी छांह सिखर परकारी ॥ सलिल कुंवर सातो जुग ऊपर अधर अरूणता भारी ॥ गमन करत जब हंस लजावत अरक थरक चुति न्यारी ॥६॥ दशनावली घन संपति लीये दरशत जब मुसिकानी ॥| चिबुक मध्य सामल बिंदुराजें मुख सुख सदन सयानी ॥ ग्रीवा लटक अटक नागरिकी बोलत अमृत बानी ॥ चोली मुलकटहेमगुननका कवच सुभटता ठानी ॥७॥ चौकी चंपकली कौस्तुभ मणि वृंद्यवन में लीनी | कहतन बने रहस्य में - रीझे मदन गोपाले दीनी ॥ चंद हार पचलरीछरा परसत किंकिणी कटिछीनी ॥ उरपर भेद भीर भूषण की अद्भुत रचना कीनी ॥|८॥ बाजूबंद ताऊ ढिंग सोहत नगबहुमोली लागे ॥ तेसी तू इतडितकी नन्‍्याई ऐसीनोरंग पागें ॥ नवग्रह गजरा जगमग नव पोहोंची चुरियन आंगें ॥ अचल सुहाग भाग्य की लहरें हस्तहें मेंदी दागें ॥५॥ पांच चबर पटियन पें गूंथी डोर चुनाव पेंडूले ॥ झूलत झबि फवि सुंदरता फुंदना जहां समतूलें ।॥ लहेंगा लाल गुलाल रंग सम पुरटउदक सो झूलें ॥ झंकृति कोकिल रवमर्दनकर नूपुर विछिया बोलें ॥ १ ०॥ दर्पन नृपति मुदारिया धरणी तेज पुंजकी नगरी ॥ दश शशि के अनुमान प्रमाणन चमक जनावत सगरी ॥हथसांकर रवनी वांधेगी कृष्ण सार के पगरी ॥ मिलकर वृंदआय विपिनमें जब तब यों झगरी ॥१ १॥ जे हरते हरपायन सो अनबट कुंदन हीरा बलिता ॥ पीन पिंड्रिया तेसीई चरनन जाबक दीनी ललिता ॥ यह विध राधा रानी गाई नांहि सावरे सरिता ॥ जोजो रसिक गाई हें ऐसें प्रेम पुंज फल फलिता ॥१२॥ सब समाज भामिनि ले दामिनि वृंदन वृंदन हेली ॥ कंज पराग अरणजा गोरा सज सजलये सहेली || लटकत आवत भांतन कंठन बांह परस्पर मेली ॥ उनमद कोऊ वदतन काहू स्यथाम समरबनवेली ॥१३॥ बाजत ताल मृदंग ढोल डफ झांझन झमक लगाये ॥ करत टोक प्यारे प्रीतमसों मुरदुर नयनन चाये ॥ मुरली स्वरफेरत घोषनमें टेर टेर दरसाये ॥ चल्यो सुगध सहख चारलों कोउ वियार केवाये ॥१४॥ बगर बगरते सखा श्रवण सुन यूथन यूथन धाये ॥| अपनी भीर सहित संकरषण ले श्रीदामा आये ॥ कुंकुम केसर माट अरुमथना तेल फुलेल मिलाये ॥ तोलोंतोक सुबल उन सन्मुख आओें लेन पठाये ॥१५॥ इतहुबाजे लागे वाजन दुंदुभी धोंसा गाजे ॥ रुजन मुरज आबज सारंगी यंत्र किन्नरी साजें ॥ इन मध्य मुकुट धरें नंदनंदन नटवर भेषनराजें | यह शुंगार नंदराय हस्त को कोटिक मन्मथलाजें ॥|१६॥ नख सिखते अभरण की जोतें जग मगाय मेरी माईं ॥ खुले बंद सब देह उघारी काछ जाल समुदाई ॥ खोल भुवन भूषणदे बावा होरी भलें मनाई ॥ खाततें बीरा उमग अलोलन रोमरोम छबि छाई ॥१७।॥ सुनले ललिता आज खेल यह मचे खिरक में माई॥ मानत नहीं जब वचन अठपटे उतते अंगुरी फिराई ॥ चली हे निसंक निरंकुश करिणी एक ठोर तहां आई ॥ सुबल तोक दोऊ गहिलोने जान कहूं नहिं पाई ॥१८॥ राखे हें ओल कहत ब्रज सुंदरि तुमें कहां लों पैये || दगा कियो किथों सांच कहत हो कड्डो किहिंवात पत्यैये ॥ जो कूटक तो बांध बांध कें सांटिन नृत्य नचैये ॥ जो सांचे होइन बातनते देहें छांडपुतनेये ॥|१९॥ बडी वेर भई सुध जब लीने राखे हें दोउ घेरे |॥ कहत हैं अवदूर भज स्याम घन पीतांबर को फेरें ॥ जानसौ दृढ़ पकरे नहीं छूटें दौरे दिये दरेरे || खरिका खेंचि दईले सांकर तरुणी रहणई हेरें ॥२०॥ चढचढ अटा चतुर्दिश वरघत भरभर कनक कमोरी ॥ नांहिदाव बदलो लेबे को सहचरी रंग रंग बोरी ॥ छूटतदे जल जंत्रन चह्ंंदिश बोलत हो हो होरी ॥ सुबल भली विध पहोच्यो मिल मिल यह सिख दीनी गोरी ॥२१॥ भई मारमो वरकीनीके ललिता सेन जनाई ॥ दुषि पकरी तुम अबमोहि मेलो सोंहलाल की खाई || तब जोजीभ दाबि छिटकायो समझे न भेद कन्हाई ॥ द्वार कपाट उघार भजेहू फिर मोहि सिढ़ी बताई ॥२२॥ उतसामनहीं भये संपूरण इतहि सब विध पूरी ॥ गर्हे ऊपर गनीन जातही मेंन मुनैया चूरी ॥ बविद्रम दाब दशन सोंकोपी चंद्रावलियुधपूरी ॥ कीनी मार उलेंडी जागर आंधी बंदन धूरी ॥ २ ३॥ कृष्णागर ओर अबीर सानिकें गेंदुक सरस संवारी ॥ श्रीदामा दिस खाजे कहियत तिनकें तकतकमारी || कूदतजि ततितलगेजगातपर हलधर बाह पसारी ॥ लगेहें अति सुकुमार लाल को कहां गई प्रीति तुम्हारी ॥२४॥ हम एसो नहीं खेल खेलिहें जो लागे या तन कों ॥ देहेंभजाई यह सेन तिहारी गहेहें दोऊ जनकों ॥ तुम तो कहत ललित यह मूरति जीवन हम ब्रजजन को || एकेले आई मिलोकिन अग्रज पूछि आपने मनको ॥२५॥ जेरी निसंक लइठालेकर पकर लीये भरकोरी ॥ जागि उठे ब्रजराज सदन में सब ऐसी भांतिन दोरी ॥ मुख मांडत सुमन नपंकनसों उर चोबा सों बोरी ॥ उल्हर रहवादर रंग रंगन ऐसी होत हे होरी ॥२६॥ उतरी कर मनोरथ वांके देख यशोमति लाजी ॥ जीती हैं रसरीति कटक वर सुरन छबीली छाजी ॥ परमानंद दुंदुभी आई बगर में बाजी ॥ देंदेकूक ब्रजेश प्रभति तब सभा अथांई भाजी ॥२७॥
Sarang
Aaj merey mill baithe maheman ..
NityaPad-218
आज मेरे मिल बैठे महेमान ॥ चंदन भवन मांझ सीतल व्यंजन धरे गोपीजन आन ॥१॥ धन्य भाग्य हे आज हमारे चंदन धर्यो है सान॥ परम हुल्लास भई गोपीजन गावत जन कल्यान ॥२॥
Saarang
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