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Sheetkal Ke Pad

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Kirtan Title
Page
Kirtan
Raag
Raniju saaran kookhi tumari .. aise laal bhaye tomente jeevan
Part1-009
रानीजू सारन कूखि तुमारी ॥ ऐसे लाल भये तोमेंते जीवन मूरि हमारी ॥१॥ सबहिन रोमरोम सुख पायौ तुमारे ठोटा जाये ॥ दूनी जौति चढी घरघरपै सुंदर लागत गाये ॥२॥ गावत फिरत सकल ब्रजवासी माथे दूब चढ़ाये ॥ श्री विद्डलगिरिधरनलालके आवत लोग बधाये ॥३॥
Devgandhar
Bali raaja koun pataal pathaayo deva abhai-pada paayo. waman-roop
Part1-218
बलि राजा कों पताल पठायो देव अभै-पद पायो। वामन-रूप धस्बो जग-जीवन कस्यप-सुत होइ आयो ॥ अति सुंदर बालक बलि-द्वारें लघु तन देखियत नीकौ । दृष्टि परी बलि राजा महाबलि सबै देवनि कौ टीको ॥ कहाँ सों आए भाग सों पाए कछु सेवा हमें दीजे । जो आग्या दीजै कछु हम कों चाहौ सो तुम लीजै ॥ पद-त्रय भूमि दीजै महाराजा ! कुटी एक पढ़िबे को पहये। और नहीं कछु तुम सों माँगों इतनौं हमकों चहिये ॥ बलि राजा हरष्यो अति मन में रूप-छक्यौ अति भारी । जो भावै सो लीजै महाप्रभु ! 'परमानेंद' बलिहारी ॥
Saarang
Dhenan koo dhyaan nisdin
NityaPad-279
धेनन को ध्यान निसदिन मेरे प्रीतम को स्वप्ने कहत गोरी गायन आई ॥ आनन उजारी बनवारीजु सम्हारि लाउ वा बिन न रहुंगो तो बाबा की दुहाई ॥१॥ कजरारी कंठवारी मखतुल फोंदावारी झांझर झनकारी प्यारी मो मन भाई ॥ जगन्नाथ कविराय के प्रभु हो तो झुकी चिरजीबोकन्हाई ॥२॥
Kanharo
Sunonri aaj naval bathaayohe ..
Part2-274
सुनोंरी आज नवल बथायोहे ॥ श्रीलक्ष्मण गृह प्रकट भयेहें श्रीवल्लभ मन भायोहे ॥१९ ॥ बाजत आवज ढोलक महुबर घनज्यों ढोल बजायोहे। कोकिल कंठ नवल वनिता मिल मंगल गायोहे २ ॥ हरदी तेल सुगंध सुवासित लालन उबट नहवायोहे॥ नखशिखलों आभूषण भूषित पीतांबर पहरायोहे॥३॥ अशन बसन कंचनमणि माणिक घरघर याचक पायोहे॥ श्रीविद्दल गिरिधरन कृपानिधि पलनामांझ झुलायोहे ॥४ ॥
Ramkali
Madan mutt matwaro hii keeno ..
Part3-004
मदन मत मतवारो ही कीनो ॥ मधुव्रत होय गिरिधरन जबही जब वदन कमल रस भीनो ॥ १॥ जाके कारन सुनरी सजनी जब आरज पथ छीनो ॥| मया करी सोई तुमने कीनी ज्यों कुंदनमें मीनो ॥१॥ वेसी प्रीत छ॒त्ती मेरे उनसों प्रान प्रकटकर दीनो ।| बेर बेर हमने रस जान्यो उन सोतन रस बीन्यो ॥३॥ कहा बिरहिनी सीत लग्यो अति सो मन जात न दीनो ॥ द्वारकेश प्रभु या जाडेको देसनिकारो दीनो ॥४॥
Malkoos
Pratham pranath vavrajaish ashish lijaiju . keejai param upkaar
Part1-121
प्रथम प्रनठ वब्रजईश आशीष लीजैजु । कीजै परम उपकार बधैया दीजैजु ॥!भ्रु.॥ पुत्र तुम्हारे कौ हो गावत भूत भविष्य वर्तमान | जब तब द्वार आन रहों पुनिद्वार न जाचों आन । बैया दीजैजु ॥१॥ पहेले सपनो पाईयौ हो मैं देख्यों अद्भूत | यदुकुल प्रकट भये व्रजभूषण नंदराय घर पूत॥२॥ बदि भादों आठें युग द्वापर अर्ध रेंन बुधवार । कौलव करण नक्षत्र रोहिणी जन्मे जगदाधार ॥३॥ द्वादश लग्न सुभग नवग्रह उदित अपरमित भेख | अगम निगम गर्गमुनिकीनौ जन्म पत्रकौ लेख ॥४॥ जिन जानौ मानसमति कोऊ देव देवनकौ देव । पूरनपुन्य अहीर अभैकृत याही जन्म याही भेख ॥५॥ गृह गहतें सुनि सब गोपी कंचन थार लियें साज | पोहोप बधाओ कूख महरकी सो बन फूले ब्रजराज ॥६॥ हय गज रथ पाट्टंबर दीने दीने बहु भंडार । हों ढाढ़ी कबहू न अघाऊँ यद्यपि नंद दातार ॥|७॥ हों माँगों यै जगमैयापै रहो पदरजकी ओट । नैन प्रभाव हारु जित तित रहौ चरणन तेरे लोट ॥८॥ भलेजु राजपूत भयौ यह भक्‍त न पूजी आस । जन्म जन्म येही यश गावै बलि जाय चतुर्भुज दास ॥९॥
Dhanashri
Phoole dolat hain vrishbhan . pragati sutaa vansh ujiyari jan shubh
Part1-195
फूले डोलत हैं वृषभान । प्रगटी सुता वंश उजियारी जन शुभ करत हैं गान ॥१॥ ताल मृदंग रंगसों बाजत साजत नवल सिंगार । होत॑ बधाई सब मन भाई शोभा अति ही द्वार ॥२॥ धनि वृषभान भागि निधि आई धन्य धन्य यह मास । कृष्णास अब आस सुफल भई प्रगटी सुख ब्रजवास ॥३॥
Saarang
Nand gaamate bunn thhan kein chaley barasaane khelan
Part3-205
नंद गामते बन ठन कें चले बरसाने खेलन होरी ॥ वसन बिचित्न सबे रंग भीने रसिक मंडली संग सब जोरी ॥१॥ विविध भांत पाग सिर शोभित कटि पट पीत पिछोरी ॥ हाथन कंचन जेरी विराजत करत कौतूहल किलक कलोरी ॥२॥ फूलन की माला झोरा झुकि काहू फूलन भरि झोरी | कोऊ अबीर गुलाल उड़ाबत चंदन बंदन रोरी ॥३॥ कोऊ ताल मृदंग बजावत कोऊ आवज डफ जोरी ॥ कोउ भेरि दमामा बजावत दुंदुभी सेहनाई की सोरी ॥७॥ कोउ चंदमुस्त्रि चंग बजावत संख शुंग॑ मुरली घनघोरी ॥ एक रबाब किन्नरी बजावत एक मंजीर झांझ झनकोरी ॥५॥ एक सारंगी अधोटी बजावत जल तरंग रस रंग रह्योरी ॥ एक प्रवीन जो वीनबजावत श्रीमंडल बाजत मधुरोरी ॥६|| एकन अमृत कुंडली राजत नवसत रंगखजोरी || कटतारन चुटकी जो बजाबत गावत हो हो होरी ॥७॥ ले समाज सबजाय जुरे वरसानें चोहटेपोरी ॥ उतते सब ब्रज युवती यूथजुर आय भई इकठोरी ।॥|८॥ लहेंगा लालचूनरी बहुरंग कंचुकी ललित कुचनपे होरी ॥ मेन मुनीसी ठाडी मानों चंचल नयन चकोरी ॥९॥ हाथन लिये कनक पिचकाई फूल छरी गेंदुक सोह़े गोरी ॥ घूंघट माझ निडारत पियतन सबसे सयानी हें अतिभोरी ॥१०॥ केसर चोवा छिरकत बहुरंग वैयां पकर झक झोरी ॥ नयनन काजर आंजि गुलचाबंत सबही धरत जोबन की तोरी ॥११॥ एक जो सन्‍्मुख पढत दोहरा त्ापाछे एक सखी जो दौरी ॥ एक दौरतदसवीस कदौरी सब ही भजाय करीमतिबोरी ॥१२॥ मार परी कोऊ आय सकत नहीं प्रीतम भुज भरि लेमेटोरी || आलिंगन दे अधरामृत पीवत यह रस सदा एक पलनघटोरी ॥१३॥ खेलि फाग रस सिंधु अधिक वढ्यो उम्रगि चल्यो जानो हदतोरी ॥ सुर वनिताजो निरख थकित भई ये बड भागि ब्रज युवतिन कोरी ॥१७॥ जो जाके मन हुती कामना सो सबहिन पूरन जो भयोरी ॥ फगुवादेन कह्मो सबहिन को वलल्‍लभ पिय सुख प्रेम हियोरी ॥१५॥
Kaafi
Chalori horry khelein nandke laa
Part3-199
चलोरी होरी खेलें नंदके ला र अरणजा केंसर छेल छबीले मोहन मदनगोपाल सों ॥१॥ मृगमद अबी ' करतालसों ॥२॥ फेंट जुभरीहे गुलालसों ॥ रुंज मुरज आबज बाजें रंगरद्यो छिरकत भरत परस्पर सब मिल लाल हंसत ब्रजबालसों || चंद्रावलि बलिराम मुख मांड्यो लटकत गजगति चालसों ॥३॥ राधाजू अचानक आयगहे हरि बेंदी लागी भालसों ॥ विप्र गदाधर प्रभु मुख निरखत सुख पायो दीनदयालसों ॥४॥
Kaafi
Tapan lagyo ghaam parat atee dhoop
NityaPad-219
तपन लाग्यो घाम परत अति धूप भैया कहं छांह सीतल किन देखो ॥ भोजनकुं भई अवार लागी हे भूख भारी मेरी ओर तुम्र पेखो ॥१॥ बरकी छेयां दुपेर की बिरियां गैयां सिमिट सबही जहां आवे॥ नंददास प्रभु कहत सखनसों यह ठोर मेरे जीय भावे ॥२॥
Saarang
Jhulaabai sutakon mahari palana karaliye navneet | nainan anjan
Part1-108
झुलाबै सुतकों महरि पलना करलिये नवनीत | नैनन अंजन गाल मिसी बिंदुका तन ओढ़े पटपीत ॥|१॥ बेन देखत मंद हसत है कबहुँ होत भयभीत । दे करतार नचावत गोपी गावत मधुरे गीत ॥२॥ राई लौन उतारति वारतिहै होत सकल अँगप्रीत । पूरन ब्रह्म गोकुलमें झूलैं परमानंद पुनीत ॥३॥ # राग आसावरी & कनक रत्नमय पालनौ हो गढ़यो रमार सूत्रधार | विविध खिलौना भातिकेहों गजमुक्ताके हार ॥१॥ सुभगपालनें बैठिके झूलत है नंदबाल | मात सुक़ृत देखिके कौतुक कहि व्रजबाल ॥२॥ जननी उबट न्हववाय के अत्तिक्रसों लिए गोद । पौढ़ाए पल पालने शिशु निरखि निरखि मनमोद ॥३॥ अति कोमल दिनसातके अधर चरनकर लाल । सूरश्याम छबि अरुणता निरखि हरखि व्रजवाल ॥४॥
Aasawari
Nandanandan daan niverat ree .. raakhe roki dathi samet gwalini
Part1-262
नंदनंदन दान निवेरत री ॥ राखे रोकि दथि समेत ग्वालिनी सखाबूंद प्रति टेरत )१॥ जब उठि चलत प्रबल ग्रोपीजन तब आगें उठि घेरत ॥ बॉँघि जठर पटपीत ललित गति कर लै लकुटी फेरत ॥२॥ काहूके कुच भुज अंचल गहि सबहिनकौ मन फेरत। परमानैंदप्रभु रसिकशिरोमणि मुसकत निरखत हेरत ॥३॥
Bilawal
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