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Sheetkal Ke Pad

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Kirtan Title
Page
Kirtan
Raag
Shobhit subhag latpati paag bheene rasik triya anurag... kunkum
NityaPad-142
शोभित सुभग लटपटी पाग भीने रसिक त्रिया अनुराग॥। कुंकुम अलक तिलक सेंदूर छबि घूमत आवत और निश जाग ॥१॥ कछुक जुंभात और माल मरगजी पीक कपोल अधर मिस दाग ॥ चतुर्भुजप्रभु गिरिधर नीके जानत आलसवश सबअंग विभाग ॥२॥
Bhairav
4 (cuck raag bhairav eeth) pichhvaare tain chhaan oodaabai horry kaun khilwari ..
Part3-074
४ (कक राग भैरव ईथ्) पिछवारे तैं छान ऊडाबै होरी कौं खिलवारि ॥ सास बुरी मेरी नँनंद हठीली कंथ सुनें देह गारि ॥१॥ गारी गावैं ढ़फ हि बजाबैं धुम मचावैं द्वारि ॥ “द्वारिकेस' प्रभु की छबि निरखति बार-बार बलिडारि ॥२॥
Bhairav
Baneri laal giridhari baanik parr bal bal jaanee .. champak bharee
NityaPad-166
बनेरी लाल गिरिधारी बानिक पर बल बल जांई ॥ चंपक भरी कुलही सिर लटकत कसुंभी पाग छबि भारी ॥ १॥। बरन पीत श्याम अंग पर ओर अरगजा सोभे मन्मथ मनोहारी ॥ गोविन्द प्रभु रीझे वृषभाननंदिनी कंचुकी खोलि भरत अंकवारी ॥ २॥।
Nat
Taruvar chhaanh teer jamuna key kiir padhawat
NityaPad-317
तरुवर छांह तीर जमुना के कीर पढावत डोलै ॥ रूपरास कोऊ नवल किशोरी मोहन कहि कहि बोले ॥१॥| झुकत झुकावत डार कदम्ब की वेणी शीश पै भ्रमर कलोले ।। नागरिदास नेह रसमाती बाम पूंदि मूंदि दूण खोले ॥२॥।
Kedaro
Raniju tum aisau suta jaayau .. jaake pragatahi yaa bavrajmain
Part1-008
रानीजू तुम ऐसौ सुत जायौ ॥ जाके प्रगटतही या बव्रजमैं गृह गृह सब सुख पायौ ॥१॥ गोपी ग्वाल गाय बछरा सब कोऊ लगत सुहायौ॥ नंदराय एकजात सबनकीौं पार्टंबर पहरायौ ॥२॥ दूने चाय उठत उर अंतर सबहिन मंगल गायौ ॥ श्री विह्रलगिरिधर मुख देखत जीवन सुफल करायो. ॥३॥
Devgandhar
Chung mridang bansuri baajat hoe hoe hoe hoe horry ..
Part3-247
चंग मृदंग बांसुरी बाजत हो हो हो हो होरी ॥ मानो किल कार सेन दे बोली उम्गि चली गृहगृहते दोरी ॥१॥ सारी सेत पीत रंग बोरी भूषण भूषित नवलकिशोरी ॥ नील कंचुकी उरपर राजत मानो शोभा भई इक ठोरी ॥२॥ रंगभीनी भामिनि गारी गाबें कहें राधा माधो की जोरी ॥ गुरूजन वरजत नेकनमानत लोक लाज तिनुका ज्यों तोरी ॥३॥ काह्ू कर साखजबाद कुंकुमा काहूकर लीने केसर घोरी ॥ उमगे ग्वाल गोपिका दुह्ंंदिश मानो मघवा वरषत घनघोरी ॥|४॥ फगणुवा दिये जीय के रीझे लाल गोवर्धन धारी ॥ देत असीस चली ब्रज वनिता दास कल्याण जाय बलिहारी ॥५॥
Sarang
Tapa humm bahut bhaantin karchayau .. himm barsha sahee sir parr ghaamaten naa durchou ..1.. cutt bredhi sapt randhnan hiyou chhoonchhau karchau ... tumahin begg bulaayvekon laalan adhar dhara ..2.. itane tapa main kiye jabahi laal
Part1-292
तप हम बहुत भाँतिन करचञौ ॥ हिम बरषा सही सिर पर घामतें ना डरचौ ॥१॥ कट ब्रेधी सप्त रंध्नन हीयौ छूँछौ करचौ ॥। तुमहिं बेग बुलायवेकों लालन अधर धर ॥२॥ इतने तप मैं किये जबही लाल गिरधर वरचौ ॥ सूर श्रीगोपाल सुमिरत सकल कारज सरचौ ॥३॥
Sorat
Aaj tou chhabilo laal praatahi khelan chalyo sakhaa sanga laay leeyen prem gaari gayaken || khelat khelat brashbhan joo kii
Part3-076
आज तो छबीलो लाल प्रातही खेलन चल्यो सखा संग लाय लीयें प्रेम गारी गायकें || खेलत खेलत ब्रषभान जु की पौरी आये हो हो-होरी बोले प्यारो मनभायकें ॥१॥ छबीली रच्यो उपाय स्याम को लीने बुलाय मैया की दृष्टि बचाय लीने उरलायकें ॥ अरसपरस दोऊ महारस भीने सहचरी सुख पावें रसिक मुख गाइकें ॥२॥
Bhairav
Rasvillas rasbhare nirtat navalkishore auo navalkishori ..
Pustak1-334
रासविलास रसभरे निर्तत नवलकिशोर औ नवलकिशोरी ॥ एकही वेष एक रूप गुण गिरिधर श्याम राधिका गोरी ॥१॥ नव पटपीत अरू नवभूषण नवकिकिंणी कटि युग थोरी ॥ दुहुँ दिसि सकल सिंगार बिराजत मानों त्रिभुवन सौभगता चोरी ॥२॥ तान बंधान वेणु रव सों मिलि बिधिना रची सुघर यह जोरी ॥ कुंभनदासप्रभु गोवर्धनधर सुरत केलि में कंचुकी छोरी ॥३॥
Malav
Uttar nadet mohani maundhar baithi piyavachan sunat nekhu
NityaPad-324
उत्तर नदेत मोहनी मौनधर बैठी पियवचन सुनत नेकहू न मटकी ॥ तू कब चलेगी आली रजनी गईरी सब शशिवाहन धरनी धुकलटकी ॥१॥ धरेंरी पाणिकपोलनमें करेंकलोल भुव नखलिखत तेरे कहा जात घटकी ॥ मुग्धवधू रिस काहेको करत हठ परम भामती तू नागरनटकी ॥। २।। ध्रुव समान फिर आयेरी सप्तरिषि अबही वारहैतमचररटकी ॥ मानदासबल राधिकाकुंवरि चल नीकी शोभा लागे तेरे नीलांबर पटकी ॥३॥
Kedaro
Shree purushottam karun pranaau, inco ullas
Part1-308
श्री पुरुषोत्तम करुं प्रनांउ, इनको उल्लास परम रुचि गाऊं, श्रीवल्लभकृषा अनुग्रह करही, मो मतिहीन शारदा शुद्ध धरही, एक समे प्रभु अति ही उल्लास, देख स्वरूप नख चंद प्रकाश; सौरभ सुगंध तुलसीदास आयो, इच्छा रमन द्वे रूप मन भायो |इच्छा भइ द्वे रूमकी तब कोटि मनन्‍्मथ मोह ही; अकल कला सौन्दर्यसीमा, वाम भाग जु प्रकट ही, देख प्रभु उन रूप अद्भुत, रमन चित वीचारियो, दक्षिण भाग जु और ललना, रसमें रस निर्धारियों । जुगल रसको रस बढावन, मध्य रूप प्रकाशही; अधिक बढतो घाट आवे घाट बढतों जा सही साम दाम जो भेद उनके मध्यको अधिकार हे; यह उल्लासनि रासरसमय रसिक मन निर्धरं है। स्व इच्छाके महेल बनाये, उनकी शोभा बरनी न जाये, वाके गुन नहीं होत है न्यारे, एक एक महेल छ ऋतु अनुसारे; रत्नजटित के छाजे तिबारी हाटिक स्फाटिककी फुलवारी । (वलण) फुले वृक्षलता वेली द्रम, निबिड कुंजन रचपची, हंस कोकिल कीर कलरव, पांती बगदल अति मची | बहत मंद सुगंध शीतल, मोर कुंहुकनी अति बनी, रटत पिय पिय सुखद चातक, चकोर चंदा चक्षनी, चकवा रु चकइ तीर सरिता, नीर कहा करे सांधा ? यूथ मुखीकी संख्या करही तुच्छ बुद्धि कैसे चित्त धरही ? (वलण) धरू कैसे चित्तमें जु, बानीहू थकी जात हे, अप्राकृत लीला प्राकृत चातक सब घन कैसे समात है ? कोटि साडे तीन मुखिया, पुरुषोत्तम निज दास हे, ओरकी को गिने संख्या यह चरन रजकी आस हे, चरनको झंकार सखियन, घोष शब्द जु गाजही, चलत अति उत्साह सखियन, रसिक सरिता भ्राज ही । श्रीपुरुषोत्तम उल्लासको, कहुं बेद पार न पावही, मूठ केसे चित्त लावे ? रसिक मन न समावही। (४) वाम भाग सिंगार बखानो, एक रसना मुख कहत न आनो, उनके बसन नीलांबर सारी, श्याम कंचुकी लहेंगा लाल कीनारी । (वलण) श्याम कंचुकी लाल ल्हेंगा, फूंदनां मखतूल हे, नीवी कटि पर फबी रही किंकिनी नग बहु मूल हे । देख रूप स्वरूप सुंदर, रमा कोटिक वारने, श्रीपुरुषोत्तम उल्लासको रसिक चित्त बिचारने । ह (५) केसर आड सुभाल मनोहर, बीच मुक्ता बिंदु मानो शशी हर, नैन बिशाल भुकुटी मसिबिंद, बदनकमलके ढिंग अली फंद, श्रवन तरु कली मनिकी ज्योति बेनी जटित झंघालों पोती, देलरी तीलरी पंचलरी मनि मुक्ता, रत्नजटित नगहार उखुक्ता । (वलण) रत्नपदक रु हरी चोकी, भीर भूखन फबी रही, केशके बीच मनि मुक्ता, जबी झुमखसू गुही, बाजूबंध जराव फुंदना, चुरीयनकी पंक्ति बनी, नासबेसर वलय कंकन, मुद्रिका दर्पन अनी, जेहर तेहर तायल अनवट बिछुवन महावर चित्र कीये, हस्त मेंदी मुकर दीने, चंद्र नख शशी जिये, नखसिखलों सिंगार कहां लो, बानी हू थकी जात हे, श्रीपुरुषोत्तम उल्लासको रस रसिक मन ललचात हे । (६) नित्यलीलामें प्रभु बिराजे, ज्यों जल धार तुटत न समाजे, ज्यों सरिता प्रवाह नही थामें, अविक्तिन्न धार चलत तट आवे, कबहुक नृत्य कर कल गाने, कबहुक भक्त करत सनन्‍्माने, कबहुक रास क्रीडा उद्योती, कबहुक जलक्रीडा कब पोती ! (वलण) पोतमें हरि यूथ बैठे, खेवट आपु कहावही, चलत इंत उत विहंसी मुख, प्रीतम प्यारीकों रीझांवहीं । प्यारी को मुख देख बिन प्रभु, ओर कछु न सुहातरी चकोर चंदा निरखके ज्यों पलक नेन समातही । कबहुक ऋतु शरदकों जस गान ललना स्वर भरे, पूरन ब्रह्म स्वरूप सुंदर, सकल कारज अनुसरे | कबहुक तांबूल आप श्रीमुख, भक्त मुखमें मेलही, श्रीपुरुषोत्तम उल्लासको रस रसिक रसमें झेलही। (७) योग शक्तिको आवरन करही, जन भीतर लीला सब धरही, गोलाकृत ज्यों रविकी ज्योति, त्यों मायाको तेज उद्योती । (वलण) तेज पुंजको जानके, निराकार मतकों अनुसरे, माया संगी जीव दुष्टी भरम भूले पचमरे, न जाने जो ईश ब्रह्मा वेद हू नित गावही, श्रीपुरुषोत्तम उल्लास रस तज गणितानंदको ध्यावही । (८) परमानंद उल्लास बढ्यों जब, सुजस बंदीजन गान करे सब, रुचि उपजी हसिजुको भायो, निकसी ऋचा स्वरूप मुख आयो । (वलण) निकसी ऋचा स्वरूप श्रीमुख सुयश गान सुनावही, आप सुनियत मग्न हैकें, वर मांगो जु दीवावही, तब ऋचा रूप कहे वरजु देहु, यह लीलाकों अनुभवे, श्रीपुरुषोत्तम उल्लासको रस रसिक को चाहन लहे। (९) वाको प्रभु जु वर दीनो, मेरोही ब्रज मोही रस भीनो, प्रकट होय तुम द्वार रस मानो, पाछे तें मोही आयो जांनो । (वलण) जांनो जो आयो मोहिको, अब यह लीला सुख तुम देहहू ; श्री गोवर्धन यमुना बूंदावन रसमें रसहों नित रहुं; ओर सखी खट दश हजारे, बाको वर दीनो जबे, बेहु प्रगट जु होयगी तब, तुम इनको सुख देहो सबे | कल्प सारस्वत व्रजकी लीला पंछीजन लख आसहे, ताही दैवी सृष्टि रसिकन श्रीपुरुषोत्तम उल्लास हे | (१०) दैवी सृष्टि उद्धारन कारन श्रीवल्लभप्रिया मुखी सुधारन, बत्तीस लक्ष जीवकी गिनती, लीलारस ते भक्त प्रतीति ; दै चिंता करि तपत बुझावन, आज्ञा भई वललभ मन भावन | * (वलण) आज्ञा भई निज वल्लभकों, ब्रह्मसंबंध तुमजु करावहु, सकल दुष्कृत दूर करि, सेवा प्रयत्न जतावहू । श्रीगोवर्धन गिरि कंदरामें देददमन कहावही ; आपु सेवा करो करावो, प्रगट लीला दिखावही, पवित्रा माल उरधार वश कर, जीय बत्तीस लक्ष वरे; गिरिराजधरकों रूप सुधारस, पीवत नैना दुःख हरे, श्रीगोवर्धन घरकी लीला दुःख हरे, श्रीगोवर्धनधरकी लीला मेरे हृदयमें रम रहो, श्रीपुरुषोत्तम उल्लासकों रस रसिक जन मिल नित कहो। जहां झरनां झरे, श्रीपतिको कहा सदन शोभा स्वइच्छा कोन सरभर करे । निज धामको गोलोक कहयित, गाय बछरा अति घने; शब्द होत है मथनको यह उल्लास रसिक मन गमे । (३) सखी यूथको हे बिस्तारा, वाकी गिनती न आवे पारा; मेघ बूँद ओर रविकी किरनी, श्रीपुरुषोत्तमलीला कौन बरनी। शेष महेशन ध्यान समाधा, कविजन रंक
Malav
Kaho kense keeje hoe aise kaptin koo vishvaas .. ekanke
NityaPad-124
कहो केंसे कीजे हो ऐसे कपटिन को विश्वास ॥ एकनके चित्तलेत चोरकें एकन लेत उसास ॥॥|१॥ जो कोऊ मान करत ताहि मनावत चेरीव्हे रहें तासों होत उदास ॥ रसिक-प्रीतमकी जानी नपरे हांसी कीथों उपहास ॥२॥
Bihagaro
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