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Sheetkal Ke Pad
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Kirtan Title | Page | Kirtan | Raag |
|---|---|---|---|
Main jaba jaanoongi sudhar khilaiya horry khelan | Part3-334 | मैं जब जानूंगी सुधर खिलैया होरी खेलन
मेरें आबोगे ॥ हमरी चुनरीया रंगनिभिजोई अपनी पाग बचाओगे ॥१॥
चोवा चंदन अगर अरगजा मृगमद सोंधो उडाओगे ॥ जाऊं लाल बलिहारी
तिहारी अपुनो कीयो पाओगे ॥२॥ | Kanharo |
Nandrani suta jaayau maharike mandir begg chalauri .. chully jaau | Part1-043 | नंदरानी सुत जायौ महरिके मंदिर बेग चलौरी ॥ चली जाऊ
वह वाट सामई जाकी ऊँची पौरी ॥१॥ सोने सींक धरौ लै साधिये चंदनसों
चरचौरी । बंदनवार द्वार द्वारन प्रति बीच आमकी मौरी ॥२॥ दिये महावरी
पॉयन चायन नाइन लै लै दौरी ॥ उठी सदनते बसन सँभारौ भूषन सबे
सजौरी ॥|३॥ आवो गावो बैठो सब मिलि पूजो शंकरगौरी । ब्याह बधाये
काज पराये विलंब न कीजे बौरी ॥४॥ नाचत बिर्ध तरून और बालिक बीच
बीच लरकौरी ॥ चोबा चंदन बंदन दीये दीये केसरखौरी | सकल उछाह भयौ
या ब्रजमें भाजि गयौ सब भौरी । जनगोविंद वीर बलभद्रकी सबहिन लागी
ढौरी ॥६॥ | Sarang |
Aaj suhaayau ree maaee . dekhat hott param sukhdai ..1.. | Part1-037 | आज सुहायौ री माई । देखत होत परम सुखदाई ॥१॥
महरि यशोदा ढोटा जायो । आनंदरायकों वंश बढायौ ॥२॥ सगरे घोख
कुलाहल भारी । गृहगृहते निकर्सी ब्रजनारी ॥३॥ सुंदर मांग जटित नग टीके।
प्रफुलित बदन लगत हैं नीके ॥४॥ मोतिनहार भार आनंदके । भायन लहरि
उठत हिय उनके ॥५॥ मंगलथार जटित कर लीने । गावत गीत घोर सुर
- कीने ॥६॥ बेगिबेगि पग धरत उताल | देखे आय रायजूके लाल ॥७॥
धन्य घरी यह पूत हौनकी । धन्य कूखि जसुमति सौनकी ||८॥ जसुमति हम
तुम पर बलिहारी । अपने कुलकी करी रखवारी ॥९॥ नाचत ग्वाल गोप
: रसगावें । फिरफिर नंदमहरजूके आवें ॥१०॥ दध्ि माखनके मॉट उठावें नरनारिनके सीस नवावें ॥११॥ फूले फिरत सबै रंग भीने । उतारि भूषन
वसन बहु दीने ॥१२॥ बैठे रायजू वेद पढावें । अपने लालके नक्षत्र
दिखावें ॥१३॥ पाँय पूँजी विप्र पहराये | दीये दान आप मन भाये ॥१४॥)
फिरि हसिकें वृषभान बुलाये । और सब लरिका गोप उठाये ॥१५॥ पहराये
भान गोप जे राजा । कहत किये तुम पूरन काजा ॥१६॥ ढाठी मागध चारन
बोले | गहने चीरन देत अमोले ॥१७॥ फिरि सारी अति सुरंग मंगाई ।
ब्रजसुंदरि सगरी पहराई ॥१८।। सबहिनके कीये सनमान । बैठे राय महाबल
दान ॥१९॥ कोरेन साधथिये वंदन वारे । झूमि रहे सबहिनके द्वारे ॥२०॥
सुनि गायनके ठाठ मंगावें । विधि करिके विग्रनको दिखावें ॥२१॥ वीथी
प्रेमनदी छबि पावें । नंद सदन सागरको थावें ॥२२॥ श्रीविह्ठलगिरिधर निधि
रासी । फूलि गये सगरे ब्रजवासी ॥२३॥ | Dhanashri |
Raas rachyaun mohanlal shobhit sanga vrajaki baal voondaavan | Part1-353 | रास रच्यौं मोहनलाल शोभित सँग व्रजकी बाल वूंदावन
यमुनातट रसिक रसिकनी ॥| चरण गति अनेक भाँत कटि की लचक मध्य
चमकत श्रुति भेद ग्रीवा लटक भ्रूह मटकनी ॥१॥ नयन कटाक्ष हावभाव
उपजत अति रंग चाव सकल क़ला निपुण सरस कामरंगिनी ॥ गान करत
कुंभनदास गिरिधर मुख मंद हास थकित भये युवती यूथ प्रेमफंदिनी ॥२॥। | Kedaro |
Vijay-sudin anand adhik chhavi mohan busson birajat . | Pustak1-317 | विजय-सुदिन आनंद अधिक छवि मोहन बसन बिराजत ।
सीस पाग रही बाम भाग पर लटकि जबारे छाजत ॥
तिलक तरल द्वै रेख भाल पर कुंडल-तेज तरनि द्वै काननि |
मुख की सोभा कहाँ लौ बरनों मगन होत मन माननि ॥
कटि-पट छुद्र-घंटिका मनि-गन सोहत जोहत मोहत ।
परमानंद! निरखि नंद-रानी लेति बलैया दोऊ हत ॥ | Saarang |
Huttery baithe sritrajanath .. | Part2-063 | हटरी बैठे श्रीत्रजनाथ ॥
अपने अंग सखा सब लीने बॉाँटत मेवा हाथ ॥१॥
भांत भांत पकवान मिठाई विधसो धरे बनाय ॥
चलो सखी देखन को जईये सुख शोभा अधिकाई ॥२ ॥
आरती करत हे देत न््यौछावर मन आनन्द बढाय ॥
नंददास कुसुमन सुर बरखत जे जे शब्द कराय ॥३ ॥ | Bilawal |
Daan maangatamen merrie munn hari liau kanhai . moodu musikaay | Part1-232 | दान माँगतमें मेरी मन हरि लियौ कन्हाई । मूदु मुसिकाय
चपल दूगनतें अति बेधत हैं माई ॥१॥ अंग अंग आतुर अति सजनी रसना
कहत न आई । हँसि पटपीत गह्मौ जब प्यारी सो रस सिंधु न समाई ॥२:'
अति रनधीर परस्पर दोऊ क्यौंहूँ मन न अधाई ॥ श्रीविद्दनगिरिधरन रसिकवर
किहि विधि कौन लखाई ॥३॥ | Bilawal |
Prathamahi bhadonmas ashtami rohini budhwari . pragate kookhi | Part1-028 | प्रथमही भादोंमास अष्टमी रोहिनी बुधवारी । प्रगटे कूखि
महरि जसोदाके लाडिले गिरिधारी ॥१॥ सुनि ब्रज जुबती अपने श्रवनन जहाँ
तहाँते धाई । मंगल थार धरैं हाथनपर गावति गावति आईं ॥२॥ मंडित बारे
धरत साथिये रोपति बंदनमाला । पॉयन परत कहत रानीसों भले जने तुम
लाला ॥३॥| करत बधाई जसुमति माई मगन भई रस भारी तुम्हारी कूखि पर
हम नंदरानी वारिवारि सब डारी ॥४॥ बाजत थारी और मृदंगा और बाजतहै
ताला । हरद दहीकी कांवरि लै लै आये गोप गुवाला ॥५॥ बैठे फूल तबे नंद अतिही सबहिन देत बधाई । हरी हरी दूब विप्र भाटन लै रायजूके सीस
धराई ॥६॥ विनती करत कहत रायजूसों धन्य जन्म विधि कीयौ । ऐसौ सुत
प्रगट्यौ तुम्हे गृह आज सुफलहै जीयो ॥७॥ नाचत गावत करत कुलाहल
मगन भये रस भारी । फिरिफिरि पहरि हुलसि दैवेकों भूषन बसन उतारी ॥८॥
दीने दान विप्रभाटनकों माला मुदरी चीरा | रतनजड़ित कुंडल पहराये मोती झलकत
हीरा ॥९) आनंद रस उच्छाह भावसों सब ब्रज उमग्यी आज । फूले डोलें
यह मुख बोलें पुत्र भयौ व्रजराज ॥१०॥ त्तब नंदरानी अपनी सखिनसों आनंद
राय बुलाये । पूरन भाग चुंबत रस आनन विहँसत भीतर आये ॥११॥ हँसि
करि बोली जच्चा सुहागिन आओ पिय मन भाये । बैठि मतो करिये विलसनकों
हम घर लालन आये ॥१२॥ चरूवा चढावनकों पिय मेरी पहलें सास बुलावौ।
रतनजटित गादी मूढ़ापर आनि के बैठावों ॥|१ ३॥! चरुवा चढ़ावनको नखसिखलो
आभूषन पहिरावी । भांतिभांतिके चीर पारटंबर इतनी बेर मंगावों ॥१४॥
साथिये धरनकों ननद हमारी तुम पिय बोलि ले आवो । रतनजटित अपने सिंघासन
आनिके बैठावों ॥१५॥ साधथिये धरनकों नेग बोहोत है सो दीजे मनभायों ।
तातें कहत सुनों पिय तुमसों यह दिन क्योहूँ पायो ॥१६॥ हँसि व्रजराज कहत
रानी सों याते, चौगनो देहें | ऐसौ सुत तुम जाय दिखाये देतहू न अपैहें ॥|१७॥
चंद्रावली व्रजमंगल राधे करिकरि लाड बुलावी। उनहींके भागि दियौ फल हमकूँ उनहीं
पै मेंडवावो ॥१८॥ हमही तुमही लालन लेकें उनकी गोद बैठावों | उनको
चीत्यो भयो हमारें लालै तुमहि खिलावी ॥१९॥ और पिय मेरी द्योगानी जिठानी
आदर दे बोलि लावी | भातिभोति सारी आभूषन सबहीकों पहरावो ॥२०॥
वैला भरिभरि दाम मँँगावो देहु रोंहिनी हाथा । हँसिहँसि खरचै रानी रोंहिनी जाकी
सिरानी गाथा ॥२१॥ गाढ़ा भरिभरि सोंजपंजीरी इतनी बेर मंगावी । गुड़,
घी, दाख खुरेरी मेली पंजीरी बहोत सनावी ॥२२॥ भरिभरि मेरी दयोरानी
जिटानी हँसिहँसि करिकें लैहैं । यह दिन हम को दियो विधाता देखिदेखि सुख
पैहें ॥३३॥। हैँसि ब्रजरायजू बाहिर आये माय बदनि बोलि लाये ॥ सगरी सोंज धरी लै आगें करी आप मन भाये ॥२४॥ सास नवलदे चरुवा चढ़ावै
आछे चीति बनाये । झांकिझांकि देखत नंदरानी चरुवा बहोत मन भाये ॥२५॥
सोना मोती हीराके सब आभूषन पहराये । हँसिहँसि पहरे सास नवलदे केऊक
जोरी मंगाये ॥२६॥ बेटी श्यामदे धरत साथिये आछे मोरि संभारे । मोतिनके
अक्षत कुमकुम लै चीत किये उजियारे ॥२७॥ गुड़ घी पूणि सात सींकनसों
बुहूँ ओर चिपकाये । सथियनकौ उद्योग देखिकें रानीजू बहोत सिहाये ॥२०॥
देत भतीजेकों झगुली कुलही और हाथनकों चूरा । खयवरिया कठुला लटकन और
पॉयनको पनसूरा ॥२९॥ इतनौ दैकरि मानदे श्यामदे रामदे झगरो ठान्यौ ।
तुमरो देन सुनों वीर मेरे एकौ नहीं मन मान्यों ॥३०॥ हँसि व्रजराज कहत
बहननिसों कहो कहा अरु दीजे । बांह पकरिकें कहत रामदे कह्मो बीर मेरो
कीजै ॥३१॥ लैहैं भाभीजूकी पायल ते हैं अति बहु मोली । रानीजूको बंटा
लाय आय रायजू खोली ॥३२॥ तुमारी ननद हठीली छबीली ते क्योंहूँ नहीं
मानें । बोलि लई पास भाभीजू दे करिकें मुसकानें ॥३३॥ भाँतिभाँति सारी
आभूषन तुम हम सब पहरायी । मोहों माँग्यी सो दीयौ बधाई जो हमरे मन
भायो ॥३४॥ तुम्हरे घुरसारको अलल बछेरा सो छोरि हों लैहों | बहुत ठाठ
गाय भैंसनिके इतनों लै घर जैहों ॥३५॥ दीने ठाठ गाय भैंसनिके अरु दीने
रथ जोरे । घोड़ाघोड़ी बछेरा बछेरी बहु दीने खोलि डोरे ॥३६॥ गाड़ा भरिभरि
सौनों दीनों दीने मोती हीरा । कै लख गाम दिये अनगिनती ऐसे राय जू
बीरा ॥३७॥ मुरि करि बेटी श्यामदे एक होंस वीर मेरें । रत्नजटित सुखपाल
मंगावो जैहें आछी तेरें ॥२८॥ इतनी सुनि आनंद रायजू दियो सुखपाल मंगाई।
तामें बैठी बेटी श्यामदे भततीजेको नेग चुकाई ॥३९॥ इतनों लै करि चली
श्यामदे मुर्मुरि देत असीसा आनंदराय कुँवर बलि गिरिधर जीवौ कोटि
बरीसा ॥४०॥ बीरन मेरे जग उजियारे भाभी कुल उजियारी । चित्र विचित्र
कूखि यशोदाकी जिन जायो गिरिधारी ॥४१॥ सोने कूखि मढ़ाय यशोदा
प्रगट्यौँ सुखदाई ॥ श्रीविद्डलगिरिधरनलाल पर बारबार बलि जाई ॥४२॥ | Asawari |
Bhojan kunjabhavanmein bhaanvate karat bhale nanabhavanason . | NityaPad-214 | भोजन कुंजभवनमें भांवते करत भले नानाभावनसों ।
अरसपरस कौर मधुररस देत समीर चलें चायनसों ॥१॥।
तब हट करत हठीली हठसों पिय पसरत दृग पायनसों ॥
करत पानरस रूपमाधुरी हिलमिल चलत सुभायनसों ॥२॥ | Saarang |
Kaapar dhota karat thakurai .. tumate ghaat kaun yaa vrajmein | Part1-258 | कापर ढोटा करत ठकुराई ॥ तुमते घाट कौन या ब्रजमें
नंद हू तें वृषभान सवाई ॥१॥ रोकत घाट बाट मग बनकौ ढोरत माँट करतहो
बुराई ॥ निकस लैहो बाहिर ह ोत हो लंपट लालच कीयें पत जाई ॥२॥
जान प्रवीन बड़े के ढोठा सुध तुम कहा बिसराई ॥ .परमानंददासको ठाकुर ले
आलिंगन गोपी जाई ॥३॥ | Kanharo |
Hari sanga horry khelani aanee .. chandrabhaga, | Part3-124 | हरि सँग होरी खेलनि आँई ॥ चंद्रभगा,
चंद्रावलि भांमा, राधा परम सुहाई ॥१॥ चोवा चंदन अगर कुँमकुमा सुरंग
गुलाल उड़ाई ॥ रतन-जटित पिचकाईन भरि भरि छिरकति कुँवर-कन्हाई
॥२५॥ ताल, मृदंग, पटह ढ़फ बाजै, घोष नगारे घाई॥ श्री मंडल सहनाई
सुंदर बिच बिच बैनु बजाई ॥३॥ अरस परस खेलति पिय प्यारी, उपमा
बरनि न जाई | “सूरदास” बलि जाई बदन की निरखि निरसि मुसिकाई ॥8॥ | Bilawal |
Deepdan vrajraj deit douu dhotanakon god baithaari .. | Part2-059 | दीपदान ब्रजराज देत दोऊ ढोटनकों गोद बैठारी ॥
दीपदानकी होत आरती मंगल गाबत सब ब्रजनारी ॥ १ ॥
दीपदान शोभित भवनन पर धरत-फिरत खिरकनमें ग्वाल॥
लाल कहत बाबा तुम देखो जानो पहराई कंचन माल॥२॥
यह त्योहार दिवारीको सुख मानत नंद गोपब्रज लोग ॥
नानाभांतके करत रहतहें अपअपने मन भाये भोग ॥३ ॥
हटरी भरत नंदजूकी रानी मेवा सब पकवान मिठाई॥
हसत हसत गृहगृहकी सुंदरि सोदा करन लालसों आई॥४॥
देखत फूलत माय बवादोऊ अनगिनती नोछावर वारी॥
हटरी बैठे यों राजत हें श्रीविद्ुलगिरिधारी ॥५ ॥ | Kah hage |
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