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Sheetkal Ke Pad
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Kirtan Title | Page | Kirtan | Raag |
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Syaam dhuthaunna kaun kaun jaake ghoonghvaare baar | Part3-260 | स्याम ढुठौंना कौन कौं जाके घूँघ॒वारे बार
सखी री ॥श्रु ०) सखी री मोर मुकुट माथें धरे अरू मृममद-तिलक सुचारु ॥
करनफूल कानन बनें उर गज-मुक्ता हार सखी री ॥१॥ मोर मुकुट कर
बांसुरी, अरु पीतांबर करि फैंट॥ गोरस बेचनि जाति ही मोसों भई अचानक
भैेंटि ॥१॥ सखी री भोर भवन तैं उठि चली नंद-महर की पौरी ॥ छैल
छबीलौ छोहरा छीन लीयौ च ित चोरी ॥३॥ सखी री कहा करी केसे मिलें
किह्ि मिसि देखनि जाऊँ ॥ सखी री चितवत ही चोरी लगे इह ब्रज एसों
गाँऊँ ॥४॥ बिन देखें तन तरसैं ही अरू रुचे न भोजन पान ॥ मों मन
जैसी बीत हीं सो जानति “जन भगवान! ॥५॥ | Sarang |
Lalit labang lataa parisheelan komal malay sameere .. | Part3-008 | ललित लबंग लता परिशीलन कोमल मलय समीरे ॥
मधुकरनिकर करंबित कोकिल कूजित कुंज कुटीरे ॥१॥
विहरत्तिहरिरिह सरसवसंते ॥
नृत्यति युवति जने न सम॑ सर्व विरहि जनस्य दुरंते ॥भ्रु०॥
उन््मद मदन मनोरथ पथिक वधूजनजनित विलापे ॥|
अलिकुल संकुल कुसुम समूह निराकुल बकुल कलापे ॥ २॥
मृगमद सौरभरभस वशं वदनवदल मालत माले ॥
युवजन हृदय विदारण मनसिजनखरुतचि किंशुक जाले ॥३॥
मदन महीपति कनक दंड रुचि केसर कुसुम विकासे ॥
मिलित शिलीमुख पाटपिटल कृत स्मरतृण विलासे ॥४॥
विगलित लज्जित जगदव लोकन तरूण करुण कुंतहासे ॥
विरहि निकृंतन कुंत मुखाकृति केतकिदंतुरिताशे ॥५॥
माधविका परिमल ललिते वनमालिक याति सुगंधौ ॥
मुनिमनसामपि मोहन कारिणि तरुणा कारण बंधौ ॥६॥
स्फुरदति मुक्तलता परिरंभण मुकुलित पुलकितचूते ॥
वृंदावन बिपिने परिसर परिणत यमुनाजल अति पूते ॥७॥
श्रीजयदेव भणितमिदमुदयत्ति हरिचरण स्मृतिसारं ॥
सरस वसंतसमय वनवर्णनमनुगत मदन विकार ॥८॥ | Basant |
Kesar phool beenat radha gori .. bhori sanga sahchari baari .. | Part1-276 | केसर फूल बीनत राधा गोरी ॥ भोरी संग सहचरी बारी ॥
जिनके अंग सुगंध केसर की अर केसररंग सारी ॥१॥ जिनके तन वरन
केसरकौ केसर पखुरी अंगुरिन पर बारी || नख प्रतिबिब देख केसरकों भूल गई
सुध सारी ॥२॥ बनहीं बन आये गिरिथर जहाँ बिहार करत सुकुमारी ॥
जीवन गिरिधर सखी रूप धरिं केल करत मनुहारी ॥४॥ | Hameer |
Aaj ayodhya manjhbadhai.. dashrath sadan | Part2-258 | आज अयोध्या मांझबधाई।। दशरथ सदन
चैत्रसुदि नौमी दिन प्रक टे संतन सुखदाई ॥१ ॥
वडभागिनी कोशल्यारानी जाकी कूख भये रघुराई॥
अमरलोक यह लोगन आबंत उर आनंद न समाई ॥२॥
सत्यलोक संताप हरण भूभार उतारन आयो माई॥
मर्यादा पुरुषोत्तम लीला प्रेम मुदित गोकुलचंद गाई ॥३ ॥ | Saarang |
Neeko banyon gokul gaam suhavanon jahaan khelat | Part3-139 | नीको बन्यों गोकुल गाम सुहावनों जहां खेलत
हरि होरी ॥ इत्तही सकल व्रजके बालक सब झुंडन जुरि आई तरूनी सब
तिनमे राधा गोरी ॥ १॥ विविध भांति बाजेबाजत नवकेसरि अरणजा कुंकुम
घोरी ॥ रतन जटित पिचकाई करणगह्ि छिरकत तकि तकि मुदित परस्पर
नवल किसोर किसोरी ॥२॥ यह विधि करि खेलत रस सिंधु तरंग भरी ब्रज खोरी ॥ मोही अमर वधू निरखत बरखत कुसमन रघुबीर फिरत संग
भरि भरि बीरा झोरी ॥३॥ | Todi |
Laalan kahaa aisein bahlawat .. jaanat naanhi vyadha kahuki | Part1-233 | लालन कहा ऐसें बहलावत ॥ जानत नांहि व्यधा काहूकी
चतुरन माँझ कहावत ॥१॥ यह मन राच्यौ याही छबिसों छिनु इत उत न
डुलावत ॥ श्रीविद्लगिरिधरन रसिक द्रै कहा मनुहार करावत ॥२॥ | Bilawal |
Merey anga sanga lagyo saanvaro moh rangmein daarat | Part3-198 | मेरे अंग संग लाग्यो सांवरो मोह रंगमें डारत
बोररी ॥ मोरमुकुट वैजयंतीमाला वाके माथे चंदनखोररी ॥१॥ ब्रजकीवधू
सब खेलन आंई सबनमें पडी होडा होडी ॥ कृष्णजीवन लछीरामके प्र भुसों
बहुतभई झकझोरा झोरी ॥२॥ | Kaafi |
Karat keli keeyo sub bhojan |... | NityaPad-221 | करत केलि कीयो सब भोजन |॥।
उठत भगे सब लरिका ब्रजके अचवन कीजें हो सुख सोधन॥।१॥
बहु बिंजन खाए ब्रजवासिन ओर खाए दधि ओदन।
आसकरन जूठन मग जोवत बल बल चंदन खोरन।२॥ | Saarang |
Chadhbadh widder gaee angang manveli terein sathani .. | NityaPad-321 | चढबढ विडर गई अंगअंग मानवेली तेरें सथानी ॥
हृदय आलवाल मध्य प्रकटभईरी आली प्रीतिपालीनीके कर छिनछिन रूसबो भयोपानी ॥१॥
कौनकौन अंगनते निरवारोरी आली अल क तिलक नथनन बैनन भ्रोहसों लपटानी ॥
नंददासप्रभु प्यारी दूतीके वचनसुन छबीली राधे मंद मंद मुरमुसकानी ॥२॥ | Kanharo |
Chhoote bund sondhe soun lapatai teddy teddy pagiya munn mohe. | NityaPad-318 | छूटे बंद सोंधे सों लपटै टेडी टेडी पगिया मन मोहे।
कंचन चोलना यह छबि निरखत काम बापुरो को है ॥१॥
लाल इजार गरे बममाल गुंजमाल श्रुति कुंडल सोहै।
रसिक रसाल गुपाल लाल गढ़यों कीमत कीमत जो है॥२॥ | Adano |
Nandju merey munn anand bhayau suni govardhan tein aayou | tuhaaren | Part1-117 | नंदजू मेरे मन आनंद भयौ सुन ि गोवर्द्धन तें आयौ | तुह्ारें
पुत्र भयो हों सुनिकें अति आतुर उठ धायी ॥१॥ बंदीजन और भिक्षुक सुनि
सुनि देश देशतें आये । एक पहलेहीं आशा लागत बहोत दिननके छाये ॥२॥
तुम दीने कंचन मणि मुक्ता नाना बसन अनूप । मोहि मिले मारगमें मानों जात
कहूँ के भूष ॥३॥ दीजै मोहि कृपाकरि सोई जो हों आयौ मॉगन । जसुमतिसुत
अपने पायन चलि खेलन आवै आँगन ॥४॥ कोटि देहूं तो पर्यौ रहुँगो बिनु
देखे नहीं जाऊँ । नंदराय सुनि बिनती मेरी तबही बिदा भलें पाऊं ॥५॥ तुम
तौ परम उदार नंदजू जो मॉौग्यो सो दीनौ | ऐसी और कौन त्रिभुवनमें तुम सर को
को कीनौ ॥६॥ मदनमोहन मैया कहि बोलें यह सुनिके घर जाऊँ। हों तौ
तुहारे घरको ढाढ़ी सूरदास मेरी नॉऊँ ॥७॥ | Dhanashri |
Poot bhayauri nandke sub nachou gaavau gwaliri . badat naan kaahu | Part1-048 | पूत भयौरी नंदके सब नाचौ गावौ ग्वालिरी । बदत न काहू
परस्पर आलीरी बारत हाटक लाल ॥१॥ हरद दूब दि चंदन छिरकत प्रकट
भये गोपाल | चतुर बिहारी भक्तन हित कारन गोकुल आये परम कृपाल ॥२॥ | Sarang |
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