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Sheetkal Ke Pad
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Kirtan Title | Page | Kirtan | Raag |
|---|---|---|---|
Vandon charan saroj tumhare .. sunder shyam kamal dall lochan | Part1-083 | वंदों चरन सरोज तुम्हारे ॥ सुंदर श्याम कमल दल लोचन
ललित त्रिभंगी प्रान पियारे ॥१॥ जे पद पद्म सदासिव कों धन, सिंधु सुता
रउर तें नहि टारे ॥ जे पद पद्म तात रिस ब्रासत मन वच क्रम प्रहलाद संहारे
॥३॥ जे पद पद्म फिरत वृन्दावन अहि सिर धरि अगनित रिपु मारे ॥ जे
पद पद्म परस ब्रज जुबती सरबसु दे सुख सदन बिसारे ॥३॥ जे पद पदूम
लोकत्रय पावन सूर सूरि दरस कटत अध भारे ॥ जे पद पद्म परसि ऋषि पत्नी
मृग अरु व्याध अमित खल तारे ॥४॥ जे पद पद्म फिरत पंडव घर दूत भये
सब काज संवारे ॥ जेई पद पंकज 'सूरदास” सुख करन बचन अहि फन प्रति
धोरें ॥५॥ | Kanharo |
Sudin savaarau shodhiken lalju bhojan keejai | kuldevta manai | Part1-140 | सुदिन सवारौ शोधिकें लालजू भोजन कीजै | कुलदेवता मनाई
हरखसों यह मानि मन लीजै ॥१॥ ब्राह्मण भोजन और दक्षना अति आदरसों
दीजै । आशीर्वाद देत सबै मिल मन इच्छित फल लीजै ॥२॥ यह बाढ़ौ बेलि
का कड़ेंते लोचन पुट अमृत रस पीजै । परमानंद कहत नँदरानी देखि देखि मुख
जै. ॥३॥ | Saarang |
Aho ! naindrani kau bhaagya badau kahaan jaun barnyon jaaee . teen | Part1-045 | अहो ! नैंदरानी कौ भाग्य बड़ौ कहाँ ज्ौं बरन्यों जाई । तीन
भुवन जाके बंधन में तिहिं हरि सुभग कर राखी बँधाई ॥ नाना विधि के भोग
बनाए सबै स्वादु रस सों अधिकाई । चिरजीयौ जसोदा ! पूत तिहारी कछुक जूठन
'परमानेंद! पाई ॥ | Sarang |
Pragatbhaye srivallabh aaj.. madhavmas | Part2-299 | प्रगटभये श्रीवललभ आज॥ माधवमास
कृष्णएकादशी मंगल लग्न महूरतराज ॥१॥ घरघर बंदन तोरण माला
युवतिन साजे मंगलसाज ॥ गावतगीत पुनीत महारस अति आनंदित भक्त
समाज ॥२॥ ब्रह्मादिक सुरनर मुनि हरखे व्हैहें सकल हमारे काज॥
मायावाद दुखी उद्धारे बेद विहित सबहिन शिरताज ॥३ ॥ कलिके अधम
उद्धारण कारण अब दृढ बंधी प्रेमकी पाज॥ अभयदान श्रीलक्ष्मण नंदन
राखे जात यमराज॥४॥ यह अवतार कृष्ण मुख रूपी करिकरुणा
त्रिभुवन शिरताज॥ चाहत चरण सदा श्रीवल्लभ वसो निरंतर
श्रीत्रजराज ॥५ ॥ | Sarang |
Duhundish chhor dumalo kii atee neeki param suhai.. | NityaPad-177 | दुहुँंदिश छोर दुमालो की अति नीकी परम सुहाई।।
गोधन संग बनते ब्रज आवत नागर कुंवर कन्हाई ।॥।१॥|
मुरली अधर धरे नंदनंदन मधुरीसी तान बजाईरी माई ॥
गोपीजन के जूथराधिका श्रवन सुनत उठ धाईरी माई ॥।२॥
गोकुल गलिन प्रवेश होत हे देखत अंगन समाईरी माई ॥
कुसुमकली बरखत सुर पुर परमानंद बस जाईरी माई ।। ३॥ | Gori |
Aarti karati jasumati mudit laal koo. deep adbhut joti, | NityaPad-109 | आरती करति जसुमति मुदित लाल को। दीप अद्भुत जोति,
प्रगट जगमग होति, वारि वारति फेरि अपनें गोपाल को ॥| बजत घंटा ताल,
झालरी संख-धुनि, निरख््रि प्रज-सुंदरी गिरिधरन लाल को । भई मन में फूलि,
गई सुधि-बुधि भूलि, छीत-स्वामी' देखि जुवति-जन-जाल को ॥ | Kanharo |
Srigovardhangiri kandara mein bhojan | NityaPad-215 | श्रीगोवरधनगिरि कंदरा में भोजन
करत है पिय प्यारी । आसपास जुवति सब राजत देत परस्पर कर मनुहारी ॥ १॥
सखिन के भावकी सामग्री लेत श्री ललिता निहार निहारी । कुंभनदास प्रभु
लाल गिरिधर को देत श्रीराधा प्यारी ॥३॥ | Saarang |
Khelat madan gopal vasant .. | Part3-046 | खेलत मदन गोपाल वसंत ॥
नागर नवल रसिक चूडामनि सव विधि सुघर राधिका कंत ॥ १॥
नेन नेन प्रति चारु विलोकन बदन बदन प्रति सुंदर हास ॥
अंगअंग प्रति प्रीति निरंतर रति आगम निसजाई विलास ॥ २॥
वाजत ताल मृदंग अधोटी डफवांसुरी कुलाहलकेलि ||
परमानंदस्वामीके संगमिलि ॥ नाचत बागत रंगरेलि ॥३॥ | Basant |
Kabaten chully yeh reeti rahat panghat parr thaado .. | NityaPad-275 | कबतें चली यह रीति रहत पनघट पर ठाडो ॥
जाति पांति कुल कौन बडो है दसेक गैया बाढो ॥॥१ ॥
नंदबाबा जिन ऐसे सिखये जो करि अँखि मोहुकों काढो ॥
नन्ददास' प्रभु जैसे मृगी लों रूप गढो प्रेम फंदा गाढो ॥२॥ | Kanharo |
Shree vallabh kulmandal jan ranjan sukhakaari .. | Part3-041 | श्री वललभ कुलमंडल जन रंजन सुखकारी ॥
श्री विट्ठलनाथ पधार्या पोते गिरि गोवर्धनधारी ॥१॥ एकरूप बहुरूप धरीने
लीला बहु विस्तारी ॥ नित्य नित्य लीला नौतन भासे हरिदास बलिहारी
॥२॥ | Hindool |
Mohi jalbharan dere kanhaiya .. | NityaPad-269 | मोहि जलभरन देरे कन्हैया ॥
और नागर सब गागर लेगंई मोहि रोकतहै घरमग जोवे मेरीमैया ।। १ ॥।
मेरोकह्यों तूमानलेहो मोहनसुनहो कुंवर बलदाऊजूकेभैया ॥
कुंवरसेन के प्रभु आनहीं कीजे हौं तोतेरी लेहों बलैया ॥२।। | Bilawal |
Nagri nagarason milli gawat raasmein sarang raag jamyau .. taana | Part1-328 | नागरी नागरसों मिलि गावत रासमें सारंग राग जम्यौ ॥ तान
बंधान तीन मूर्छना देखत बैभव काम कम्यौ॥ अद्भुत अबधि कहाँ लगि बरनों
मोहन मूरति बदन रम्यौ ॥ भजि क्ृष्णदास थकित नभ उडुपति गिरिधर कौतुक
दर्ष दम्यी ॥२॥ | Saarang |
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