top of page
Sheetkal Ke Pad
To get full expanded Kritan text click on any column of the kirtan row in below table.
Kirtan Title | Page | Kirtan | Raag |
|---|---|---|---|
Kanakkundal kapolmandit gaurajachhurat sukesh .| madgaj chaal | NityaPad-106 | कनककुंडल कपोलमंडित गौरजछुरत सुकेश ।| मदगज चाल
चलत सुरनर मुनि लाडिले ब्रज कुंवर नरेश ।॥९॥ नयन चकोर किये ब्रजवासी
पीवत बदन राकेश ॥ अतिप्रफुल्लित मुख कमल सबनके
गोपकुलनलिनदिनेश ।।२॥ अतिमदतरण विघूर्णित लोचन अतिविकसत कृपा
आवेश॥ चलत मधुर वरषत गोविंदप्रभु ब्रज द्वारेंद्वारें प्रवेश ॥। ३।। | Gori |
Kunjamen viharat yugal | NityaPad-229 | कुंजमें विहरत युगल
किशोर॥ यह अचंभों देख सखीरी उग्यों चंद विनभोर ॥९॥ तहां घनस्याम
दामिनी राजत द्वैशशि चार चकोर ॥ अंबुज खंजन मीन मधुपमिल क्रीडत
एकहि ठोर ॥२॥ तहां द्रै कीर बिंब फल चाखत विद्गुम मुक्ता जोर ॥ बार
मुकर आनन पर झलकत नाचत सीस न मोर।। ३॥। तामें अधिक अधिकतामहिया
वीस कमल इक ठौर ॥ हेमणिलालताही द्वैफल मान देत अकोर ॥४॥ कनक
लता पर नीलमणि राजत उपमा कहा कहूं कछू छोर ॥ सूरदासप्रभु यह विधि
क्रीडत ब्रजजुवतिनके चितचोर ॥५॥ | Saarang |
Aaj payaane kau dinn neekau .. kushal keli air kreedat haye poonjive manorath jeeki ..1.. | Pustak1-316 | आज पयाने कौ दिन नीकौ ॥ कुशल केलि एर क्रीड़त है पूँजिवे मनोरथ जीकी ॥१॥
अतुलित बल अतुलित सेना में हनूमान सिर टीकौ ॥
जाम्बवान सुग्रीव नील नल अंगद बाल बलीकौ ॥२॥
विजय दसमी और सींग दाहिनौ बाँयौ घर जोगिनीकौ ||
दिशाशूल मारत पाछे तें रावण मरण सहीकौ ॥३॥
शुंगी ऋषि मुन्रि इष्ट करत हैं जोड़ा कर कोटीकौ ॥
अग्र स्वामि कारज सब सरिहे उतरे भार महीकौं ॥४॥ | Saarang |
Rung bhar khelat hein hari horry .. ratna jateet | Part3-334 | रंग भर खेलत हें हरि होरी ॥ रत्न जटीत
पिचकाई कर लीये छिरकते नवल किशोरी ॥१॥ ललिता प्रीतम को मुख
मांडत केसरसों रंग बोरी ॥ विचित्र व िहारि विहारिन परस्पर आनंद सिंधु
झकोरी ॥२॥
| Kanharo |
Tere lochan laachan mott .. prananathakon munn chitenchorat dey | NityaPad-114 | तेरे लोचन लाचन मोट ॥ प्राणनाथकों मन चितेंचोरत दे
घूंघटकी ओट ॥१॥ गिरिधर पियके नयन सन्मुख मिले करत रसघोट ॥ सुन
कृष्णदास निरख बल इनकों न्याय लजत मनटोट ॥ २॥। | Adano |
Sub vrajgopi rahee takitak .. | NityaPad-203 | सब ब्रजगोपी रही तकिताक ॥
करकर गांठ लसत सबहिन के बनको चलत जब छाक ।।१॥ मधुमेवा पकवान
मिठाई घरघरा ले निकसीं थाक ॥ नंददासप्रभुको यह भावत प्रेमप्रीतिके
पाक ॥२॥ | Saarang |
Arekaare pyaare ratnare bhora badan kamalke lobhi .. | Part3-149 | अरेकारे प्यारे रतनारे भोरा बदन कमलके लोभी ॥
फिरत पराम डेततबहीते उपजत कलिकागोभी ॥१॥ . फूलरहे द्वुम डारडार
झुक भारकुसुम मकरंद ॥ ताहि छांड पियो चाहत तुम सुधाकिरण मुखचंद
॥२॥ जो तूहोहितृषा आतुरतो रहिब अलक लरलाग ॥ पुनि विश्राम कियो
चाहेतो चिबुक गाढ खणखाग ॥३॥ जो उन्मत्त गान करें तो श्रुतिषणथ लग
गुंजार ॥ क्यों भठकें ब्रज बन वन वीथन यह निश्चय उरधार ॥४॥ | Singhadoo |
Hari bhajan mein kahaa chahiyat haye naine shravan rasna pada paan. | NityaPad-369 | हरि भजन में कहा चहियत हे नेन श्रवन रसना पद पान।
एसी संपत जान मिली हो जो न भजे ताकुं बड़ी हान ॥ हरि.॥
पूरब पुन्थ सुकृतनको फल अति दुर्लभ मानुष अवतार।
पाप पुन्य जाते जानि परत है उपजत हे ब्रह्मज्ञान । हरि.॥।
गुरु कर्णधार पोत पद अंबुज भवसागर तरवेके हेत ॥
प्रेरक पवन कृपा केशवकी परमानंद चित चेत ।। हरि.॥ | Kanharo |
Praat uthat urr anand bharaken peeje jamuna jall nirmal .. | NityaPad-232 | प्रात उठत उर आनंद भरकें पीजे जमुना जल निर्मल ॥
पानपरसत अंग अंग मिटे आरत सनमुख होत रसना रस निश्चल ॥१॥
गोपीजनव्रजवास धर्मकुल दैवीजन सब आवत हें चल ।।
रहत नहीं दोष सुमरे लक्ष्मण सुतसब सुख वास चरण दृढके बल ॥२॥
त्रिविध ताप मेटनके साधन ए लपटनों चंदन कर सीतल ॥
परमानंद तमाल वललभकी हम पर रहो छाया अति सीतल॥३॥ | Saarang |
Aaee hoe abahi dekh sudhar sunder bhekh thadori larika aeka rupco bavro .. | NityaPad-255 | आई हो अबही देख सुधर सुंदर भेख ठाडोरी लरिका एक रूपको बावरो ॥
परदनी फबत पटुका कंठ फरहरतहे करत उनमान मैन बनत नहि रावरो ॥ १ ॥
नीर जमुना के तीर भरत रही गागर देत जबहि उठाय देखत सब गामरो॥
कृष्णदासनिनाथ नंदनंदन कुंवर हृदय मे बसत वर मेरोई सांवरो ॥ २॥। | Saarang |
Naval nikunj mahalraspunjahi rasikaay todi swargaayo .. | NityaPad-071 | नवल निकुंज महलरसपुंजही रसिकाय टोडी स्वरगायो ॥
मिटगयोभान नवलनागरिको अंगहि अंग अनंग जगायो ॥१॥ दोरी आय
कंठलपटानी एही तानमेरे मनभायो ॥ चतुर्भुजप्रभु गिरिधरनागर नट यह बिधि
गाढोमान मनायो ॥ २॥ | Todi |
Yeh tau bhalee upaji aaya .. nidharak baithi saut hwackain dekh dekh | Part1-292 | यह तौ भली उपजी आय ॥ निधरक बैठी सौत ह्वैकैं देख देख
रिसाय ॥९॥ कहा याकी सकुच मानत कहौ घात सुनाय ॥ तबहि बस कर
लियौ हरिकों हम सबन बिसराय ॥२॥ प्रबल पावस शरद ग्रीषम कियौ तप
तनगार ॥ तिनहिं तरतलै आप बैठे प्राणपति बनवार ॥३॥ जो भई सो भई अब
यह छोड़दै रसवाद ॥ सूरप्रभुके अधर लगि लगि कहा बोलत नाद ॥४॥ | Nat |
Page 1 of 1
bottom of page
