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Sheetkal Ke Pad

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Kirtan Title
Page
Kirtan
Raag
Bhojan
NityaPad-210
भोजन करत नंदलाल संगलियेग्वाल बाल करतहें ख्याल बेठे सीतल छैया ॥ पातन पर धरत भात दधि सीखरन लिये हाथ मांगत मुसक्यात जात सांवरोकन्हैया । १॥ बिजन बहों भांत भांत अनुपम छबिकहीनजात रूचसो लेत फिर खात हीर्देसोपठई मैया ॥ छीतस्वामीगिरवर धर मंडल मध्य बिच सोहत सबन को मन मोहत मोहन निरख लेत बलैया ॥१॥
Saarang
Gidgiutantantan dhitaadhitaan mandilaga baajai .. tandhila
Part1-342
गिडगिउतांतांतां धिताधितां मंदिलगा बाजै ॥ तांधिला घिलांधिलां धिधिकट धिधिकट धननननथुंग ग्रिडगिडथुं गिडिगिडथुं घन प्रचंड गाजै ॥१॥ थुंगधुंगथुंगभुंगथरथरतनननननन थेई थेई शब्द उघटत नटवर नट राजै ॥ कृष्णदास प्रभु गिरिधर प्यारी संग नृत्य करै अंग-अंग कोटि सुलक्षण मन्मथ मन लाजै ॥२॥
Iman
Maadho chanchar khelahi kheltari yamuna key teer
Part3-132
माधो चांचर खेलही खेलतरी यमुना के तीर ॥ध्रुण.। बीचबीच गोपी बनी विचविचरी वे बने हें मुरारि ॥ मरकत मणि कंचनमणी मालारी जानों गुही संवारि ॥१॥ कुंकुम वरनी गोपिका केसोरी घनस्याम शरीर ॥ नीलपीतपट मंडिता नाचतरी वे प्रेमगंभीर ॥|२॥ करतल ताल बजावहीं गावेंरी वे गीत रसाल ॥ मदनमोहन मन हरच्यो लीला सागर गिरिधरलाल ॥३॥ किंकिणी नूपुर बाजही शब्दवरी कोलाहल केलि ॥ क्वणित वेणु मधिनायका लटकत लाल भुजागलमेैलि ॥४॥ एकजु पान खबावही एकजु मांगे देह उगार ॥ एकजु मुख चुंबन करे एकजो वीने टूटेहार ॥५॥ चंदभूल कौतुक रह्यो हरणारीबे मोहेनाद || थाक्यो रथ केसें चले ब्रजयुवतिनरी वह लाये वाद ॥|६॥ चढ़ विमान सब देवता बरखनरीबे लागे फूल ॥ जय जय जय यदुनंदना रास रच्यो रतिनायक भूल ॥७॥ जो प्रसाद उनकों भयो हरि पररंभण बाह पसारि ॥ परमानंद प्रभु श्रीपती पुण्यपुज कृत गोकुल नारि ॥८॥
Sarang
Shree ballabh prabhu karna sagar jagat ujagar
Part3-041
श्री बल्लभ प्रभु करना सागर जगत उजागर गाइए ॥ निरख-निरख मंगल मुख की छबि बल बल बल जाइए ॥१॥ जिनकी कृपा अनुग्नहतें श्री गिरिधरलाल लड़ाइए ॥ अनायास सब सुख को बहिये जीवन को फल पाइए ॥|२॥ चरन परस तनरूप दरश सब ही दुःख दूर बहाइए ॥ श्री बल्‍लभ गुण जाइए यातें रसिक कहाइए ॥३॥
Hindool
Vrajanandakandam‌ vrajanandakandam‌ .
NityaPad-032
व्रजानंदकंदम्‌ व्रजानंदकंदम्‌ । घोषपति भाग्यभुविजातम्‌ ॥ रसिक वरगोपिका पीतरसमाननं तव जय तु ममदृशि सुजातम्‌ ॥।श्लु.॥ रुचिरदरहास गलदमलपरि मललुब्ध मधुपकुलमुखकमल सदनम्‌ ॥ अमृतचयगर्व निर्वासना धरसी धुपाय यमनोजाग्नि शमनम्‌ ॥१॥ स्मित प्रकटितचारुदंत रुचिवदन, विधुकौमुदी हत निखिलतापे ।| विलस ललितेहृद्यकनककलशये, मारकत मणिरिव दुरापे ॥२॥ सुभग सुमुखी कंठनिहित निजबाह रतिमत्त गजराज इबरुचिरम्‌ ॥ विहरविरहानलं चारु पुष्करचलन शीक रैरुपशमय सुचिरम्‌ ॥३॥ अरुण तरला पांग शरनिहित कुल-वधू, धृतितव विलोचनसरोजम्‌ ॥ ममवबदन सुषमासरसिविलसतु सततमल, सगतिनिर्जित मनोजम्‌ ॥।४॥ नंदगेहाल वालोदित स्त्रीराग से कसंवृद्धसुरवृक्षम्‌ ॥। ब्रजवरकुमारिका बाहु हाटकलता सततमाश्रयतु कृतरक्षम्‌ ॥॥५॥ व्रजश्लाघ्य गुणरसिकता गुणगोपनातिशय रुचिरालापलीलम्‌ ॥ तादूगीक्षण जनितकुसुमशरभाव भरयुवतिषु प्रकटतरनिखिलम्‌ ॥।६।। रुचिरकौमार चापल्य जय ब्रीडया,बल्‍लबी हृदयगृहगुप्तं ॥७॥। प्रकटयतन्रिजन खरशरचयरैसम शरमिहजयसिहृदयभावितम्‌ ॥ घोषसीमंतिनीविद्युदुद्यबेणुकलनिनदगर्जितस्त्वमिहसततं ॥ वचन करुणा कूतदृष्टिवृष्टिरंगंनवजलदमपिकुरु सुहसितं ॥।९॥
Bibhaas
Jhanak vaar mohan aavani bhaee ..
NityaPad-278
झनक वार मोहन आवनि भई ॥ राधे बिलोकत द्वार ॥ इक दृग अंजन मंजन कीयें इक उमंग चोंप लिये नई ॥१॥ बसनन कों अग्र धूप आभूषन अति अनूप चंदन ख्ौर लिलाट दई ॥ ' मैंन' के प्रभु दरस हित कारन वृषभानु नन्दिनी रति लई ॥२॥
Saarang
Mohan tum kaise hoe daani | sudhe rahau gahau apani pati tumare
Part1-220
मोहन तुम कैसे हो दानी | सुधे रहौ गहौ अपनी पति तुमारे जियकी जानी ॥१॥ हम गूजरे गमारि नारि हैं तुमहों सारगपानी । मटुकी लई उतारि शीशतें सुंदरि अधिक लजानी ॥२॥ कर गहि चीर कहा ऐंचत हो बोलत चतुर सयानी । सूरदास प्रभु माखनके मिस प्रेंम प्रीति चित ठानी ॥३॥
Devgandhaar
Arrie sancroso dhota thaado yaahi bagarmein .. haath lakutia
Part1-255
अरी सांक्रोसो ढोटा ठाड्ो याही बगरमें ॥ हाथ लकुटिया कांधे कमरिया रोकत आन डगरमें ॥१॥ दान लियेबिन जान नदेही बांह पकर . डारत गागरमें ॥ कैसे कीजैये गोरस ले उलटी सखी सूरसी राधानगरमें ॥॥२॥
Kalyan
Raakhat rung girivardharan ..
Pustak1-350
राखत रंग गिरिवरधरन ॥ रासरंग सरस रच्यौ नृत्य गति मनहरन ॥१॥ शरद उड्डपति किरण रंजित बिपिन नाना बरण ॥ तरणि तनया पुलिन में सुख रासि प्रकटित करण ॥२॥ सुभग युवति कदंब संगीत सुरत सागर तरण ॥ भर्तू काव्य सुधा सरोवर राज बिहरन ॥३॥ तत थेई तत थेई थेई शब्द गति उच्चारण ॥ कृष्णदासनिनाथ निज भुज त्रिया उर विस्तरण ॥४॥
Kedaro
Tailank kull deepak pragate sribalalabh maharaj ..
Part2-297
तैलंक कुल दीपक प्रगटे श्रीबललभ महाराज ॥ आज्ञादई कृपाकर श्रीहरि पुष्टि प्रगटये काज॥९॥ मुख मूरति प्रकट जबकीनी निजजन भक्तसमाज॥ रसिक शिरोमणि श्रीवल्लभप्रभु तीनलोक पर गाज ॥२॥
Sarang
Esein nandako nand boley hoe hoe hoe hoe horry .. vrajki
Part3-273
एसें नंदको नंद बोले हो हो हो हो होरी ॥ ब्रजकी वीथन वीथन डोलेरी ॥१॥ शोभित हैं सख्ा संग सोंधे में भीने ॥ वरन वरन सब सुगंध फेंटन भर लीने ॥२॥ बाजत ताल पखाबज आवज भेरी सहनाई ॥| हलधर डफ मोहन मुख मुरलिका सुहाई ॥|३॥ कंचन कलश विविध अरगजा भराये ॥ जोई मिले मारण में ताही शिरनाये ॥७॥ खेलत खेलत वृषभान जू कें आये ॥ निरख मोहन मंडली तन सबन नयन सिराये ॥५॥ सुनत वचन घरघरते निकसी सब गोपी || कंचन की मूरति मानो बंदन सों ओपी ॥६॥ अंग अंग अनुराग भरी सबे गोप कुमारी ॥ घूंघट पट ओट दिये देत लाले गारी ॥७॥ निकस निकस ठाड़ी भई अपनी अपनी खिरकी ॥ चोवा चंदन अरगजासो छेल छबीले छिरकी ॥८॥ झुंडन झुंडन ठाडी भईं शोभा अति बाढी ॥ लाल मुनियां खोल मानो पिंजरनते काढी ॥५९॥ सबे चतुर सबे भोरी सबे वेसकिशोरी ॥ सबे सुंदर सबे सुघर एक डारकी तोरी ॥ १ ०॥| रत्नजटित पिचकाई कर कुँकुमा भराई ॥ तक तक हरि छिरकत तबे और अचानक आंई ॥१ १ ॥ विविध भूषण विविध वसन अंगरंग सोह़ें ॥ तिलक भाल छबि विशाल उपमाकों कीहें ॥१२॥ कीनो काम कारीगर जरी जराय जरीना ॥ चुनी चहुंओर गोपी मध्य गोपाल नगीना ॥१३॥ गोकुल की खोरिन में स्लेल मच्यो भारी ॥| झपट जाय ओचका गहि लीने गिरिधारी ॥१४॥ नील पीत अंचलसों गांठ सरबीन जोरी ॥ हँसत लाल लजात स्याम झपट झकझोरा झकझोरी ॥|१५॥ अरूण वसन कंचुकी तन नीलवसन सारी ॥ दीजे क्‍यों गारि ताहि प्यारे हू की प्यारी ॥१६॥ उडत गुलाल लाल विविध नौतन छबि छाजे || युवती यूथ मंडल में दामिनि विराजे ॥ १ ७॥। बल बल बल माधो रसिक यह प्रसाद पाऊं ॥ श्रीस्यामा दंपति गुण जन्म जन्म गाऊं ॥१८॥
Maru
Nandgam koo pandey vraj varasaane aayo || atee
Part3-103
नंदगाम को पांडे ब्रज वरसाने आयो || अति उदार वृषभान जानि सनमान करायो ॥१॥ पांडेजू के पायन कों हँसिहँसि सीस नवायो ॥ पायधुवाय न्हवाय प्रथम भोजन करवायो ॥२॥ धाय आईं प्रजनारी जिन यह सूधोपाया । भानभवन भई भीर फाणको खेल मचायो ॥३॥ सीसी सरस फूलेल अंग्अंगन झलकायो ॥ हनूमान की प्रतिमा मानों तेल चढायो ॥॥४॥ काजरसों मुखमांडि बदन विंदाजु बनायो ॥ कारे कलस श्रवत मानों चपरा चिपकायो ॥५॥ गज गामिनि गोंछनसों तुकमैया लपटायो ॥ देहधरें मानों फागुन खेलन ब्रज में आयों ॥६॥ कह्डंचंदन कहंवंदन कहंचोवा लपटायो ॥ ऋतुवसंत जानों केसूकोद्रम नवफूलन छायो ॥७॥ काह्दू गूलरी माला काह्दू झंगला पहरायो ॥ मानोगज घंटानवीच गजगाह बनायो ॥८॥ रंग रह्मो चहोंटियन अंगरातो ब्हे आयो ॥ गुंजन को गहनो मानो प्रोहित पहरायो ॥९॥ माथेतें मोहनीनें छाछको माट ढरायो ॥ मानो काचे दूध सों गिरि गोवर्धन न्हायो ॥ १ ०॥ चोरभोर भई खोर मानो गंगाजल ढायो ॥| महादेव की जटा चूरिचरनोदिक आयो ॥११॥ लगत दंत सोंदंत गिडिगिडी अंग लगायो मानोहो सुघर संगीत ताल कठतार बजायो ॥१२॥ श्रीराधा राधा कह्नि अपनों बोल सुनायो ॥ अरी भानकी कुंवरि सरनिहों तेरी आयो ॥१३॥ सुनिकें प्रेमवचन गरो राधाभरि आयो ॥ वावाजू को दणलाले प्रोहित पड़रायो ॥१४७॥ कीरतिजू पांय लाभि तातोपय प्यायो ॥ तोलों खेलत होरी ब्रज में दूल्हे आयो ॥१५॥ साचे स्वांगन सजिकें सबे समूह सुहायो || तपा व्यास कोपूत धुत सुकदेव बनायो ॥ १ ६॥| सनकादिक चारथों निस ज्यों सन्‍यास सुहायो ॥ घूमत आयो इंद्र स्वांग उनन्‍्मत्त नचायो ॥१७॥ ब्रज की बीथनि बीच कीच में लोट पुटायो ॥ चारिवदन को स्थांग चतुर चतुरानन लायो ॥१८॥ पंचानन पांचों मुखसों संगीत बजायो ॥ हरिकोव्हे जुवाबरो नारद नाचत आयो ॥ १ ९॥ देखि नंद के लाल जंत्र धरिगाल बजायो || महादेव पटतारदेत यह पट प्रभु भायो ॥२०॥ हो हो हो होरी हरि हांसीनहँसायो ॥ माया निपुन भई सोनार दहलहुलरायो ॥२१॥ कामकाम नीभयो सवन को चित्त चुरायो ॥ ललिता जोरी गांठि लाल को व्याह रचायो ॥२२॥ गठजोरो वृषभान कुंवरि सों जाय जुरायो | नवलअंब के मोर को मोरी मोर बनायो ॥२३॥ पीत पिछोरी तानि छबीलो मंडप छायो || फागुन की गारीन को साखा चार पढायो ॥२४॥ डोरी की अग्यारी करि दूल्हे परनायो ॥ होरी को पकवान सो भरिभरि झोरिन खायो ॥२५॥ फूलि फाग की फाग फल्योजिन यह जसगायो ॥ जन हरीया घनस्याम वास बरसानें पायो ॥२६॥
Bilawal
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