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Sheetkal Ke Pad
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Kirtan Title | Page | Kirtan | Raag |
|---|---|---|---|
Baithe laal | NityaPad-261 | बैठे लाल
फूलनकी पिछवारी ॥ सुंदरश्याम सुभगता सीमा कंठमाल मनहारी ॥१॥
मवलकिशोर रसिक नंदनंदन संग राधिका प्यारी ॥ रसिकराय प्रभु सब गुण
पूरण सुखनिधि श्रीगिरिधारी ॥२।॥| | Saarang |
Arrie yahaan shree vrindavanrang .. | Pustak1-359 | एरी यहाँ श्री वृंदावनरंग ।।
सा री ग म प ध नि अलाप करत उपजत अबधर तानतरंग ॥१॥
निर्तत अतजत लेत ग्रग्रतततत धिकट घिलांग द्रुम बाजत मृदंग ॥
गोविंदप्रभुकेजु अंगअंगपर वारफेर डारों कोटि अनंग ॥२॥ | Saarang |
Douu alsaanen raajat praat .. shree vrishbhan nandani nand suta rasik salaune gaat .. 1 .. | NityaPad-026 | दोऊ अलसानें राजत प्रात ॥ श्री वृषभान नंदनी नंद सुत रसिक सलौने गात ॥ १ ॥
नीलपीत अम्बर लपटानो छिन छिन अधिक सुहात ॥
मानहु घन दामिन अपनी छबि होई एक बिकसात ॥। २॥
बिन मकरंद अरबिंद वुन्द मिल अंग अंग बिकसात ||
सुखसागर गिरिधरन छबीलो निरख अनंग लजात ॥।३॥ | Bibhaas |
Tumakon lalkaryohaigheya .. | NityaPad-196 | तुमकों लालकर्योहैघेया ॥
आबवोबेग जातमुरझानो बोलतयशोदा मैया ॥१॥|
आनपतूकीपातनकीकर फिरलैहैंबलदाऊभैया ।।
बावाकहत पहिलेजोपीवे सोगोकुलकोरैया ॥|२॥
यहसून दौरभवनमें आये गोदबैठे प्यारो कुंवरकन्हैया ॥
श्रीविद्ठलगिरिधरनलालको प्यावनबावाबहुत सुखपैया ॥। ३ | Bilawal |
Aavat mohan munn haryo . houn apane | NityaPad-289 | आवत मोहन मन हर्यो । हों अपने
गृह सचुसों बेठी निरख बदन अचरा विसर्यों ॥१॥
रूप निधान रसिक नंदनंदन'निरख बदन धीर न धर्यों |
कुंभनदास प्रभु गोवर्धनधर अंग अंग प्रेम पीयूषभर्यो ॥२॥ | Hameer |
Dhanidhani vraj barsaanon gaam . pragatbhai jahaan sriradhaju | Part1-178 | धनिधनि ब्रज बरसानों गाम । प्रगटभई जहाँ श्रीराधाजू
नाम ॥१॥ जहाँ बसे राजा वृषभान । नंदरायके जीवन प्रान ॥२॥ जाके
घर कीरत सी रानी । ब्रजवनिताके अति मनमानी ॥३॥ तिनके उदर भई
सुकुमारी । सकलकला गुणयण अति भारी ॥४॥ अति आनंद भयौ तिहि
काल । आईं जुरि सब ब्रजकी बाल ॥५)॥ मंगल कलश बिराजत द्वार ।
गावत कर लै आईं थार ॥६॥ घरघर बंदनवार बंधाई । सब मिलि आनेंद
करत बधाई ॥७॥ पंच शब्द बाजत हैं ऑगन । विप्र आदि आये सब
माँगन ॥८॥ देत दान वृषभान उदार | भूषण बसन अनुप्त हार ॥९॥
छिर्कत दूध दही घृत रोरी । एकते एक महारस बोरी ॥१०॥ जानत नॉहिन
भई मन मगन । भूषण बसन सेँभार नहीं तन ॥११॥ चिरजीयो राधा
सुकुमारी | जाके दूल्हे श्रीगिरिधारी ॥१२॥ सबै असीस देत मुख देखत ।
फिरि फिरिकें राधा तन पेखत ॥१३॥ नंद गोप हैं अति बड़भाग । दुलहनि
राधासी अनुराग ॥१४॥ यहि बिधि आनेंद सरिता बही । कुँवरी कृपाते
निजजन लहीं ॥१५॥ बोहोतभौति ये लीला गाई । गोविंद तहाँ नौछावरि
पाई ॥१६॥ | Bilawal |
Aeye pyaari maan naan keejai piya saun bawri merey | Part3-358 | ए प्यारी मान न कीजै पिय सौं बावरी मेरे
कहै चलि गज गामिनि ॥ बार-बार मुख निहार नवल नवेली नारी तू सुकुमारि
आली बस कीए स्याम सुनि भामिनि ॥१॥ ज्यौं-ज्यौं रूक होत त्यौं-त्यों
पीतम अधीर होत सुन्दर प्यारी तेरे बस भए ओर सकल ब्रज जुबति खेलति
होरी हरि सँग सुनि री स्वामिनि ॥ फागुन में मान कैसो यै तो अनोखी
रीति प्रीति क्यों न करि प्यारी अतर सुगंध अरगजा केसर घनसार 'ब्रजाधीस'
प्रभु रचि राखी है बेगि चलि जात हे जामिनि ॥२॥ | Kanharo |
Chali dekhi sakhi vidhi aajbhali navkunjan mein millie jein matari .. | NityaPad-216 | चलि देखि सखि विधि आजभली नवकुंजन में मिली जें मतरी ॥
पिय हाथ हठीली कीजे मनको पंगु शीज्ष धरे नहीं चितबत ही ॥१॥
ललितादि सखी करजोरी रही अरु करे विनति नहीं हितवतरी ॥|
यह सुख माधुरी जो न लहे वब्रथादिन योही वितवतरी ॥२॥ | Saarang |
Yamuna jall kreedat shyam chahun or | NityaPad-252 | यमुना जल क्रीडत श्याम चहुं ओर
बनी बाम नावमधि लाल रावटी रचि ॥
फूलनको बंगला मनोहर राजत झुकि रही लता हंस ओर चकोरकी पंगति सचि ॥१॥
कोकिला अलापततान लेत सुखकारी गावत प्रवीन प्यारी सारंग राग खचि ॥
छुटत जल जंत्रनफुंहीं मानों सुमन माल गुहीं व्रजाधीश मेंघ श्याम मूरत देख ी ललचि ॥|२॥ | Saarang |
Anandarai birajat aaj .. bhaye nandakenand chakrit way karat | Part1-012 | आनंदराय बिराजत आज ॥ भये नंदकेनंद चकृत वे करत
सुफल सुखराज ॥१॥ बदन प्रफुलित नैन चुमत रस झलमलात सब अंग ॥
झलमलात चीरा माथेपर पेचनि लाल सुरंग ॥२॥ झलमलात वागौ सौंधिसों
झलकत कुंवर उच्छंग ॥ झलझलात सब सभा चहूँ दिसि सुख आनंद तरंग।।३॥।
राजाभान गोहने जै जै गोप ग्वाल सब पूरन गाऊँ ॥ विप्र भाट चारन बंदीजन
यह पढ़त मुख ले ले नांऊं ॥४॥ सुभर पहुँचेन पहुँचिका मुदरी बाजूबंद सु
जबाई ॥ कंठहार श्रवनन गजमोती झलक न बरनी जाई ॥५॥ वचन संतोष
संतोष सबन चित सबहिन पुरवत आस ॥ परम उदार भार सबही रज उग्र तेज प्रकाश ॥६॥ परमभाग लछिन मंगल निधि रानीसी ग्रह नारी ॥ बलि
गिरिधरनरायजू ऊपर सूरसेन बलिहारी ॥७॥ | Devgandhar |
Varaj kheleri dhamaar mohan pyarori nandako .. | Part3-336 | वरज खेलेरी धमार मोहन प्यारोरी नंदको ॥
संग बनी रस ओपी गोपी कह्मो न परत कछु बाढ्यो या सुख सिंधु उड्डचंदको
॥१॥ वाजत ताल मृदंग उपंग किन्नरी ऊपर बाढ्यो सुख आनंदको ॥ नंददास
प्रभु प्यारे कौतुक देखत ओर शोभा गिरिधर मेन फंदको ॥२॥
| Nayaki |
Chhaak khaat govardhan oopar . vaha baapai voe vaa oopar jhapatat | NityaPad-207 | छाक खात गोवर्द्धन ऊपर । वह बापै वो वा ऊपर झपटत
गिरनि न देत भू पर ॥ आछे मीठे क हि-कहि नाचत लै-लै कर तें भाजत ।
सुबल सुबाहु तोक श्रीदामा ग्वाल-मंडली राजत ॥ विविध केलि करत
मनभाई परमानंद' हि दीनी । रहसि मन मीनी ॥ | Saarang |
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