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Sheetkal Ke Pad

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Kirtan Title
Page
Kirtan
Raag
Teree naval tarunta navavasant ..| nabanav vilas
Part3-060
तेरी नवल तरूनता नववसंत ॥| नबनव विलास उपजत अनंत ॥ध्रु०)॥ नवअरुन अधर पल्‍लव रसाल ॥ फूले विमल कमल लोचन विशाल ॥ चलि भृकुटी भृंग भृंगनकी पांति ॥ मृदु हसन दसन कुसमनकी भांति ॥१॥ भई प्रगट अल्प रोमावलि मोर ॥ स्वास सौरभ मलय पवन झकोर॥ चल फलउरोज सुंदर सुठान॥ बोले मधुरमधुर कोकिला जान ॥२॥ दुरि देखत ब्रज कुंवरराय ॥ बाढ्यो मममथ मन चोगनों चाय ॥ तोहि मिलि विलस्यो चाहतहें स्याम || जाहि देखत लज्नित कोटिकाम ॥ ३॥। तब चली चरन मंथर विहार ॥ बाजे रुनन झुनन नूपुर झंकार ॥ सुनि पुलकित गोकुल पत्ति कुमार ॥ मिलि भयो गदाधर सुख अपार ॥४॥
Basant
Aaj baney mohan rung bheene.
NityaPad-160
आज बने मोहन रंग भीने। केसरी पाग सिथिल अलकावलिसीस चन्द्रिका दीने ।१॥| केसरी वागो अति राजत हि हरी इजार चरननमें दीने । हार हमेल दरपन ले निरखत रसिक' प्रीतम चरनन दीने ॥ २॥
Aasawari
Dekhorimai kesihagwalin ultiraimathaniyan vilobe |
NityaPad-181
देखोरीमाई केसीहैग्वालिन उलटीरईमथनियां विलोबे | बिननेती करचंचल पुनपुननवनीते टकटोवे ॥ १॥। निरखस्वरूप चोंट चितलाग्यो एकटक गिरिधरमुखजोबे | कुंभनदासचितेरही अकबकआऔरें भाजनधोवे ॥ २॥।
Bilawal
Houn balihari merey lalana | khelan jinn doori jaahu trinaavart
Part1-107
हों बलिहारी मेरे ललना | खेलन जिन दूरि जाहु तृणावर्त दलना ॥१॥ बलराम संग अँगुरी गहि सीखौ बलि चलना । जीवन घनश्याम सुंदर कंस मारि मलना ॥२॥ त्रिभुवन जाके तीन पाय वामन बलि छलना । सोई प्रभु रघुनाथ दास झूलत ब्रज पलना ॥३॥
Aasawari
Bhaag bado jasodaju nand koo pragate kunwar kanhai hoe ..
Part1-033
भाग बड़ो जसोदाजु नंद को प्रगटे कुँवर कन्हाई हो ॥ जबते जन्म भयो ढोटाकों तबतें नव निध पाई हो ॥१॥ ऊपमाँ कहा कहों बालक की मोपें बरनि न जाई हो ॥ कोट कुबेर सिंघ द्वारे ठाड़े तिनसों हम बड़ाई हो ॥२॥ जरा वियोग रोग भय नाही घरघर मंगल गाई हो ॥ और महा सिध भवन भवन प्रत सूरदास बलजाई हो ॥३॥
Asawari
Byaru karat bhaavate jiya key ..
NityaPad-303
ब्यारु करत भावते जिय के ॥ खटरस बिंजन मीठे मोहन अंचल बियार करत पिय के ॥ १॥ कबहुँक कौर देत श्रीमुख में ताप समावत अपने हिय के ।। नन्द्दास प्रभु उसीर महल में प्राण प्यारी प्राण पिय के ।२॥
Kanharo
Sunder sawre jabaten murali adhar dharee .. suna shiv samaadhi
Part1-284
सुंदर सावरे जबतें मुरली अधर धरी ॥ सुन शिव समाधि टरी ॥ सुनि थके व्योंम विमान ॥ सुर बधू चित्र समान | गृह नक्षत्र त्यजत न रास ॥ बाह न बँधे धुनि पास ॥१॥ सुनि आनंद उम्ग भरे ॥ चल थके अचल टरे ॥ चल अचल गति विपरीत | सुन बेंगु कल पद गीत ॥ झरना झरें पाखान ॥ गंधर्व मोहे गान ॥२॥ सुन खग मृग मौन धरी ॥ फल तृणकी सुधिबिसरी ॥ सुन धेनु मृग थक रहे ॥ तृण दंतहूँ न गहे ॥ बछरा न पीबें क्षीर ॥ पक्षी मनों मुनि धीर ॥३॥ द्रुम बेलि चपल भये ॥ नव अंकुर प्रकट नये ॥ तहाँ विटप चंचल पात ॥ हरि निकटकों अकुलात॥ अंकुरित पुलकित गात ॥ अनुराग नयन चुचात ॥४॥ सुन चंचल पवन थक्‍यो ॥ सरिता जल चल न सक्‍योौ ॥ सुन थक्‍्यौ मंद समीर ॥ उलट्यो जु यमुनानीर ॥ सुनधुनि चलीं व्रजनार | सुत देह गेह बिसार ॥५॥ मनमोहन रूप धस्वो ॥ कामकौ गर्ब हस्बो ॥ नव नील तन घनश्याम ॥ नव पीतपट अभिराम ॥ नव मुकुट नवमणि दाम ॥ ल्ावण्य कोटिक काम ॥६॥ मन मोहझौ मदन गोपाल ॥ तन श्याम नयन विशाल ॥ श्रीमदनमोहनलाल ॥ संग नागरी नववाल ॥ नव कुंज यमुनाकूल ॥ देख सूरदास मनफूल ॥७॥
Bilawal
Aho hari bhaamate bhawati kachhu kii keaney ..
NityaPad-306
अहो हरि भामते भावती कछु की कीनी ॥ नई प्रीति की रीस सुनो क्‍यों न नातो तोसो गामतें ।|१॥ इन सकुचन पतियांहु न लिखत दुख पावें सुनत मेरे नामतें॥ धरमदास प्रभु तुमकुं दोष नहीं बीच पर्‌यो काहु वामते ॥२॥।
Kalyan
Bhojan key bhatin kii kraanti kachhu kahee naan jaat ..
NityaPad-212
भोजन के भातिन की क्रान्ति कछु कही न जात ॥ भांति भांति राखे पनवारे परोसिके मंजुल मूदुल मधु मोदक सलोने साद सरस रस राखे रस के ॥१॥ अरस परस कछु जेमत रसिकवर सब रहो वूंदाविपिन बरसिकें। कोर के उठायवेते कर ना कह्यो करत विवस है जात मुख माधुरी दरसिकें।।२॥
Saarang
Dekho brindavan srikamal naine | aayo aayo madangun
Part3-029
देखो बृंदावन श्रीकमल नेन | आयो आयो मदनगुन गुदरदेन ॥|ध्रु०॥ द्रमनवदल सुवन अनेकरंग ॥ प्रति ललितलता संकुलित संग ॥ करधरे धनुष कटि कसिनिषंग ॥| मानों बने सुभट साजे कवच अंग ॥१॥ कोकिल कुंजरहय हंसमोर ॥ रथसैल शिला पदचर चकोर ॥ वरध्वज पताक तरुतारकेर ॥ निर्झर निसान वाजे भमर भेर ॥२॥ जहां नेम सुमति अतिमलयवात ॥ मानों जेतवसन वाने उड़ात ॥ रुचिराजत विपिन विलोलपात ॥ धपि धाय धरत अतितुरतगात ॥३॥ सूरदास इम वदत बाल ॥ आयो कामकृपन शिव क्रोध काल ॥ फिरि चितयो चपल लोचन विसाल ॥ यह अपनों करि थापिये जुपाल ॥४॥
Basant
Khelat raas dulhani dulhu ..
Pustak1-337
खेलत रास दुलहनि दूलहु ॥ सुन्‌हु न सखी सहित ललितादिकनिरख निरख नयनन किन फूलहु ॥१॥ अतिकल मधुर महामोहन ध्वनि उपजत हँंसमुत्ता के कूलहु ॥ थेई थेई बचन मिथुन मुख निरसत सुरमुनि देह दशा किन भूलहु ॥२।॥ भूदु पदन्‍्यास उठत कुंकुमरज अदभुत बहत समीर दुकूलहु ॥ कबहुँ श्यामश्यामा दोऊ नृत्यत्त कच कुचहार छुवत भूजमूलहु ॥३॥ भूकुटी बिलास हास रसबरखत हित हरीवंश प्रेमरस झूलहु ॥ अति लावण्य रूप अभिनय गुण नॉहिन कोटि काम समतूलहु ॥४॥
Gori
Shree lakshman bhatt grih bhaye, shree vallabhadhiraj.
Part2-317
श्री लक्ष्मण भट्ट गृह भये, श्री वल्लभाधिराज। पनरा सै पेतीस में भक्त उधारन काज॥१॥ शाह सिकन्दर लोदि भो, दिल्‍ली पति बड़ भाग। प्रभता सुनि लखि हिय भयों, सरस श्रवन अनुराग ॥२॥ भयो श्रवन अनुरागतें, दरसन को अनुराग ॥ तब दिल्‍ली पति चित्त भई, चित्र करावन लाग॥३॥ पाय अनवसर समय को, श्री जमुना तट धाम | कहत भागवत की कथा, श्री सुबोधिनी नाम ॥४॥ तहां भट्ट माधोदासजू, हाजर रहत हमेश । श्री सुबोधिनी लिखत हे, शीघ्रसु शुद्ध विशेष ॥५ ॥ कृष्णदास मेघन जहां, हाजर द्वेकर जोर। तीन दिवस ठाढो रहो, पुरुषोत्तम के जोर ॥६ ॥ दामोदर हरसानि जहां, करत दंडबत आय | ग्रीसम ऋतु के समय में, ऐसो समय सुपाय ॥७ ॥ पनरासों सडसठ लखो, संवत को अनुमान। सम्प्रदाय कल्प द्रुम सु, पुस्तक माहि प्रमाण ॥८ ॥
Kanharo
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