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Sheetkal Ke Pad
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Kirtan Title | Page | Kirtan | Raag |
|---|---|---|---|
Horry khelani koo chaley .. rung bheene hoe .. sunder | Part3-312 | होरी खेलनि को चले ॥ रंग भीने हो ॥ सुंदर
मदन गुपाल ॥ लाल रंग भीने हो ॥ आगें दे बलबीर ॥ करति कुलाहल
ग्वाल ॥ लाल०॥१॥ बाजे बहु विधि बाज हीं ॥ जंत्र पखाबज ताल ॥
रुंज मुरज ढ़फ दुंदुभि ॥ बिच बिच बैंनु रसाल ॥२॥ सबन सुनति सब
ब्रज बधू ॥ घर घर तैं उठि धाई ॥ मुख्य जु राधा लाड़िली ॥ गावति
गारि सुहाई ३ ॥ सनमुख आनैें हुलसि कैं ॥ केसर भरि पिचकाई ॥
प्रान पिया कौं छिरकि हीं।। बद मोरि मुसिकाई ॥|७॥ जुवती जूथ पै छरिकि
हीं॥ सुरंग गुलाल अबीर ॥ चौंक परैं सब खेलि हीं ॥ भरति परसपर
भीर ॥५॥ हो हो होरी बोलि हीं ॥ नांचे दे कर तारि ॥ चहूं दिस तें बे
छिरकि हीं ॥ कारि जु अरगजा वारि ॥६॥ तब ललिता चंद्रावली ॥ गहि
लीनें घनस्यथाम ॥ नैन ऑजि मुख मांड़ कैं ॥ झटकति गहि बन दाम ॥७॥
ले उठाइ भरि अंक में ॥ प्रेम आलिंगन देहि ॥ एक अधर रस घूंट ही ॥
एकु जु चुंबन लेहि ॥८॥ एकु जु पान खबाव हीं ॥ एकु जु लेह्ि उगार ॥
भुज भरि राखें पीय कौं ॥ हा हा खाहु कुमार ॥९॥ हंसि हंसि चिबुक
उठाब हीं ॥ दुलरी लींनी खोल ॥ कै बल छूटो आपुनौ ॥ कै ब्रजराजें
बोल ॥६०॥ यों गिरिधर संग खेलि हीं ॥| वाढ्यौ उर आनंद ॥ हेंरें नेन
चकोर ज्यौं ॥ पिय मुख पूरन चंद ॥ ९ १॥ मन भायो फगुवा लियो || अंबर
मोतिन माल ॥ बारें सरबसु वारनैं ॥ बलि-बलि “दास” गुपाल ॥१२॥ | Gouri |
Mandal madhya rung bharey shyama shyam rajenri .. | Part1-347 | मंडल मध्य रंग भरे श्यामा श्याम राजेंरी ॥
धररररररररररसमुरली घोर गाजैं री ॥१॥ गान करत व्रजकी बाम सप्तसुरन
तीनग्राम अंगअंग अभिराम मन््मथ मन लाजें री ॥ मंदमंद हास करें रीक्षिरीज्ि
आँकौ भरें नयनन मध्य लेत मान अति सुदेश छाजैंरी ॥२॥ युवती जन नृत्य
करें श्याम ग्रीव भुजा धरें श्यामा संगीत उघट रसही रस सारी || धिधिकिटता
धिधिकिटता धिलां धिलां घिलां धिधिकिटथिधिकिट थेईथेई गिडगिडतक बाजैंरी
॥३॥ रररैंन रीझ् रही यययमुना थकित भई चचचचंद गगगगन पपपपपश्चिम
रथन भाजैंरी ॥ क्ृष्णदास प्रभु बिलास बरखत नव रूपरास वृंदावन वर बिलास
रंग बढ़यो आजेरी ॥४॥ | Adano |
Baat kahet rasrang uchchalita.. phoolan key mahel virajat | NityaPad-258 | बात कहेत रसरंग उच्छलिता॥ फूलन के महेल विराजत
दोऊ मंद सुगंध निकट वहे सलिता ॥ १॥ मुखमिलाय हँस देखत दर्पण में सुरत
श्रमित उर माल विगलिता॥ परमानंदप्रभु प्रेम विवश भये कहि हम में सुंदरको
ललिता॥२॥ | Saarang |
Gwalini prakatto purananeh | dedhibhajan sirpar dharryori | NityaPad-097 | ग्वालिनी प्रकट््ो पूरणनेह | देधिभाजन सिरपर धर्योरी
कहत गोपालहि लेह ॥ १॥ कोन सुने कासों कहूंरी काके सुरतसंकोच ।। काको
डर पथ अपथकोरी कोउत्तमको पोच ॥२॥ वाटघाट निजपुर गली जहां तहां
हरिनाम ॥ समझाये समझे नहीं वाहि सिखदेवि थक््योगाम ॥|३॥| दीपक जो
मंदिर वरे बाहिर लखे न कोय तृणपरसत प्रज्वलित भयो गुप्त कोन विधि होय ।।४॥
पान किये जैस वारणी मुख भलकन तनन संभार। पग डगमग जित तित धरेंविधुरी
अलक लिलार ।।५॥ सरिता निकट तडागके दीनोकूल विदार ॥ नाममिट्यो
सरिता भई को निवेरवेवार ॥६॥ लज्या तरल तरंगिणीगुरुजन गहरी धार | दोऊ
कुलकूल परमित नहीं ताहि तरत न लागी वार ।॥७॥ विधिभाजनओछल्यो रच्यो
लीलासिंधु अपार ॥ उलट मग्न तामें भयो कोन निकासनहार ॥|८।। चित
आकरष्यो नंदके मुरली मधुर बजाय ॥ जिहिलजा जगलाजयो सो लज्जा गई
लजाय ॥९॥ प्रेममग्न ग्वालिन भई सूरदासप्रभु संग ॥| नयन श्रवण मुख नासिका
ज्यो कंचुकी त्यजत भुजंग ।॥१०॥॥ | Ramkali |
Aeye sir soney key sutan sohat paag pechan upar nug lagey .. | NityaPad-119 | ए सिर सोने के सुतन सोहत पाग पेचन उपर नग लगे ॥
रतनारे ढरारे से लोचन मुरत मेन जगे ॥ १॥।
मुखकी मंजुलताई कापें बरनि न जाई चंचलता हसदूर भगे ॥
नंददास नंदरानी छबिनिरखत बार पिबत जल जिन काहुकी दृष्टि लगे॥१॥ | Kanharo |
Mohe aur kachhu naan suhai sarbi mero kunwar | Part3-128 | मोहे और कछु न सुहाई सरबी मेरो कुँवर
छबीलें मन हरचौ हो ॥ध्रु०॥ आजु सखी मैं देख्यों ठाड़ो एक साँवरौ-
गात ॥ नैँद-पौरि आगैं यों निकसे, चल््यौ खिरक कौं जात ॥१॥ पीरी-
पागण, चौपरीया बागौ, पहिंरे लालइजार ॥ फैंटा सोहे कसुंभी रंग कौ मानों
कोदिक मार ॥२॥ कुंडल लोल कपोलन झांई, मुक्ता दुलरी ग्रीव ॥ ऊपर
धावत हार गुंज कौ, सुँदरता की सीव ॥३॥ बाजुवंद अंगुरीया मुदरी सोभा
कही न जाई ॥ छुद्घघंटिका राजत कंटि तट, नूपुर बाजत पाँई ॥४॥ खेलत
रूप ठगोरी सी ल्याई चरन चल्यौ नँहि जात ॥ बूझति नाँहि नाम कहा
तेरौ हँसि मेरे ढिंग आत ॥५॥ उर की माला मोकौं पहिरावत अधर मधुर-
रस प्याई ॥ यह सुख सखी कहति नहिं आबे 'स्यामदास' वलि जाई॥६॥ | Bilawal |
Naval kanhai hoe pyaare .. esso jhagaro nivaar .. daan kaahe koo hoe laage .. chaley jaahu apane hoe mug ..bhru0). aavat jaat | Part3-135 | नवल कन्हाई हो प्यारे ॥ एसो झगरो निवार ॥ दान काहे को हो लागे ॥ चले जाहू अपने हो मग ॥भ्रु०)। आवत जात
सदा रहीं कबह्दू सुन्यों नहीं कान | अब कछु नईये चलाइये दूध दहीकोदान
॥१॥ सदा सदा हम दान लियो सुनही नवल कुमारि ॥ ओर गले न्हे तुम
गई दान हमारो मारि ॥२॥ ठालेठूले फिरतहो चलो हमें घरकाम || इनकी
कछुन चलाइये ख्याली सुंदर स्याम ॥|३॥ स्याम सखन सोयों कश्यो घेरो
सबनकों जाय ॥ ढीठ बहुत ये ग्वालिनी मटुकी लेहु छिनाय ॥४।॥| गोचारन
मिस विपिनमें लूटतहो परनारि॥ कहेंगी जाय ब्रजरायसों ऐसो झगरो निवारि
॥५॥ मधु मंगल क्यो कृष्णसों दान लेहु कछु छाड॥ इनसों दिनदिन कामहे
मति बलेह कछू आड ॥६।॥ सांची कहत के हसत हो हमकों होत अवार ॥
सब सखियन सेनावेनीकर गहने देहो मोती हार ॥७॥ मदनमोहन पिय
हरखियो लीयो हस्त करहार || अपने कंठले पहरियो गजमोतिन अतिचार
॥८॥ सब सस्वियन मिल मतोमत्यो कीजे कहा उपाय ॥ राधा गहने दीजिये
ओर नहीं कछुदाय ॥९५॥| ललिता विसाखा भाजियो राधा तजी है अकेली ॥
गोविंद प्रभु नवकुंज में पियप्यारी की केलि ॥१०॥ | Gouri |
Morr mukut katkaachhani janani paharaave .. shyam anga bhushan | NityaPad-172 | मोर मुकुट कटकाछनी जननी पहरावे ।। श्याम अंग भूषण
सजे बिंदुका जो बनाबे ॥१॥ नूपुर कंकन किंकिनी कर बेन गहावे ॥ मुसकनमें
मन हरे वस ताप जनावे ॥|२॥ ब्रजरानी आई तहां दरपन दरसावे ॥| भोग अरप
बीरा दियो सुख सूर बढावे ।॥।३॥ | Bhairav |
Sunari sendai gwalanakon mohanlal bajaayo bayne .. | Part1-286 | सुनरी सेनदई ग्वालनकों मोहनलाल बजायो बेन ॥
प्रातसमे जागे अनुरागे वृंदावन धन आनंद माई चले चरावन धेन ॥१।॥| बरन
वरन वानिक बनिआये पटभूषन जसोमति पहेराये भाल तिलक दे आंजे नैंन ॥
हरिनारायन श्यामदासकेप्रभु माई प्रगटभये धरि सीसचंद्रिका सब व्रजजन
सुखदेन ॥२॥ | Bilawal |
Vrajnari vrajraj gopgrah mohan dekhan aaeen .. | Part3-121 | ब्रजनारी ब्रजराज गोपग्रह मोहन देखन आईं ॥
सोडस साजि सिंगार सोरह बरसकी एकदाई ॥१॥ दिव्य बसन भूषन तन
गावें गारि सुहाई ॥ श्रवन सुनत आनंद मनमोहन दई हे दिखाई ॥ २॥ रणमगो
बदन विलोकिकें नेन रहे अरुझाई ॥ सुंदर स्यथाम सरूप रूप अति छबि
बरनी नहीं जाई ||३॥ केसरि साखि जवाद कनिक कुंडी जो भराई ॥ रतन
खचित पिचकाईन छिरकत कुंवर कन््हाई ॥४॥ खेल मच्यो ब्रजबीच
अरगजाकी चमचाई ।| ताल मृदंग ढोल डफ मुरली शब्द सुहाई ॥५॥ हो
हो हो कष्टि बोलत आनंद उर न सम ाई ॥ तिनमें मुख्य श्रीराधाजू सेनन
देत सिखाई ॥६॥ सिमिटि सकल ब्रज सुंदरि मोहन पकरे धाई ॥ पीतांबर
वनमाला मुरली लई हे छिनाई ॥७॥ हंसिहंसि हरि पे मांगत फगुवा देह
कन्हाई ॥ लीला ललित मनोहर माधो जनमन भाई ॥८॥ | Bilawal |
Thu jinn boleri daine devaa hii jaari .. vaha helbar | Part3-103 | तु जिन बोलेरी देन देवा हि जारी ॥ वह हेलबार
जिंभार जगत को हमहें सुलक्षण नागरनारी ॥|१॥ वाके जिये आवे सोई
गावे हम कहा करें लाज की मारी ॥ होरी में कहो कोन विगोयो कृष्ण
जीवन लछीराम झंझारी ॥२॥ | Mari |
Hariko waman roop banaayo .. nandrai yeh roop banaayo .. | Part1-214 | हरिको वामन रूप बनायो ॥ नंदराय यह रूप बनायौो ॥
नंदराय यह मानी जयंति उबटि सुगंध न्हवायी ॥१॥ शिर किरीट पीतांबर
काछनी आभूषन बहु भाँति ॥ जन्म सम सुनि सुनि गृह गृहतें आई जुरि जुरि
पांति ॥२॥ कहत सबै सिंगार सलोंनों नितप्रति दूनौ नेह ॥ द्वारिकेश प्रभु
याचक है के कहाँ बलि दीनौ तो देह ॥३॥ | Dhanashri |
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