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Sheetkal Ke Pad
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Kirtan Title | Page | Kirtan | Raag |
|---|---|---|---|
Atee komal tanu dharnau kanhai . gaye tahaan jahaan kaali | Part1-171 | अति कोमल तनु धरनौ कन्हाई । गये तहाँ जहाँ काली
सोवत उरगनारि देखत अकुलाई ॥१॥ कह्लौ कौनकौ बालक है तू बार बार
कहि भाग न जाई । छिनकहिं में जरि भस्म होयगौ जब देखे उठि जागि
जुंभाई ॥२॥| उरग नारी की वाणी सुनके आप हँसे मनमें मुसिकाई । मोकों
कंस पठायौ देखन तू याकों अब देहि जगाई ॥३॥ कहा कंस दिखरावत इनकी
एक फूँक ही में जर ि जाई । पुनि पुनि कहत सूरके प्रभुसों तू अब काहे न जाई
पलाई_ ॥४॥ | Bilawal |
Abjin mohibharo nandanand houn vyakul aibhari .. | Part3-018 | अबजिन मोहिभरो नंदनंद हों व्याकुल अईभारी ॥
कहत ही कहत क्यो नहीं मानत देखे नये खिलारी ॥१॥ काल्हि गुलाल
परच्ो आंखिनमें अजहून भई पियसारी ॥ परमानंद नंद के आंगन खेलत
ब्रजकीनारी ॥२॥ | Basant |
Jhoolau jhoolauhon palana . jinn curry aari aisee hansau mero | Part1-104 | झूलौ झूलौहों पलना । जिन करी आरि ऐसी हँसौ मेरो
ललना ॥१॥ तुमकूँ और मँँगाऊँ खिलौना । काहेक ौं हटी खेलौ मेरे
छौना ॥३॥ हों ढिंग बैठि तुमहिं झुलाऊँ | गीत नये नये तोहि सुनाऊँ॥३॥
देखि लटकें ऊपरके फूँदना | दोऊ कर हरषि गहत नेंदनंदना ॥४॥ तेरे
चरनके नूपूर बाजैं | श्रवन सुतन षटपद ज्यों गाज"ं ॥५॥| सदमाखन तेरे कर
दैहों । मुखमें मेलि बलैयों लेहों ॥६॥ क्यों रोवै मेंरे बहौत दुःखनकौ । मोकों
दायक सकल सुखनकौ ॥७॥ हुलरावति सुतको नैंदरानी | रसिक सनेह भरी
मृदुबानि. ॥८॥ | Aasawari |
Shyam subhag tanjhaani .. | NityaPad-059 | श्याम सुभग तनझांई ।।
उमग चली प्रीत वरनी ते ताहु में अतिअंगराग शोभा कहियन जाई ॥१॥|
लालपाग चौकरी बिराजत कुल्हे सुरंगढरकाई ॥
स्निग्ध अलक बीचबीच राखी चंपकली अरुझाई ॥।२॥
देखत्त रूपठगोरी सी लागत नेनन रहे अरुझाई ॥
गोविंद प्रभु सब अंग अंग प्रति सुंदरमणिराई ॥। ३। | Kanharo |
Vrajayuvati haricharan manaave.. jey padakamal | Part2-365 | ब्रजयुवती हरिचरण मनावे॥ जे पदकमल
महामुनि दुर्लभ वे सपनेहू नपावे ॥१ ॥ तनु त्रिभंग युगजानु एकपग ठाढे
एक दरसाय॥ अंकुश कलश वज्र ध्वजा प्रकटत तरुणी मनहि
भ्रमाय ॥२ ॥ यह छबि देख रही एकटक हियेमें करत विचार ॥ सूरदास
मन चरण कमल पर सुखसों करत विहार ॥३ ॥ | Sorat |
Bhadombadi nisi aathh bali nandrani suta jaayo kanhai . tihichhin nandrai mukhprafulit vahsukh kahyo naan jaaee ..1.. guruse biprabulav. paharaaun ..18.. kouu kahein curr chumban premses totre bachan bulaaun . kouu | Part1-033 | भादोंबदि निसि आठ बलि नंदरानी सुत जायो कन्हाई । तिहिछिन नंदराय मुखप्रफुलित वहसुख कह्यो न जाई ॥१॥ गुरुसे बिप्रबुलाव. पहराऊं ॥१८॥ कोऊ कहें कर चुंबन प्रेमसों तोतरे बचन बुलाऊं । कोऊ
कहें मनि जटित खिलोनां लें आइ सों लडाऊं ॥१९॥ सकल सुहागिनि रुचिर
भालपर चित्रित कुंकुम आड़े । सेंदुर मांग सवांरि परस्पर हँसत कपोलन
गाड़ें ॥२०॥ रतितें सरस सकल कमलासी भवन भवन प्रति डोले । बांधत
बंदन माल साथिये तोरन नग बहु मोलें ॥२१॥ चहचारों यह सुनत गोप सब
जीततित तें उठि आये | मानों सुरनर अति चतुर काम छबि भेटि महरिको
लाये ॥२२॥ कुंकुम तिलक दूब धरि दि घृत दूध महर सिरनायो । नाचत
हँसत कोऊ कछु गावत गोरसकीच मचायो ॥२३॥ बाजत दुंदुभी ढोल सप्तसुर
ग्राम सहित मूदुबीने | रंभा आदि अपछरा तुंबर तिनहूकी छबि छीने ॥२४॥
पटभुखन बहु मोल वारिके मन वांछित सब दीनें | कहत सदा चिरजीयो लाल यह
किये महारस भीने ॥२५॥ कंचन कलस धुजा रंगराजे पीरे चमकत जो हे ।
कंसादिक जीतन कारन यह चपलात अति सोहें ॥२६॥ लीला सिंधु छबीले
श्याम गुन कबि कोऊ कहा बिचारें | वल््लभ कुल यदुनाथ तन धनि व्रजाधीश उर
धोरें. ॥२७॥
जोतसी भुखन बसन बनाई । स्वस्तियन जाति कर्म पुत्रकों करत तवें
चितचाई ॥२॥ पितर देवपूजा सुभ बिधिसों कीनी बेदबताई । मानों तिहूं
लोक जीति अब लीये कीरति जग प्रगटाई ॥३॥ गैयां तुरत सिंगारि द्विजनकों
दीनी तिन मन भाई । मानों सदा सब देत कामनां सुरभी सुद्धी बिसराई ॥४॥
तिल गिरिरत्न अमोल दान करि मंगल स्वस्ति पढ़ाई । मानों कुबेरसें किये सकल
द्विज संपति कितिक लुटाई ॥५॥ तब सुनि गोप वधु घरघरते निकसी गावत
बधाई । मानों नंदघर सागर मिलिवेको बिबिध त्रिवेनी आई ॥६॥ सुंदर बदन
कमल ससि सरसे बरसे सुधा मिठाई । कंचन दामिनि तें तन सुंदर खंजन नेन
निकाई ॥७॥ सोभित कान तरुकली झुमक रंगरंग नगन जड़ाई ॥ भानों
शुक्र कुंज गुरु बुध हितसों बेठे करि समताई ॥८॥ सारी झीनी हँस गज गवनी
ओर सभा बसुधाई । लहेंगा बहु रंग कंचुकी गाठी बेनि सिथिल गुहाई ॥९॥
सुभ्न कुसुम सुधरे केसनतें गिरत पण न ढिग जाई । कीरति लपट मानों मधुकर
सब पीवत कजन रसधाई ॥१०) हार पदिक चमकत मुख चिबुकें नूपुर पग
अरुनाई । मानों तीयरुप कमल फुलवारी रची विविध रंग झाई ॥११॥ कंचन
थाल लियें सब कर मृदु कुंकुम आदि धराई ॥ मानों उदें राव बहुत सरसके
केवलनपर हित ठाई ॥१३॥ प्रेम मग्न व्रजराज कुंवर में तन सुधि सब बिसराई।
अति सुगंध लपटी चहुं दिसतें जसोमति निकट बुलाई ॥ १३॥ पूरन परमानंद
रूपकों निरखत द्रगन अघाई । सकल कला ससिउदित ढिज मानों जुगजुग तिमिर
नसाई ॥१४॥ पूजत नंदरानी सुत तिहिछिन बोलत सुधा सनाई ॥ भाटन
ओर सुततरुनी गन कीनी कबित बडाई ॥१५॥ पूछत नाम करन रिषि सब
मिलि गर्ग बतायो सो केंसों ॥ केंहे अचल सुखद ब्रज मंडल ओर न दूजो
एसो ॥१६॥ तुम्हारे मन अभिलाख हती यह दिन दिन होते सवायो ।
अबिचारित धन मन ज्यों त्यों यह परम पदारथ पायो ॥१७॥ कोऊ कहत यह
सिसु उछंग ले यह छिनु कंठ लगाऊ कोऊ कहत तन पीत झगुलिया उर करला | Asawari |
Jahan-jahein charan-kamal maadhau key taheen-taheen munn morr . | NityaPad-363 | जहँ-जहेँ चरन-कमल माधौ के तहीं-तहीं मन मोर ।
जे पद-कमल फिरत बुंदावन गो-धन संग किशोर ॥
चिंतन करों जसोदानंदन मुदित सांझ अरु भोर |
कमल-नयन घनश्याम सुभग - तन पीतांबर के छोर ॥
इष्ट देवता सब बिधि मेरे जे माखन के चोर।॥।
'परमानंददास' की जीवनि गोपिनि पट झकझोर ।। | Bihaag |
Aaj nandlal mukhchand nayanan nirakh parammangal bhayo bhawan | NityaPad-137 | आज नंदलाल मुखचंद नयनन निरख परममंगल भयो भवन
मेरे।। कोटि कंदर्प लावण्य एकत्रकर वारूं तबही जब नेक हेरे।।१॥ सकल सुख
सदन हरषित बदन गोपवर प्रबल मदनदल संग घेरें ॥। कहो कोऊ केसें हूननहें
सुधबुद्ध बने गदाधर मिश्र गिरिधरनटेरे ॥२॥। | Khat |
Teree gati agaadh mope barni naan jaay niranjan niraakaar narayan | Part1-079 | तेरी गति अगाध मोपे बरनी न जाय निरंजन निराकार नारायण
सप्त द्वीप सप्त खंड अष्टकुल पर्वत को मेरु रच्यो सप्त धारायन ॥१॥ तू ही चंद
तू ही सूरज तू ही उडगन के तारे तू ही तेज पवन पानी तू ही धरनि आसमान |
तानसेन के प्रभु घटघट में करत ज्ञान अगमनिगम सकल सृष्टि धरत ध्यान ॥२॥
| Lalit |
Vraj mein horry khelati saanvaro manmohan jaakon | Part3-167 | ब्रज में होरी खेलति साँवरो मनमोहन जाकों
नाम ॥ फागु सकल ब्रज रम रह्यो रस भीजि रह्यों सब जाम ॥१।| नटवर
भ्रेष उतारि कें बिप्र भये गोपीनाथ ॥ जिनके नैननि कौतुक बारे तेइ ब्रज
के लरिका साथ ॥२॥| नव तरूनी और रूपवती हैं हरि ताकी बाखर जात ॥ चितवत अति अनुराग सौं औ कहति भेद की बात ॥३॥ गोपी कहे अह्ो
विप्र जू हम कछु पूछत तुम सौं ॥ हमारी प्रीत जू हरि सौं लागी कछु हरि
हू की हम सौं ॥४॥| कहति हौं बाके जिय की तुम सौं. तुम सुनौं हि को
हेत ॥ जो कछु करति तुम कारनें हरि चाहत सदाँ संकेत ॥५॥ पिय की
हँसि चितवनि लखी ओर सोभा रही निहारि॥ रीझि रीक्िि सब सँग लगी
लोक लाज डर डारि ॥६॥ श्री राधा मंत्र जपत चले हरि जहाँ कीरति
वृषभानु ॥ कहि न सकत चाहत कहा दानन में कन्या दाँनु ॥७॥ कर गहि
कै ढ़फ लाड़िली आई गावत सखियन सँग ॥ कहि “भगवान हित रामराई'
प्रभु भई नैन गति पंग ॥८॥ | Dhanashri |
Maaee ree rung raheri laalan una hii trian sanga, nirakhat chhavi | NityaPad-054 | माई री रंग रहेरी लालन उन ही त्रियन संग, निरखत छवि
ढंग परत ओरे ओरे ओरे ॥ ले दरपन मुख देखो जु प्यारे लाल, अधरनि अंजन
लाग्यो ठोर ठोर ॥ १॥ हमसों अवध बदी ओरनसों रत मानी, करत फिरत पीत
नई नई पोर पोर।। जाओ जी जाओ तुम उनही के सूर प्रभु काहे को आवत प्रात
मेरे दोर दोर ॥२॥। | Malkos |
Bhookho bhayo aaj mero baaro ..| | NityaPad-074 | भूखो भयो आज मेरो बारो ॥|
भोरही ग्वाल उराहनो लाई उठतहीं कियो पसारो ॥ १॥
पहि लेही रोहिणीसों कहिराख्यो तुर्तकरो जो नार॥
ग्वालबाल सब बोललये मिली बैठे नंदकुमार ॥ २।
भोजन बेग लावो कछु मैया भूख लगी मोहि भारी ॥
आजु सवारे कछु न खायो सुनत हसी महेतारी ॥३॥।
रोहिनी चितेरही यशुमति तनसिर धुनधुन पछितानी ॥
परोसों वेग बेर कित लावत भूखो सारंगपानी ॥।४॥
बहुव्यंजन बहुभांत रसोई षटरस किय प्रकार ॥।
सूरस्याम हलधर दोऊ भैया और सखा सब ग्वार ॥५॥ | Dhanshree |
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