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Sheetkal Ke Pad
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Kirtan Title | Page | Kirtan | Raag |
|---|---|---|---|
Jhoolo paalane nandanand | gahat fudan duhuunkar curry hansat | Part1-094 | झूलो पालने नंदनंद | गहत फुदान दुहूँकर करि हँसत
किलकत मंद ॥१॥ चुवत मुखतें लार रस मानों कमलते मकरंद । निरखि
गोपी अतिहिं फूलें अधर रस सुख कंद ॥२॥ चरन कोमल अरुन मानों पल्लव
नव महकंद । गहि अंगुठा बदन मेलत पीवत रति रस चंद ॥३॥ पौढ़ि सगरे
अंग नचावत खेलत मिलवत फंद । रसिक मेरे मन बसौ यह बाललीला छंद।।४॥
| Ramkali |
Udho manato naheen dashbis | aeka hato sou gayo | NityaPad-373 | उधो मनतो नहीं दशबीस | एक हतो सो गयो
एयामसंग कोन भजे जगदीश ॥। १॥
भये सिथिल सबे माधोबिन ज्यों देही बिन शीश |
स्वास अटक रहो आशा लगि रही जीयो कोटि वरीश ॥।२॥
तुमतों सखा श्यामसुंदरके सकल जोगके इश।
सूरदास रसिकनकी बतिया को बूजबवे यह रीस ॥३॥ | Bihaag |
Radhamo hunn | NityaPad-300 | राधामो हन
करत बियारू।॥। एक करथार सवारें सुंदरि एक वेष एकरूप उज्यारी ॥। १॥॥ मधुमेवा
पकवान मिठाई दंपति अतिरुचि कारी ॥ सूरदास को जूंठन दीनी अतिप्रसन्न
ललितारी ॥२॥ | Kanharo |
Bhor tamchor boley dijeju darsanan .. aaturvhe uthh dhaaye dagmagaat | NityaPad-143 | भोर तमचोर बोले दीजेजु दरसनां ॥ आतुरव्हे उठ धाये डगमगात
चरण आये आलसमें नयनबेन अटपटे रसनां ॥॥९॥ एक संध्याजु कहि सिधारे
बचन जियमें विचारे सकुचकें मंद प्रकटत दशनां ॥। च॒तुर्भुजप्रभु गिरिधरन सिधारो
तहां जहां रतिरंग कियें पलट आये वसनां ॥२॥ | Bhairav |
Kalindi key teer manohar, kreedat hain douu bhaiya .. | Part3-033 | कालिंदी के तीर मनोहर, क्रीडत हैं दोऊ भैया ॥
मल्लकाछ कांटे सीस टिपारो देखत अति सचु पैया ॥ १॥ वृन्दावन रमनीय
भूमि अति कूजत मोर पपैया ॥ राग रागनी तान सरस सुर कोकिलनाद
सुहैया ॥२॥ संग राधिक ललितादि अष्ट सखी कुंकुम कलस भरैया।| छिरकत
श्यामस्याम कुंजनमें रूचिर गुलाल उडैया || ३॥| बरखत कुसुम कुसुम देवमुनि
नारद आनन्द अति हरखैया ॥ कृष्णदास प्रभु यह सुख बिलसत निरखत
लेत बलैया ॥४॥ | Basant |
Parvat pahelen khodi bahaauun.. vachn maar patal pathaaun..1.. | Part2-080 | पर्वत पहेलें खोदि बहाऊं।। वच्न मार पाताल पठाऊं॥१॥
फूलफूल जिन कौनो॥ नेंक न राखों ताकों चीन्हों ॥२ ॥
नंद गोप नयनन यह देखें [॥ बड़े देवताकों मुख पेखें ॥३ ॥
निंदित मोहि करी गिरिपूजा ॥ जासों कहत ओर नहि दूजा ॥४ ॥
गर्व करत गोवर्द्धन ग िरिको ॥ पर्वत मांहि आहि कहा किरको ॥५ ॥
डूंगरको बल इनहि दिखाऊं॥ ता पाछें ब्रजखोद बहाऊं।।६ |
राखों नहीं काहू सब मारों ॥ व्रजगोकुलको खोज निवारों ॥७ ॥
को जाने कहां गिरि कहां गोकुल ॥ भूपर नहीं राखों उनको कुल ॥८ ॥
सूरदास यह इंद्र प्रतिज्ञा ॥ ब्रजवासिन सब करी अवज्ञा ॥९ ॥ | Bilawal |
Lalmai baithe raajat huttery.. | Part2-060 | लालमाई बैठे राजत हटरी॥
रानीजूसाज संम्हार धर्यो बलराम कृष्णको बटरी ॥१॥
लडु॒वा गूंजा पकवान बहुत कर भरभर थार धरीहें मठरी॥
गृहगृहतें गोपी सब आई भीरभई तहां ठटरी॥२॥
तोलतोल कें देत सबनकों भाव अटलकर राख्यो अटरी ॥
रसिकप्रभुके नयनन लागी श्रीवृषभान कुंवरिकी रटरी ॥३ ॥ | Kanharo |
Rainto ghatat jaat sunari sayani baat mero | NityaPad-325 | रैनतो घटत जात सुनरी सयानी बात मेरो
कह्मो माने नाहिं तोहि नासुहातरी ॥। सुखके सोहाय भरी ऐसी कैसी टेबपरी घटत
ना मानतेरो दया मं आवतरी ॥ १॥ जाके दरशकों सब जग तरसत सोई तेरे रूपबिन
रह्यो नजातरी ॥| नंददास नंदलाल बैठे अतिशय विहाल मुरलीकी ध्वनिसुन तेरो
नाम गातरी ॥२॥ | Bihagaro |
Keerati aur vrishbhan kunwarin lai baith chauk suhaaye . soney roope | Part1-188 | कीरति और वृषभान कुँवरिं लै बैठ चौक सुहाये । सोने रूपे
वसन समेत दिवावत विप्रन गाये ॥१॥ दोहरी देत सबन पहर ामनि मन आनंद
बढ़ाये । गोपी ग्वाल सुरंग कुंकुमके माथें तिलक कराये ॥२॥ अपने कुँवर
और इनकी कुँवरि तन देखि रहत व्रजरानी ! फिरि मुसिक्याय कहति कीरति सों
मेरी तेरी तपति बुझानी ॥३॥ सब सबसों गोकुल और राबल और सकल
ब्रजवासी । श्रीविहलगिरिधरन राधिका प्रगर्टी है सुखरासी ॥४॥ | Saarang |
Danahin daan curry nakmani kahaa paranau merey khyaal lalre . | Part1-231 | दानहीं दान करी नकमानी कहा परणौ मेरे ख्याल लालरे ।
जो हम यह व्योहार छाँड़िदें दही महीकौ भये कहाँके दानी ॥१॥ कीजै नफा
को होत हानि सोई सोनों जाहु जर जाते टूटें कान । कृष्णजीवन लछीरामके प्रभु
प्यारे तुम व्योसे जैसी हम व्यौसान ॥२॥ | Bilawal |
Valimatohon khelongi horry .. merrie aankhin bharon | Part3-196 | वालिमतोहों खेलोंगी होरी ॥ मेरी आंखिन भरोन
गुलाल ॥्रु० ॥ कहा कह्यो हो तब मोसों खेलत यमुना तीर ॥ तन मन
सुधि भूली अब काहे धाय गहत मेरो चीर ॥९॥ सखी बुलाय कह्मो प्यारे
प्यारीसों कह्टि समुझआाय ॥ अब ज्यों ज्यों कडिहो तुम त्यों त्यों खेलेंगे हम
आय ॥२॥ यह सुन उत खेलन कों प्यारी कीयो अपनों जोर ॥ इत हलघर
नंद नंदन दोऊ ग्वालन में कीयो सोर ॥३॥ रत्नजटित पिचकारि भरिलिनो
केसर नीर ॥ ताक ताक युवती जण ऊपर छिरक कीयो हियोसीर ॥४॥
तब प्यारी सखियन ले धाई बंसन लीने हाथ ॥ सुरंग गुलाल उडाय दुहूं
दिस धाय गहे ब्रजनाथ ॥५॥ चोवा मेद जवाद साख गोरा मृगमद घन
सार ॥ सरस फुलेल अरगजा ले ले पहरावत उरहार ॥ ६॥ झांझ भेरि किन्नरि का एव यम बाण थी 2 || आन लललतल रबाब बीना महवर सहनाइ || वीच वीच मरलीहि बजावत ओरवाजे बजवाई जय ॥2॥|
दमाती डोले बिना बुलाई बोले ॥ घोवा
डोले ॥ १॥ तूजो जोवन ठीटरी ग्वालिन
की गांठ धीरज प्रभु भरुवा होय सो
हो होरी खेलें लाल संग ग्वाल इकदिसि
र बीना श्रीमंडल अमृत कुंडली आवज
| सुमन कलस नवतमाल उडवत अवीर
छतियां लाय चुंवन दे करत ख्याल ॥
ग॒ कर रसाल राग रंग सहित गाबत
देह गोकुल पाल मेवा पीतांबर गुंजहार
फर्ल्मत सभा! आपर 5 | Kaafi |
Bunn thhan aaee rangili gangaur. | Part2-249 | बन ठन आई रंगीली गनगौर।
सजि सिंगार चञ्जल मृगनेनी पहेरें पीत पटोर ॥१ ॥
सखी सहेली ले संग राधा गावत नंद की पोर।
निरखत हरखत अतिरस बरखत मोहे नंद किसोर ॥२ ॥
उपजी प्रीति परस्पर अन्तर मानो चंद चकोर |
'कृष्णदास' पिय प्यारी की छबि पर डारत हैं तृन तोर ।।३॥।। | Noor Saraang |
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