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Sheetkal Ke Pad
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Kirtan Title | Page | Kirtan | Raag |
|---|---|---|---|
Pyaare avadhivadi ghar aavan kii .. | NityaPad-110 | प्यारे अवधिवदी घर आवन की ॥
जिहिजिहि जानी तिहि रति मानी टेव परीरी मोहि खिजावनकी ।। १॥|
बहुत गई अब थोरीसी रही यारे विरहनी विरह जगावनकी ॥
सूरदासप्रभुसो जाय कहियो आपही रीझे और रिझावन की ॥२॥ | Nayaki |
Agh samharini adham udharini kalikal tarini madhumathan gunakatha .. | NityaPad-365 | अघ संहारिनी अधम उधारिनी कलिकाल तारिनी मधुमथन गुणकथा ॥
मंगल वधायिनी प्रेमरसदायिनी भक्ति अनुपायिनी होत जिय सर्वथा ॥ १॥
मथवेद कथग्रंथ कहत व्यासादि मुनि अजहुँ अधुनीक जन कहतहूँ मतियथा !।
परम पदसो पानकरो गदाधर गान अन्य आलापतें जात जीवनवृथा ॥२॥ | Bihaag |
Chandan pahiri chully sukumari laalan kau munn | NityaPad-242 | चंदन पहिरि चली सुकुमारि लालन कौ मन
मोहे ॥ सारी सरस बनी अति झीनी कर नौलासी सोहें ॥१॥ कर नोती झाई
गंडनि पर देखत ही मन लोभा ॥ मृगमद तिलक विराजे भाल पर अखिल
भुवन की सोभा ॥ २॥ पंकज लोचन अति अनियारे अंजन रेखा राजें ॥ नासा
बेसरि की छबि निरखत कोटि काम छबि लाजे ॥३॥ अरून अधर दसनावलि
की दुति चिबुक चिन्ह सुखकारी ॥ मुख अवलोकति सखी ललितादिक अपनों
तन मन वारी ॥४॥ स्थाम संग कुंजन में ठाढी करत विनोद विसेके ॥।
“गदाधरदास कहांलो बरनों जा मुख रसना इके ॥॥५॥ | Saarang |
Daan dey hari gwalan soun maani .. bhalee bhookh mein chhaak leey aaee | Part1-249 | दान दे हरि ग्वालन सों मानी ॥ भली भूख में छाक ले आई
प्रिति जिय की तेरी न जानी ॥१॥ अब लेहो बोल ग्वाल बालन को बल भैया
हू को टेर बुलाऊं | आई है छाक भई गैया इक ठौरी मंडल जोरि बनाऊं ॥२॥
तिहि छिनु हलधर सँंग सब आए तत्क्षन भोजन कों बैठा रे ॥ “दास चतुरभुज”
प्रभु तरू कदंब के पनवारों लै गिरिधर डारै ॥३॥ | Saarang |
Rahat mandaranori dwaar merey ... houn kaisen nikso merrie aliri baahar | NityaPad-312 | रहत मंडरानोरी द्वार मेरे ॥। हों कैसें निकसो मेरी आलीरी बाहर
ठाडोई देखों निशदिन रहत घेरें ॥ ९॥ कबहुंक वेणु बजावत गावत पिछवारे हवै
बोल सुनावत टेरें॥ हों घती पल डरपतहों चतुर बिहारी जिन आवे घरमें दीये
दरेरे॥२॥ | Iman |
Radhajukon lalita manaayaliyen aavat harijuke kanpari noopurbhanak || | NityaPad-335 | राधाजूकों ललिता मनायलियें आवत हरिजूके कानपरी नूपुरभनक ||
तल्परची किसलयदल हाथरहे प्रतिधुनि हियेभई बाज झनक ।।१॥
जब जायमिली लपटानी हरि हियो त्योंत्यों फेरमिटत कांसेकी ठनक।॥।
सूरदासमदनमोहन श्याम रिझे परस्पर हंसत हंसत पोढे परिअंक खनक ॥२॥ | Kanharo |
Chali dekhan jaithen nandlal ..dhu0.. banithani aaeen | Part3-050 | चलि देखन जैथें नंदलाल ॥ध्ु०॥ बनिठनि आईं
सब ब्रज की बाल ॥ ऋतु बसंत गावहु रसाल ॥१॥ चली राधे कुंवरि
सहचरिन संग ॥ लीयें ढफआवज किन्नरी मृदंग ॥ बिच महुंवर मधुर बाजे
ऊपंग ॥ ले मिली स्यामसों रागरंग ॥२॥ रंगरंगी मदन पचरंग अबीर॥
आये करति कुलाहल यमुनातीर ॥ ठाडे मधुसूदन गोपीनीर ॥ नवकेसरि
के रंगरंगे चीर ॥३॥ जिहिं कुंज मधुप गुननिवास ॥ बोले अंबडार कोकिल
प्रकास ॥ जहाँ स्यामसुंदर करें बिलास ॥ श्रीजगन्नाथ भजि माधोदास ॥४॥ | Basant |
Vrishbhan nripati darbara bajebaje mendilra | pragati haye shubh | Part1-203 | वृषभान नृपति दरबारा बाजेबाजे मेंदिलरा | प्रगटी है शुभ
घरी नक्षत्र ब्रज रोप्यो है बंदनवारा ॥१॥ सखी सहेली मंगल गावें नाखें साँचे
तारा । गरीबदास की स्वामिनि प्रगटी बाह्यौ रंग अपारा ॥२॥ | Bihaag |
Piya binn jaagat raine gaee .. avadhivadi gaye ajahuun naan aaye | NityaPad-052 | पिय बिन जागत रेन गई ॥ अवधिवदि गए अजहूं न आये
बडी वेर भई ॥ १॥ कछु कहत करत कछु कोने सीख दई ।। सांच नही एको अंग
कहां रीत लई ॥२॥ कैसे कीजे विश्वास भएहो बिषई ॥ रसिकप्रीतम रावरीहे
छिनछिन गति न ई ।। ३॥॥ | Lalit |
Mohan vrajkeri rattan . aeka charitra aaj mein dekhyau pootana | Part1-147 | मोहन व्रजकेरी रतन । एक चरित्र आज में देख्यौ पूतना
पतन ॥१॥ तृणावर्त लै गयौ अकाशें ताही कों धतन । जेजे दुष्ट उपद्रव ठाने
तिनहीं कों हतन ॥२॥ सुनिरी यशोदा या मोहनकों करे जतन ।
परमानंददासको जीवन श्याम है सुतन ॥३॥ | Bilawal |
Srivitthalnath naam rasamrit panasdatu curr ray rasna .. | NityaPad-365 | श्रीविद्ठलनाथ नाम रसअमृत पानसदातू कर रे रसना ॥
जोतू अपनो भलो चाहिते यह व्रत जिय धर रे रसना ॥१॥
यारसके प्रतिबंधक जेते तिनते तू अतिडर रे रसना।।
हरिकों विमलयश गावतनिरंतर जातविघ्न सबटर रे ससना ॥२॥
वारंबार कहतहूं तोसों यह मारग अनुसर रेरसना ॥
छीतस्वामी गिरिधरन श्रीविट्ठल आनंद उरमें भर रे रसना ॥३॥ | Bihaag |
Dhaadhi tein padhi nand rijhaayi | jasumati sutaki keerati gaaee | Part1-118 | ढाढ़ी तें पढ़ि नंद रिझायी | जसुमति सुतकी कीरति गाई
संबहिनके मन भायो ॥१॥ नंद सुबागौ अपने गरेकौ ढाढ़ीकों पहरायौ । दीनी
धेनु धौरी और धूमरि अरु भंडार खुलायी ॥२॥ ढाढ़िनकों सोनेके नूपुर गहनो
अगढ़ गढ़ायौ । रतन खचित खगवारों गरेकौ ढाढ़िनकूँ पहरायो ॥३॥ तेरे भरें
भलौ यथा व्रजकौ या घर मंगल गायौ । सूरदासकों सर्वसु दीनौ मंगल सुजस
सुनायी ॥४॥ | Dhanashri |
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