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Sheetkal Ke Pad
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Kirtan Title | Page | Kirtan | Raag |
|---|---|---|---|
Inn ankhiyan aagete laalan eko palchhin hoy nannyaare .. | NityaPad-298 | इन अँखियन आगेते लालन एको पलछिन होय नन््यारे ॥
बलबल जाउं वदन देखनकों तरसतहैं नयनन के तारे।। १॥ बोहोरच्यो सखा बुलाय
संगके यही आंगन खेलो मेरे प्यारे ॥ निरखत रहूं पन्नगकी मणि ज्यों सुंदर
बालविनोद तिहारे ॥२॥ मधु मेवा पकवान मिठाई व्यंजन मीठे खाटे
खारे ॥ सूरस्यामको जोईजोई भावे सोईसोई माँगलेहु मेरे प्यार े ॥३॥ | Iman |
Khelat raas rasik nandlal .. | Pustak1-326 | खेलत रास रसिक नंदलाल ॥
यमुना पुलिन शरद निशि शोभित रचि मंडल ठाढ़ी व्रजबाल ॥१॥
तत थेई थेई तत थेई शब्द उघटत बाजत झाँझ पखावज ताल ॥
जम्यौ सरसही राग परस्पर गुंजत कोमल वेणु रसाल ॥२॥
सन्मुख लेत हैं उरप तिर॒प दोऊ राधा रसिकनि मदनगोपाल ॥
मानों जलद दामिनी स्सपूरण कनक लता मानों श्यामतमाल ॥३॥
सुरपुर नारि निहार परम रस और रतिपति मनमें भयौ बेहाल ॥
थकित चंद गति मंद भयौ अति चूके मुनि ध्यान धरत तिहिं काल ॥४॥
परम बिलास रच्यौ नटनागर विलुलित उरसि मनों अलिमाल ॥
क्रृष्णदास लालगिरिधर गति पावत नाहिंन हस्ती मराल ॥५)॥ | Khat |
Nishdin srivallabhagun gaayo .. | NityaPad-348 | निशदिन श्रीवल्लभगुण गायो ॥
भक्तकमल प्रकाशित कर निजजनहि सुधा पिवायो ॥। १॥
ज्ञानयोग वैराग्य जपतप अन्य भजन भजाये ||
ब्रजाधीश विलास श्रीवल्लभ चरणकमल शिरनाये ॥ | Bihaag |
Dhaadhi prem magan vhai naanche | dhaadhin sanga vrajraj nand ghar atee | Part1-127 | ढाढ़ि प्रेम मगन व्है नाँचे | ढाढ़िन संग व्रजराज नंद घर अति
अद्भुत सुख साँचे ॥९॥। पुत्र जन्म मैं सुन्यौ तिहारें सबहिनके सुखदानी । बहुत
दिनन की हुती लालसा सुफल आज मैं जानी ॥२॥ धनि धनि घरी मुहूरत पल
छिन धन्य दिवस निस मानी । अबहों आयो देंन असीसा जसुमति कूरि
सिरानी ॥३॥ मच्छ कच्छ बारह नृसिंघ परसराम बपु धारञ । श्रीरघुवीर धी
प्रगट व्है बहु बिधि जस विस्तारञ ॥४॥ अब श्रीकृष्ण प्रगट भये तुम्हारें सब
जगके उजियारे । लीला चरित्र बिनोद बढ़ावत यह जस सरस तुम्हारे ॥५॥
अब तुम सुनौ पढ़ूँ विरदावलि श्रीवललभ कुल जस गाऊँ । परम उदार दयानिधि
दाता तिनकौ सुजस सुनाऊँ ॥६॥ गाय बच्छ सब नरनारि के आनंद प्रेम
बढाऊँ । तिनकी कृपा अनुग्रह मोपै बारवार शिरनाऊँ ॥७|| महा बाहु भये
कंजनाभजू तिनकौ जस सुनि लीजै | भुज बल चित्रसेन अज मींडृहू परनाली मन
दीजै ॥८॥ तिनके पुत्रन बहू सुखदाई रहत प्रेममें भीजै | महानंद सूर सुरानंदसो
नंदनंद सुख कीजै ॥९॥ धरानंद ध्रुवनंद और उपनंद परम उपकारी | अभिनंदन
श्रीनंदरायजू वर ऐसी महतारी ॥१०॥ जसुमतिकें श्रीकृष्ण प्रगट भये तिनकी
हों बलिहारी । असुर संघारन दुष्टन मारन संतन के सुखकारी ॥११॥ जसुमति
कुल्या तुल्या तुंग और पियारी रानी । पाँच गोप की विदित भामती सो मैं प्रगट
बखानी ॥|१२॥ अविचल यह परिवार तिहारी भूर भाग्य रजधानी । यह असीस
ढाढ़ी ढाढ़िन की वेदन हू में गानी ॥१३)। सात साखिकौ ढाढ़ी तिहारौ तुम
बिन ओर न जाँचू । सत् संपति तिहारे प्रताप सों गोपन के गुन बाँचूँ ॥१४॥
जब लों वह उच्छाह तिहारे ठाढ़िन संग ले नाँचूँ। अब चाहत गोपाललालकी चरन
कमल रज रॉचूँ ॥१५॥ रतन जटित हेम टोडर मुदरी पार्टंबर पहराये । मणि
तुरंग भूषन गज महिषी गायन खरिक बताये ॥१६॥ अन्न धन दीनों ब्रजजन
जो सबन भयौ मन भायौ । सूरदास व्रजरानी रीक्षि हँसि अपनी बाँह
बसायौ ॥१७॥ | Maroo |
Dhota kaahe koo badhaavat raari mohi ghar jaann dey ... yeye naina | Part1-238 | ढोटा काहे को बढावत रारि मोहि घर जांन दे ।॥ ये नैना
तें काहा पाये दधि की बेचन हार जोबन मद माती फिरे प्यारी गुजर गर्व गवार॥१॥
तुम गोकुल की ग्वालिन काहे करत अवेर ॥ दान हमारो दीजियें सो ग्वालिनी
राखी घेर ॥२॥ तुम ढोटा ब्रजराज के कान्ह तुम्हारो नाम ॥ हठ जिन कीजे
सावरे बसीयत इक ही गाम ॥३॥ दथि बेचन ग्वालिन चली मिले ओंचका
कान ॥ रसिक रसीले साँवरे गही मटुकिया आन ॥४॥ दानी नंदकुमार नें
तानी भोंह कमान ॥ जात कहा ब्रज सुंदरी गुजर दे हो हमारों दान ॥५॥
तुम दानी कब के भए कब हम दीनों दान ॥ गाई चरावत नंद की भए अनोंखे
कान ॥६॥ मोर मुकुट माथें धरों रिमझिम बरषे मेह ॥ मेरी मटुकिया छांडि
दे लाला और सबन की लेह ॥७॥ मोर मुकुट माथे धरों जासों बढे सनेह ॥
क्यो हमारों मानीये अचरा छांडि तुम देह ॥८॥ हों गुजरि राजा कंस की गहि
पकराऊं तोहि ॥ आधी राति के भाजीयों काहे को परगट हो हि ॥९॥ भुजा
ऊखारो तेरे कंस की करो मथुरां कों राज ॥ दान हमारो दीजिये गुजर काहे कों
बढ़ावत रार ॥१०॥ तुम दानी कब के भए कब हम दीनो दान ॥ हमपि
छाप दिखराव ही तुम कापें पहिराय्रो दान ॥११॥ लें आए तो लेंहिगे कबहु
न करि हैं कान ॥ मोहि दुहाई नंद की तुम देहो हमारो दान ॥१२)| सखियन
मधि राधिका ग्वालन मधि बलबीर ॥ झगरों ठानो दानकों कालिंदी के तीर
॥१३॥ बारबार हो बरजती कह्मों हमारों मान ॥ मारौंगी रे ग्वालिया मोहि
दाऊ की आन ॥१४॥ मोर पखौआ सिर धरों बांस फुंकनी फेंट ॥ हाथ
लकुटीया गहि लई यह सिंगार पर ऐंठ ॥१५॥ ब्रिन्दावन की कुंज में मोहन
दीनी टेर ॥ नंद महरि के लाडिले ग्वालिन राखों घेर ॥१६॥ माय तुम्हारी
जानिये बाप चराई गाय ॥ तुम चराये जेंगयर अब मांगत दि का आय ॥१७॥
मोर चंद्रिका सिर धरो मुख मुरली घनघोर ॥ कुंज गलीन राधा रवन जै जै जुगल
किसोर ॥१८॥ गुंजावली चंदन तिलक सुढ़ार ॥ पीतांबर छुद्र घंटिका अरू
बैजंती माल ॥१९॥ मोर मुकुट माथें धरो धुंघर बारे केस ॥ यह बांनिक
मेरे मन बसों प्यारो नागर नटवर भेष ॥२०॥ दान लीला श्रीकृष्ण की सुनें
सुनावें सब कोय ॥ प्रेम भक्ति जिनके बढ़े हरि भजि निर्मल होय ॥२१॥
दि मटुकी आगें धरी ग्वालिन ल्ागी पाय )। हिलि मिलि प्रीत बढ़ाई के 'माधोदास'
बलि जाय ॥२३२॥ | Bilawal |
Urag liau harikon laptai . garv bachan kahi kahi mukh | Part1-171 | उरग लियौ हरिकों लपटाई । गर्व बचन कहि कहि मुख
भाखत मोकों नहिं जानत अहिराई ॥१॥ लिये लपेटि चरण तें शिखलों अति
यह मोकों करि ढिठाई । चाँपी पूँछ लुकावत अपनी युवतिनकों नहिं सकत
दिखाई ॥२॥ प्रभु अंतर्यामी सब जानत अब डारों यह सकुच मिटाई । सूरदास
प्रभु तनु विस्तास्या काली बिकल भयौ तब जाई ॥३॥ | Bilawal |
Kahaari kahon mohan mukhshobha kahaa karun sirparihai thagori | NityaPad-114 | कहारी कहों मोहन मुखशोभा कहा करुं सिरपरीहै ठगोरी
रूपदेख मेरो मन भयो लोभा ॥। १॥। अंग अंग लावण्यरूप छबि मानोंहो मदनद्गुम
उपजी गोभा ॥ कृष्णदास गिरिधरन किये वश चपल कटाक्ष गढ़यो मन
चोभा॥।२॥ | Adano |
Atee suvas seetal | NityaPad-244 | अति सुवास सीतल
उसीर सार छिरकत बार वार अतिसुकुमारी ॥-भरि गुलाब जल अपार फुहारेन
की झर झरात चंदन छिरकत छैल पहिर स्वेत सारी ॥१॥ बार बार तृन तोरे
गोकुल चंद पर स्यथामा सलोनी संग चितवत चित चोरे ॥
'छीत स्वामी '
गिरिवरधर वि्डलेश पद प्रताप निरखि नैंन रस बस भई सब ही तृन तोरे ॥२॥। | Saarang |
Nand nandan vrishabhaanu nandani sanga saras rituraj | Part3-061 | नंद नंदन वृषभानु नंदनी संग सरस ऋतुराज
बिहरति बसंते ॥ इत सखा संग सोभित श्रीगिरिवरधरन उत जुबति जन मधि राधा लसंते ॥१॥
सूरजा तट सुभग परम रमनीय बन सुखद मारुत मलय मृदुल बहंते ॥
प्रफुलित मल्लिका मालती माधवी कुहूँ कुहँ सन्द कोकिल हसंते ॥२॥|
विविध सुर ग्राम तीन ग्राम जाबत सुघर नागरी ताल कठताल
बाजति मृदंगे ॥ बैनु बीना अमृत कुंडली किन्नरी झांझि बहु भांति चंग उपंगे॥३॥
चंदन सु बंदन अबीर नव अरणजा मेद गोरा साख बहु घसंते ॥
छिरकति परसपरि सु दंपति रस भरे करतिं बहु केलि मुसकनि हसंते ॥४॥
देखि सोभा सुभग मोह़े सिव बिधि तहाँ थकित अमरेस लजित अनंगे ॥
“गोविंद' प्रभु हरिदास बर्य धरि घोष पति जुबति जन मान भंगे ॥५॥ | Basant |
Mainhariki muratni bunn paaee .. suna yashumati sanga chhaand aapano | NityaPad-024 | मैंहरिकी मुरत्नी बन पाई ॥ सुन यशुमति संग छांड आपनो
कुंवर जगाय देनहों आई ॥।१॥ सुन त्रिय बचन विहस उठ बैठे अंत्तरयामी कुंवर
कन्हाई ॥ मुरलीके संग हुती मेरी पहुंची दे राधे वृषभान दुहाई ॥२॥ में निहार
नीची नहीं देखी चलो संग दें ढोरे बताई ॥ बाढी प्रीति मदन मोहनसों घर बैठे
यशुमति बोहोराई ॥३॥ पायो परम भावतो जियको दोऊ पढे एक चतुराई ॥
परमानंददास जाहि बूझो जिन यह केलि जन्म भरगाई ॥।४॥ | Ramkali |
Srigokulrai kumar .. kamal dall lochana .. | Part3-292 | श्रीगोकुलराय कुमार ॥ कमल दल लोचना ॥
ठाडे हैं सिंघदुवार ॥ कमल दल लोचना | नखसिख भेस बनाय ॥ सुंदरता
अति सार ॥१॥ रसभरे नंदकिशोर ॥ निकसे खेलन फाग ॥ मधुर वेणु
करभधरे ॥ गावत गोरी राग ॥२॥ आये ब्रजके चोहटें ॥ लिये सखा सब
संग ॥ नव भूषण नव वसन ॥| शोभित सामल अंग ॥३॥ उपमा कही न
जाय ॥ सुंदर मुख आनंद ॥ बालक बूंद नक्षत्र ॥ प्रगटे पुरण चंद ॥8॥
बाजत ताल मृदंग ॥ आबज डफ मुख चंग || मदन भेरि सुरबीन ॥ गिडणिडि
झांझ उपंग ॥५॥ श्रवण सुनत चली दौर ॥ गृहणृहते ब्रजनारि ॥ तिनमें
परम सुदेश ॥ राधा अति सुकुमारि ॥६॥ बने चीर आभरण ॥ सबतन
विविध सिंगार ॥ कंकण कटि किंकिणी || उरगज मोतिन हार ॥७॥ नकबेसर
ताटंक ॥ कंठसरी अनुभांति ॥ चोकी बनी जराय ॥ दूर करत रविकांति
॥८॥ सेंदुर तिलक तंबोल ॥ खुटिला बने विसेख ॥ शोभित केसर आड ॥
कुंकुम कज्जल रेख ॥।९॥ प्रफुल्लित अति आनंद ॥ चितवत हरि मुख ओर ॥
मानो विधु प्रीतम मिले ॥ सादर चारू कोर ॥१०॥ रूप नयन रसभरे ॥
वारंबार निहार ॥ गावें झूमक चेत ॥ बीच सुहाई गार ॥१ १॥ चोवा चंदन
अरणजा ॥ सोंधें सजे अनेक | पिचकाई कर लिये ॥ धाईं एकते एक
॥१२॥ अतिभर बांधे फेंट | सुरंग अबीर गुलाल ॥ दुहंदिश माच्यो खेल ॥
इतगोपी उत्तग्वाल ॥|१३॥ नरनारी परी चोंक ॥ छिरकत तकतक जेह ॥
भरत भई अति भीर ॥ मानों बरखत मेह ॥१४॥ वरण वरण भये बसन ॥
अंगन रहे लपटाय ॥ क्रीडा रस वस मजन || आनंद उर न समाय ॥१५॥
ब्रज युवतिन मतो मत्यो ॥ मुखन जनावतबेन ॥ पकर लेह घनश्याम ॥
मिलवत इत उत सेन ॥१६॥ युवती यूथ नबपेल ।| दीने सख्रा भजाय ॥
कहत कहामतो करें ॥ अवत्तो कछू न सुहाय ॥१७॥ कहतन बाचें कछू ॥
वचन गारओर गीत ॥ झुंडन जुर चह्ं ओर ॥ जाय गद्यो पटपीत ॥१८॥
नवल कुंवर जानिये ॥ अवजो मुरली लेहु ॥ राधे करहु जुहार ॥ के हमारो
फयुवा देहु ॥ १९॥ फगुवा देह न देहु ॥ छांड हु ओर उपाय ॥ हमारो भायो
करहु ॥ के छूटो सिरनाय ॥ २०॥ प्यारी पियसों कहे | अति मीठे मृदुबोल ॥
काजर आंजे नयन ॥ रोरी हरद कपोल ॥२१॥ मुख मांडें छबि भई ॥ कोटि
मदन सिरताज ॥ त्रिभुवन सौभग लियें ॥ मानों व्याहन आयो आज ॥२२॥
क्रीडत अवचल रहो ॥ युगयुग यह ब्रजवास ॥ श्रीगिरिधर को यशगान ॥
नितकरह चतुर्भुनदास ॥२३॥ | Gouri |
Vrindaavan aeka palak joe rahiye. | NityaPad-363 | वृन्दावन एक पलक जो रहिये।
जन्म जन्म के पाप कटत है कृष्ण कृष्ण मुख कहिये ॥१॥
महाप्रसाद और जल जमुना को तनक तनक भर लहिये ॥
सूरदास बैकुंठ मधुपुरी भाग्य बिना कहां ते पैये ।२॥॥ | Bihaag |
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