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Sheetkal Ke Pad
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Kirtan Title | Page | Kirtan | Raag |
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Aur kouu samajheso samajhe hamkoon itani samajh bhalee .. | NityaPad-358 | और कोऊ समझेसो समझे हमकूं इतनी समझ भली ॥
ठाकुर नंदकिशोर हमारे ठकुरायन वृषभानलली॥।१॥
श्रीदामा आदि सखा स्वथामके स्यामासंग ललितादि अली॥
ब्रजपुर वास शैलवन विहरत कुंजनकुंजन रंगरली ।। २॥
इनके लाड चाहूँ सुखसेवा भाववेल रसफलन फली ॥
कहे भगवान हित रामरायप्रभु सबनतें इनकी कृपाभली॥३॥ | Gori |
Murali kaun tapa tein keeyau .. rahat girdhar mukhahin laagi | Part1-292 | मुरली कौन तप तें कीयौ ॥ रहत गिरधर मुखहिं लागी
अधरकौ रस पीयौ ॥१॥ नंदनंदन पानि परसकें तोय तनमन दीयों ॥
सूरश्रीगोपाल बस भये जगतमें जस लीयौ ॥२॥ | Sorat |
Beeri khabawat sthaamahin pyaari .. paake paan peere sundartabharettego | NityaPad-088 | बीरी खबावत स्थामहिं प्यारी ॥ पाके पान पीरे सुंदरताभरेततेगो
सरस संवारी ॥॥९॥ काथा चूना लॉग इलायची कपूर सरस उज्वल सुपारी ॥।
जावत्री फल मृगमद सौर सबे सजलाई बहु रुचिकारी | २॥ खाय खवाय दोऊ
परस्पर रसभरे नयन कमल मनुहारी ॥ आनन उडुपति अधरबिंब फल रसना पर
बलहारी ॥३॥ उभय सिंघासन मिलके बैठे कामकेलि क्रीडत सुखकारी ॥।
इंद्रनीलमणि हारबन्योहे माधोप्रभु श्रीगोवरधनधारी ॥४॥ | Dhanshree |
Radhika sthaamatan dekh muskani ... haar vingun lekh adhar | NityaPad-135 | राधिका स्थामतन देख मुसकानी ॥। हार विनगुण लेख अधर
अंजनरेख नयन तंबोल तुतरात वानी ॥ १॥। पाग लटपट बनी उरें छूटी तनी अंगकी
गति देख जियमें लजानी || उपट कंकनपीठ वक्र विव्हल दीठ इंठकीईठता
लखी छानी ॥२॥ पाणिपललव अधर दशन सोंगहि रही मधुरवच बोल जिय
हारमानी ॥ सूरप्रभु प्राणपति अंक भर नागरी नवलनागर उरें घालसानी ॥३॥। | Ramkali |
Horry khelati nand koo laal .. chova chandan auru | Part3-137 | होरी खेलति नंद को लाल ॥ चोवा चंदन औरू
अरगजा भरि-भरि लींनें थाल ॥९१॥ सीस टिपारो लाल के उर बैजयंती
माल ॥ नाँचति गाबति सब मन भाये खेलति फागु गुपाल ॥२॥ बाजति
ताल मृदंग झाँझ ढ़फ गावति गीत रसाल | '“ोबिंद' प्रभु कौ श्रीमुख
निरखति बलि-बलि गई ब्रज बाल ॥३॥ | Sarang |
Way dekhiyat hamaare gokulke duhkhaju .. | NityaPad-283 | वे देखीयत हमारे गोकुलके दुःखजु ॥
प्राचीदीसते नकुदछ न मेरी अंगुरी के अग्र तन नेकुं करो मखजु ॥१॥
चढगीर सुंग कहेत मोहनजु चलो बल दाऊ हम देखवेकी भुकजु ॥
जन्मभूमि चल आये गोबिन्द प्रभ ु तन पुलकत मन भयोअत सुखजु ॥२॥ | Hameer |
Bali jaauun ladili chalau sneliye fagu .. | Part3-171 | बलि जाऊँ लाडिलि चलौ स्नेलिए फागु ॥
रस निधान नबल नँदलाल सौं प्रगट करौ अनुरागु ॥१॥ जाय लाल चोहटे
सजि कैं सरस सखा लै सँग ॥ नाँचति गावतति करति कौतुहल बाजति
ताल मृदंग ॥२॥ जब आये हरि निकट पौरि कें तब रही है न सँभार ॥
सकल साज रतिराज सँग लै चरन धरौ निज दुआर ॥ ३॥| तब बोली बृषभानु
नँंदनी जाउ नँद ग्रह तीर || बिविध भाव मन हि मन संचति मुसिकात रति
रनधीर ॥9॥ दोऊ ग्रहे कर गहें बलि बलि कैं हरखि चली चंद्रावलि ॥।
काम खबरी रति लैं चली मनौं पहिरावति निज मालि ॥५॥ उत तें जाइ
नंद लाड़िलो इत तैं गोष कुमार ॥ पुलकति तन निरखति नैंननि करै घुँघट
जोट जुहार ॥६॥ मोहन उत मुरली में उघटति नबल सखि कौ नाम ॥
एहि कलि कंठ कोकिला कूजे पूजे मन के काम ॥७॥ उत तैं धुँधारि करति
गुलालनि इत पिचकाईन धार ॥| मनौं अरून घन में झलकति है चपल
चअमकि सुढ़ार |[८॥ एक सखि नब घन साँवल सौं कष्डि रख जिय की
बात ॥ ले पधराइ चलै मंदिर में जहाँ दामिनी दुति मात ॥९॥ पीय सौं
मिलि सरस ससि बदनी करत भाँवते छेलि ॥ मनौं कलप सिंगार द्रुम पहिरे
कनक बेलि रही झेलि ॥१०॥ मोहन पीय निज भुज अंतर लै डारौ कुँमकुम
नीर ॥ मनौं राधिका नव दुति विलसें साँवल सुभग सरीर ॥११॥ पिय
मुख कमल पराग लगाबैं जोति अद्भुत छबि होत ।| सुधा सिंधु मनौं चंद प्रगट भी परी कमल मुख जोत ॥१२॥ इंदु मुखि चोवा बिंदु लावैं पिय
बदनार बिंद ॥ ब्रज जुबतिन कौं मन मचुकरि वे मनौं पीयौ मकरंद ॥१३॥
मन तब एके स्याम चंद कौ निरखेई ढिंग जाई ॥ ज्यौं ज्यों किरन सुधा
छबि बाढ़ैं त्यौं त्यों तृथा बढ़ाई ॥ १४॥ जोरे भरति लाल जब देख्यो कोऊ
दुरि हरि भरि जाई ॥ कोऊ पिचकाईन की छुटति हैं मींडति अंग बचाई
॥१५॥ कोऊ प्थारी उलटि जात है सरस रंग लै ग्बारि ॥ भरति ताप पनह
तन लाल कौं पीय नहि सकत सह मारि ॥१६॥ भरति लाल एक भरे अंक
में एक अंजन दै नैंन ॥ एकु चुंबति जाँऊ दुरि मुरि कै अपनों बदलो लैन
॥१७॥ पीय बने भाम दस दिस ठाड़ें देखि अन देखि री नारी ॥ जोरी
गाँठि सब सुख निरखति है 'रसिक' सखी बलिहारी ॥१८॥ | Dhanashri |
Bali gaee balcharitra murari | paany paijaniyaan bajat runjhun | Part1-152 | बलि गई बालचरित्र मुरारि | पाँय पैजनियाँ बजत रुनझुन
नचवति नंदकी नारि ॥१॥ कबहुँ हरिकों लाय अँगुरियन चलन सिखावत
ग्वारि ॥२॥ कबहुँक हृदय लगाय चूँमति मुख बैठी अंचल डारि । कब्हुँक
हरि तन कोषि चितवत कबहुँ दिवावत गारि ॥३॥ कबहुँढ अंग भूषण बनावति
राईलौन उतारि । सूरदास सुरनर सब मोहे देखि यह अनुहारि ॥४॥ | Bilawal |
Poorat madhure venu rasal .. | Pustak1-349 | पूरत मधुरे वेणु रसाल ॥
चारु ध्वनि वे सुनत श्रवणन बिमोही व्रजबाल ॥१॥
राजऋतु गिरि गोवर्द्धन तट रच्यो रास गोपाल ॥
निरख कौतुक चंद भूल्यो तजी पश्चिम चाल ॥॥२॥
सुनि थके सुरनर पवन पशु खग सुधि न रही तिहिं काल ॥
दास कुंभनप्रभु हर्यौ मन गोवर्द्धधधर लाल ॥३॥ | Kedaro |
Thu kabaki khilwari horry khelanjaanen || varajati | Part3-240 | तु कबकी खिलवारि होरी खेलनजानें || वरजति
हों रहि ग्वालिन खेलें कीरति सकुमारि ॥१॥ जब आवत कर कमल ना
ललें थोरो सो घूंघट डार ।| चलत दूृगं चल अंचल औझल मुर्ति मेन सरमार
॥२॥ गरुबे वचन बोल हरूवेंदे जाति सबन को मार ॥ कर पर कर धर
चिबुक अंगुरिया इकटक रही निहार ॥|३॥ दक्षण चरण उठाय उलट धरणी
जो अंगूठाधार || एक टक देख रहत ठाडीधर रूप तृभंगी नार ॥|४॥ कबह्दू
सकुचि घूंघट गहरो दे गाबत सरस धमार ॥ बहुत गुलाल उडाय गगन
फिर देखत वदन उघार ॥५॥ तुलतनरत्ति नखसिख एको अंग को कहि
सके विचार ॥ मन हरणी ब्रज तरुणी सबे ये मोहन मन फंदवार ॥६॥ | Sarang |
Aaj nandlal pyaaro mukat dharey . | NityaPad-285 | आज नंदलाल प्यारो मुकट धरे ।
स्तन लसत मकराकृति कुंडल काछनी कटि वरन बनमाल गरे ॥१॥|
चंचल नैन विशाल सुभग भाल तिलक दिये सुंदर मुखचंद चारु रूप सुधा झरे।।
विचित्र बिहारी प्यारो बेनु बजावत बंसीवट ते व्रज़जन मन जु हरे ॥ २॥ | Gori |
Nand badhaai bottot taadhe . badibais dhota jaayau haye atee anand | Part1-048 | नंद बधाई बॉटत टाढ़े । बड़ीबैस ढोटा जायौ है अति आनंद
बर बाढ़े ॥१॥ काहू गैया काहू भूषण काहू बसन अनेक मनमें आन करत
सुरपतिसों गहें आपुनी टेक ॥२॥ फूले फिरत गोप सब बालक गावत परस्पर
भाखत । गिरिधरदास कल्यान युवत्तीजन देवेकों कछुअन राखत ॥३॥ | Sarang |
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