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Sheetkal Ke Pad
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Kirtan Title | Page | Kirtan | Raag |
|---|---|---|---|
Raas curran munn keenau sarad vimal madhi tarani tanaya tata saghan | Part1-325 | रास करन मन कीनौ सरद विमल मधि तरनि तनया तट सघन
बन ॥ गावत सप्त सुर तीन ग्राम ताल जंत्र उघटित शब्द गति परत परन ॥१॥
बंसीकी नि सुनि धाईं आईं ब्रजनारि मनमथ वेदन कीनौ प्रान हरन ॥ कोऊ
पति सुत छाँड़्यों स्यामसों स्नेह बाढ़यौ प्रेमकी तरंग तामें लगी तरन ॥२॥ ए
सुख शोभा दिन दिन यहै गृह सरस बधाई ए गीतन गाय ॥ आनंदघन ब् रजजीवन
.जोरी रसिक स्दों सहाय ॥३॥ | Todi |
Aaye deva vimanan chadh chadh || | Part2-284 | आये देव विमानन चढ चढ ||
महा महोत्सव दरस करनकों एकएकतें आगें बढ बढ ॥१ ॥
विन गिरिधर इन समकोऊ नाहीं कहो कोउ बातें कछु गढ गढ॥
सगुणदास प्रभु जन्म श्रवण सुन दे असीस मुनि मंत्रन पढ पढ ॥२ ॥ | Bilawal |
Govind tihaaro swaroop nigam neti neti gaaven .. bhaktake | Part1-080 | गोविंद तिहारो स्वरूप निगम नेति नेति गावें ॥ भक्तके
वश श्याम सुंदर देह धरें आवें ॥१॥ योगी मुनि ज्ञान ध्यान स्वपने नही पावे) ॥
नंद घरनि बांधिताहि कपि ज्यों नचावें ॥२॥ गोपीजन प्रेमआतुर संगलागी
लोलें ॥ मुरलीको नाद सुनत गृहतजि वन डोलें ॥|३॥ वेदपुराण स्मृतिकथा
कहत शुक बिचारी ॥ परमानंद प्रेमकथा सबहिनते न्यारी ॥४॥ | Bilawal |
Horry khelati haye nandlal .. ita sub sakhaa mandali | Part3-318 | होरि खेलति है नंदलाल ॥ इत सब सखा मंडली
राजति उत समूह ब्रज बाल ॥१॥ बाजति सरस मृदंग ढोल ढ़फ बीना बैनुं
उपंग ताल ॥ छिरकति कुँमकुमा और अरगजा उड़ति अबीर गुलाल ॥२॥
गावति गारि मगन भई गोपी मीठी परम रसाल ॥ फगुवा मिसि गिरिधर
गहि आने लींनीं और बनमाल ॥३॥ रस बस भई सकल ब्रज वनिता अंग
न कछु सँभाल ॥| गोविंद प्रभु पिय की बलिहारी अंबुज बदन रसाल ॥४॥ | Hameer |
Hamaare busson deho girdhari eetani | NityaPad-044 | हमारे बसन देहो गिरधारी ईतनि
दया तुमे नही आवत हम जल माझ ऊघारी ॥१॥
तुम ब्रजराज कुमार को डर कांपत हे अति भारी ॥
सुरदास प्रभु यहे बीनती तुम सबके दुख हारी ॥२॥। | Ramkali |
Jopein srivallabh charan gahe !. | NityaPad-004 | जोपें श्रीवललभ चरण गहे !।
तो मन करत वृधा क्यों चिंता हरि हियें आय रहे ॥१॥
जन्म जन्म के कोटि पातक छिनहींमांझ दहे ॥
साधन कर साधो जिनको उस सब सुख सुगम लहे ॥२॥|
कोटिकोटि अपराध क्षमा कर सदा नेह निवहे ॥
अब संदेह करो जिन कोऊ करुणासिंध ु लहे ॥ ३॥॥
अबलो विन सेवें श्रीवललभ भवदु:ख बहुत सहे ॥
रसिक महानिधि पाय ओर फल मनवचक्रम न चहे ॥४॥। | Ramkali |
Abb houn yaa dhotaaten haaree .. goras lait atak jaba keaney hansat | Part1-243 | अब हों या ढोटातें हारी ॥ गोरस लेत अटक जब कीनी हँसत
देत फिर मारी ॥१॥ निशदिन घरघर फेरौ करत है बालक यूथ मँँझारी ॥
गोविंद बलि इमि कहत ग्वालिनी ये बातें कैसे जात सहारी ॥२॥
# राग सारंग ऋ कहि दधि मोल आज हों लैहों ॥ यह गजमोतिन हार कंततें
चंद्रावलि गुप्त तोहे देहों ॥१॥ पान पान गहि ठाढ़ि कीनी बाट माँझ कियो
झगरौ ॥ बाबाकी सों जान न दैहौं गिरिधरलाल हटीलौ अचगरौ ॥२॥ लोभ
दिखाय प्रीति जो कीनी नीकी ये बात और सब फीकी ॥ परमानंद प्रभु जान
महातम जो हरि भजे चतुर सोई नीकी ॥३॥ | Saarang |
Dugger | NityaPad-315 | डगर
चल गोवर्धनकी वाट ॥ खेलत बीचमिलेगें मोहन जहां गोधनके ठाट ॥॥१॥
चलरी सखी तोहि जाय मिलाऊं सुंदरवदन सरोज ॥ कमलनयन के एक रोमपर
वारों कोटिमनोज ॥|२॥ पाहुनी एक अनुपम आई आनगामकी ग्वार ॥।
परमानंदस्वामी के ऊपर सर्वस्व डारों वार।।३॥ | Adano |
Shyam kaho taba bhojan laavo.. giriaagen sub aana dharaavo ..9 .. | Part2-072 | श्याम कहो तब भोजन लावो॥ गिरिआगें सब आन धरावो ॥९ ॥
सुनत नंद तहां वाल चलाये लाये॥ भोग सामग्री सबे मँगाये।
खटरसकी बहुभांत मिठाई ॥ अन्नभोग अतिही बहुताई ॥३ ॥
व्यंजन बहुत भांत परसाये ॥ दध्िलोंनी मधु माट भराये ॥४ ॥
दही वरा बहोत परसाये ॥ चंदही सम पटतरते पाये ॥५ ॥
अन्नकूट जेसो गोवर्धन ॥ ओर पकवान धरे बहुकोदन॥६॥
परसे भोजन प्रातहिं ते सब॥ रविमाथेतें ढरक गयो अब ।।७ ॥
गोपन कहो श्याम इहां आवो॥ भोग धयों सब गिरिहिं जिमाबो ॥८ ॥
सूरस्थाम आपनही भोगी ॥ आपहि माया आपही योगी ॥९॥ | Bilawal |
Barasaane kii nagari ick naval matau juri keenau | Part3-220 | बरसाने की नागरि इक नवल मतौ जुरि कीनौ
जु ॥ फगुवा चाहे लाल पै होरी कौ खेलि संग लीनौं जु ॥१॥ एकनु केसर
घोरि कें हो एकु कनक पिचकाई जु ॥ एकनु बूका बंदन एकु अबीर कपुर
मिलाई जु ॥२॥ एकनु चोवा मृगमद सुरँग गुलाल भरि झोरी जु ॥ एकु-
एकु पै डारि हीं मधि सुन्दर राधा गोरी जु ॥३॥ बहु बिधि बाजे साजि
कै ढँफ दुंदुभि करताला जु ॥ नंद सदन सब आव ही सकल बयस ब्रजबाला
जु ॥४॥ नंद रानी अरघ दे वारनैं श्री राधा सनमुख हेरे जु ॥ चमकि उठि
चंद्रावलि सखी वृ्द मुख फेरे जु ॥५॥ भीतर धसी गहे लाल कौ भुज भरि
आने हो लाल जु ॥ श्री राधा की दिसि जाई कै लाए लाल अमोला जु
॥६॥ केसर मुख ते नाइ के इक चोबा मुख लपटाबै जु ॥ बंदन बूका डारि
के होरी की गारि सुनावै जु ॥७॥ रँग अबीर उड़ाई कें अरुन अँबर लौं
आयो जु॥ हो हो बोलै रैँग सौं मानौ गगन घोरी कैं धायो जु ॥८॥ घोष
कुलाहल छ रह्यौ मनौ निरधन धन पायौ जु ॥ भुज भरि भैठे लाड़िलो
किही बिधि छुटि न जाए जु ॥९॥ ब्रज रानी बरजे सबै मनभायौ फगुवा
लेओ जु ॥ पट भूषन बह भाँति के नैंकु लालन छोरि वेहो जु ॥१०॥ श्याम
चिते नैंकु हेरि कैं सकल सुंदरी बस कीने जु ॥ मन बच क्रम करि वारने
गिरिधरि सरबसु दीने जु ॥११॥ तब मतो जु कीनौं मोहना लीला अनौखी
आनी जु ॥ सकल मनोरथ पुजे उत धाम काम ऋतु मानी जु ॥ १ २॥ बरसाने
जे गोप हैं ते ते स्वरूप हरि लीने जु ॥ उन लच्छन वे कंठ मिलि वे भेख
परसपर कीने जु ॥१३॥ अपुनी महतारीन सौ सबै बुझति हैं इक गाथा
जु ॥ मैया तुम कौतुक सुनौ इक नंद कुंवर ब्रज नाथा जु ॥१४७॥ आजु
बेगि घर आब ही वे तिहारे सुत होई जु ॥ तुम हो भोरी बोरी चोरी जानत
है सब कोई जु ॥१५॥ इक मैया तुम सौं कहौ बात सबै जिय भाव जु ॥
मैरो रूप धरि आव हीं वे किही मिसि पेठ न पावै जु ॥१६।| मोहन रूप
है मोहना जग मोहन बस कीनों जु ॥ जंत्र -मंत्र सब जान हीं इन बात
सबैं बस कीनौं जु ॥१७॥ निसचै वे हम घर आव हि सुत नाम ले ले
बोलै जु ॥ बहुत बल करैं आपुनौ क्यौं न दरबाजा खोले जु ॥१८॥ जब
वे घर दिसि आव ही हो इंटन मारि भजाबों जु ॥ मीठी सी बात सुनाबहिं
वे निज बिसबास न लाओ जु ॥१९॥ सुनौ न चित दे कान तुम भारी
अजानी बारी जु ॥ निरदया ह्ले बैठियों मति निज ग्रह आई किवारं जु
॥२०।| इतनो बोलि इत हरि घर-घर चढ़े अटारी जु ॥ सकल सुंदरी संग
पोढि के रस रीति कला जन टारी जु ॥२१॥ आन फिराई राज की मनमथ
तू जहाँ राजे जु ॥ दृष्टि पोर वा छ्ले रहे भाव धरी ग्रह साँजे जु ॥२२॥ भूले
सुरति के रंग में हो ताकि मारे दृग दीने जु ॥ नेन पुतरी लाज तजी हो
आपु समान सीर कीने जु ॥२३॥ डंड कुचन पे डारि के मन भाया सो
कीनों जु ॥ चुंब कपोल द अंक ले मदन प्रसंसा भीनी जु ॥२७।॥ चित
चोगान गहि लाई के कुटिल कटाच्छन मारे जु ॥ हाव-भाव के भारा में
दंपति तहं बिकसति भारे जु ॥२५॥ बरसाने बरखा भई प्रेम नीर झरि आई
जु ॥ रस बस भई गोपिका मानों नौ निधि पाई जु ||२६॥| उत्त की गति
हों कहा कहीं गाप सबे घर आए जु ॥ आपुनी आपुनी महतारीन को टेरि
दीए दरसाए जु ॥२८॥ पकरे तोरी किवार के हो कोउ न बोलन पाव जु ॥
बहत कीन गाप तबे उत लेइंट चलावे जु ॥२८॥ लागे जु वही अंग प
सब भाजत कुदल डोले जु ॥ भार भरी रे चहँ दिसि गोप कुलाहल बाले
जु ॥२०॥ निसा यह गति पाई के परी रहो बाग बगीचा जु ॥ गोप सब
मन लाई के मति सोच करी सुखीचा जु ॥३०॥ कुल के देव लगे
मैया पे इहि विधि होरी भारी जु ॥ बलि जू सबरे दीजिए सुख पाब नर नारी
जु ॥३१॥ केते गुन बरनन करों श्रीगिरिधर के गुनन्यारे जु ॥ रसना इक
बरसवाने के को विधि गीने गुन भारे जु ॥३२॥ मंद अजान जु है मेरी मति
दृष्टि न पंर जाई जू ॥ 'दास गदाधर' प्रभु की लीला सुमर-सुमर उर माँही
जू ॥ ३ ३॥ | Kafi |
Phoolan koo mukut banyo phoolan koo pichhora tunn shobhit atee pyaari barr phoolan koo shungar . | NityaPad-267 | फूलन को मुकुट बन्यो फूलन को पिछोरा तन शोभित अति प्यारी बर फूलन को शुंगार ।
कंठफूल बागो फेंटा फूलगादी गेंदुवा फूल हँस बेठे हें स्थामा स्थाम शोभा को नहीं पार ॥
फूलन के आभूषण वसन विराजत फूलन के फोंदा फूल उरहार ।
नंददास प्रभु फूले निरखत सुधि भूलें शुकदेव नारद शारद रटत वार बार ॥ | Saarang |
Mangarh queyon huun naan tootat abalaake | NityaPad-324 | मानगढ़ क्यों हूं न टूटत अबलाके
बलको प्रताप।। आपन ढोवाचढ गिरिधरपिय अबलातू चिलाचांप मुक्तकटाक्ष
घूंघटदरवाजो नहीं खूटत ।९॥ विविध प्रणवहथ नालगोला बोलेंजू उछट परत
काम कोट नहीं फूटत ॥ गोविंदप्रभु साम दाम भेददंड कर घेरापर्यो चहुं दिशसंचित
रुख्याई जलक्योंहूँ नहीं खूटत ॥२॥ | Kedaro |
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