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Sheetkal Ke Pad

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Kirtan Title
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Kirtan
Raag
Sobat neend aaya gaee shyaamahin . mahari uthh podhaay duhanako
NityaPad-127
सोबत नींद आय गई श्यामहीं । महरि उठ पोढाय दुहनको आपन लगी गृहकामही ।॥॥१॥ वबरजतहें घर के लोगनकों हरी ये लेले नामही ॥ गाढेबोल नपावत कोऊ डर मोहन बलराम ही॥ शिवसनकादिक अंत नहिपावत ध्यावतहें हिनयामही ।। सूरदासप्रभु ब्रह्मसनातन सो सतोबत नंदधामहीं ॥। ३॥
Laal lalit lalitaadik sangaliyen vihartari
Part3-056
लाल ललित ललितादिक संगलियें विहरतरी बरवसंत ऋतुकला सुजान ॥ फूलन की करगें दुकलियें पटक तपट उरजछियें हंसत लसत हिलिमिलि सव सकल गुन निधान ॥१॥| खेलत अति रसजो रह्यो रसना नहीं जात क्यो निरसिर पररित्र थकित भये सघन गगन जान ॥ छीत स्वामी गिरिवरधर श्रीविड्ठल पद पद्मरेनु वरप्रताप महिमातें कियो कीरति गान ॥२॥
Basant
Ghoomat ratnare naine sakal niss jaage. latpati sudesh paag,
NityaPad-147
घूमत रतनारे नेन सकल निस जागे। लटपटी सुदेश पाग, अलकन झलकन बीच पीखछाप युगकपोल अधरनमिस दागे ॥|१॥ बिनगुन उरमाल बनी बिचबिच नख रेख ठनी पललटि परे पीत बसन कंकन सो दागे। तिलक बन्यो बदन बनमाल लगी चंदनसो डगमगात चरन धरत रेन सुख लागे॥।२॥ वचन रचन कियो सांझ तुम आये भोर मांझ बलबल या बदनकमल शोभित अनुरागे । जाय वसो वाहि धाम बिलसे जहां चारो जाम गोदविंदप्रभु बलिहारी करजोर मांगे ॥३॥
Bilawal
Horry khelat laal lalana sanga .. vividh bunn
Part3-335
होरी खेलत लाल ललना संग ॥ विविध बन बन आईं जुर ब्रज युवती बहु रंग ॥१॥ प्रथम देख हरि तन विथकित भई मूरतिवंतत अनंग ॥ नयन बाण लागत उर अंतर भई विकल सब अंग ॥२॥ तज कुल लोक लाज तन की सुध कर मयांदा भंग ॥ उमग उमग विलसें प्रीतमसों बांध गुलाल उछंग ॥३॥ कर विचार मति चारू सबे मिल अपने अपने संग ॥ जुरी जाय हरि सुधा सिंधुसों बढी प्रवाह मानों गंग ॥४॥ कोऊ लेकर पकर पिय को कर नृत्य करे थेई थुंग ॥ कोऊ पिय निज भुजसों भुज भर भेटे उरज उतंग ॥५॥ कोऊ बजावत वेणु मधुर स्वर कोऊ सरस उपंग ॥ कोऊ कर कठताल बजाबत कोऊ मृदुल मृदंग ॥६॥ कोऊ ठाडी पिय मुख निरखत गहि भुज लता लवंगण ॥ कोऊ लेन उगमार धरत मुख पीय कपोल पर अंग ॥७॥ कोऊक निकट जाय प्रीतम के मृद्‌ बजाय मुख चंग |॥ कर कटाक्ष हँस हँस उत्त चितवत जीत्यो दृगन कुरंग ॥८।॥ चंचल चपल कहांलों वरणों मेट्यो मान तरंग ॥ अंग नखसिख प्रकट देखियत सिर मुक्ताफल मंग ॥९॥ कबहुंक देख देख पिय को मुख नाचत सकल सुधंग ॥ वीच वीच बचन विविध मुख बोलत कूजत मानों विहंग ॥१०॥ कबहुंक मुख सरसिज पर फेरत अति चंचल द्रग भृंग ॥ कबहंक धाय अधर रस पीवत चित उपज्यो रति रंग ॥११॥ यह विधि पिय संग खेलत मेट्यो डसी मैन भुजंग ॥ अति रसमद कछुहि नहिं जानत भई भाव पर पंग ॥ १ २॥ यह लीला सुमिरत रसिक मन हरि पद रति अति अनिषंग ॥ श्रीवललभ पद कमल विमल मततिि गावत उठत त्तरंग ॥१३॥
Kanharo
Sukh nidhi srigiriraj tareti ..
NityaPad-354
सुख निधि श्रीगिरिराज तरेटी ॥ कुंड कुंड जल अचवत न्हावत पुनि पुनि रज में लोटी ॥१॥ धरत भोग बेजर की रोटी ऊपर मेवा टेंटी ॥| रसिकदास जन श्रीवल्लभ पद परस सकल दुख मेटी । २॥
Bihaag
Pragat bhaee rawal shree radha . suni dhaaee vrajpurki vanita
Part1-178
प्रगट भई रावल श्री राधा । सुनि धाई ब्रजपुरकी वनिता निरखत सुंदर रूप अगाधा ॥१॥ तब वृषभान दान बहु दीने जाचककी सब पूजी साधा । “द्वारिकेस” स्वामिनी महिमा मुनिमन ध्यान लगाय समाधा ॥२॥
Bilawal
Phoolan key bangla baney
NityaPad-261
फूलन के बंगला बने अति छाजे बैठे लाल गोवर्धनधारी ॥ चंपक बकुल गुलाब निवारो लाल अनारसुधारी ॥१॥ पीत चंमेली चितकों चोरत रायबवेली महकारी ॥ परमानंददासको ठाकुर तन मन धन बलिहारी ॥२॥
Saarang
Premmagn bolat nandrani...
NityaPad-075
प्रेममग्न बोलत नंदरानी॥। अहो अहो सुबल अहो श्रीदामा ले आवहु किन टेर मृदुबानी ।|१॥ भोजनवार अबार जान जिय सुरतभई आतुर अकुलानी ॥ ढुंढत घर घर आंगन द्वारलों तनकी दशाहिरानी ॥। २॥ जननी प्रीति जान उठदोरे शोभितहें कच रज लपटानी ॥ परमानंद नंद नंदनको अखियां निरख सिरानी ॥। ३।।
Dhanshree
Sriyapunaji patit paavan karye ||
NityaPad-010
श्रीयपुनाजी पतित पावन कर्ये || प्रथमही जब दियो दरसन सकलपातक हर्‌ये ॥१॥ जलतरंगन परस कर पयपान सो मुख भर्‌ये ॥ नाम सुमरत गई दुरमति कृष्णजस विस्तर्‌ये ॥ २॥ गोपकन्या कियो मजन लालगिरिधर बर॒यो ॥ सूर श्रीगोपाल सुमरत सकल कार्य सर्‌ये ॥। ३॥।
Ramkali
Chitravichitra batrajaki balmandali rachana rachee sorchi .. dadhi payas navneet
NityaPad-204
चित्रविचित्र बत्रजकी बालमंडली रचना रची सोरची ॥ दधि पायस नवनीत मध्यशर्करा पलासपत्रनके पुटनकी पंगति सची ।॥१ ॥ नानापकवाननके पनवारे लोनीवारे खाटेखारे व्यंजन अनगिन गणना नाहींबची ॥ मुरारीदासप्रभु प्यारी भोजनकर बैठे शेष लेन सहचरी निकट आय ललची ॥|२॥
Saarang
Sohat jaruli poongharvaari | lutt latkat lilat binduli
Part1-152
सोहत जरूली पूँघरवारी | लट लटकत लिलाट बिंदुली अति सोहै पोहोंची देत करतारी ॥१॥ सोहत कंठ कनक केहरि नख मंद हँसन मोहत खगवारी । राजत कटि किंकिनी और घुँघरू चलत घुटुरुवन ऐसे कान्ह की रामदासबलिहारी ॥३॥
Bilawal
Baso merey nainan mein douu chand .. gaur burren vrishbhan nandini sthaam
NityaPad-119
बसो मेरे नैनन में दोऊ चंद ॥ गौर बरन वृषभान नंदिनी स्थाम वरन नंद नंद॥१॥ कुंज निकुंज में बिहरत दोऊ अति सुख आनन्द कंद॥ रसिक प्रीतम पिया रस में माते परो प्रेम के फंद ॥।२॥।
Bihaag
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