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Sheetkal Ke Pad
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Kirtan Title | Page | Kirtan | Raag |
|---|---|---|---|
Matimati jasumatike laal dekhat sub gwal baal binatati | Part1-233 | मतिमति जसुमतिके लाल देखत सब ग्वाल बाल बिनतती
सुनि हा हा हरि छूबी न देह मेरी ॥ रोकि रहत मारगमें इत उत्त नहीं जान देत
ठाढ़े लियें लकुट हाथ राखी सब घेरी ॥१॥ एततौ कहा बल दिखावत दोऊ
टूगन हों नचावत भावत नहीं हमें दीठ लंगर गत तेरी ॥ रसिक प्रीतम छाँड़ि देहु
चाहों सोई माँगि लेहु नॉँहि न कछु है सँदेह हों तो निजचेरी ॥२ ॥ | Bilawal |
Deepmalika curran aaee vrajabadhu manharani .. | Part2-055 | दीपमालिका करन आई ब्रजबधु मनहरनि ॥
कंचन थाल लसत कमलनकर नंदमहेर घर घरनि॥९१॥
गजमोतिनके चोक पुराये गावत मंगल गीत जुवती गन ॥
आसकरन प्रभु मोहन नागर निरख हरख प्रफुल्लित तन मन ॥२ ॥ | Kanharo |
Benu maaee baaje shree bansibat.. | Part3-004 | बेनु माई बाजे श्री बंसीबट।।
सदा बसनन््त रहित वृन्दावन पुलिन पविन्न सुभग जमुना तट ॥१॥
क्रीट मुकुट मक्राकृत कुंडल मुखारविन्द भँवर मानो लट ॥
दसनन कुंद कली छबि राजति भ्राजति कनक समाज पीत पट ॥२॥
सुर मुनि ध्यान धरति नहिं पावत, करति बिनोद सँग बालक भट ||
दास अनन्य भजन रस कारन “हित हरिबंस' प्रणट लीला नट ॥३॥ | Gouri |
Chhabilo laal duhat dhenudhauri .. maathe kamal varan koo tiparo | NityaPad-170 | छबीलो लाल दुहत धेनुधौरी ॥ माथे कमल वरण को टिपारो
ओढे पीतपिछोरी ॥१॥॥ कहारी कहूं कछु कहत न आबे डारी कठिन ठगोरी ॥
कुंभभदास प्रभु सुख गिरिधर को जब भेटूं भर कौरी ॥॥२॥ | Saarang |
Raadhe dekhi banakain chain || bhang kokil sabd suni suni | Part3-355 | राधे देखि बनकैं चै न || भंग कोकिल सब्द सुनि सुनि
प्रकट प्रमुदित मैन ॥ १॥ जहाँ बहति मंद सुगंध सीतल भाँमिनी सुख सैन ॥
कौन पुन्य अगाध कौं फल तूं जो बिलसति ऐंन ॥२॥ लाल गिरिधर मिल्यौ
चाहति, मोहन मधुर बैन ॥ “दास परमानँद' प्रभु हरि चारू पंकज नैन ॥३॥ | Basant |
Chaleho bhaanvate russ aina .. khel faag anurag | Part3-364 | चलेहो भांवते रस ऐन ॥ खेल फाग अनुराग
भरे दोऊ मत्त द्विरद गति गैन ॥१॥ सोभित बसन गुलाल सगवंगे अति
आलस युत नेन ॥ रसिक बिहारी बिहारिन कीनों नव निकुंज मधि सैन ॥२॥
| Bihag |
Yeh magosankarshanvir.. | NityaPad-373 | यह मागोसंकरषणवीर॥
चरणकमल अनुरागनिरंतर भावेमोहि भक्तनकीभीर ।।१॥
संगदेहुतो हरिभक्तनको वासदेही श्रीयमुमातीर।।
श्रवणदे उतो हरिक थारस ध्यानदे हु तो स्थामशरीर ॥२।।
मनकामनाकरो परिपूरण पावनमजनसु रसरीनीर ॥
परमानंददास को ठाकुर त्रिभुवननायक गोकुलपतिधीर ॥३॥ | Bihaag |
Mileki phool nayanahi kahey deit tere .. | NityaPad-110 | मिलेकी फूल नयनाही कहे देत तेरे ॥
श्याम सुंदर मुखचुंबनपरसे नाचत मुदित अनेरे ॥ १॥।
नंदनंदनपें गयो चाहत है मारग श्रवणनघेरे ।
कुंभनदास गिरिधरन मिलनकू करत चिन्ह दशफेरे ॥१॥। | Nayaki |
Shrivrishbhan ladeti gaaiyen keerati kull mandanbal hoe .. | Part1-269 | श्रीवृषभान लड़ेती गाइयें कीरति कुल मंडनबाल हो ॥
सोनेकीसी बेलिहो प्यारी चंपेकीसी माल हो ॥१॥ हंसगमनी मृगलोचनी शोमित
सहज सिंगार ॥ चमकत चंचल चीकने सिर सटकारे बार ॥२॥ पूँधरवारे
बारन ऊपर शोभित सुंदर साल ॥ चंदके फंद परे अहिनंदन उरझे कंचन जाल
॥३॥ अतलसकौ लहेंगा कटि गाढ़ो दरियाई की अँगिया पीत ॥ उरज सुभट
कंचनकवच सजि आये रति रणजीत ॥४॥ कृश कटि केहरि देखिदुरै हरि जेहर
तेहर पाय ॥ गजगमनी कमनी अवनी रखनी रति लेत बलाय ॥५॥ कर चूरौ
ललकै झलक पलकै न लगै छबि देख |! अँगुरिन मुँदरी पोंहीची गजरा बाजूबंद
विशेख ॥६॥| चंपकली चौकी चमकै दमकै दुलरी पिय पोति ॥ चितकों लेत
चुराय चाहिकें बदन चंदकी जोति ॥७॥ अरुण अधर दमकत दशनावलि श्याम
चपलता सार ॥ कमलकोशमें बैठी पंगति मानो भृंगकुमार ॥८॥ बेसर को
मोती लटके मटके खटके प्रिय प्रान ॥ श्रवन बनी रुचि मनी कनककी तनक
तरकुली कान ॥९॥ पियतृखमोचन रतिर्स रोचन चंचल लोचन नार ॥ कुँवर
किशोर चकोर चेंहें टुबा पढ़त चंद चटसार ॥१०॥ अलिकुल गंजन रतिरसरंजन
नयनन अंजन दीन ॥ क्रीड़त सुधा सरोवर महियाँ मानो मनसिजके
मीन ॥११॥ समर सहायक नवरस नायक सायक घायक नयन ॥ कुँवर
कुरंग सुरंग कमल काननसों ठानत टैन ॥१२॥ कारी झपकारी भारी बरुनी
बरनें कवि कौन ॥ भ्रोहें सुठि सोहें मोहें मानो हावभाव के भौन ॥१३॥
शुभ बिरियाँ दुपेहेरियां के फूलनकी बेंदी दीनी भाल ॥ इंदुबधू मानों नवलचंदकों
आय मिली ततकाल ॥१४॥ शीश फूल सोहै मोहे बनी तनक कनककी
आड़ ॥ चिबुक चारु मुसिकाय हँसत जब परत कपोलन गाड़ ॥१५॥ यह
विधि छबि अगाधा साधा राधाजू सखियन माँझ | बिटियाँ बहुत जो गोपनकी
संगखेलत सांझी सांझ ॥१६॥ गोधूलकी बिरियाँ डलियाँ फूलनकी ले च्लीं
हाथ ॥ बीनत फूलन यमुना कूलन श्यामाजूके साथ ॥१७॥ एक लिये
ओली चोली पर चाँप चिबुकतर चीर ॥ फूलन तोरत तनहिं मरोरत जहाँ भ्रमरनकी
भीर ॥१८॥ एकन लै लावन्य ललित पटकी अटकी कटि छीन ॥ रमक
- झमक पललव नवाय चढ़ बीनत फूल प्रवीन ॥१९॥ कुंदी कुंद करन कोमल
निरवारत बाला बेलि ॥ ललित लवंग लता बनिता पर रहे झूमका झेलि ॥२०॥
जाई जुही केतकी निवारी चमेली रायबेल ॥ फूलन की कर गेंदुक बाला बनमें
खेलत खेल ॥२१॥ बौरसरीके फूलबकी नकफुली बनावत एक ॥ श्यामा
अभिरामा सुख थामा खेलत खेल अनेक ॥२२॥ तिहिं छिन कुंजबिहारीजू दुरि
देखत कुंजनओट ॥ रहे हैं चित्र कैसेजु चितेरे लगी द्रगनकी चोट ॥२३॥
कियौ सखीको रूप लालने भर गुलाबदल गोद ॥। त्रियारूप धर दरशन दीनों मनमें
मानत मोद ॥२४॥ निरखि निरखि वृषभान नंदिनी बोली बचनरसाल ॥
सब सिंगार सोहै मोहै तू को हैरी नवबाल ॥२५॥ तू क्यों फिरत अकेली हेली
यह बन यमुना कूल ॥ नंदगाम घर साँझी को हम बीनन आईं फूल ॥२६॥
उत्कंठित वृषभान नंदिनी कंठ भुजा उरमेल ॥ आज अबार भई साँझीकों तू संग
हमारे खेल ॥२७॥ सखी लईं सब बोल बोल गौरंभन धुनि सुनि कान ॥
बड़ी बार घर जैहें तो खीजें बाबा वृषभान ॥२८॥ चंदा चंद्रभगा चंद्रावलि
चंचलनयनी चली धाम ॥ बहुत फूल बीनै हैं भटू री पूजे मनके काम ॥२९॥
कमल फिरावत गीतजो गावत आवत घर ब्रजवाल ॥ फूलनकी कर गेंद लकुटिया
फूलनकी उस्माल ॥३०॥ माय धाय उर लाय लई कीरतिजू परमप्रवीन ॥
अरग बढ़ाय लई घर भीतर आप आरती कौन ॥३१॥ मृगमद चंदन केसरसों
श्यामाजू लीपी भींत ॥ कामधेनु के गोबरसों रचि साँझी फूलन चीति ॥३२॥
धूप दीप धरि भोग अमृतरस आप आरतौ उतारि ॥ गावत गीत पुनीत किशोरी
श्रीवृषभानकुमारि ॥३३॥ करब्यारू सब संग खेलि चली अपने अपने धाम॥
श्यामाजू और नवल सखी सुख लूट्यौ चास्यो जाम ॥३४॥ त्रिय बागौ ललिताहिं
दीयौ श्यामापति सुधर सुजान ॥ रसिकरूप धर केलि करी सुखसागर प्रानन
ग्रान ॥३५॥ शरद निशा सुख यह विधि राधा माधौजूनित्यबिहार ॥ शोभापर
बल जाय श्यामघन अवलोकत सुखसार ॥३६॥ | Gori |
Jasoda atee harkhit guna gaavai . madangopal jhulat hain | Part1-101 | जसोदा अति हरखित गुण गावै । मदनगोपाल झुलत हैं
पलना आपुन बैठि झुलावै ॥१॥ शिव विरंची जाकों नहिं पावत ताकों लाड़
लड़ावै । भाँत भाँतके सुरंग खिलोना श्याम सुँदरकों खिलावै ॥२॥ माखन
मिश्री और मलाई ऑँगुरिन करिकें चखावै | छीत स्वामी गिरिधरन श्रीविदल रुचि
करी सो पावै ॥३॥ | Bilawal |
Saras gaabat laalan tribhangi .. | Pustak1-339 | सरस गाबत लालन त्रिभंगी ॥
राग कल्यान मिल चर्चरी तालसों मधुर कर मुरलिक ा मोहन गुनंगी ॥१॥
रासमंडल मध्य सुबिध नाचत वे अलाग लागन लाग जुबती जन संगी ॥
कोक संगीत सुखसिंधु सावल रत्न नंदनंदन केलि मनन््मथ तरंगी ॥२॥
सप्तस्वर भेद अवघर तान मानसों मंद चाल सुरति श्रीधर्म भंगी ॥
क्ृष्णदासनिनाथ लालगिरिधरनसों चल क्यों न मिलत लोचन कुरंगी ॥३। | Gori |
Douu milli karat bhaamati batiyaan .. | Pustak1-359 | दोऊ मिलि करत भामती बतियाँ ॥
मदनगोपाल कुँबरि राध्ेकें नखमनि अंक लिखत उर छतियाँ ॥१॥
तैसीय छिटक रही उजियारी पून्यौ चंद शरद की रतियाँ ॥
केलि रूपिनी यमुना श्रीभट वृंदावन फूल्यौ बहु भत्तियाँ ॥२॥ | Kedaro |
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