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Sheetkal Ke Pad

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Kirtan Title
Page
Kirtan
Raag
Arrie sakhee khelati giridhar laal .. gwal baal
Part3-129
एरी सखी खेलति गिरिधर लाल ॥ ग्वाल बाल सब सँग लाये ॥ एरी सखी फैंटन अबीर गुलाल सखा अंस पै भुज दये ॥ रंग फागुन मास सुहावनों ॥|१॥ एरी सखी सोहे दमालो सीस, पीत बसन तन छबि दये ॥ एरी सखी चोवा चंदन नीर केसर सुरँग रैंगन कीये ॥ रंग फागुन मास सुहावनों ॥२॥ एरी सखी खेलति साँवरो लाल ॥ रँग भलो गहगड़ रह्ौ ॥ रँँग फागुन मास सुहावनौ ॥ एरी सखी '“ब्रजाधीस' बलि जाइ ॥ तहुँ जात न सुख मोपै कह्यो ॥ रँग फागुन मास सुहावनौ ॥३॥
Kafi
Nirtat shyamshyama hait .. mukut latkan bhukuti matkan
Part1-321
निर्तत श्यामश्यामा हेत ॥ मुकुट लटकन भूकुटी मटकन नारी मन सुख देत ॥१॥ कबहुँ चलत सुधंग गति लै कबहुँ उघटत बैन ॥ लोल कुंडल गंडमंडित चपल नयनन सैन ॥२॥ श्याम की छवि निरख नागर रही इकटक जोई ॥ सूर प्रभु उर लाय लीनी प्रेम गुण कर पोई ॥३॥
Ramkali
Arrie sakhee prakate krishna murari .. vraj gharghar anand bhayau .
Part1-053
एरी सखी प्रकटे कृष्ण मुरारि ॥ ब्रज घरघर आनंद भयौ । दधिकाँदों आँगन नंदके ॥ध्रु.॥ एरीसखी बाजत ताल मृदंग और बाजे सब साजिकें ॥ भवन भीर व्रजनारि पूत भयौ व्रजराजकें ॥१॥ घोषघोषते बाम बसनन सजिसजिकें गईं ॥ रोहिनी महाबड़भागि आदर दे भीतर लईं ॥२॥ बिछुवनके झनकार गलिन गलिन प्रति है रहे ॥ हाथन कंचन थार उर पर श्रमकन च्वेरहे ॥३॥ ग्वाल गोपिका जात रावरी सगरो भरि रहो ॥ फूले अंग न मात सबनकौ भागि उघरि रहौ ॥४॥ जहाँ ब्रजरानी आप सेंन कीयौ ढोटा भयें॥ तहाँ कुतूहल होत मिलि 'जुबती जूथन गये ॥५॥ निरखि कमल मुख चार आनंदमय मूरति भई ।| लये अंचल पटछोर मन भाई असीसें दई ॥६॥ राय चौकमें घेरि छिरकत दधि हरदी मेलि ॥ पकरि पकरिकें ग्वाल बोल लेत भुज भुजन पेलि ॥७॥ कावरि मथना माँट अगनित गिनें नहीं जातहैं ॥ धरे भरे सब ठौर कहॉलों सदन समातहैं ॥८॥ होत परस्पर मार माखनके गेंदुक करे॥ एक एककूं ताकि बदन अंग लेपत खरे ॥९॥ ऊपरते दि दूध शीश सीसन गागरि हरें ॥ घोंटुनलों भई कीच रपटि रपटि सगरे परें ॥१०॥ ब्रज गोपिनके चोर भीजिलगे अंगअंगसों ॥ गावत्तहें जुर झुंड अपने अपने रंगसों ॥११॥ हो हो बोलें ग्वाल हेरी दे दे गावहीं ॥ जोरिजोरि सब बांह बाबा नंद नवावहीं ॥१२॥ नंदराय बड़भाग नाचतमें देखत बने ॥ फिरत मंडलाकार अंगअंग सुखमें सने ॥१३॥ चिबुक केश सब स्वेत उरपर सगरे छै रहे ॥ रंग कुमकुमारंग दधि दूधन उरझे रहे ॥१४॥ भाल विशाल रसाल फेंटा शीस सुहावनों ॥ तोंदि थलक और चाल नायैं मृदंग मिलावनों ॥१५॥ गहिगहिकें भुज भूलरहे- गोप सुखमानिकें ॥ रपटि परे जिन नंद सावधान यह जानिके ॥१६॥ ऑगन उदधि आनंद पंक चढ्यौ कटिलों भयौ ॥ दई पनारी खुलाई सरिता ज्यों बीधिन गयौ ||१७॥ भानसुतामें जाई मिल्यौ रंग आनंदमें॥ कलिंदनंदनी आप सुख लूटत यह फंदमें ॥१८॥ यह औसर सब साधि घोष नृपतिजू नहाइयौ ॥ जे बरसोंदी खात ते सब विप्र बुलाइयौ ॥१९॥ पूजा पितर कराय दान करत बहु भायसों ॥ घरके मागध सूत झगरतहैं ब्रजरायसों ॥२०॥ मेंटत सगरी रारि मन धन देत अघाइकें । करत बहुत सनभान भूषन पट पहरायकें ॥२१॥ विधिसों गाई सिंगरि दई द्विजन केई ठाठसों । जो माँगो सो देहुँ कहत नंद विप्र भाटसों ॥२२॥ अभरन अंबर छाय सहस्र॒ पाँच दश आईइयौ । हँसिहँसि रोहिनी आप ब्रज तरुनी पहराइयौ ॥२३॥ घरघर घुर्त निसार कही न जात कछूये जियकी । मंगलमय ब्रज देश फिरत दुहाई गाजकी ॥२४॥ ब्रज दशाकौ रूप कहा कहूँ सखी या समें । निरख निरख नंददास नृत्य करतहैं ता समें ॥२५॥
Kafi
Meromankanh harao .. gayojo sanganandandanke vahaante naheen
NityaPad-092
मेरोमनकान्ह हरओ ।। गयोजो संगनंदनंदनके वहांते नहीं टरओ ॥|१॥ कहाकहंजो बगदन आयो स्याम समुद्रपरयो ॥ अतिगंभीरबुद्धिको आलवपयप्रेमपीयूषभरञ्यो ॥ २॥ अबतो जियऐसीबनिआई भवनकाज बिसरयो | परमानंदभलेटांअटक्यो यह सबरहयोधरयो ।। ३॥।
Dhanshree
Jhoolat sunder jugalkishore .. nand nandan vrishbhan
Part3-374
झूलत सुंदर जुगलकिशोर ॥ नंद नंदन वृषभान नंदिनी पीवत सुधारस नयन चकोर ॥१॥ भूकुटी भृंग धनुष सी शोभित तिलक सायक जोर ॥ मंद मंद मुसिकात स्यथामघन करत कटाक्ष इन ओर ॥२॥ अंजन दीप्ति रंजन लागे राजत दशन तंबोर ॥ मृगमद आड बने कर कंकण हार सिंगारन डोर ॥ ३॥ गयो सिरतें पटोल मनोहर उघरे कुच कलश कठोर ॥ सूरसु निरखत भये प्रेमवश तब पिय करत निहोर | ४॥
Devgandhar
Doodh piwawat jasoda maiya ..
NityaPad-305
दूध पिवावत जसोदा मैया ॥ धोरी धेनुको काढ अपने कर तामें मधुर मिलाय मिठईयां ॥१॥ तातो क्यो कटोरा सुंदर बहुतसुगंध मिलैया | ले कर प्यावत श्याम मधुर सुख जन गिरिधर' जननी बल जैया ॥ २॥
Kanharo
Sughar radhika praveen bansibat raas rachyau sthaama sanga varr sudhang tarani tanaya teere ..
Pustak1-343
सुघर राधिका प्रवीन बंसीबट रास रच्यौ स्थामा संग वर सुधंग तरनि तनया तीरे ॥ आनंद कंद वृंदावन सरद चंद पवनमंद कुसुमपुंज ताप दवन धुनित अलिकुटीरे ॥१॥ रुनित किकिनी सुचारु नूपुर मणि बलयहार अंगवर सुधंग तार तिर॒प तरल चीरे ॥ गावत अति रंग रहौ व्यास रस प्रवाह बह्मो निरख नैनमीन करत प्रेमसिंधु सीरे ॥२॥
Iman
Hoe hoe hoe horry bolein nandkunwar madmato dolein
Part3-276
हो हो हो होरी बोलें नंदकुंवर मदमातो डोलें ॥१॥ सखा बूंद संग लीयें आवें ॥ ब्रजनारिन मनमोद बढावें ॥२॥ केसरभरी कनक पिचकाई || छिरकत स्याम युवतिन मनभाईं ॥ ३॥ सुरंग गुलाल अबीर उडावें ॥ मालव राग सरस स्वर गावें ॥४॥ विविध सुगंध अरगजा कीनो ॥ मनमोहन सब ग्वालन दीनों ॥५॥ ताल मृदंग पटह डफ बाजें ॥ श्रवण सुनत ध्वनि घनजिय लाजें ॥६॥ बूंदावन यमुनातट सोहे | सबहिन को मन गिरिधर मोहे ॥७॥ कौतुक निरख थके सुर मुनिगण ॥ मगन भई हुलसी गोपीजन ॥८।॥ प्रेमसिंधु वरणों कहां तांई ॥ रसना विधिने एक बनाई ॥५॥ यह लीला ब्रज जन मन भावे ॥ गोकुलचन्द चरणरज पावे ॥१०॥
Malav
Saanware kaun mai rung saun bharaungi .. aankhi aanji
Part3-225
सांवरे कौं मै रंग सौं भरौंगी ॥ आँखि आँजि मुख मांड़ि पीतम कौं अब काइ सौं मैं नांही डरौंगी ॥१॥ फगुवा लै पीतांबर देह औरू बहुत भांति के नाम धरौंगी॥ “मानिक चंद! प्रभु मोहि सौंह तिहारी अब कौ फागु मैं सुफल करौंगी ॥२॥
Kafi
Kahauju daan laihi kaisen .. doodh daheekau daan kabahu naan sunyau kaana
Part1-250
कहौजू दान लैही कैसें ॥ दूध दहीकौ दान कबहु न सुन्यौ कान मानों लोंग लादी काहु जैसें ॥१॥ आपुहीते लेत किधौं काहु लिख दीनौ समुझावी थों तैसें ॥ गोविंदप्रभु तुमें डर न काहूकौ ब्रजराज कुँवरवर तातें गाल मारत घर वैसें ॥२॥
Nat
Jamuna key tata khelati hari-sanga, radha lai sub
Part3-214
जमुना के तट खेलति हरि-संग, राधा लै सब गोपी ॥ नंदलाल गोवरधन धारी, तिन कै नेहनि ओपी || १॥ चलहु सखी ! चली तहाँ जाइयै, छिनु जियरा न रहाई ॥ बेनु-सब्द करि मन हरि लीन्‍्हौ, नाना राग बजाई ॥२॥ सजल-जलद-तन पीतांबर छबि, कर मुख मुरली धारी ॥ लटपट पाग बने मन-मोहन ललना रहीं निहारी ॥३॥ नैंन नें नसौ मिलि, कर सौं कर, भुजा ठए हरि ग्रीवा || मधि नायक गोपाल बिराजत सुंदरता की सींवा ॥|४॥ करत केलि-कौतूहल माधौ, मधुरी बानी गाव ॥ पूरन चंद सरद की रजनी, संतन सुख उपजाबै ॥५॥ सकल सिंगार कियौ ब्रज-बनिता, नख-सिख-लौं भल ठानी ॥ लोक-बेद-कुल-धर्म काहु की, नैंकु न मानति कानी ॥६॥| बलि-बलि बल के बीर त्रिभंगी, गोपिनि के सुखदाई ॥ सकल बिथा जु हरी या तन की हरि हँसि कंठ लगाई ॥७॥ माधव सारि, नारि माधव कौं, छिरकत चोवा-चंदन ॥ ऐसौ खेल मच्यौ उपरापरि, नंद-नंदम जग-बंदन ॥८॥ ब्रह्मा, इन्द्र, देव-गन गंभ्रव, सुमन एक रस बरषैं ॥ सूरदास, गोपी बड़भागिनि, हरि-क्रीड़ासुख करपें ॥९॥ ६५ (ुक्र| राग काफी 8)
Kafi
Laalan khelat hein hoe horry .. chova chandan aggar
Part3-205
लालन खेलत हें हो होरी ॥ चोवा चंदन अगर कुंकुमा अवीर भरें भरि झोरी ॥ १॥| बाजत ताल मृदंग झांझ डफ ओर मुरली धुनि थोरी ॥ कृष्ण जीवन लछीराम के प्रभुसंग खेलत राधा गोरी ॥२॥
Kaafi
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