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Sheetkal Ke Pad
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Kirtan Title | Page | Kirtan | Raag |
|---|---|---|---|
Jaisohun taiso tihaaro srichalalabh abjin chhaand deho mohikarte .. | NityaPad-350 | जैसोहूं तैसो तिहारो श्रीचललभ अबजिन छांड देहो मोहिकरते ॥
बांह गहेकी लाजमनधरहो नाहिं भरोसो मोहि साधन बलते ॥१॥
तुम तज और ठोर नहिं मोको जासों जाय कहों दुखभरतें ॥
रसिकशिरोमणि श्रीवल्लभप्रभु राखो मोहि चरणशरण भव डरतें ॥२॥ | Bihaag |
Bhushan saje saamal anga .. laadili vrishbhanjuki liye hain | Part1-353 | भूषण सजे सामल अंग ॥ लाड़िली वृषभानजूकी लिये हैं
हरि संग ॥१॥ रच्यौ रास बिलास कानन रसिक वर नवरंग।॥। कला नटवर धरत
जब कछु देख लज्जित अनंग ॥२॥ बेणु ध्वनि सुनि थकित मुनिगण गति लेत
थेई थेईथुंग ॥ श्रीविद्धलगिरिधरनकी बलि जाऊँ ललित त्रिभंग ॥३॥ | Kedaro |
Bunny sahaj yeh loot harikeli gopinaken supanen yeh kripa kamala naan | NityaPad-138 | बनी सहज यह लूट हरिकेलि गोपीनकें सुपनें यह कृपा कमला न
पावे ॥ निगम निरधार त्रिपुरारहूं विचार रह्मो पचरह्मो शेष नहीं पार पावे ॥१॥
किंनरी बहुर अरु बहुर गंधर्वनीपनगनी चितवन नहीं माझ पावें ॥ देत करतार
बेलाल गोपालसों पकर ब्रजबाल कपि ज्यों नचावें ॥२॥ कोऊ कहे ललन
पकराव मोहि पावरी कोऊ कहेलाल बल लाओ पीढी ॥ कोऊ कहे ललन
गहाव मोहि सोहनी कोऊ कहे लाल चढ जाउ सीढी ॥३॥ कोऊ कहे लालन
देखों मोर केसे नचें कोऊ कहे भ्रमर केसे गुंजारें ॥ कोऊ कहे पौर लग दौर आबो
लाल रीझमोतीन केहारवारें ॥४॥। जो कछु कहें ब्रजवधू सोइसोड़ करत तोतरेबेन
बोलनसुहावें ॥ रोय परत वस्तुजब भारी न उठेतबे चूम मुख जननी उरसों
लगावें॥५॥ बेन कहि लोनीपुनचाहि हरत बदन हँस स्वभुज बीच लेले कलोलें ॥।
धामके काम ब्रजबाम सब भूलरहीं कान्ह बलराम के संग डोलें ॥।६॥। सूर गिरिधरन
मधुचरित्र मधुपान के और अमृत कछु आनलागे।। और सुख रंककी कोन इच्छा
करें मुक्तिहों लोनसी खारी लागे ॥॥७॥। | Khat |
Syaamtan priya bhookh naan biraje . kanak manimukut kundal | NityaPad-172 | स्यामतन प्रिया भूख न बिराजे । कनक मनिमुकुट कुंडल
श्रवन वनमाल अधरमधुरी धरे नाहि छाजे ॥| १॥ निरख अब परस्पर रीझे दोऊनार
बर गयो तजी विरह रस प्रेम पागे। सूर प्रभु नागरी हसत मनमें रसत बसन मन
स्याम के बड़े भागे ॥२॥ | Bhairav |
Nand udey suni aayou houn vrishbhaanako magaa. devekon bado mahar | Part1-118 | नंद उदे सुनि आयौ हों वृषभानको मगा। देवेकों बड़ो महर
देत न करत गहरु लालकी बधाई पॉँऊँ नंदकों झंगा ॥१॥ तौ लो न बिदा छै
जाऊँ औरकें कहाँ बिकाऊँ जौ लों न भवन आवें ऋषिगर्गा । चिरजीवी नंदको
कुमार सूरके प्रान आधार जसुमति सुत चले अपने पगा ॥२॥ | Dhanashri |
Giridharlal byaru keeje | | NityaPad-301 | गिरिधरलाल ब्यारू कीजे |
पूरी दूध मलाई मिश्री पहिलें कौर प्यारी को दीजे॥१॥
ले जेंबत लाल लाडिली दोउ ललितादिक निरखत सुख लीजे॥
“गोविंद प्रभु प्यारी कर बीरी पीक दान सखियन को दीजे ॥२॥ | Kanharo |
Hoe hoe horry boli hii .. naval kumbar milli | Part3-162 | हो हो होरी बोलि ही ॥ नवल कुँबर मिलि
खेलैं फागु ॥ आगम सुनि ऋतुराज को उपज्यों मन में अति अनुरागु ॥१॥
बरस चौस लागी रहै या सुख की आसा जिय माँहि ॥ जो बिधना ऐसी
करै सबै चौस होरी व्हैं जॉँहि ॥२॥ अति डुलास चित में बढ्यों अब रोक्यों
यह कापे जाई ॥| उम्गि चलल््यों रस सिंधु कों अपनी मरजादा बिसराई
॥३॥ सुबल सुबाहु सखा सबै जोरि लियों निज सैंग समाज ॥ अपने अपने
घरन तें निकसे करि खेलनि कों साज ॥४॥ एकु सखा हो हो करे एकु
करे उलटी कछु रीत ॥ मधुमंगल नॉँचति चले गावति हैं होरी के गीत
॥५॥ एकु दिगंबर रूप धरि नख सिख अंग बिभूति चढ़ाई ॥ एकु कोउ
कामिनि भई चलैं हैं दुहुँन की गाँठि जुराई ॥६॥ ताल परव्राबज बाज हीं
बाजै रूंज मुरज सहनाई ॥ दुंदुभि ढुफ औ झालरी रहों कुलाहल सब ब्रज
छाई ॥७॥ सैननि ही में साँवरे कह्मों सुबल सौं यों समुझाई ॥ आजु भैया
यह साज सौं खेलैं बरसानें में जाई ॥८।| आये बट संकेत में जहँ कींनीं
मुरली की घोर ॥ खबन सुनति प्यारी राधिका चौंकि परी चित रहदों न
ठौर ॥९॥ निकसी संग समाज लै खेलनि कों सब साज बनाई ॥ पाबस
ऋतु सरिता मनौं उमगि चली रस सिंधु समाई ॥१०॥ एकन कर गैंदुक
सोहे एकन नबलासी बहु रंग ॥ झूमक मिलि गावत चलीं झोरिन भरें गुलाल
सुरंग ॥११॥ ताल पखाबज बाज हीं सुर बीना महुंवरि मुख चंग ॥ मधुर
मधुर सुर बाज हीं मदन भेरि ढ़फ चंग उपंग ॥१२॥ आइ प्रिया पहुँची
तहाँ खेलति हैं जहाँ नंद किसोर ॥ मानौं समेर संकेत में रूपे सुभट सनमुख दोऊ और ॥१३॥ बिबिध भाँति फूलन गूही पहिलैं गेंदुक दरई चलाई ॥
मानौं रस संग्राम की आगे दई बसीठ पठाई ॥१४॥ पिय पिचकारी पूरी
के दइ प्रिया उर ऊपर तानि ॥ अगर अरगजा घोरि के मुख सौंधौं लपटायों
सानि ॥१५॥ वरखत हे दुढ्ँ और तैं मनौं मेघ उमड़े जलरास || गौर घटा
औ साँबरी बरखति केसर नीर सुबास ॥१६॥ सब सखियन ढ़िण स्याम
के दीनौं लाल मुलाल उड़ाई ॥ दुरि पाछे तैं घात सौं गहे कुँवरि मन मोहन
जाई ॥६७॥ एकन भुज गाढ़ी गही एकु बनाबति चित्र कपोल ॥ एकु निडर
आऑजन लगी नैन कमल दल परम सलोल ॥१८॥ इकु सनमुख मुख चाह
हीं एकु लेति कर चिबुक उठाई ॥ बहुत कहावत हों आपुन को आजु बंदों
जो जाउ छुडाई ॥१९| एकन मुरली हरि लई एकन मोतिन माल उत्तारि ॥
नब केसरि मुख माँडि कैं इकु नाँचति हैं दे दै कर तारि ॥२०|॥ एकन गहि
बैनी गुह्ी एकन मोतिन माँग सँवार ॥ उरज पै कंचुकी कसी तापै मोतिन
माल सुढ़ार ॥२१॥ तनसुख की सारी अति झीनी अरु लींनी सौंधे सौं
साँन ॥ अगर अरणजा बोरि कै पहिरावति पीतम कों आन ॥२२॥ नूपुर
कंचन किंकिनि नख सिख भूषन सजे सिंगार ॥ सो सुख देरैं ही बने
अद्भुत सोभा बढ़ी अपार ॥२३॥ कर पै कर धरि लै चलीं बैठारे प्यारि
ढिंग जाई ॥ आई नई यह सहचरी चाँहति है देखन कौं पाई ॥२४॥ अति
प्रवीन गुन आगरी बैनु बजावत परम अनूप ॥ सेबा अंग सिंगार में सुधघर
सखी साँवरी सरूुप ॥२५॥ उतर्कठा तुम मिलन की लगी रहत जाके जीय
माँहि ॥ हँसि भेटो दोऊ अंक भरो जासौं तन मन नैन सिराहि ॥२६॥ अति
आनंद हुलास सौं मिली सखी दोऊ भरि अँकवारि ॥ जब जान्यो यह भेद
कछू तब हि सकुंचि मुसिकाई निहारि ॥२७॥ जो आनैँद उर में बढ्यों एकु
रसना बरन्यौं नहिं जाई ॥ दिन दिन यह सुख दुहुँन कों निरखि “माधुरी'
नैंन सिराई ॥२८॥ | Dhanashri |
Jall queyon naan piyo laalan joe hoe piyaa tum pyaase . | NityaPad-278 | जल क्यों न पियो लालन जो हो पिया तुम प्यासे ।
भरि लाई जमनोदक सीतल पीवत क्यों अलसाते ॥१॥
जल के मिस तुम डोलत घर घर नवल त्रियन रस माते ।
चतुरबिहारी पिय प्यासे हो तो पानी प्रियो हो जोबन के माते ॥२॥ | Saarang |
Huu shyama shyam raas madhi naayak vraj jubati jooth sahaayak | | Pustak1-358 | हू श्यामा श्याम रास मधि नायक ब्रज जुबती जूथ सहायक |
एक है क्रम बाँह जोरी रच्यौ रास मंडल निर्तत मधि अड्डत सुंदर सुखदायक ॥।१॥
ज ैसी बिधि कहियत ग्रंथन की संगीत मध्य तातें गति अधिक लेत बीना बैंन सहायक ॥
प्रभु कल्याण गिरिधर श्रीराधा निरख निरख त्रैताप दूर करत मनसा बाचा कायक ॥२॥ | Bihaagro |
Harihonte haarihon laltihari pyaareeke paayan parpar .. rahee | NityaPad-120 | हरिहोंते हारीहों लालतिहारी प्यारीके पायंन परपर ॥ रही
सिरधरचरणन बडीबारभईं लीजिये मनाय रूठी मानत मानिह क्योंहूँ कर ॥।१॥
जेसेजेसें रातजात तेसेंतेसें सतरात मोसों नबतरात मानीहे में बांसूंहार | सुनतही
बचन रसिकप्रीतम दूतीके आप उठ चले देखत बदन जात इतहीं ढार ॥२॥ | Kanharo |
Sumirau nandraj kumar . nandaangan karat ringan badan bithure | Part1-168 | सुमिरौ नंदराज कुमार । नंदआँगन करत रिंगन बदन बिथुरे
बार ॥१॥ चरन नूपुर किंकिनी कटि कठुला हार । करन पोंहोंची उरसि बघनों
तिलक सोहै लिलाट ॥२॥ सुनत फिरके चक्ृत चित निज किकिनी झनकार।
टठकि टेरत करत निश्चै हँसत परम उदार ॥३॥ पंक लेपन अंग कीने नचत
नैन सुढार । करि बड़ाई गोद जननी लेत मोद अपार ॥४॥ गहत बछरा पूछ
ऐंचत रूप जीत्यौ मार | देखि परवश हँसत गोपी मुग्ध तजत अपार ॥५॥
कूरके ढिंग जात खेलन फिरत जननी लार | काज बिसरत सबै गृहके विग्रता के
भार ॥६॥ बालक संग रासलीला करत ब्रजगृहद्धार । देत आनंद युवतीजनकों
पठई गृहगृहचार ॥७॥ करत चोरी भवन प्रति धैंसि लेत गोरस सार । बैठि
. जेंमत निडर पतिलों परोसि राखे थार ॥८॥ देत माखन बनचरनको बॉटि बाँटि
अपार | खनत चोंहोटी निपट बालक भजत दै करतार ॥९॥ मायके ढिंग
लसत सूधे साधु मनखरारि | गोपी दैन उराहनों सब जुरि आवैं दै दस
चारि ॥१०॥ सुमिरि कृत संकेत गोपी हँसत झूँठी रार । बारि डारों निरखि
शोभा रसिक बारंबार ॥११॥ | Kedaro |
Mohan nandrai kumar .. | Pustak1-332 | मोहन नंदराय कुमार ॥
प्रगठ ब्रह्म निकुंज नायक भक्त हित अवतार ॥१॥
प्रथम चरण सरोज बंदी स्थाम घन गोपाल ॥ ललित कुंडल गंड मंडित चारु नयन विशाल ॥२॥
बलराम सहित विनोद लीला शेष शंकर हेत ॥
दास परमानंदप्रभु हरि निगम गावत नेत ॥३॥ | Malav |
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