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Sheetkal Ke Pad
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Kirtan Title | Page | Kirtan | Raag |
|---|---|---|---|
Yeh mokon tabahi naan sunai.. mein bahuu kinny adhmai ..15.. | Part2-090 | यह मोकों तबही न सुनाई॥ में बहू किनी अधमाई ॥१५॥
पुरण ब्रह्म रहे व्रजआई। सुरन कही करी ला ॥९॥
आज कह्नों जब महत गमाई॥ काहूने मोहि सुधि न ॥३॥
यह सुन अमर गये शरमाई॥ सुनो राज हम जान न पाई ॥४॥
अब सुनिये आपन मन लाई॥ ब्रजही चलो नहि और उपाईं ॥५ ॥
वेहें कृपासिधु करुणा कर।॥ क्षमा करेंगे श्रीसुंदरवर ॥६ ॥
और कछू मनमें जिन आनो ॥ हमजो कहें सत्य कर मानो ॥७ ॥
सूर सुरन यह बात सुनाई ॥ सुरपति शरण चल्यो नम ८ ॥ | Bilawal |
Chandan paherat aavat haye navrang rangilo .. | NityaPad-290 | चंदन पहेरत आवत हे नवरंग रंगीलो ॥
चंदनकों तन पाग पिछोरा चंदन छबिही छबिलो ॥१॥
चन्दनकी तन खोर कीए हें चन्द्र लागत अरबीलो ॥
कृष्णदास प्रभु परममनोहर लागत परम रसीलो ॥२॥ | Hameer |
Vraj bhayo-mahariken pootat jaba yeh baat sunee .. suni anande | Part1-001 | ब्रज भयो-महरिकें पूतत जब यह बात सुनी ॥ सुनि आनंदे
सब लोग गोकुल गणित गुनी ॥ ब्रज पूरब पूरे पुन्य रूपी कुल सुधिर थुनी ॥
ग्रह लग्न नक्षत्र बलि सोधि कीनी वेद धुनी ॥१॥ सुनि धाईं सब व्रजनारि
सहज सिंगार कियें ॥ तन पहरें नौतन चीर काजर नैन दियें ॥ कसि कंचुकी
तिलक लिलाट शोभित हार हियें कर कंकण कंचन थार मंगल साज लियें ॥२॥
वे अपने अपने मेल निकरसीं भांति भलीं ॥ मानों लाल मुनिनकी पांति पिंजरन
चूर चलीं ॥ वे गावें मंगलगीत मिलि दश पांच अलीं ॥ मानों भोर भयौ रवि
देखि फूली कमल कलीं ॥३॥ उर अंचल उड़त न जान्यौ सारी सुरंग सुहीं ॥
मुख मांड्यों रोरी रंग सेंदुर मांग छुह्टी ॥ श्रम श्रवनन तरल तरौना बेनी शिधिल
गुहीं ॥ शिर बरषत कुसुम सुदेश मानों मेघ फुहीं ॥४॥ पीय पहलें पौहोंचीं
जाय अति आनंद भरी ॥ लई भीतर भवन बुलाय सब शिशु पाँय परी ॥ एक
बदन उधारि निहारत देत असीस खरी ॥ चिरजीयो यशोदानंद पूरन काम करी
॥५॥ धन्य धन्य दिवस धन्य रात्र धन्य यह पहर घरी ॥ धन्य धन्य महरिजूकी
कूँख भागि सुहाग भरी ॥ जिन जायो एसौ पूत सब सुख फलन फरी ॥ विर
थाप्यो सब परिवार मनकी शूल हरी ॥६॥ सुनि ग्वालन गाय बहोरि बालक
बोलि लिये ॥ गुहि गुंजा घसि वनधातु अँग अँग चित्र ठये ॥ शिर दथि माखनके
मॉट गावत गीत नये ॥ संग झांझ मुदंग बजावत सब नंद भवन गये ॥७॥
एक नाचत करत कुलाहल छिर्कत हरद दही ॥ मानों बरखत भादोंमास नदी
घृत्त दूध बही ॥ जाको जहीं जहीं चित्त जाय कौतक तहीं तहीं ॥ रस आनंद
मगन गुवाल काहू बदत नहीं ॥८॥ एक धाय नंदजूपै जाय पुनि पुनि पॉँय
परे ॥ एक आप आपुहिं माँझ हँसि हँसि अंक भरें ॥ एक अंबर सवही उतारि
देत निशंक खरें ॥ एक दधिरोचन ओर दूब सबनके शीश धरैं ॥९॥ तब
नंद न्हाय भये ठाड़े अरु कुश हाथ धरें ॥ नांदीमुख पितर पुजाय अंतर सोच
हरे || घसि चंदन चारू मैँगाय विप्रन तिलक करें ॥ वर गुरुजन द्विजन पहराय
सवनके पॉय परें ॥१०॥ गन गैया गिनी न जाय तरुन सुबच्छ बढ़ी ॥ नित चरें यमुनाजूके काछ दूने दूध चढ़ी ॥ खुर रूपे तांबे पीठ सोने सींग मढ़ी ॥| ते
दीनी द्विजनन अनेक हरखिं असीस पढ़ी ॥११॥ तब अपने मित्र सुबंधु हँसि
हँसि बोलि लिये ॥ मधि मृगमद मलय कपूर माथें तिलक किये ॥ उर मणिमाला
पहराय बसन विचित्र दिये ॥ मानों बरषत मास अषाढ दादुर मोर जिये १ २॥
वर बंदी मागध सूत आंगन भवन भरै ॥ ते बोलें लै ले नाम हित कोऊ ना
बिसरै | जिन जो जाँच्यौ सो दीनी रस नंदराय ढरे ॥ अति दान मान परधान
पूरन काम करें ॥१३॥ तब रोहिनी अंबर मंगाय सारी सुरंग धनी ॥ ते दीन
बधून बुलाय जैसी जाय बनी ॥ वे अति आनंदित बहोरि निज गृह गोप धनी॥
मिलि निकसीं देत असीस रुचि अपुनी अपुनी ॥१४॥ तब घरघर भेरि मृदंग
पटह निसान बजे ॥ वर बांधी वंदनमाल अरु ध्वज कलश सजे ॥ तब ता
दे वे लोग सुख संपति न तजे ॥ सुनि सूर सबनकी यह गति जै हरि चरन
॥१५॥ | Devgandhar |
Doll parr deit paraspar taari .. baisari saun | Part3-375 | डोल पर देत परसपर तारी ॥ बैसरी सौं
अलके अरुझांनी तुम देखो नवल बिहारी ॥ १॥| उरसों उर नहिं टारत मोहन
नेकु करत नहिं न्यारी ॥ 'परमानंद' दास तहाँ ठाढ़ें तुम जीते हम हारी ॥२॥।
| Devgandhar |
Gharan chully sub kahee yashumatison .. deva manawat vachan vinatison ..1 .. | Part2-068 | घरन चली सब कही यशुमतिसों ॥ देव मनावत वचन विनतिसों ॥१ ॥
तुमबिन ओर नहीं हम जानें ॥ मुख स्तुति करत हम कहा बखानें॥२॥
जहांतहां ब्रजमंगल गानें॥ बाजत ढोल मृदंग निसानें ॥३॥
बहुत भांत करत पकवानें॥ नेवज कर धर साज वबिहानें ॥४ ॥
छुबत नहीं देव काज संकाने॥ देव भोगकों रहत डरानें ॥५ ॥
सूरदास हम सुरपति जाने ॥ ओर कोन एसो जिहिं माने ॥६ !। | Bilawal |
Maiya yaate bhaee aber.. aavat bhaaj gaee aeka gaiya jaay dhasi bunn | NityaPad-106 | मैया याते भई अबेर।। आवत भाज गई एक गैया जाय धसी बन
फेर ॥१॥ दोर ग्वाल सब वाके पाछे पकरनकी कर आस || चढकदंब पीतांबर
फेरच्यो आय गई मोपास ॥। २॥। में चुचकार पीठ कर फेर्यो लहडे लई लगाय |।
बतिया सुनत रसिकप्रीतमकी मनफूली यशुमति माय ।।३॥। | Gori |
Haa haa abb key moson kheliyen bahorin bhari | Part3-238 | हा हा अब के मोसों खेलियें बहोरिन भरि
हों आँख ॥ जो तुमारे परतीत नांडिजिय ललिता देहूसांख ॥१॥ जो अब
के न खिलायहो ये सबें हसेंगी मोहि ॥ बावा की सो पाय लागत हों यह
विनवत हों तोड़ि ॥२॥ अपने निकट सबन के देखत बोललेवो एकवार ॥
कुंददाम श्रीकंठतें हस मुखते देहोउगार ॥३॥ बहुत गुलाल उडाय सांबरे
दिनकर लीजे सांझ ॥ आलिंगन दे सांवरे कोऊ लखे न धूंधर मांझ ॥8॥
खेल फाग त्योहार मानिये आज हमारे धाम ॥ मदन मान मर्दन करो पिय
ब्रजपति पूरन काम ॥५॥ | Sarang |
Gaauun srivallabhanandan key guna laauun sadaa munn angsarojan |. | NityaPad-007 | गाऊं श्रीवल्लभनंदन के गुण लाऊं सदा मन अंगसरोजन |।
पाऊं प् रेम प्रसाद ततछिन गाऊं गोपाल गहे चितचोजन ॥।१॥
नवाऊं शीशरिझाऊं लाल आयो शरण यह जो प्रयोजन ॥
छीतस्वामी गिरिधरन श्रीविद्डल छबि पर बारूँ कोटि मनोजन ॥२॥। | Ramkali |
Angaabhushan janani utaarat .. | NityaPad-291 | अंगआभूषण जननी उतारत ॥
दुलरी ग्रीवमाल मोतिनकी केयुरले भुजा स्थाम निहारत ॥१॥
क्षुद्रावली उतारत कटीसेंत धरत महीपर मन वारत ॥
रोहिणी भोजन करहु चढाई वारवार कहि कर कर आरत ॥ २।।
भूखे भए स्याम हलधरपें यह प्रेम विचारत ।।
सूरदासप्रभु मात यशोदा पटल दुहन अंतर रज झारत ।।३॥ | Gori |
Laal tum pakari cassie baani | jabahin humm aavat bechan | Part1-222 | लाल तुम पकरि कैसी बानि | जबहीं हम आवत बेचन
तबहीं रोकत आनि ॥१॥ मन आनंद कहत मुँह कीसी नंदनंदनसों बात ।
घुंघटके ओझल डै देखति मन मोहन करि घात ॥२॥ हरिकरि लागी रहौ सब
अँचरा तनक दहीजु चखाय । श्री विह्डलगिरिधरनलालनें खायके दियौ
उठाय ॥३॥ | Devgandhaar |
Aaj aroon aroon dorre drigan lalke laagat hain atibhale.. | NityaPad-148 | आज अरून अरून डोरे दृगन लालके लागत हैं अतिभले॥
बंदन भरे पगन अलि मानों कुंजदलन पर चले ॥ १॥| लालकी पगियामें न समात
कुटिल अलक आलस झलमले ॥ नंददासप्रभु पोहोपन मध्य मानों मधुप गुंज
सोबत ते कलमल्ने ॥२॥ | Bilawal |
Bunny rawati aaj anupam naval | NityaPad-251 | बनी रावटी आज अनुपम नवल
उसीर सीतल अतिसार ॥ बेठेहें पियप्यारी दोउ पहर अरगजा सरस सुधार ॥१॥
'करत ब्यार नार नव ललिता निरखत रूप सुधा न अघाय ॥ रसिक प्रीतम जुग
केलि करत जल जुगजुग दसदीस रह्यो जस छाय ॥२॥ | Saarang |
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