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Sheetkal Ke Pad
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Kirtan Title | Page | Kirtan | Raag |
|---|---|---|---|
Dekhan deit naan barrin palake .. | NityaPad-282 | देखन देत न बैरिन पलके ॥
निरखतवदन लालगिरिधरको बीच परत मानों व्रजकीसलके ॥॥१॥
बनतेजु आवत वेणु बजावत गोरज मंडित राजत अलकें ॥
मार्थे मुकुट श्रवणमणिकुंडल ललित कपोलन झांई झलकें ॥२॥
ऐसे मुखदेखनकों सजनीकहा कियो यह पूत कमलकें ॥|
नंददास सब जडनकी यह गति मीन मरत भायेंनहिं जलकें ॥३॥ | Gori |
Chalhu radhike sujan tere hita gunanidhaan raas rachyo kunwar | Pustak1-322 | चलहु राधिके सुजान तेरे हित गुणनिधान रास रच्यो कुँवर
कान्ह तट कलिंदनंदिनी ॥
निर्तत युवती समूह रास रंग अति कौतूहल बाजत रसमूर मुरलिका आनंदिनी ॥१।|
बंसीबट निकट जहाँ परम रम्य भूमि तहाँ सकल सुखद बहत मलय वायु मंदिनी ॥
जाती ईषद विकास कानन अतिशै सुवास राकानिशि शरद मास विमल चंदिनी ॥२॥
कुंभनदासप्रभु निहार लोचनभर घोषनारि नखशिख सौंदर्य सीम दुख निकंदिनी ॥
विलसो भुज ग्रीव मेल भामिनी सुख सिंधु झेल गोवर्द्धधधरन केलि जगतवंदिनी ॥३॥ | Bilawal |
Bhayau madan paranchad aeye hari kheliye milli aaee .. | Part3-144 | भयौ मदन परंचड ए हरि खेलिए मिलि आई ॥
गोप सब मिलि मतो मतिए रोकिए ब्रज जाई ॥ १॥ तरनि-तनया तट बिपिन
में घेरि सकल समाई ॥ रैन दिन इकु ठौर रहिए छाँडिए बन गाई ॥२॥
साजिए कर कनक-पिचकाई बिबिधि रतन जराई ॥ तकि तकि चलाई सनमुख
डारिए मुसिकाई ॥३॥ जोरिए किन साज अपनों एकु एकु सिखाई ॥ ले
गुलाल मुँठिन भरि भरि भाजिए किलकाई ॥४॥ घोरि केसू कुँमकुमा रस
सीस कलस चढाई ॥ ताल, बीना, झांझ, किन्नरि, लेह ढ़फ मढ़वाई ॥५॥
दौरिए ब्रज बाल ऊपरि देह तिन हि हराई ॥ कुसुम पल््लव माल अपने
उर पहिराई ॥६॥ घोख काहु न जान कहिए दीजिए जु दुहाई ॥ लीजिए
अचरा पकरि कैं कीजिए मन भाई ॥७॥ अंग अंग अनंग प्रकटयों बिबसता
को पाई ॥ भवन भवन निसाँन लै लै फिरति उनमद भाई ॥|८॥ तान कोऊ
तोरि नाँचै फागु गीत गवाई || जाई पनघट एकुठे व्है बाल बृंद लराई ॥९॥
भयौ ब्रज में अतुल आनँद कहा रसना गाई | देव गन निज गेह भूलै केलि लखि सुखदाई ॥ १ ०॥ बसन भूषन दए रुचि सौं मोल सरस मँगाई ॥ पढ़ति
अस्तुती परसपर मिलि जियौ ब्रज के राई ॥११९॥ बिबिधि कुसुमनि होत
बरखा सुर बिमानन छाँई || कमल बदन निहारि ब्रज जन रहति मन अरुझाई
॥१२॥ देति सरबसु बारि मुख पै ध्रति चित में चाई ॥ कांनि करति न
युरु जनन की लसति भुज लपटाई ॥१३॥ बजे बाजे मुर॒झ, आबज ढ़ोल
अरू सहनाई ॥ गारी गावैं दिहुँनि सातैं हाव भाव बताई ॥१४॥ रँँगमँगे
नँंदलाल हरखे, हियो अधिक सिराई || कहा बरनौं बाल मति सौं जाति
सुधि बिसराई ॥१५॥ श्रीविट्ठलेश प्रताप कौों बल लेह निस दिन गाई ॥
यह लीला देरि “जन गिरिधरि” गहे जिन कै पाई ॥१६॥ | Aasawari |
Laalayati dolika munch shayanam . tilak gorochan bhaal | Part1-090 | लालयति दोलिका मंच शयनम् । तिलक गोरोचनं भाल
मुक्ताफले कुटिल कुंतल मुख चकित नयनम् ॥१॥ चरण संचालन मोद भरगायनं
प्रतिबिंब दर्शनेन मूदुलर हासम् | बाललीला परमपद सुनूपुरधरं भाषणोत्फुल्ल
नासाविकासम् ॥२॥ अंगुष्ठ चोषक गूढरस पोषक स्वल्प संतोषक कृष्णचंद्रम्।
गोपिका जनमनोमोद संपादन तदभिलषिता क्रृतौ विगततंद्रम् ॥३॥ | Ramkali |
Kunwarkunwari aaye daan chukai .. chumbat badan aaya dwaarmein | Part1-264 | कुँवरकुँवरि आये दान चुकाई ॥ चुंबत बदन आय द्वारमें
जसुमति रोहिनी लेत बलाई ॥१॥ लियें उठाय गोद अपनी में बैठी भवन में
जाई ॥ पूछत को जीत्यौ को हारबौ बोले मुरि मुसकाई ॥२॥ यह ब्योहार
दान को ऐसौ मेरी राधिका उमग्यौ चाहौ ॥ श्रीविइलगिरिधरनलाल संग योंही
खेलौ इने खिलाहो ॥३॥ | Bihagaro |
Nandanandan vrishbhan nrip nandini saras rituraj | Part3-055 | नंदनंदन वृषभान नृप नंदिनी सरस ऋतुराज
'बिहरत वसंते ॥ इत सखा संग शोभित श्रीगिरिवरधरन उत्तजुबति जनमध्य
राधा लसंते ॥१॥ सूरजा तट सुभग परम रवनी यबन सुखद मारूत मलय
मृदुबह॑ते ॥ प्रफुल्लित मल्लिका मालती माधवी कुहु कुह्डु शब्द कोकिल
हंसते ॥२॥ विविध सुर तीन गावत सुघर नागरी ताल कंठ ताल बाजत
मृदंगे ॥ वे नवीना अमृत कुंडली किन्न॑री झांझ बहु भांति चंग उपंगे ॥३॥
चंदनसु वंदन अबीर नव अरणजा मेदगोरा साख बहु घसंते ।| छिरकत
परस्पर सुदंपति रसभरे करत बहुकेलि मुसकनि हसंते ॥४॥ देखि सोभा
सुभग मोहे सिव विविध तहां थकित अमरेश लजित अनंगे ॥ गोविंद प्रभु
पिय हरिदास वर्यधर घोषपति युवतिजन मानभंगे ॥५॥ | Basant |
Vraj mandal anand bhayau . pragate shree mohanlal .. | Part1-061 | ब्रज मंडल आनंद भयौ । प्रगटे श्री मोहनलाल ॥
व्रजमंडल ॥ ब्रज जुबती चली भेट लै । हाथन कंचन थार ॥१॥ जाय जुरे
नंदरायपें | बाँधी बंदनवार ॥ जाय जुरे ॥ कुमकुमके दीये साथिये । सोहनी
मंगल गाय ॥२॥ कान्ह कुँवर देखन चले । हरखित होत अपार ॥ कान्ह॥
देखदेख व्रज सुंदीी । अपनौ तन मन वार ॥३॥ जसुम ति लेत बुलायके ।
अंबर दीये पहराय ॥ जसुमति ॥ आभूषन बहु भौंतिके । देत सबन मन
भाय ॥४॥ दे अशीश घरकों चले चिरंजीयो कुँवर कन्हाई ॥ दे अशीश ॥
सूरश्याम विनती करे | नंदराय मन भाई ॥५॥ | Rayso |
Gopi gopal laal raas mandal maanhi .. | Pustak1-344 | गोपी गोपाल लाल रास मंडल मांही ॥
थेई थेई थेई ताथिलांग निर्तत गल बांही ॥
द्ुम द्रम द्रुम द्रुम मृदंग झननननन रूप रंग ग्रग्रत ग्रग्रत ताधिलांग उघटित रसनारी ॥१॥
बीच बाल बीचलाल प्रति प्रति प्रति युति रसाल ओघट अति गति उताल निरख द्रग सिराई ॥
श्री राधा मुख शरद चंद पोंछत श्रम जल आनंद नंद नंदन लटक लटक करत मुकुट छांई ॥२॥
तततत थेई सुधर द्योत शशिय रथ क्यों मध्यनि ठाठ उरप तिरप लाग डाट दंपति अति सांधे ॥
गावत रस भरे रंग तान ताल सुर उमंग आनंद उपजत अनंग रीझत हरि राधे ॥३॥
ठाड़े व्योमन विमान देखत सुर शक भान देव अंगना निधान रीझ आ्राण वारे ||
चकित थकित जमुना नीर खग मृग डग मग शरीर जे जे बलवीर सूर बल सखा तिहारे ॥४॥ | Iman |
Podhe maaee lalan sez sukhakaari .. | NityaPad-340 | पोढे माई ललन सेज सुखकारी ॥
रत्नजटित सारोटा बैठी चांपत चरण वृषभान दुलारी ॥ १॥
चरणकमल कुच कलशनपर धरें अंगअंग पुलकितब्रजनारी ॥|
कर कर बीरी खवावत पियकों मधुरवचन बोलत मनुहारी ॥२॥
कंठ लगाय भुजदें सिरहानें अधर पान मुखकरत पियारी ॥
रीझउगार देत गोविंदप्रभु सुरत तरंग रंगरह्मों भारी ॥३॥ | Bihaag |
Aeye naina nainani saun khele horry .. laal laadili | Part3-340 | ए नैना नैननि सौं खेले होरी ॥ लाल लाड़िली
गुलाल उड़ावति पलकन की करि झोरी ॥ १॥ ऊघरत, मूँद्त मुठि चलावति,
कर-कर बैनन चोरी॥। 'हरिबल्लभ' प्रभु खेलैं होरी आनंद सिंधु झकोरी ॥२॥
| Adano |
Jhooli jhooli rajkumari chhabili pyaari. srikirati praan aadhaar | Part1-206 | झूली झूली राजकुमारी छबीली प्यारी। श्रीकीरति प्रान आधार
छवीली हो प्यारी ॥ सब सुंदरताकी सार छबीली हो प्यारी ॥टेक॥ नवल
कनकको पालनो प्यारी रतन जटित जराई ॥ गजमोतिनके झूमका प्यारी लटकत
परम सुहाई ॥१॥ आसपास झालर बनी प्यारी पीत जरीकी कोर । पचरेंग
- फोंदा पाटके प्यारी सोभित है चहुँ और ॥२॥ ऐसौ पलना लाड़िली प्यारी तोकों
बनायी सँवारि । तुम झूलो हों झूलाऊँ हो प्यारी अब किन छांडो ओर ॥३॥
कबहूँ किलक हँस हँस उठे प्यारी चितवत नैन बिसाल । जननी डीठ डर जानके
प्यारी देत चखोड़ा भाल ॥४॥ जरतारी टोपी लसे प्यारी झगुली पीत सुदेस॥
कंठ बघना कर पोहोंचियाँ प्यारी सोभित सुंदर वेस ॥५॥ माखनमिश्री देऊँगी
प्यारी घुटुरूवन चलौ सुहाई ॥ तेरे चरन रुनझुन करे प्यारी खटपद सुनत
लजाई ॥६॥ वह दिन केसौ होयगौ प्यारी तुतरे बैन बुलाई । मैया कही टेरे
तबै प्यारी सर्वस देहुँ लुटाई ॥७॥ मैया मनोरथ यों करै प्यारी जाकौ श्री कीरति
नॉऊ । दीजै यह फल रसिककों प्यारी श्रीवललभ गुन गाउँ ॥८॥ | Dhanashri |
Madangopal hathilaun ree maaee .| kaun bair bhaee humm taadi | Part1-221 | मदनगोपाल हठीलौं री माई ।| कौन बेर भई हम टाड़ी
रोकी कुँवर कन्हाई ॥१॥ दान लिये बिनु जान न देहों तुम्हें वखभान दुहाई॥
काहे कों रार बढ़ावत सुंदरि देहु हमारी दान चुकाई ॥२॥ दानही दान कहा
कहौ मोहन यह कैसी बनि आई । कुंभनदास प्रभु गोवरधनधर मुसकि ठगोरी
लाई ॥२॥ | Devgandhaar |
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