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Sheetkal Ke Pad
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Kirtan Title | Page | Kirtan | Raag |
|---|---|---|---|
Aho kaanh gaiya kahaan bisrani .. | NityaPad-288 | अहो कान्ह गैया कहां बिसरानी ॥
कहां चराई चलाई कौन वन कहांपिवायो पानी ॥१॥
भई सांझ बन माझ फिरत हो बोलत पंछी कोऊनवानी ॥
रसिकप्रीतम तुम भूलेसे फिरत कहा बात तिहारी जानी ॥२॥ | Hameer |
Krishna chandra aavenge merey aajari maaee bahutdinanaki avadhi | NityaPad-123 | कृष्ण चंद्र आवेंगे मेरे आजरी माई बहुतदिननकी अवधि
आज ॥ तनमन जोबन आनंदित वदनहास नयन सेनवेनमधुरथार मध्यकरकें
पहेलें मिलहोरी भेटसाज ॥। १॥ गृहगृहतें सखी बाल लेंहुरी अति प्रवीन वीनाकरधर
हरिसंग करहों रतिसुख समाज ॥ मकरंद नंद सुतकिशोर रिझ्ञबोंगी गानतान
आनआन आछेहूं कृष्ण रागरंग रिझायकें लेहोरी एक छत्रराज ॥२॥ | Bihagaro |
Raasmein rasik mohan baney bhamini .. | Pustak1-349 | रासमें रसिक मोहन बने भामिनी ॥
सुभग पावन पुलिन सरस सौरभनलिन मत्त मधुकर निरक शरदकी यामिनी ॥१॥
त्रिबिध रोचक पवन ताप दिनमणि दवन तहाँ ठाढ़े रवन संग शत कामिनी ॥
ताल बीणा मृदंग सरस नाथत सुधंग एकतें एक संगीतकी स्वामिनी ॥२॥
रागरागिन जमी विषिन बरखत अमी अधरबिंवन रमी मुरली अभिरामिनी |
लाग डाप उरप सप्तस्वरनसों सुलप लेत सुंदर सुभग राधिका नामिनी ॥३॥
ततथेईथेई करत गतिब नूतन धस्त पगन डगमग धरत मत्त गजगामिनी ॥
धाय नवरँग धरी उरसि राजत खरी उभय कलहंस हरिवंश घनदामिनी ॥४॥ | Kedaro |
Vrajaraani hoe suta palana jhulaavati | nirakhi nirakhi phooli | Part1-104 | व्रजरानी हो सुत पलना झुलावति | निरखि निरखि फूली
गुण गावति ॥१॥ कबहुँक कर लै झुनझुना बजावति । बारबार लै फिरकी
फिरावति ॥२॥ चुंबति मुख मन मोद बढ़ावति । कब्हुँक स्तन पान
करावति ॥३॥ चाहि रहत चित अचरज लावति । सुत सुखकौं कुल देव
मनावति ॥४॥ कबहुँक दुहुँकर पकरि नचावति | सुख समूह सब दुख
बिसरावति ॥५॥ गोद लियें सुत बाहिर आवति । ब्रज जुबतिनकीं खेल
दिखावति ॥६॥ सुत उछंग लै चंद्र बतावति | मधुर वचन कहि बोल
सिखावति ॥७॥ बड़भागिनि व्रजरानी कहावति | रसिक सदा यह लीला
भावति ॥८॥ | Aasawari |
Aaj nava kunjanki atishobha.. | NityaPad-230 | आज नव कुंजनकी अतिशोभा॥
करत विहार तहां पियप्यारी निरख नयन मन लोभा ॥|१॥|
रूपबरि सींचत निजजनकों उठत प्रेमकी गोभा।॥
परमानंदप्रभुजी चितवनी लागत चितको चोभा॥२॥ | Saarang |
Saaree hari ree choon kain paheri choli hari sub sondhe bharee .. | Part3-005 | सारी हरी री चून कैं पहेरी चोली हरी सब सोंधे भरी ॥
चूरी हरी अरू पोह्ोंची हरी री हाथन में मेंडदी गेहरी ॥१॥
पोत्त हरी मुख जोत खरी खरी जोबन जोत जडाब जरी ॥
नव कुंज हरी ब्रन भोमि हरी देखि सखी मेरी सुथरी ॥२॥ | Malkoos |
Shravan suni sajani ree baaje baaje mandilas . aaj nisi laagat | Part1-203 | श्रवण सुनि सजनी री बाजे बाजे मंदिलस । आज निसि लागत
परम सुहाई अति आवेस होत तन मनमें रावल बजत बधाई ॥१॥ दे दै कान
सुने और फूले रावलकी नर नारी । कीरति रानी कन्या जाई होत कुलाहल
भारी ॥२) आनंद भरे अकुलाय चली सखी सहज सुंदरी गोपी । प्रादुर्भाव
कीरति सुताको जासो तन मन ओपी ॥३॥ अति ऊंचे चढ-चढके टेरत पसर
उठे सब ग्वाल । गैया बगदावों रे मैया भई वृषभानके बाल ॥४॥ आय जुरे
सब गोप आपसे भयो सबन मन भायो | पंचामृत ढारत सीसनतें नावत वृषभान
नयायो ॥५॥ मंगल साज शुंगार मंगल मुखी चंचल कुंडल हार | हाथन कंचन
थार रहे लसी पग नुपूर झनकार ॥६॥ धन दिन धन यह प्रात आजकी सखी
धन धन थे गोपी । कुंवरी किसोरी चंदा निरखत अंखियां तृषित चकोरी ॥७॥
नाचत सिव सनकादि नारद हरद दही भर राजे । इत निसान उत भेरी दुंदुभी हरखि
परस्पर बाजे ॥८॥ जा सुखको सनकादिक इच्छत सो विलसत ब्रज गेही ।
कहे “भगवान हित रामराय' प्रभु प्रगटे प्राण सनेही ॥९॥ | Bihaag |
Nainan neend gaee ree aalee nishdin chhatiyaan lagyau hii rahat | Part1-291 | नैंनन नींद गई री आली निशदिन छतियाँ लाग्यौ ही रहत
धरकौ ॥ जबतें मोहन मुरली धुनि कीनी सुधि न रही री कछु और महा डर
घरकौ ॥१॥ छतियाँ उसास लेत नमदिया गारी देत सास तकत मेरे पाँयनकौ
खरकौ ॥ कैसेंके जईये कैसेंके दरसन पैये प्रभु कल्यान गिरिधरकौ मेरे हाथ
भयौ पाथर तरकौ ॥२॥। | Saarang |
Sugan manaay rahee vrajbala manbhaavan ghar aavanakon .. | NityaPad-233 | सुगन मनाय रही ब्रजबाला मनभावन घर आवनकों ॥
चंदन भवन लिपाय सोॉ ंज सज अरगजा अंग लगावनकों।। १॥
भोग राग रंग संपूरन आनंद अपनी रुचि उपजावनकों ।।
कृष्णदास गिरिधरन संग मिली बिरह व्यथा बिसरावनकों ॥२॥ | Bibhaas |
Srivallabh srivallabh srivallabh guna gaauun.. | Part2-309 | श्रीवल्लभ श्रीवल्लभ श्रीवललभ गुण गाऊं॥
निरखत सुंदर स्वरूप बरखत हरिरस अनूप द्विजवर कुल भूप सदां बल बल बल जाऊं ॥१ ॥
आगम निगम कहेत जाहि मुनि न लहें ताहि सकलकला गुणनिधान पूरण उरलाऊं॥
गोविंद प्रभु नंदनंदन श्रीलक्ष्मणसुत जगतवबंदन सुमिरत त्रैतापहरत चरणरेणु पाऊं ॥२ | Gouri |
Sur sutaa key kull douu | NityaPad-251 | सुर सुता के कुल दोऊ
मिल बेहेरत ॥ गुलाब कुसम कुसमनजो सवारी सेज हींडोरा करत ॥१॥ धर्यों
अरगजा सुगंध मिलाप ॥। त्रिविध पवन मन हरत ॥| कुसम माल ताहा: गुहें गुहें
राखी कुसम बिजना हलत ॥२॥ सखी सबे छीरकाव करतहे मानो पावस बरखत ॥
होद फुहारे ऊड़त हजारे घनसावन सोझरत ॥३॥ सुरमंडल ओर बिन
'मिलावत: वामसारंग सुर भरत॥ मधुर मधुर तहां मृदंग बजावत: तानन तालन
परत ॥४॥ सखी सबे सिंगार बनावत: ऊपमां को मनधरत ॥ परमानंदको भाव
कुँज मध: पग घुंघरू बजत।॥।५॥ | Saarang |
Kriparas nayan kamaldal phoole... bhru vilas dekhein kotik manmath rahey bhoole .. 9.. | NityaPad-316 | कृपारस नयन कमलदल फूले॥। भ्रू विलास देखें कोटिक मनमथ रहे भूले ॥ ९॥
वदनकमलपर कुटिल अलक छबि मोतिन हार अवतंस झूले ॥ गोविंदप्रभु प्यारी
संग बैठे जहां कालिंदी कूले | २॥ | Adano |
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