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Sheetkal Ke Pad

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Kirtan Title
Page
Kirtan
Raag
Chandaa chhip gayori piya pein chala pyaari dekh andheri raat .. way vihasalak savaarat
NityaPad-332
चंदा छिप गयोरी पिय पें चल प्यारी देख अंधेरी रात ॥ वे विहसअलक सवारत तुं बेठी इतरात ॥१॥ ए इतनो मान कित करत भामिनी छांड दे कित पांच सात ॥ गोविंद प्रभुसों मिले क्यों न भामिनी वृथा यामिनी जात ॥२॥।
Shankara Bharan
Mugdha tuu kitt karat vilambu .. tolon jaay que‍yon naan
Part2-340
मुग्धा तू कित करत विलंबु ॥ तोलों जाय क्‍यों न घर अपने भरि घट यमुना अम्बु ॥१ ॥ जो लों नाहि धरत हरि मुरली मोहन मंत्र अधर अवलंबु॥ सुधिकर देख तुही ब्रजपति जब बैठे बिटप कदंबु ॥२ ॥
Hameer
Doridori aavat mohi manawat damkharach kachhu molalairi ..
NityaPad-125
दोरीदोरी आवत मोहि मनावत दामखरच कछु मोललईरी ॥ अचरापसार के मोहि खिजावततहों तेरे बाबा की चेरी भईरी ॥ १॥॥ जारीजा सखी भवनआपने लखबातनकी एक कहीरी ॥ नंददास वे क्‍यों नहीं आवत उनके पायन कछु मेंहदी दईरी ॥॥२॥
Bihagaro
Merey kulkalmash sabahi naase dekh prabhaat prabhakarkanya ...
NityaPad-009
मेरे कुलकलमष सबही नासे देख प्रभात प्रभाकरकन्या ॥। वे देखो पाप जात जिततितते ज्यौं मृगराज देख मृगसन्‍्या ॥१॥ पोषत दे पयपान पुत्रलों हे जगजननी धन्य सुधन्या ॥ दियो चाहे गदाधरहुकों चरनकमलनिजभक्ति अनन्या ॥२॥ '
Bibhaas
Nand hoe barasaane kau dhaadhi . jaayau putra tihaaren sunike mohi
Part1-123
नंद हो बरसाने कौ ढाढ़ी । जायौ पुत्र तिहारें सुनिके मोहि अधिक रुचि बाढ़ी ॥१॥ कारनहै कीरति ताहूकें सोहै त्रिभुवनसार । बालिक बिरध तवीसावासी सबके यहै विचार ॥२॥ प्रीति पुरातन हती पहलेंही अब है परम सगाई । पुत्र तिहारी सुता भानुकी बिधिना बात बनाई ॥३॥ ढैहै जो जगदीश्वर करिहे तुम लै ढाढ़ी दान | हय गज हीर यूथ गाइनके अरु मुक्ताफल कान ॥४॥ अचिरकाल सुख आनि कहेंगे भक्ति देहु ममतात । अग्रदास ढाढ़ी प्रण कीनौ तबही दानकी बात ॥५॥
Paraj
Rangan rung hoe hoe horry khenle ladillo vrajrajko ..
Part3-109
रंगन रंग हो हो होरी खेंले लाडिलो ब्रजराजको ॥ सांबरे जात कमल दल लोचन नायक प्रेम समाजको ॥१॥ प्रथमहीं ऋतु बसंत बिलसे हलसे होरी डांडो रोप्यो ॥ मानो फाग प्राण जीवन धन आनंदित सब ब्रज ओप्यो ॥२॥ मृगमद मलय कपूर अगर केसर ब्रजपति बहुघोर धरे ॥ सरस सुगंध संवार संग दीये रंगन कंचन कलश भरे ॥३॥ प्रेमभरी खिलवारनके हित सुखके साज सिंगार कियें ॥ भाग्य अपार जसोदा मैया वारवार जलवार पियें ||४।। भई हे रंगीली भीरद्वारन प्रीतम दरशन कारनें ॥ अबबनठन निकसे मंदिरतें कोटि मदन कीये बारनें ॥५॥ फेंट भराय लई जननीपें आज्ञा लई ब्रजईशतें ॥ नंदराय तब रत्न पेंचरचि बांध्यो गिरिधर शीशतें ॥६॥ तापरमोर चंद्रका सोहे ग्रीवहरन लहकात हें ॥ मदनजीत को बानो मानो रूप ध्वजा फहरातहें ॥७॥ तेसेई सखा संगरंग भीने हरख परस्पर मनमोहे ॥ वरण वरण युवतिन के कमल मानों अंबर दिन मणि संग सोहे ॥८॥ आनंदभर बाजे बाजत हैं नाचत मधुमंगल रंगकिये || हरिकी हसन दशननकी क्िरिण नयननकी ढरनमनमोदि लिये ॥९॥ कोऊ द्वारे कोऊ चढ अटा कोऊ खिरकिन वदन सुहाये ॥ गोकुल चंद्रमा देखन को मानो चंद्र विमानन चढचढ आये ॥|१०॥ अबीर गुलाल उडाय चले देखत जेसें सब कोऊ हरखे ॥ छिरकत फिरत छेल नवरंगी कहा कहिये रस नवघन बरखे ॥ १ १॥ राधा दृष्टि परत नहीं मोहन निरख नयन मन घूमेंडों ॥ सनन्‍्मुख व्हेय पिय कल्प तरूवर महाभाग्य रसफल झूमेहो ||१ २॥ प्रमदा गण मणि श्यामा रसिक शिरोमणि सों खेलन आईं॥ दुद्ेंदिश शोभा उमग रंग मच्यो मानवेणु ध्वनि लाई ॥१३॥ नयनन बेनन खेलत वधू गेंदुक नवलासिन मारमची ॥ कमल नयन करले पिचकाई मृगनयन सेनन भ्रृंडनची ॥|१४॥ छिरकी छेल छबीली भांतन मनहरणी जोबन बारी ॥ सब अंग छींट बनी पिय वसनन फुलीं छबि फुलवारीं ॥|१५॥ पहोप पराग उडाय दाव रचि अछन अछन नेरे आई ॥ दौर दामिनीं घनघेरच्यो पिय बात बनीं सब मनभाई ॥१६॥ कोऊ मुख मांडत देगलबईयां कोऊ पोंछत आछी छबिसों ॥ अलकन भ्रोहन मूल रंग रह्मो शोभा कहियन जाय कविसों ॥१७॥ कोऊ रचि रूचि पान खबवावत पुलकित अधरन परस किये ॥ कोऊ भुज गह्हि डहकाय फगणुवा मागत पिय नयन चेन दिये ॥|१८॥ राधा नागरि स्याम सुंदरपर प्रीत उमग केसर ढोरी ॥ महामनोहर ताको राजा अभिषेक किये कहें हो हो होरी ॥ १ ९॥ सरस्वती सहित महामुनि मोहे यह शोभा दंपति हेरे || कहि भगवान्‌ हित रामराय प्रभु हँस चितवन वसीमन मेरे ॥२०॥
Bihagaro
Gokul barshat anand meha .. brahma shiv surpati jaake
Part1-014
गोकुल बरषत आनंद मेहा ॥ ब्रह्मा शिव सुरपति जाके बस सो प्रकट्यो नंदगेहा ॥१॥ बाजे बजत होत कुलाहल शब्द सुन्यो नरनारी॥ ताते चलिये भये भावते अब तन व्यथा निवारी ॥२॥ सजि सजि निकट गामके वासी आये महरिके धाम ॥ गलिनगलिनमें भीर भई बहु पग धरिवे नहीं ठाम ॥३॥ करिकै राय जुहार सबनसों भीतर लये बुलाई ॥ भले पधारेहो जू मेरे करत अनेक बड़ाई ॥४॥ दूध दही छिरकतहैं सबपै मुद्रित ग्वालिनी ग्वाल ॥ ग्रावत विमल विमलयश व्रजजन मंगलगीत रसाल ॥५॥ छिरकत हरद दही पय तरुनी अतिही शोभा देत ॥ हालत खोलत बोलत रसमय ब्रजजन भये सहेत ॥६।॥ अंबर भूषन द्रव्य रायजू दिये सबन मंगाय ॥ जैसौ जाके मनकी मान्यौ लेत हिये सचुपाय ॥७॥ अपने अपने टोल चले वे दे असीस सुखदैन ॥ क्ृष्णदास निरखि यह शोभा महा सिराये नैन ॥८॥
Devgandhar
Kharbuja mishree aarogat ravija tata kunjanmein giridhar ..
NityaPad-213
खरबूजा मिश्री आरोगत रविजा तट कुंजनमें गिरिधर ॥ 'ललिताचन्द्रभगा चन्द्रावली लावत डला डलैया भर भर ॥१॥ कोउ गोवत 'कोउ बेनु बजावत कोउ ढोरत विजना ले ले कर ॥ कोउ करत मनुहार जोर कर कोउ खवावत हसि वलल्‍लभवर ॥॥२॥ कोउ लावत कर तोर कुसुमकली कोउ गुहत वनदामभ बैठकर ॥ कोउ पहेरावत कोउ मुख निरखत कोउ देखावत ले दर्पण कर ॥३॥ कोउ आबत कोउ फिरत कुंजनमें कोउ बातें करत परस्पर ॥ 'कृष्णदास' ठाड़ो अवलोकत लेत बलेया बार फेर कर ॥४॥
Saarang
Chhaandi dehu yeh baani pyaare kamalanayan manmohana
Part3-152
छांडि देहु यह बानि प्यारे कमलनयन मनमोहना ॥ध्रु०॥ प्यारे आबत जाति सदा रहीं कबहुन देखी एसी रीत ॥ अनहोती श्रवनन सुनी केसें होय प्रतीत ॥|१।॥| गिरि घटियां उठि भोरढी मारण रोकत आय ॥ बहुरि अचानक सीसतें मदढुकीदेत ढुराय ॥२॥ ऐसी तुमहीन बूझिये अटकि रहत गहिबांड || मातपिता भैया सुने सांझपरत वन मांह ॥ ३॥ हँसतही मेमन मसतहो कह्ठि कहि मीठे बोल ॥ सेंतमें तक्‍यों पाइये यह गोरस निर्मोल ॥४॥ चन्रभुज प्रभु चित करखियो चितवनि नयन विशाल ॥ रतिजोरी मिसदानके गिरिगोवर्धनलाल ॥५॥
Dhanashri
Yeh mango sankarshanvir ..
NityaPad-355
यह मांगो संकरषणवीर ॥ चरणकमल अनुरागनिरंतर भावेमोहि भक्तनकी भीर ॥ १॥। संगदेहुतो हरिभक्तनको वासदेहो श्रीयमुनातीर श्रवणदेउतो हरिकधारस ध्यानदेहुतो स्थामशरीर ॥२॥ मनकामनाकरो परिपूरण पावनमज्जन सुरसरीनीर ॥ परमानंददासको ठाकुर त्रिभुवननायक गोकुल- पतिधीर ॥३॥
Bihaag
Yeh nita nemm jasodaju merein tiharelal ladyaavanakon . praat
Part1-090
यह नित नेंम जसोदाजू मेरें तिहारेलाल लड़्यावनकों । प्रात समय पालनें झुलाऊं संकंटभंजन जस गावनकों )॥१॥ नाचत कृष्ण नचावत गोपी कर कठताल बजावनकों | आसकरन प्रभु मोहन नागर निरखि बदन सचुपावनकों. ॥२॥
Ramkali
Horry khelein syaam sanga naval vaam vrishbhan vaam
Part3-202
होरी खेलें स्याम संग नवल वाम वृषभान वाम धननननन ॥ संग लिये ग्वाल बाल वाजत डफताल उडत गुलाल फननननन ॥१॥ उतबनी युवलाज दिये बेंदी आड भाल गावे मुख मारी एक मननननन ॥ जुरी हैं सकल नारी पकरे मुरारी लीने पटउतारी आंजे दृगशननननन ||२॥ भरे रंग माट अति विविध भांत घट मारत सांठ सननननन ॥ भीजे हे रंग चीर रहेसरीर त्रियदेहो दरस लागे लाज नयनननननन ॥ ३॥ फगणुवा मंगाय दियो मन मनाय लीयो कुंवर कुंवरि एक मननननन ॥ सूरदास प्रभु निरख दंपति सुख वारवारबल चरननननन ॥४॥ जू नयन चकोर ॥७।॥ लीनी हाथ कनक पिचकाई गोकुल के नरनार ॥ खेल मच्यो वृषभान पोरिमें कोऊन मानतहार ॥|८॥ उडत्त गुलाल अबीर कुंकुमा रह्मो दसोंदिस छाय ॥ प्रेम मणन भई फिरत ग्वालिनी आनंद उरन समाय ॥९॥ नील कमल लीने गोपिनकर ग्वालन दीये मार ॥ हो हो हो करि होरी खेलत देत परस्पर गार ॥१०॥ कोऊ हलधरकों कोऊ स्याम को करो कछू भेद उपाय ॥ सावधान व्है फिरत ग्वाल सब दृष्टि न इतउत जाय ॥१ १॥ सात पांच मिल गोप भेषधर हलघर पकरे जाय ॥ फेंट पकर वसकिये आपने छूटोगे आंखि अंजाय ॥१२॥ तब मोहन कीयों भेख सखी की ओरों सखी बनाय ॥ जाय गहे वृषभान नंदिनी दाऊ लिये छिडाय | १ ३॥ जित तितते सबधाई ग्वालिनि मोहन घेरेजाय | राधा कहे जान नहीं पावें मुरली लई हे छिनाय ॥१४।॥ श्रीराधा जाय गह़े मनमोहन अंचललियो छिडाय ॥ केनाचो केरहो हारतुम फगुवा देहो मंगाय ॥१५॥ मोहन सरक्ा बुलाय आपनो मेवा बहुत मंगाय ॥ आपुन चाखि चखावत ग्वालन गोपिन अंगुरी दिखाय ॥१६॥ तब प्यारी उठिधाय सखिनले मेवालियो छिडाय ॥ आपुन खाय खवाबत गोपिन ग्वाल रहे डहकाय ॥१७॥ मोहन हसिवस करी ज्वालिनी लीने सबे मनाय ॥ राधा माधो केलि करो दोऊ रति पति अति सुख पाय ॥१८॥ सिवविरंचि सुरपति सुधि विसरी चकृत रहो रथभान ॥ वरखत सुमन सुरेसत्रिया सब वारत तनमन प्रान ॥१९॥ युगल किशोर सदा मन मेरे रहो रस रूप समाय ॥ सूर स्यामस्यामा प्यारी छवि निरखत दृगन अघाय ॥२०॥
Kaafi
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