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Sheetkal Ke Pad

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Kirtan Title
Page
Kirtan
Raag
Joe russ rasik kiir muni saayo....
NityaPad-362
जो रस रसिक कीर मुनि सायो।॥। सो रस रटत रहत निशिवासर शेष सहस्रमुख पार न पायो ॥१॥ गावत शिव शारद मुनि नारद कमलकोश वासी न चखायो | यद्यपि रमारहत चरणनतर निगम न अगम अगाध बतायो॥ २॥। तरणितनयातट बंसीवट निकट वूंदाविपिन वीधिन बहायो ॥ सो रस रसिकदास परमानंद वृषभानसुता कुचबीच बसायो ॥। ३॥
Bihaag
Phool gaee vrishbhan dulari ..
Part2-246
फूल गई वृषभान दुलारी ॥ पहेले तो निरखत नेनन भर क्यों पूजों एकांतन न्‍्यारी ॥१ ॥ कर अंजन नेनन दे मोहन अपने हाथ जीमायो॥ अंग अंग सब भूषण भूषित बसन मनोहर तिलक करायो ॥२॥ रूप रास केसेंक बरनों नव नागरि नवनागर पायो॥ रति रस केलि करो दोउजन लीलारस परमानंद पायो ॥३ ॥
Saarang
Sughar piya aaye bhuj bharee kanth lagaaye nenan hiyo siraaye ..
NityaPad-053
सुघर पिय आये भुज भरी कंठ लगाये नेनन हियो सिराए ॥ खुले कपाट ठाड़ी मग जोबत सगरी रेन निवहाये ॥। १॥ को त्रिया के रति रंग राचे चारों जाम आनन नहिं पाये॥ रसिक प्रीतम ऐसे कबहू न कीजे बसि ब्रजजन सु पाये ॥२॥
Lalit
Pyarenarhin kariye yeh haansi ..
NityaPad-036
प्यारेनर्हिं करिये यह हांसी ॥ दीजेचीर जायग्रहकों सब हमतोतुझ्ारीदासी ॥।१॥ तुम ब्रजराजकुमार कहावत सबहिनके सुखरासी ॥ श्रीविद्ठनगिरिधरनलाल तुमरहत सदा वनवासी ॥। २॥॥
Ramkali
Doll bhalo singarayon phulani ..
Part3-369
डोल भलो सिंगारयों फुलनि ॥ वृन्दावन वंसीवट छैयां श्री जमुना के कुलनि ॥१॥ नंदनंदन वृषभान नंदिनी बैठे दोऊ जन झुलनि ॥ छिरकत केसर चोवा चंदन छाड्यो गुलाल अतुलनि || २॥ माँगति फगुवा सब ब्रज युवति कह्यो हमें जिन भूलति || वसन मँगाय दिये “ब्रजपति' तब ओरे रतन अतुलनि ॥३॥
Basant
Naachat raasmein gopal sanga mudit ghoshnari ..
Pustak1-332
नाचत रासमें गोपाल संग मुदित घोषनारी ॥ तरु तमाल श्यामलाल कनकवेलि प्यारी ॥१॥ चल नितंब किंकिणी कटि लोल बंक ग्रीवा ॥ राग तान मान सहित वेणु गान सीवा ॥२॥ श्रमजलकण सुभर भरे रंग रेंनु सोहै ॥ क्ृष्णदासप्रभु गिरिधर ब्रजजन मन मोहै ॥
Malav
Maaee mero hari nagarason neh. sunari sakhee que‍yonhun nahin
Part2-355
माई मेरो हरि नागरसों नेह। सुनरी सखी क्‍्योंहुं नहिं छुटत पूर्व जन्म सनेह ॥१ ॥ सब अंग निपुन सकल ब्रजसूंदर स्थाम बरन सब देह॥ जबतें द्रष्टि परी नंदनंदन तबतें बिसय्यों गेह॥२ ॥ कोउ निंदो कोउ बंदो मनको गयो संदेह॥ सरीता सिंधु मिलि परमानंद एक टिक बरस्योमेह ॥३ ॥
Goud Sarang
Dekhat nandkanh atisovat .. bhookhebhaye aap bunn bheetar yeh
NityaPad-127
देखत नंदकान्ह अतिसोवत ॥ भूखेभये आप बन भीतर यह कहि कहि मुख जोबत ।॥।|१॥ कह्यो नहीं मानत काहूको आप हठीले दोऊ बीर ॥ वारबार तन पोछत करसों अतिहि प्रेमकी पीर ॥२॥ सेज मंगाय लई तहां अपनी जहां स्थामबलराम ॥ सूरदासप्रभुके ढिंग सोईसंग पोढी नंदवाम ॥। ३।।
Bihaag
Mohan natwar-bapu kaachhen aavat goo-dhana sanga liain latkat .
NityaPad-284
मोहन नटवर-बपु काछें आवत गो-धन संग लिऐं लटकत । देखन को जुरि आईं सबै त्रिय मुरली-नादस्वाद-रस गटकत ॥ करत प्रवेस रजनी-मुख ब्रज में देखत रूप ह॒दै मैं अटकत । छीत-स्वामी गिरिधरन लाल- छबि देखत ही मन कहुं अनत न भटकत ॥
Gori
Jhundan gaavatahen shrajnari .. navsat saaj shringar
Part2-285
झुंडन गावतहें श्रजनारी ॥ नवसत साज श्रृंगार कनकतन पहेरें झूमक सारी ॥१ ॥ कंचन थार लियेंजु कमल कर मंगल साज सँवारी॥ दधि अक्षत अरु श्रीफल कुंकुम और दूब कुसुम मालारी ॥२॥ नाचत गावत करत कुलाहल उठीं देत कर तारी॥ श्रीलक्ष्मणगृह खेल मच्योहे भीर भई अति भारी ॥३॥ घरघर बांधी बंदनमाला मंगल कलश ध्वजारी॥ श्रीवललभ मुख कमल निरख छबि दास रसिक बलिहारी ॥४॥
Bilawal
Giridharan laal tere kaaranen ruchikar talp sawari .. baithe akele :
Part1-339
गिरिधरन लाल तेरे कारनें रुचिकर तल्प सवारी ॥ बैठे अकेले : कुंजमें नेंक चलौ हा हारी ॥१॥ कालिंदिके कूलपै फूलन महेल बनाय ॥ जल बरखत द्रूमकी लता सुरत पवन सुहाय ॥२॥ चली पिया पै भामनी बैठे नंदकिशोर ॥ अली गुंजत सघन बन बोलत कोकिल दादुर मोर ॥३॥ निरमल निशि शशी शरदकौ है वर्षाकौ अंत ॥ बहोरबौ रास मंडल रच्यौ सखि तिहारे कंथ ॥४)| जोबन रूप कुसुमकौ ताहि कौन पतीजै ॥| पछितायबेकौ मन रहे . सुखबिलास रस लीजै ॥५॥ दूति के बचन सुन राधिका मनमें अति रुचि बाढ़ी ॥| तन जो भूषण साजही भई तत्क्षण ठाढ़ी ॥६॥ निरबारत चली कुंज में जब मोहन सुधि पाय ॥ प्रभु मुकुंद माधो मिले रहसि कंठ लप्टाय ॥१॥
Rayaso
Merey ghar aavo nand nandan chandan curr raakhun atee sheetal |
NityaPad-302
मेरे घर आवो नंद नंदन चंदन कर राखूं अति शीतल | अपने कर लगाऊं सब अंग झीनो बसन दीपत झांई कल ॥। १॥। मेवा मिठाई बहो सामग्री कपूर सुवास मिश्री पना सुमल। कर हो बयार पहोप बिंजना ले गरे पहिराऊं माल तुलसीदल ॥२॥ कमलदलन की सेज बिछाऊं बांह धरो श्री राधा की गल। गिरिधरलाल लाडिली छबि देखत श्रीवललभ सिर पल ॥|३॥
Kanharo
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